वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३३
न्यायकन्दली
दोषाणामिति, तदपि न किञ्चित्, वातादिदोषदुष्टानां धातूनां रोगान्तरजननोपलम्भात् ।
सर्वस्य सर्ववित्त्वं च दोषाणां शक्तिनियमादेव पराहतम् । न च ज्ञानस्यार्थव्यभिचारे
सर्वत्रानाश्वासः, यत्नेनान्विष्यमाणानां बाधकारणदोषाणामनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्व्याप्त-
स्य विपर्ययस्याभावावगमादेव विश्वासोपपत्तेः ।
विपर्ययानभ्युपगमे च द्विचन्द्रज्ञानस्य का गतिः ? दोषव्यतिभिन्नानां चक्षूरश्म्यव-
यवानां च पृथग् निर्गत्य पतितानां चन्द्रमसि जनितस्य ज्ञानद्वयस्यायं द्वित्वावभास इति
चेन्न, ज्ञानधर्मस्य चक्षुषा ग्रहणाभावात् । ज्ञानधर्मो ज्ञेयगतत्वेन गृह्यमाणो ज्ञेयग्राहकेणै-
वेन्द्रियेण गृह्यत इत्यभ्युपगमे तु भ्रान्तिः समर्थिता स्यात्, अन्यधर्मस्यान्यत्र ग्रहणात् ।
इत्यलमतिप्रकोपितैः श्रोत्रियद्विजन्मभिरित्युपरम्यते ।
ये तु शुक्तिकायां रजतप्रतीतावलौकिकं रजतं वस्तुभूतमेव प्रतीयत इति
हो, वे भी वस्तुतः 'विपर्यय' को स्वीकार ही करते हैं, क्योंकि जहाँ जो नहीं है,
वहाँ उसके व्यवहार की प्रवृत्ति ही वस्तुतः 'विपर्यय' है । 'दोष केवल शक्ति का
व्याघात ही कर सकता है' इस कथन में भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि वायु
प्रभृति दोषों से युक्त धातुओं से रोग नाम की दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है ।
शक्ति के नियमन से भी सभी जनों में सर्वज्ञता की आपत्ति खण्डित हो जाती है ।
किसी स्थान में ज्ञान का अर्थ व्यभिचारी होना ज्ञान में सभी व्यवहारों के विश्वास
को डिगा नहीं सकता, क्योंकि यत्नपूर्वक अन्वेषण करने पर बाध के कारणीभूत
दोष की अनुपलब्धि से दोष के अभाव का निश्चय हो जाएगा । फिर दोष के
अभाव के साथ अवश्य रहनेवाले विपर्ययाभाव की सिद्धि (सुलभ) होगी । इस
अभाव-निश्चय के द्वारा ही (यथार्थ) ज्ञान में विश्वास की उपपत्ति होगी ।
विपर्यय को यदि न मानें तो द्विचन्द्रों के ज्ञान की क्या गति होगी ? (प्र.)
दोष से युक्त चक्षु की रश्मियों के अवयव अलग-अलग निकल कर चन्द्रमा के
ऊपर जाते हैं, अतः एक ही चन्द्र के दो ज्ञान उत्पन्न होते हैं । दोनों ज्ञानों में
रहनेवाले द्वित्व का ही चन्द्रमा में भान होता है । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि
ज्ञान में रहनेवाले धर्म का चक्षु से भान होना सम्भव नहीं है । यदि यह मान भी लें
कि (प्र.) ज्ञान का धर्म जब ज्ञेय में गृहीत होता है, तब ज्ञेय का ज्ञान जिस इन्द्रिय
से होता है, उसी से ज्ञानगत धर्म भी गृहीत होता है । (उ.) तो फिर इससे भी
विपर्यय या भ्रान्ति ही समर्थित होती है, क्योंकि (आप के कथनानुसार भी) अन्य
(ज्ञान) का धर्म द्वित्व अन्यत्र (विषय चन्द्रमा में) ही गृहीत होता है । अत्यन्त क्रुद्ध
श्रोत्रियं ब्राह्मणों को इससे अधिक कहना व्यर्थ समझकर मैं इससे विरत होता हूँ ।
जो कोई इस रीति से विपर्यय का खण्डन करते हैं कि (शुक्ति में) वस्तुतः
४३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अनध्यवसायोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषय एव सञ्जायते ।
तत्र प्रत्यक्षविषये तावत् प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा व्यासङ्गादर्थि-
त्वाद्वा किमित्यालोचनमात्रमनध्यवसायः । यथा वाहीकस्य पन-
प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही अनध्यवसाय
भी होता है । इनमें पहिले से ज्ञात अथवा अज्ञात किसी अन्य विषय में मग्न
अथवा किसी विशेष प्रकार की प्रतीति की इच्छा या किसी प्रयोजन से अभिभूत
पुरुष का ('यह क्या है?' इस आकार का) केवल आलोचन ज्ञान ही प्रत्यक्ष
के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषय का अनध्यवसाय है । जैसे कि भार ढोनेवाले
पुरुष को कटहल प्रभृति फलों को देखने के बाद यह अनिश्चयात्मक
(अनध्यवसाय) होता है (कि, यह क्या है ?) उस (भारवाही पुरुष) को
न्यायकन्दली
वदन्तो विपर्ययाभावं समर्थयन्ति, तेषामस्मिञ्ज्ञाने प्रवृत्तिर्न स्यादलौकिकस्यार्थक्रिया-
हेतुत्वानवगमात् ।
अनध्यवसायोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषये सञ्जायते । प्रत्यक्षानुमानविषये
विपर्ययस्तावद्भवति, अनध्यवसायोऽपि भवतीत्यपिशब्दार्थः । प्रत्यक्षविषये
तावदनुमानविषये क्रमेणानध्यवसायो वक्तव्यमित्यभिप्रायेण क्रमवाचिनं ताव-
च्छब्दमाह-प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा व्यासङ्गादर्थित्वाद्वा किमित्यालोचन-
मात्रमनध्यवसायः । प्रसिद्धाश्च ते अर्थाश्च प्रसिद्धार्थाः, येऽर्थाः पूर्वं ज्ञातास्तेषु
व्यासङ्गादन्यत्रासक्तचित्तत्वाद् विशेषप्रतीत्यर्थित्वाद् वा किमित्यालोचनमात्रम् । गते
विद्यमान रजत का ही भान होता है; किन्तु वह रजत अलौकिक है । उनके मत
से इस ज्ञान के बाद प्रवृत्ति नहीं होगी; क्योंकि अलौकिकरूप वस्तु से किसी भी
कार्य की उत्पत्ति कहीं भी किसी को ज्ञात नहीं है ।
'अनध्यवसायोऽपि' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि
जिस प्रकार विपर्यय प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही होता
है, उसी प्रकार 'अनध्यवसाय' भी उन दोनों प्रकार के विषयों का ही होता है ।
प्रकृत वाक्य में क्रम के वाचक 'तावत्' शब्द का प्रयोग इस अभिप्राय से किया गया
है कि प्रत्यक्ष के विषय और अनुमान के विषय क्रमशः दोनों में ही अनध्यवसाय
भी समझना चाहिए । 'प्रसिद्धाश्च ते अर्थाश्च' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रसिद्धार्थेषु'
इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'प्रसिद्धार्थ' शब्द से वह अर्थ लेना चाहिए, जो पहले से ज्ञात
हो । 'तेषु व्यासङ्गात्' अर्थात् उनसे भिन्न विषयों में चित्त के लगे रहने के कारण
अथवा किसी के विशेष प्रकार से प्रतीति के 'अर्थित्व' अर्थात् प्राप्ति की इच्छा से