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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९१
प्रशस्तपादभाष्यम्
का नाश मान लेने पर भी नहीं हो सकेगा; क्योंकि प्रत्यक्ष के द्वारा
केवल विद्यमान विषय ही प्रकाशित होते हैं । अतः यही कहना पड़ेगा
कि उक्त प्रत्यक्ष के समय तक द्वित्व का नाश नहीं होता । तस्मात्
सहानवस्थानरूप विरोध पक्ष में जो 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की अनुत्पत्तिरूप
आपत्ति दी गयी है, वह अयुक्त है । इसी प्रश्न का समाधान 'न,
आशूत्पत्तेः' इत्यादि से देते हैं । (उ.) नहीं, अर्थात् कथित द्रव्यप्रत्यक्ष के
समय द्वित्व का नाश अवश्य ही हो जाता है । 'द्वे द्रव्ये' यह एक ही
विशिष्ट ज्ञान नहीं है; किन्तु अलग-अलग दो ज्ञान हैं । अतिशीघ्रता से
उत्पन्न होने के कारण 'द्वे', 'द्रव्ये' एवं 'द्वे द्रव्ये' ये तीन ज्ञान 'द्वे द्रव्ये'
इस आकार के एक विशिष्ट ज्ञान की तरह मालूम पड़ते हैं । जैसे कि
'शब्दवदाकाशम्' यह एक विशिष्ट ज्ञान नहीं है; किन्तु 'शब्दः',
'आकाशः' एवं 'शब्दवदाकाशम्' ये तीन ज्ञान हैं, फिर भी क्रमशः
अतिशीघ्रता से उत्पन्न होने के कारण उन तीनों ज्ञानों में एक ही
विशिष्ट ज्ञान की तरह व्यवहार होता है, इसी प्रकार 'द्वे द्रव्ये' यहाँ भी
समझना चाहिए ।
न्यायकन्दली
द्वित्वप्रत्यक्षज्ञानस्य पूर्वक्षणवर्त्येवार्थो विषयः, अस्ति च 'द्वे द्रव्ये' इति ज्ञानोत्पादात्
पूर्वस्मिन् क्षणे द्वित्वमिति तदुपसर्जनता भव्येव । इदं त्विह वक्तव्यम्-द्वे
द्रव्ये इति ज्ञाने यथा द्रव्यं प्रतिभाति तथोपसर्जनीभूतं द्वित्वमपि, न चाविद्यमानस्य
द्वित्वस्य प्रतिभासो युक्तः । तस्मादेतदविनष्टमेव तदानीं विशेष्यज्ञानस्यालम्बनं स्यात्,
तदवभासमानतालक्षणत्वात् तदालम्बनताया इत्यत आह-नाशूत्पत्तेरिति ।
द्रव्यज्ञानकाले द्वित्वं न विनष्टमित्येतन्न, आशूत्पत्तेर्द्वित्वगुणज्ञानस्य द्रव्यज्ञानस्य च
नहीं (यह बात नहीं है); क्योंकि द्वित्व के सभी प्रत्यक्षों में पहले क्षण में
विद्यमान द्वित्व ही प्रतिभासित होता है । प्रकृत में भी 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान से
पहले क्षण में द्वित्व की सत्ता तो है ही, अतः द्वित्व में उक्त उपसर्जनता के रहने
में कोई बाधा नहीं है । इस प्रसङ्ग में यह आक्षेप किया जाता है कि 'द्वे
द्रव्ये' इस ज्ञान में द्रव्य की तरह द्वित्व का भी प्रतिभासित होना कहा गया है,
सो ठीक नहीं मालूम पड़ता; क्योंकि उक्त प्रत्यक्षात्मक ज्ञान में अविद्यमान
द्वित्व का प्रतिभास कैसे होगा ? अतः उक्त ज्ञान का अविनष्ट द्वित्व ही
अवलम्बन हो सकता है; क्योंकि उस ज्ञान में प्रतिभासित होना ही उस
ज्ञान का अवलम्बन होना है । इसी आक्षेप का समाधान 'न, आशूत्पत्तेः'
इत्यादि भाष्य से कहते हैं । अर्थात् 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के समय द्वित्व का नाश
हो जाता है; किन्तु 'आशूत्पत्ति' से (उक्त ज्ञान की उत्पत्ति होती है), अर्थात्

२९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
वध्यघातकपक्षेऽपि समानो दोष इति चेत् ? स्यान्मतम्-ननु
वध्यघातकपक्षेऽपि तर्हि द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः ? कथम् ?
द्वित्वसामान्यबुद्धिसमकालं संस्कारादपेक्षाबुद्धिविनाशादिति । न,
(प्र.) 'वध्यघातक' रूप विरोध पक्ष में भी तो द्रव्य ज्ञान
की अनुत्पत्ति रूप आपत्ति है ही; क्योंकि द्वित्वत्व जाति के ज्ञान
के समय ही संस्कार से अपेक्षाबुद्धि का नाश हो जाएगा । (उ.) नहीं;
न्यायकन्दली
शीघ्रमुत्पादात् क्रमस्याग्रहणे द्वित्वद्रव्ययोरेकस्मिन्नेव ज्ञाने प्रतिभास इत्यभिमानः ।
वस्तुवृत्त्या तु पूर्वं द्वित्वस्य प्रतिभासतदनु द्रव्यस्येत्यर्थः । अत्र प्रकृतानुरूपं दृष्टान्तमाह-
यथेति । शब्दवदाकाशमित्यत्र शब्दज्ञानमाकाशज्ञानं शब्दविशिष्टाकाशज्ञानं च त्रीणि
ज्ञानान्याशूत्पद्यन्ते यथा, तथा द्वित्वादिविज्ञानोत्पत्तावपि । किमुक्तं स्यात् ? यथा शब्दादि-
ज्ञानेष्वाशुभावितया क्रमस्याग्रहणे युगपत्प्रतिभासाभिमानस्तथा द्वित्वद्रव्यज्ञानयोरपीति ।
वध्यघातकपक्षेऽपि द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति केनचिदुक्तं
तदाशङ्कते-वध्यघातकपक्षेऽपीति । अस्यार्थं विवृणोति स्यान्मत-
मित्यादिना । यदि गुणबुद्धिसमकालं द्वित्वविनाशे द्रव्यज्ञानं नोत्पद्यते ?
'द्वे द्रव्ये' ये दो ज्ञान हैं, जो अत्यन्त शीघ्रता से एक के बाद उत्पन्न होते हैं । इस
शीघ्रता के कारण ही दोनों का अन्तर समझ में नहीं आता, एवं यह अभिमान
होता है कि 'द्वे द्रव्ये' इस आकार का एक ही विशिष्टज्ञान है, जिसमें द्वित्व और
द्रव्य दोनों ही प्रतिभासित होते हैं; किन्तु वस्तुतः यहाँ पहले (ज्ञान में) द्वित्व का
प्रतिभास होता है, पीछे (के ज्ञान में) द्रव्य का । 'यथा' इत्यादि से इस प्रसङ्ग के
अनुरूप दृष्टान्त देते हैं । अभिप्राय यह है कि 'शब्दवदाकाशम्' यहाँ पर शब्दज्ञान,
आकाशज्ञान एवं शब्दविशिष्ट आकाशज्ञान ये तीन ज्ञान क्रमशः अत्यन्त शीघ्रता से
उत्पन्न होते हैं । एवं इस अत्यन्त शीघ्रता के कारण ही तीनों ज्ञानों का अन्तर
गृहीत नहीं हो पाता और तीनों शब्द, आकाश और शब्दविशिष्ट आकाश इनके
एक ही समय प्रतिभासित होने का अभिमान होता है । वैसे ही द्वित्वज्ञान और
द्रव्यज्ञान इन दोनों में भी है ।
किसी की शङ्का है कि वध्यघातक पक्ष में 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यज्ञान
की अनुपपत्ति है ही । 'वध्यघातकपक्षेऽपि' इत्यादि से इसी शङ्का का उत्थापन
करके 'स्यान्मतम्' इत्यादि से उसकी व्याख्या करते हैं । अर्थात् द्वित्व रूप
गुणविषयक 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के समय ही द्वित्व के नष्ट हो जाने के कारण
द्रव्यविषयक उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति न भी हो फिर भी वध्यघातक
पक्ष में द्रव्य ज्ञान की अनुत्पत्ति रूप दोष है ही ।