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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९९
न्यायकन्दली
इन्द्रियसमनन्तरप्रत्यययोरपि ग्राह्यतापत्तिः । ताभ्यामपि हि ज्ञानमुत्पद्यते, बिभर्ति च
तयोर्यथास्वं विषयग्रहणप्रतिनियमं बोधात्मकं च सारूप्यम् । अथ मतं
यदेतद्विषयग्रहणप्रतिनियतत्वमिन्द्रियसारूप्यं विज्ञानस्य, यदपि समन्तरप्रत्ययसारूप्यं
बोधात्मकत्वम्, तदुभयमपि सर्वज्ञानसाधारणम्, असाधारणं तु विषयसारूप्यम्, नीलज
एव नीलज्ञाने नीलाकारस्य सम्भवात् । यश्चासाधारणो धर्मः स एव नियामक
इत्येतावता विशेषेण ज्ञानमर्थं गृह्णाति नेन्द्रियसमनन्तरप्रत्ययाविति । तदयसारम्,
समानविषयस्य समनन्तरप्रत्ययस्य ग्रहणप्रसङ्गात् । यो विज्ञाने नीलाद्याकारमर्पयति स एव
तस्य ग्राह्यः, नच धारावाहिकविज्ञाने समनन्तरप्रत्ययान्नीलाद्याकारस्योत्पत्तिः, किन्त्वर्थादस्यैव
तदुत्पत्तावन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्योपलब्धेर्बोधाकारोत्पत्तावेव बोधस्य
सामर्थ्यावगमादिति चेत् ? नीलाद्याकारसमर्पको ग्राह्य इति कस्येयमाज्ञा ? नान्यस्य कस्यचित्,
तस्यैव तु ग्राह्यत्वस्वभावनियमो नियामकः । एवं चेत् स्वभावनियमादेव नियमोऽस्तु,
इन दोनों से अर्थ का ग्रहण होता है, अतः ज्ञान अपने उत्पादक अर्थक्षण का ही
ग्राहक है और किसी का नहीं । (प्र.) तो फिर इन्द्रिय और समनन्तरप्रत्यय (मन)
इन दोनों में भी ग्राह्यता आएगी; क्योंकि वे दोनों मिलकर ज्ञान का उत्पादन करते
हैं । एवं ज्ञान उन दोनों से ही क्रमशः विषयग्रहण का नियम और बोधात्मकत्वरूप
सादृश्य का लाभ करता है । अगर यह कहें कि (प्र.) ज्ञान में नियतविषयग्राहकत्व
इन्द्रिय का सादृश्य एवं बोधात्मकत्वरूप समनन्तरप्रत्यय (मन) का सादृश्य है, तो
फिर ये दोनों तो सभी ज्ञानों में समान रूप से हैं । ज्ञान में विषय से ही
असाधारण्य होता है; क्योंकि नीलरूप विषयजन्य ज्ञान में ही नीलाकारता सम्भव
है । आधारण धर्म ही नियामक होता है, इसी विशेष के कारण ज्ञान (अपने जनकों
में से) विषय को ही ग्रहण करता है, इन्द्रिय और समनन्तरप्रत्यय (मन) को नहीं;
किन्तु इस कथन में भी कुछ तत्त्व नहीं है; क्योंकि (नीलादिविज्ञान से नीलादि
वस्तुओं की तरह समान नीलादिविषयक) समनन्तरप्रत्यय के ग्रहण की आपत्ति
तब भी होगी । (उ.) जो वस्तु विज्ञान में नीलादि विषय के आकार का सम्पादन
करती है, वही वस्तु उस विज्ञान की ग्राह्य है । धारावाहिक ज्ञान में भी समनन्तरप्रत्यय
से नीलादि आकार की उत्पत्ति नहीं होती; किन्तु नीलादि अर्थों से ही होती है;
क्योंकि आकार के प्रति अर्थ ही कारण है, चूँकि उसी के साथ आकार का अन्वय
और व्यतिरेक है । एवं बोध में बोधाकार की उत्पत्ति का सामर्थ्य भी देखा जाता
है । (प्र.) यह किसकी आज्ञा है कि विज्ञान में नीलादि आकार का जो सम्पादक
हो वही विज्ञान का ग्राह्य हो ? (उ.) विज्ञान के साथ विषय ग्रहण का जो नियम
है, वही उक्त नियम का सम्पादक है । किसी की आज्ञा से यह नियम नहीं
बनाया गया है । (प्र.) फिर स्वभाव के नियम से ही उक्त नियम मानिए । ज्ञान

३०० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
ज्ञानं हि स्वसामग्रीप्रतिनियतार्थसंवेदनात्मकमेवोपजायते । अर्थोऽपि संवेद्यस्वभावनियमादेव
संवेद्यते, नेन्द्रियादिकमित्यकारणमाकारः । न हि छिदिक्रिया वृक्षाकारवती येनेयं वृक्षेण
सह सम्बद्ध्यते न कुठारेण; किन्त्वस्या वृक्षस्य च तादृशः स्वभावो यदियमत्रैव नियम्येत
नान्यत्र । अस्येदं संवेदनमिति च व्यवस्था तदवभासमात्रनिबन्धनेवेति तदर्थमप्याकारो न
मृग्यः ।
अथ साकारेण ज्ञानेनार्थो न संवेद्यत एव, किन्तु स्वाकारमात्रम् । तदर्थसद्भावो
निष्प्रमाणको न तावदर्थस्य ग्रहणम्, न चाध्यवसायो विकल्पो ह्यवशिष्यते, स
चोल्लेखमात्रव्यापारो भवन्नपि प्रत्यक्षपृष्ठभावित्वाद्यत्र प्रत्यक्षं प्रवृत्तं तत्र स्वव्यापारं
परित्यज्य कारणव्यापारमुपाददानो वस्तु साक्षात्करोति । यत्र तु प्रत्यक्षमेवाप्रवृत्तं तत्र
विकल्पोऽप्यसमर्थ एव, कारणाभावात् । ज्ञानाकारः सदृशं कारणं व्यवस्थापयन्नर्थ-
सिद्धौ प्रमाणमिति चेत् ? तत्किमिदानीं स्थूलाकारस्य समर्पकोऽप्यर्थो बहिरस्ति ? का
गतिरस्य वचनस्य -
तस्मान्नार्थेन विज्ञाने स्थूलाभासस्तदात्मनः ।
एकत्र प्रतिषिद्धत्वाद् बहुष्वपि न सम्भवः ॥ इति ।
अपने कारणों से नियमित विषय से ही उत्पन्न होता है । एवं अर्थ भी अपने
ग्राह्यरूप स्वभाव से ही विज्ञान के द्वारा गृहीत होता है, अतः विज्ञान में
आकार का कोई उत्पादक नहीं है । जैसे कि वृक्ष की कुठारजनित छेदन-क्रिया
वृक्ष-रूप आकार से युक्त नहीं है, फिर भी वह वृक्ष के साथ ही सम्बद्ध होती है,
कुठार के साथ नहीं । अतः यह कल्पना सुलभ है कि छेदनक्रिया और वृक्ष दोनों
का ही यह स्वभाव है कि वह छेदनक्रिया वृक्ष में ही नियमित रहे, अतः 'यह
ज्ञान इसी विषयक है' इस नियम के लिए भी किसी आकार को खोजने की
आवश्यकता नहीं है ।
अगर यह कहें कि साकार विज्ञान से अर्थ गृहीत नहीं होता है, केवल
विज्ञान का अपना आकार ही गृहीत होता है, अतः अर्थ की सत्ता ही
अप्रामाणिक है, क्योंकि अर्थों का ग्रहण ज्ञानरूप भी नहीं हो सकता, अध्यवसाय
रूप भी नहीं, किन्तु अर्थों का केवल विकल्परूप ज्ञान ही हो सकता है । वह
अगर होता भी है तो प्रत्यक्ष के पीछे होता है, जहाँ प्रत्यक्ष प्रवृत्त भी होता है, वहाँ
अपने व्यापार को छोड़कर अपने कारणादि के व्यापार को (विकल्परूप ज्ञान
के द्वारा) ग्रहण कर वस्तु का साक्षात्कार करा देता है । जहाँ प्रत्यक्ष की
प्रवृत्ति नहीं होती है, वहाँ कारण के न रहने से विकल्प भी असमर्थ ही है । (उ.)
ज्ञान का आकार ही अपने सदृश कारण को सिद्ध करते हुए अर्थसिद्धि का
भी जनक प्रमाण है । (प्र.) क्या यह कहना चाहते हैं कि घटादि स्थूल आकार
का सम्पादक भी बाहर ही है ? तो फिर आपके इस वाक्य की क्या गति
होगी ? अतः विज्ञान में विज्ञानात्मक स्थूल वस्तु का अवभास नहीं होता है ।