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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २१५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २१५
प्रशस्तपादभाष्यम्
सन्निकर्षजत्वात् सुखादीनां संयोगः । तद्विनाशकत्वाद्विभाग इति ।
संयोग से उत्पन्न होते हैं, अतः आत्मा में संयोग भी है । यतः विभाग
संयोग का नाशक है, अतः आत्मा में विभाग भी है ।
न्यायकन्दली
गुणादेवोत्पादो न्याय्यः । ऊर्ध्वज्वलनतिर्य्यक्पवनान्यात्मविशेषगुणकृतानि गुरुत्वादिकारणा-
भावे सति कर्मत्वात् पुरुषप्रयत्नजपाणिकर्म्मवत् ।
सन्निकर्षजत्वात्सुखादीनां संयोगः । सुखादीनामात्मगुणानां मनःसंयोगजत्वादात्मनि
संयोगः सिद्धः, व्यधिकरणस्यासमवायिकारणत्वाभावात् । तद्विनाशकत्वाद् विभाग इति ।
तस्य संयोगस्य विनाशकत्वाद् विभागः सिद्धः, आत्ममनसोर्नित्यत्वेनाश्रयविनाशस्य
विनाशहेतोरभावादित्यर्थः । नन्वात्मनि नित्ये स्थिते नित्यात्मदर्शिनः सुखतृष्णापरिप्लुतस्य
सुखसाधनेषु रागो दुःखसाधनेषु द्वेषस्ताभ्यां प्रवृत्तिनिवृत्ती, ततो धर्म्माधर्म्मौ, ततः संसार
इत्यादिरमोक्षः । नैरात्म्ये त्वहमेव नास्मि कस्य दुःखमित्यनास्थायां सर्वत्र रागद्वेषरहितस्य
प्रवृत्त्यादेरभावे सत्यपवर्गो घटत इति चेत्, न, नित्यात्मदर्शिनोऽपि विषयदोषदर्शनाद्
वैराग्योत्पत्तिद्वारेण तस्योत्पत्तिरित्यलम् ।
विलक्षण प्रकार की होती हैं, अतः यही न्यायसङ्गत है कि ऊर्ध्वज्वलनादि क्रियाओं
का कारण भी आत्मा का विशेषगुण ही हो । जिस प्रकार हाथ की क्रिया पुरुष में
रहने वाले प्रयत्न रूप विशेष गुण से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार वह्नि की
ऊर्ध्वज्वलन रूप क्रिया एवं वायु की कुटिल गति रूपा क्रिया ये दोनों ही आत्मा के
विशेष गुण से उत्पन्न होती हैं; क्योंकि गुरुत्वादि उनके कारण वहाँ नहीं हैं, जैसे
कि पुरुष के प्रयत्न से उत्पन्न हाथ की क्रिया ।
'यतः सुखादि संयोग से उत्पन्न होते हैं, अतः संयोग भी आत्मा का गुण है';
क्योंकि 'व्यधिकरण' अर्थात् विभिन्न अधिकरणों में रहने वाले कारणों से उस
अधिकरण में कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है । 'विभाग चूँकि संयोग का नाशक है,
अतः वह भी आत्मा का गुण है', अर्थात् विभाग संयोग का नाशक है इससे आत्मा
में विभाग नाम के गुण की भी सिद्धि समझनी चाहिए । अभिप्राय यह है कि आत्मा
और मन दोनों ही नित्य हैं, अतः सुखादि के कारणीभूत संयोग का नाश आश्रयों के
नाश से नहीं हो सकता, फलतः उक्त संयोग का नाश विभाग से ही मानना पड़ेगा ।
(प्र.) नित्य आत्मा के सिद्ध हो जाने पर नित्य आत्मा के ज्ञान से युक्त एवं
सुख की तृष्णा (एवं दुःख की वितृष्णा से) ओतप्रोत जीव का सुख के साधनों में
राग और दुःख के साधनों में द्वेष, राग से प्रवृत्ति एवं द्वेष से निवृत्ति एवं प्रवृत्ति
से धर्म और निवृत्ति से अधर्म और धर्माधर्म से संसार, इस प्रकार मोक्ष की ही अनुपपत्ति
होगी । अगर 'नैरात्म्य' अर्थात् आत्मा का विनाश मान लिया जाय 'जब हम ही नहीं तो
फिर दुःख किसको' ? इस प्रकार की अवज्ञा से पुरुष स्वभावतः राग और द्वेष से

२१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मनस्त्वयोगान्मनः । सत्यप्यात्मेन्द्रियार्थसान्निध्ये ज्ञानसुखादीनामभूत्वोत्पत्ति-
दर्शनात् करणान्तरमनुमीयते । श्रोत्राद्यव्यापारे स्मृत्युत्पत्ति-
मनस्त्वजाति के सम्बन्ध से मन का व्यवहार होता है । आत्मा
और इन्द्रिय का संयोग, विषय और इन्द्रिय का संयोग इन दोनों
के रहने पर भी किसी को ज्ञान सुखादि की उत्पत्ति कभी होती
है, कभी नहीं । अतः आत्मा, इन्द्रिय और विषय इन सबों से भिन्न
(ज्ञानादि के) कारण का अनुमान करते हैं, श्रोत्रादि इन्द्रियों के व्यापार
के न रहने पर भी स्मृति की उत्पत्ति होती है । एवं बाह्य इन्द्रियों से
न्यायकन्दली
प्रधानत्वात् प्रथममात्मानमाख्याय तदनन्तरं मनोनिरूपणार्थमाह-मनस्त्वयोगान्मन-
इति । व्याख्यानं पूर्ववत् । मनस्त्वं नाम सामान्यं मनोव्यक्तीनां भेदे स्थिते सत्यनुमेयम् ।
या हि समानगुणकार्या व्यक्तयस्तासु परं सामान्यं दृष्टं यथा घटादिषु, समानगुणकार्याश्च
मनोव्यक्तयस्तस्मात्तासु सद्भावे सामान्ययोगः । असिद्धे मनसि तस्य धर्मनिरूपणमन्याय्य-
मिति मत्वा तस्य सद्भावे प्रमाणमाह-सत्यप्यात्मेन्द्रियार्थसान्निध्ये इति । आत्मनस्तावत्
सर्वेन्द्रियैर्युगपत्सम्बन्धोऽस्त्येव, इन्द्रियाणामपि सन्निहितैरर्थैः सन्निकर्षो भवति, तथाप्येकस्मिन्
निवृत्त हो जायगा । राग और द्वेष से शून्य पुरुष को न किसी विषय में प्रवृत्ति
होगी न किसी से निवृत्ति । प्रवृत्ति और निवृत्ति के न रहने से धर्म और अधर्म
की धारा रुक जायेगी । इससे जन्म की धारा रुक जाएगी । इस प्रकार इस
(नैरात्म्य) पक्ष में अपवर्ग की उपपत्ति हो सकती है। (उ.) नित्य आत्मा के ज्ञान से
युक्त पुरुष को भी विषयों में दोष दीख पड़ते हैं, इस दोष-दर्शन से वैराग्य की
उत्पत्ति होती है, फिर मोक्ष की उत्पत्ति असम्भव नहीं है । अब इस विषय में
इतना ही बहुत है ।
आत्मा और मन इन दोनों में आत्मा ही प्रधान है, अतः आत्मा का निरूपण
करके बाद में 'मनस्त्वयोगात्' इत्यादि से मन का निरूपण करते हैं । इस पङ्क्ति
की व्याख्या 'आत्मत्वाभिसम्बन्धात्' इत्यादि पङ्क्तियों की तरह समझनी चाहिए ।
भिन्न-भिन्न मनोव्यक्तियों की सिद्धि हो जाने पर 'मनस्त्व' जाति का अनुमान करना
चाहिए । जिनसे समान रूप के (जितने भी) कार्य होते हैं एवं समान गुणवाले
जितने भी व्यक्ति हैं, उन सबों में एक परसामान्य देखा जाता है, जैसे कि घटादि
में। मनोव्यक्तियों में भी समान कार्य होते हैं एवं मनोव्यक्तियाँ भी समान गुणवाली
हैं, अतः उनमें भी एक परसामान्य अवश्य ही है । 'मन की सिद्धि के बिना उसके
गुणों का निरूपण सङ्गत नहीं है' यह मान कर ही 'सत्यप्यात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षो' इत्यादि
से मन की सत्ता में प्रमाण देते हैं । आत्मा का सभी इन्द्रियों के साथ एक ही काल में

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१७
न्यायकदली
विषये प्रतीयमाने विषयान्तरे ज्ञानसुखादयो न भवन्ति, तदुपरमाच्च भवन्तीति दृश्यते,
तद्दर्शनादात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षेभ्यः करणान्तरमनुमीयते यस्य सन्निधानाज्ज्ञानसुखादीनामुत्पत्तिः,
असन्निधानाच्चानुत्पत्तिः । आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षाः कार्योत्पत्तौ करणान्तरापेक्षाः, सत्यपि
सद्भावे कार्यार्नुत्पादकत्वात् तन्त्वादिवत्, यच्च तदपेक्षणीयं तन्मनः । एकार्थोप-
लब्धिकालेऽनुपलभ्यमानस्याप्यर्थान्तरस्येन्द्रियसन्निकर्षोऽस्तीति किं प्रमाणम् ? इन्द्रिया-
धिष्ठानसन्निधिरेव । रूपोपलब्धिकाले गन्धादयोऽपि घ्राणादिभिः सन्निकृष्यन्ते, तदधिष्ठान-
सन्निहितत्वादुपलभ्यमानगन्धादिवत् । प्रमाणान्तरमप्याह-श्रोत्राद्यव्यापारे स्मृत्युत्पत्तिदर्शना-
दिति । स्मृतिस्तावदिन्द्रियजा ज्ञानत्वाद् गन्धादिज्ञानवत्, न चास्याः श्रोत्रादीनि
करणानि, बधिरादीनां श्रोत्रादिव्यापाराभावे तस्या उत्पत्तिदर्शनात् । तस्माद्यदस्याः करण-
मिन्द्रियं तन्मनः, न केवलं पूर्वस्मात्कारणात् करणान्तरानुमानं बाह्येन्द्रियैश्चक्षुरादिभि-
सम्बन्ध है ही, (क्योंकि आत्मा विभु है) इन्द्रियाँ भी समीप के अपने विषयों के
साथ सम्बद्ध हैं ही । तब भी जिस क्षण में एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उस
क्षण में दूसरे ज्ञान या सुखादि रूप आत्मा के दूसरे विशेष गुणों की उत्पत्ति नहीं
होती । उस ज्ञान का नाश हो जाने पर दूसरे ज्ञान या सुखादि की उत्पत्ति देखी
जाती है । इससे ज्ञान के प्रति आत्मा और इन्द्रिय का सन्निकर्ष एवं विषय और
इन्द्रिय का सन्निकर्ष इन दोनों को छोड़कर तीसरे कारण का भी अनुमान होता है,
जिसके संनिहित रहने से दूसरे ज्ञान-सुखादि की उत्पत्ति होती है एवं जिसके
संनिहित न रहने पर नहीं होती है, अतः आत्मा और इन्द्रिय का सन्निकर्ष एवं
इन्द्रिय और विषय का सन्निकर्ष ये दोनों ज्ञानादि के उत्पादन में किसी और व्यक्ति
की भी अपेक्षा रखते हैं; क्योंकि उनके रहते हुए भी ज्ञानादि की उत्पत्ति नहीं
होती है, जैसे कि तन्तु प्रभृति से (ज्ञानादि की उत्पत्ति नहीं होती है) । उन संनिकर्षों
को ज्ञानादि के उत्पादन में जिसकी अपेक्षा होती है वही मन है । (प्र.) 'जिस समय
एक विषय की उपलब्धि होती है, उसी समय अनुपलब्ध दूसरे विषयों के साथ भी
इन्द्रियों का संनिकर्ष है' इसमें क्या प्रमाण है ? (उ.) इन्द्रियों के अधिष्ठान
(चक्षुर्गोलकादि आश्रय प्रदेश) ही प्रमाण हैं । जिस समय (चक्षु से) रूप की उपलब्धि
होती है, उसी समय घ्राणादि इन्द्रियों के साथ भी उनके विषय गन्धादि सम्बद्ध
रहते हैं; क्योंकि वे भी अपने ग्राहक घ्राणादि इन्द्रियों के अधिष्ठान के समीप हैं,
जैसे कि उपलब्धकालिक गन्धादि । 'श्रोत्राद्यव्यापारे' इत्यादि से मन की सत्ता में
और भी प्रमाण देते हैं । स्मृति भी इन्द्रिय से उत्पन्न होती है; क्योंकि वह भी ज्ञान है,
जैसे कि गन्धादि का ज्ञान । श्रोत्रादि इन्द्रियाँ स्मृति की हेतु नहीं हैं; क्योंकि श्रोत्रादि
व्यापार के न रहने पर भी बहरे व्यक्ति को भी स्मृति होती है, अतः स्मृति का
हेतु जो इन्द्रिय वही 'मन' है । केवल इन कहे हुए हेतुओं से ही मन का अनु-

२१८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः-
प्रशस्तपादभाष्यम्
दर्शनाद् बाह्येन्द्रियैरगृहीतसुखादिग्राह्यान्तरभावाच्चान्तःकरणम् ।
गृहीत न होने वाले एवं दूसरे प्रकार से प्रत्यक्ष होने वाले सुखादि की
भी सत्ता है । इन दोनों से भी 'अन्तःकरण' (मन) का अनुमान होता है ।
न्यायकन्दली
रगृहीतानां सुखादीनां रूपाद्यपेक्षया ग्राह्यान्तराणां भावाच्च तदनुमानमित्याह – बाह्येन्द्रि-
यैरिति । सुखादिप्रतीतिरिन्द्रियजा, अपरोक्षप्रतीतित्वाद् रूपादिप्रतीतिवत्, यच्च तदिन्द्रियं
तन्मनः, चक्षुरादीनां तत्र व्यापाराभावात् । अभिन्नकारणत्वाज्ज्ञानात्मकाः सुखादयः
सुखसंवेदनानि (च) न कारणान्तरेण गृह्यन्त इति चेत्, न, ज्ञानस्वभावत्वे सुखदुःखयोर-
विशेषप्रसङ्गात् । परस्परभेदे च न तयोर्ज्ञानात्मकता, बोधाकारस्योभयसाधारणत्वेऽपि
सुखदुःखाकारयोः परस्परव्यावृत्तत्वात् । न चानयोर्ज्ञानानाभिन्नहेतुत्वम्, ज्ञानस्यार्थाकारा-
दुत्पत्तेः, तस्माच्च वासनासाहायात् सुखदुःखयोरुत्पादात्, अन्यथोपेक्षाज्ञानाभावप्रसङ्गात् ।
न च स्वसंवेदनं विज्ञानमित्यपि सिद्धम्, एकस्य कर्म्मकरणादिभावे दृष्टान्ताभावात्,
मान नहीं होता है; किन्तु 'बाह्य इन्द्रियों से' अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से जिन
सुखादि विषयों का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, वे रूपादि से विलक्षण अर्थ, अथ च
प्रत्यक्ष योग्य सुखादि से भी मन का अनुमान होता है । यही बात 'बाह्येन्द्रियैः'
इत्यादि से कहते हैं । सुख की प्रतीति भी इन्द्रिय से होती है; क्योंकि वह भी
अपरोक्ष प्रतीति है, जैसे कि रूपादि की प्रतीति । सुखादि का प्रत्यक्ष करानेवाली
इन्द्रिय ही 'मन' है; क्योंकि (वहाँ) चक्षुरादि अन्य इन्द्रियों का व्यापार असम्भव
है । (प्र.) ज्ञान एवं सुखादि वस्तुतः अभिन्न हैं; क्योंकि एक ही सामग्री से इन
सबों की उत्पत्ति होती है, अतः सुख एवं उसके ज्ञान के लिए ज्ञान के उत्पादकों
को छोड़कर और किसी की अपेक्षा नहीं है । (उ.) सुखादि अगर ज्ञान स्वभाव
के होते तो सुख और दुःख में कोई अन्तर न रहता । सुख और दुःख परस्पर
भिन्न हैं तो फिर दोनों ज्ञान स्वभाववाले नहीं हो सकते । सुखादि में
ज्ञानाकारतारूप एक धर्म मान लेने पर भी उनमें से प्रत्येक में रहनेवाले
सुखाकारत्व एवं दुःखाकारत्व रूप विभिन्न धर्म तो परस्पर भिन्न हैं ही । (बौद्ध मत
में भी) केवल ज्ञान के कारण 'विज्ञान से सुख और दुःख की उत्पत्ति नहीं हो
सकती; क्योंकि विषयाकार विज्ञान से ज्ञान की ही उत्पत्ति होती है । विषयाकार
विज्ञान को ही जब वासना का साहाय्य मिलता है तो उससे सुख-दुःख की उत्पत्ति
(बौद्ध मत से) होती है, अगर ज्ञान के उत्पादक विषयाकार विज्ञान से ही सुख
और दुःख की भी उत्पत्ति मानें तो संसार से उपेक्षात्मक ज्ञान की सत्ता उठ
जायगी, (क्योंकि सुख और दुःख से भिन्न ज्ञान ही बौद्ध मत में उपेक्षा ज्ञान है) ।
विज्ञान 'स्वसंवेदन' अर्थात् 'स्वप्रकाश' ही है, इसमें भी कोई प्रमाण नहीं है;
क्योंकि इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है कि एक ही वस्तु एक ही क्रिया का एक ही समय