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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७५
न्यायकन्दली
द्वित्वमारभ्यत इत्येककालनिर्देशः क्षणद्वयात्मकलवाख्यकालाभिप्रायेण । क्षणाभिप्रायेण तु
कालभेद एव, कार्यकारणयोः पूर्वापरकालभावात् । ज्ञानादर्थस्योत्पाद इति नालौकिक-
मिदम्, सुखादीनां तस्मादुत्पत्तिदर्शनात् । बाह्यार्थस्योत्पादो न दृष्ट इति न वैधर्म्यमात्रम्,
तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वस्योभयत्राविशेषात्। उभयगुणालम्बनस्य द्वित्वाभिव्यञ्जकत्वे
सिद्धे सति ज्ञानस्य तदा नानन्तर्य्यनियमोपपत्तिरिति चेत्, न, अनियमप्रसङ्गात् । यदि हि
द्वित्वमबुद्धिर्ज स्याद्रूपादिवत्पुरुषान्तरेणापि प्रतीयेत, नियमहेतोरभावात् । बुद्धिजन्ये तु
यस्य बुद्ध्या यज्जन्यते तत् तेनैवोपलभ्यत इति नियमोपपत्तिः । प्रयोगस्तु द्वित्वं बुद्धिर्जं
नियमेनेकप्रतिपत्तृवेद्यत्वात्, यन्नियमेनेकप्रतिपत्तृवेद्यं तद् बुद्धिर्जं यथा सुखादिकम् । नियमे-
नैकप्रतिपत्तृवेद्यं च द्वित्वं तस्मादिदमपि बुद्धिर्जम् ।
वायिकारण हैं । दोनों एकत्व रूप अनेकविषयक एकबुद्धि (अपेक्षाबुद्धि) निमित्त-
कारण हैं । जिस समय दोनों एकत्व संख्याओं की एकबुद्धि (अपेक्षाबुद्धि) उत्पन्न
होती हैं, उसी समय दोनों एकत्व संख्याओं से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । इसी
अभिप्राय से 'इत्येकः कालः' इस वाक्य से एक काल का निर्देश किया गया है ।
इस निर्देश वाक्य के 'एक काल' शब्द से दो क्षणात्मक 'लव'रूप काल अभिप्रेत है ।
क्षणात्मक काल के अनुसार वस्तुतः वे क्रियायें क्रमशः ही होती हैं; क्योंकि कारण
को पहले एवं कार्य को पीछे रहना आवश्यक है । ज्ञान से वस्तु की उत्पत्ति कोई
अलौकिक घटना नहीं है; क्योंकि ज्ञान से सुखादि की उत्पत्ति देखी जाती है ।
'ज्ञान से बाह्य वस्तु की सृष्टि नहीं होती है' यह कहना केवल बाह्य और आन्तर
दोनों वस्तुओं के भेद को ही प्रकट करता है; क्योंकि दोनों ही प्रकार की
अवस्थाओं के साथ ज्ञान का अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही समान रूप से देखे
जाते हैं । (प्र.) (द्वित्व के) दोनों आश्रयों में रहनेवाले दोनों एकत्वों से द्वित्व की
उत्पत्ति हो ही जायेगी, फिर उसके लिए अपेक्षाबुद्धि को भी कारण मानने की क्या
आवश्यकता है ? (उ.) द्वित्व को अगर बुद्धिजन्य न मानें तो साधारण्यरूप अनियम
की आपत्ति होगी; क्योंकि रूपादि साधारण विषयों की तरह सभी द्वित्व सभी
पुरुषों से गृहीत नहीं होते, किन्तु जिस पुरुष की अपेक्षाबुद्धि से जिस द्वित्व की
उत्पत्ति होती है; वह द्वित्व उसी पुरुष से गृहीत होता है और किसी पुरुष से
नहीं । इस प्रकार द्वित्व असाधारण है, साधारण नहीं । अतः अपेक्षाबुद्धि भी
द्वित्व का कारण है । (इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि)
नियमतः सुखादि की तरह जो कोई भी वस्तु नियमतः किसी एक ही पुरुष के
द्वारा गृहीत होती है, उसकी उत्पत्ति अवश्य ही बुद्धि से होती है । द्वित्व का ग्रहण
भी किसी एक ही पुरुष से होता है, अतः द्वित्व भी बुद्धि से उत्पन्न होता है ।

२७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
एवं द्वित्वस्योत्पन्नस्य प्रतीतिकाणं निरूपयति-ततः पुनरिति । ततो द्वित्वोत्पा-
दादनन्तरं द्वित्वसामान्ये तस्मिन् ज्ञानमुत्पद्यते । अत्रापि संयुक्तसमवाय एव हेतुः ।
एकत्वसामान्यापेक्षया पुनरिति वाचोयुक्तिः । द्वित्वसामान्यं द्वित्वगुणस्य विशेषणम्, न
चागृहीते विशेषणे विशेष्ये बुद्धिरुदेति,, अतो विशेष्यविज्ञानकारणत्वेनादौ सामान्यज्ञानं
निरूपितम् । अस्य सद्भावेऽपि द्वित्वसामान्यविशिष्टा द्वित्वबुद्धिरेव प्रमाणम् । तस्याः
सद्भावेऽपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं प्रमाणम् । द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं विशेषणज्ञानपूर्वकं
विशिष्टज्ञानत्वाद् दण्डीति ज्ञानवदित्यनुमिते गुणज्ञाने तस्यापि विशिष्टज्ञानत्वेन विशेषण-
ज्ञानपूर्वकत्वमनुमेयम् ।
ये तु विशेषणविशेष्ययोरेकज्ञानालम्बनत्वमाहुः, तेषां सुरभिचन्दन-
इस प्रकार से उत्पन्न द्वित्व के कारणों का निरूपण 'ततः पुनः' इत्यादि ग्रन्थ से
करते हैं । 'ततः' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति के बाद, 'तस्मिन्' अर्थात् संख्यारूप
द्वित्व में जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) का ज्ञान उत्पन्न होता है । जाति स्वरूप इस
द्वित्व के प्रत्यक्ष में संयुक्तसमवेतसमवाय सम्बन्ध ही कारण है । (द्वित्व के
आश्रयीभूत दोनों द्रव्यों में अलग-अलग) पहले एकत्व ही था, उसके बाद द्वित्व की
उत्पत्ति हुई-इस आनन्तर्य को समझाने के लिए ही 'पुनः' शब्द का प्रयोग है ।
जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) संख्यारूप द्वित्व का विशेषण है । विशेषण का ज्ञान
विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान का कारण है, अतः बिना विशेषण ज्ञान के विशेष्य
(विशिष्ट) ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इसीलिए सबसे पहले सामान्यरूप द्वित्व
के ज्ञान का ही निरूपण किया गया है । जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) विशिष्ट
संख्यारूप द्वित्व का ज्ञान सर्वजनीन है, इसी से प्रमाणित होता है कि जातिरूप
द्वित्व का भी अस्तित्व है । एवं 'द्वे द्रव्ये' इत्यादि आकार की विशिष्ट अनुभूतियों
से ही संख्यारूप द्वित्व की सत्ता प्रमाणित होती है । इस प्रसङ्ग में अनुमान का
प्रयोग इस प्रकार है कि जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' यह विशिष्ट बुद्धि केवल
विशिष्ट बुद्धि होने के कारण ही दण्डरूप विशेषण की सत्ता के बिना नहीं हो
सकती, उसी प्रकार 'द्वे द्रव्ये' इस आकार की विशिष्ट बुद्धि भी केवल विशिष्ट
बुद्धि होने के कारण ही संख्यात्मक द्वित्वरूप विशेषण के अस्तित्व के बिना सम्भव
नहीं है । अतः द्वित्व संख्या की सत्ता अवश्य है । द्वित्व संख्या की इस प्रकार से
अनुमिति हो जाने पर 'इस अनुमिति की भी उत्पत्ति विशिष्ट बुद्धि होने के कारण
ही जातिरूप द्वित्व विशेषण के अस्तित्व के बिना सम्भव नहीं है, अतः जातिरूप
द्वित्व की भी सत्ता अवश्य है' इस प्रकार द्वित्व संख्या की अनुमिति के बाद
जातिरूप द्वित्व का भी उक्त रीति से अनुमान करना चाहिए ।
जो कोई विशेष्य और विशेषण दोनों को (नियमतः) एक ही ज्ञान का
विषय मानते हैं, उनके सामने 'सुरभिचन्दनम्' इस ज्ञान का प्रसङ्ग रखना चाहिए;