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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४३
न्यायकन्दली
द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् । यत् स्यन्दनकर्मकारणं तद् द्रवत्वमित्यर्थः । त्रिद्रव्यवृत्ति
पृथिव्युदकज्वलनवृत्तीत्यर्थः । तत्तु द्विविधमिति । गुरुत्वमेकविधं द्रवत्वं तु द्विविधमिति
तुशब्दार्थः । नैमित्तिकं सांसिद्धिकं च । निमित्तं च वह्निसंयोगः, तस्येदं कार्यमिति
नैमित्तिकम् । सांसिद्धिकं च स्वभावसिद्धम्, वह्निसंयोगानपेक्षमिति यावत् । सांसिद्धिकमपां
विशेषगुणः, अन्यत्राभावात् । नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः, साधारणत्वात् ।
सांसिद्धिकस्य द्रवत्वस्य गुरुत्ववन्नित्या- नित्यत्वनिष्पत्तयः । यथा नित्यद्रव्यसमवेतं गुरुत्वं
नित्यम्, अनित्यद्रव्यसमवेतं च कार्यकारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशाद् विनश्यतीति तथा
सांसिद्धिकं द्रवत्वमपि ।
अत्र चोदयति-संघातदर्शनात् सांसिद्धिकद्रवत्वमयुक्तमिति चेद् आप्यस्य
हिमकरकादेर्द्रव्यस्य संघातदर्शनात् काठिन्यदर्शनादपां स्वभावसिद्धं द्रवत्व-
'द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम्' अर्थात् प्रसरण क्रिया का जो कारण वही 'द्रवत्व'
है । 'त्रिद्रव्यवृत्ति' अर्थात् पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में द्रवत्व रहता है ।
'तत्तु द्विविधम्' इस वाक्य में प्रयुक्त 'तु' शब्द से यह सूचित किया गया है कि गुरुत्व
तो एक ही प्रकार का है; किन्तु द्रवत्व दो प्रकार का है । 'नैमित्तिकं सांसिद्धिकञ्च'
इस वाक्य में प्रयुक्त 'नैमित्तिक' शब्द 'निमित्तस्येदं कार्यं नैमित्तिकम्' इस व्युत्पत्ति
से निष्पन्न है एवं इस 'निमित्त' शब्द का अर्थ है वह्नि का संयोग । (फलतः वह्नि
प्रभृति तैजस द्रव्य के संयोग रूप निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही नैमित्तिक द्रवत्व है)
स्वाभाविक द्रवत्व को सांसिद्धिक द्रवत्व कहते हैं । फलतः वह्नि प्रभृति तैजस
पदार्थों के संयोग के बिना ही जो द्रवत्व उत्पन्न हो उसे सांसिद्धिक द्रवत्व कहते हैं ।
'सांसिद्धिकोऽयं विशेषगुणः' सांसिद्धिक द्रवत्व जल का विशेष गुण है; क्योंकि वह
अन्य द्रव्यों में नहीं है । 'नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः' नैमित्तिक द्रवत्व
पृथिवी और तेज का सामान्य ही गुण है; क्योंकि वह दो द्रव्यों में समानरूप से रहता
है । 'सांसिद्धिकस्य' अर्थात् सांसिद्धिक द्रवत्व का 'गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः'
अर्थात् जिस प्रकार नित्य द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला गुरुत्व नित्य ही
होता है और अनित्य द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला गुरुत्व कारणगुणक्रम से
उत्पन्न होनेवाला कार्य होता है एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है,
उसी प्रकार द्रवत्व में भी समझना चाहिए । (अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाला द्रवत्व
भी नित्य है एवं कार्य द्रव्य में रहनेवाले द्रवत्व की उत्पत्ति कारणगुणक्रम से होती
है एवं विनाश आश्रय के विनाश से होता है) ।
'संघातदर्शनात् सांसिद्धिकद्रवत्वमयुक्तम्' इस सन्दर्भ के द्वारा आक्षेप किया गया
है कि हिम, करका प्रभृति जलीय द्रव्यों में 'संघात' अर्थात् काठिन्य देखा जाता है, अतः
जल में रहनेवाले द्रवत्व को स्वाभाविक मानना ठीक नहीं है । 'दिव्येन' इत्यादि सन्दर्भ
के द्वारा उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । सभी जलों में स्वाभाविक द्रवत्व की

६४४ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे द्रवत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तास्यः, तेन परमाणुद्रवत्वप्रतिबन्धात् कार्ये हिमकरकादौ द्रवत्यानुत्पत्तिः ।
नैमित्तिकं च पृथिवीतेजसोरग्निसंयोगजम् । कथम् ?
सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टादीनां कारणेषु परमाणुष्वग्निसंयोगाद् वेगापेक्षात्
कर्मोत्पत्तौ तज्जेभ्यो विभागेभ्यो द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् कार्यद्रव्य-
निवृत्तावग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षात् स्वतन्त्रेषु परमाणुषु द्रवत्वमुत्पद्यते,
(उ.) यह बात नहीं है; क्योंकि दिव्यतेज के साथ संयुक्त परमाणुओं में
द्रव्य का उत्पादक संयोग ही सङ्घात रूप होता है (अर्थात् उक्त
परमाणुओं का ही संयोग कठिन होता है)। इसी से जल का स्वाभाविक
द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है, जिससे जल से उत्पन्न होनेवाले पाला और
बरफ में सांसिद्धिक द्रवत्व की उत्पत्ति नहीं हो पाती ।
अग्नि के संयोग से पृथिवी और तेज (इन दोनों ही) में नैमित्तिक
द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । (प्र.) किस प्रकार ? (इनमें नैमित्तिक द्रवत्व
की उत्पत्ति होती है ?) (उ.) घृत, लाह, मोम (मधूच्छिष्ट) प्रभृति द्रव्यों
के उत्पादक परमाणुओं में वेग की सहायता से अग्निसंयोग के द्वारा
क्रिया की उत्पत्ति होती है । उस क्रिया से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न
होते हैं । इस विभाग से उक्त परमाणुओं में रहनेवाले (द्व्यणुक के)
उत्पादक संयोग का विनाश होता है । इस (संयोगविनाश) से घृतादि
कार्य द्रव्यों के नाश हो जाने के बाद उष्णता की सहायता से अग्निसंयोग
के द्वारा स्वतन्त्र (परस्परासम्बद्ध) परमाणुओं में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है ।
न्यायकन्दली
मित्युक्तम् । समाधत्ते—दिव्येनेति । सर्वत्रोदके स्वभावसिद्धस्य द्रवत्वस्योप-
लम्भादपां स्वभावसिद्धमेव द्रवत्वं तावन्निश्चितम् । यत्र तु हिमकरकादौ
कार्ये द्रवत्वानुत्पत्तिस्तत्र दिव्येन तेजसा सम्बद्धानामाप्यपरमाणूनां परस्परसंयोगो
उपलब्धि होती है, इससे समझते हैं कि जल का द्रवत्व स्वाभाविक ही है ।
हिमकरकादि जलीय द्रव्यों में द्रवत्व की जो उत्पत्ति नहीं होती है, उसका
हेतु यह है कि दिव्य तेज के साथ उन द्रव्यों के उत्पादक परमाणु सम्बद्ध
रहते हैं, अतः उन परमाणुओं के द्रव्योत्पादक संयोग संघातात्मक होते हैं,
जिससे हिमकरकादि के सांसिद्धिक द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाते हैं । (प्र.)
'तेज के संयोग से सांसिद्धिक द्रवत्व का प्रतिरोध होता है' यह किस प्रमाण
से समझते हैं ? (उ.) अनुमान के द्वारा समझते हैं; क्योंकि हिमकरकादि से भिन्न