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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

२५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
रूपादीनां सर्वेषां गुणानां प्रत्येकम्परसामान्यसम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा
भवन्ति ।
रूपादि सभी गुणों के रूपादि नाम इसलिए हैं कि उनमें (रूपत्वादि)
अपर जातियों का सम्बन्ध है ।
न्यायकन्दली
सम्प्रति प्रत्येकं गुणानां परस्परवैधर्म्यप्रतिपादनार्थमाह-रूपादीनामिति । रूपमादिर्येषां
तेषामेकैकं प्रत्यपरजाते रूपत्वादिकायाः सम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा रूपमिति रस इति संज्ञा
भवन्ति । रूपत्वाद्यपरसामान्यकृता रूपादिसंज्ञा रूपादीनां प्रत्येकं वैधर्म्यम् । रूपत्वसामान्यं
नास्तीति केचित्, तदयुक्तम्, नीलपीतादिभेदेषु रूपं रूपमिति प्रत्ययानुवृत्तेः । चक्षुर्ग्राह्य-
तोपाधिकृता तदनुवृत्तिरिति चेत्, न, तेषां रूपमित्येवं चक्षुषाऽग्रहणात् । तद्ग्राह्यतानिमित्तत्वे
हि ग्रहणानन्तरं तथा प्रत्ययः स्यात् । चक्षुर्ग्राह्यता तद्ग्रहणयोग्यता, सा च नीलादिषु
त्रिकालावस्थायिनीति चेत् ? अस्तु कामम्, किन्त्वेषा यदि प्रतिरूपं व्यावृत्ता,
प्रत्ययानुगमो न स्यात्, एकनिमित्ताभावात् । अथानुवृत्ता, संज्ञाभेदमात्रम् । एवं
रसादयोऽपि व्याख्याताः ।
वाक्य का अर्थ है कि रूपादि गुणों में से प्रत्येक में रूपत्वादि स्वरूप अपर जातियों
के सम्बन्ध से रूप, रस आदि संज्ञायें होती हैं । रूपादि नाम ही रूपादि गुणों के
असाधारण धर्म हैं, जिनकी मूल हैं रूपत्वादि जातियाँ । कोई कहते हैं कि (प्र.)
रूपत्व नाम की कोई जाति नहीं है । (उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि
नीलपीतादि विभिन्न रूपों में 'यह रूप है' इस एक प्रकार की (अनुवृत्ति) प्रतीति
होती है । ( प्र.) सभी रूप आँख से देखे जाते हैं, इसी से सभी रूपों में एक
आकार की प्रतीति होती है । (उ.) नीलपीतादि में 'यह रूप है' इस आकार की
प्रतीति आँख से नहीं होती है, अगर चक्षु से गृहीत होने के कारण ही नीलादि में
'यह रूप है' इस प्रकार की प्रतीति हो, तो फिर चक्षु के द्वारा ग्रहण के बाद ही
'यह रूप है' इस प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । (प्र.) 'चक्षुर्ग्राह्यत्व' (चक्षु से
गृहीत होने ) का अर्थ है-चक्षु के द्वारा गृहीत होने की स्वरूपयोग्यता, यह तो
नीलादि में तीनों कालों में है ही । (उ.) मान लिया कि है; किन्तु यह योग्यता
नीलादि प्रत्येक रूप से अगर अलग-अलग है तो फिर 'सभी रूपों में ये रूप है'
इस एक आकार की प्रतीति नहीं होगी; क्योंकि उसका कोई एक कारण नहीं है ।
अगर चक्षुर्ग्राह्यता सभी रूपों में एक है, तो फिर जाति को मान लेने में कोई
विवाद ही नहीं रह जाता है । इसी प्रकार से रसादि की भी व्याख्या हो जाती है ।