वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३७
प्रशस्तपादभाष्यम्
वा तदा जीवनसहाययोर्वैकल्यात् तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात्
प्राणनिरोधे सत्यन्याभ्यां लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यामात्म-
मनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीराद् विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते ।
मृत) शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग के उत्पादन
में उन्हें आत्मा और मन के संयोग के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है ।
इस विभाग से ही मन में 'अपसर्पण' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है । उस
न्यायकन्दली
तयोरुपभोगात् प्रक्षयो विनाशोऽन्योन्याभिभवो वा परस्परप्रतिबन्धात् स्वकार्याकरणं वा,
ततो जीवनसहाययोः धर्माधर्मयोर्वैकल्येऽभावे सति तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्याद् जीवन-
पूर्वकस्य प्रयत्नस्य वैकल्यादभावात् प्राणवायोनिरोधे सति पतितेऽस्मिन् शरीरे याभ्यां
धर्माधर्माभ्यां देहान्तरे फलं भोजयितव्यं तौ लब्धवृत्ती भूतौ यैहिकशरीरोपभोग्यधर्माधर्म-
प्रतिबद्धत्वाद् देहान्तरोपभोग्याभ्यां धर्माधर्माभ्यां कार्यं न कृतम् । यदा त्वैहिकशरीरोपभोग्यौ
धर्माधर्मौ प्रक्षीणौ तदा देहान्तरोपभोग्यधर्माधर्मयोर्वृत्तिलाभः प्रतिबन्धाभावाज्जातः । ताभ्यां
लब्धवृत्तिभ्यामैहिकदेहोपभोग्यात् कर्मणोऽन्याभ्यामात्ममनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीरा-
न्मनसो विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते ।
का संयोग ही 'जीवन' है । इस जीवन से जो कार्य उत्पन्न होंगे, धर्म और अधर्म
उनके सहकारिकारण हैं । जिस समय उपभोग से उनका 'प्रक्षय' अर्थात्
विनाश हो जाएगा या 'अन्योन्याभिभव' अर्थात् परस्पर एक-दूसरे के प्रतिरोध के
कारण दोनों अपने काम में अक्षम हो जाते हैं, उस समय जीवन (उक्त
आत्ममनःसंयोग) के सहायक धर्म और अधर्म के 'वैकल्य' से अर्थात् अभाव के
कारण 'तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात्' अर्थात् जीवन से उत्पन्न होने वाले प्रयत्न के
अभाव से प्राणवायु का निरोध हो जाता है । जिससे इस शरीर का पतन हो
जाता है । इस शरीर के पतन के बाद जिन धर्मों और अधर्मों से दूसरे शरीर के
द्वारा उपभोग करना है, उन धर्मों और अधर्मों में कार्य करने की क्षमता आ
जाती है । वर्तमान शरीर के द्वारा उपभोग के कारणीभूत धर्म और अधर्म से
प्रतिरुद्ध होने के कारण ही वे धर्म और अधर्म अपने उन उपभोगरूप कार्यों से
विरत रहते हैं, जिनका सम्पादन दूसरे शरीर से होना है । जिस समय ऐहिक
शरीर के धर्म और अधर्म नष्ट हो जाते हैं या असमर्थ हो जाते हैं, उस समय
दूसरे शरीर के द्वारा उपभुक्त होनेवाले धर्म और अधर्म अपना कार्य प्रारम्भ कर
देते हैं; क्योंकि उनका कोई प्रतिबन्धक नहीं रह जाता । ऐहिक शरीर से उपभोग्य
इन धर्म और अधर्म से भिन्न एवं जीवनरूप आत्ममनःसंयोग के सहायक अथ च
कार्यक्षम इन दूसरे धर्म और अधर्म से मन में अपसर्पण क्रिया उत्पन्न होती है,
जिससे मृत शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है ।
७३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ततः शरीराद् बहिरपगतं ताभ्यामेव धर्माधर्माभ्यां समुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण
सम्बध्यते, तत्संक्रान्तं च स्वर्गं नरकं वा गत्वा आशयानुरूपेण शरीरेण
सम्बद्ध्यते, तत्संयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति ।
शरीर से निकला हुआ मन उन्हीं धर्मों और अधर्मों से उत्पन्न आतिवाहिक
शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । उस शरीर के साथ सम्बद्ध होकर ही
मन स्वर्ग या नरक को जाता है और वहाँ जाकर स्वर्ग या नरक के
भोगजनक धर्म और अधर्म के अनुरूप दूसरे शरीर के साथ सम्बद्ध
न्यायकन्दली
अपसर्पणकर्मोत्पत्तावात्ममनः संयोगोऽसमवायिकारणम्, मनः समवायिकारणम्, लब्ध-
वृत्ती धर्माधर्मौ निमित्तकारणम् । ततस्तदनन्तरं तन्मनो मृतशरीराद् बहिर्निर्गतं
ताभ्यामेव लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यां सकाशादुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बद्ध्यत ।
तत्संक्रान्तं तदातिवाहिकशरीरसंक्रान्तं मनः स्वर्गं नरकं वा गच्छति । तत्र गत्वा
आशयानुरूपेण कर्मानुरूपेण शरीरेण सम्बद्ध्यते । स्वर्गे नरके वा यदुपजातं शरीरं तत्र
तावन्मनःसम्बन्धेन भवितव्यम्, अन्यथा तस्मिन् देशे भोगासम्भवात् । न चात्मवद्गत्यैव
मनसो देहान्तरसम्बन्धोऽस्ति, अव्यापकत्वात् । गमनं च तस्येतावद् दूरं केवलस्य न
सम्भवति, महाप्रलयानन्तरावस्थाव्यतिरेकेणाशरीरस्य मनसः कर्माभावात् । तस्मान्मृत-
शरीरप्रत्यासन्नमदृष्टवशादुपजातक्रियैरणुभिर्ह्यणुकादिप्रक्रमेणारब्धमतिसूक्ष्ममनुपलब्धियोग्यं
आत्मा और मन का संयोग मन की इस अपसर्पण क्रिया का असमवायिकारण
है एवं मन समवायिकारण है तथा कार्यक्षम धर्म और अधर्म उसके निमित्तकारण
हैं । 'ततः' अर्थात् इसके बाद मृत शरीर से निकला हुआ वही मन अपने कार्य के
उत्पादन में पूर्णक्षम उन्हीं धर्म और अधर्म से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ
सम्बद्ध होता है । 'तत्संक्रान्तम्' अर्थात् आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध मन
स्वर्ग या नरक में चला जाता है । वहाँ जाकर आशय के अनुरूप अर्थात् अपने
कर्मों के अनुसार फल-भोग के अनुरूप शरीर के साथ सम्बद्ध हो जाता है ।
शरीर की उत्पत्ति स्वर्ग में हो या नरक में, उसमें मन का सम्बन्ध रहना आवश्यक
है, उसके बिना स्वर्गादि देशों में भी भोग नहीं हो सकता । जिस प्रकार विभु होने
के कारण आत्मा स्वर्गादि देशों में न जाकर भी उन देशों में उत्पन्न शरीरों के
साथ सम्बद्ध हो जाता है, उसी प्रकार से मन के बिना वहाँ गये, उन दूसरे शरीरों
के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; क्योंकि मन विभु नहीं है । इतनी दूर (शरीर
से असम्बद्ध) केवल मन का जाना भी सम्भव नहीं है; क्योंकि महाप्रलय को