वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८५
प्रशस्तपादभाष्यम्
इति । एवं तर्ह्युत्तरविभागानुत्पत्तिप्रसङ्गः, कारणविभागाभावात् । ततः
प्रदेशान्तरसंयोगवति संयोगाभाव इत्यतो विरोधिगुणासम्भवात् ।
रहनेवाले दूसरे तन्तु के विभाग का विनाश होता है । इस प्रकार यहाँ आश्रय
के विनाश से ही विभाग का विनाश होता है, उत्तर देश के संयोग से
नहीं । (प्र.) अगर उक्त स्थल में उक्त प्रकार से आश्रय नाश के द्वारा
ही विभाग का नाश मानें, तो फिर तन्तु का आकाशादि देशों के साथ
जो (विभागज) विभाग उत्पन्न होता है, वह न हो सकेगा; क्योंकि इस
न्यायकन्दली
ततो यस्मिन् काले विभागात् तन्त्वोः संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव कालेऽद्वयोः
संयोगविनाशात् तदारब्धस्य तन्तोर्विनाशः, तस्मिंस्तन्तौ विनष्टे तदाश्रितस्य
तन्त्वन्तरविभागस्य विनाशः, तदाऽऽश्रयविनाशः, कारणमन्यस्य विनाशहेतोरभावात् ।
अत्र पुनः प्रत्यवतिष्ठते-एवं तर्हीति । द्वितन्तुकविनाशसमकालमेव तन्तुविभागस्य
विनाशः । उत्तरो विभागः सक्रियस्य तन्तोराकाशादिदेशेन समं विभागजविभागेनोत्पद्यते,
कारणस्य तन्त्वोर्विभागस्याभावात् । यद्युत्तरो विभागो न संवृत्तः, ततः किं
तत्राह-तत इति । तत उत्तरविभागानुत्पादात् प्राक्तनस्य तन्त्वाकाशसंयोगस्य
उत्पन्न होती है । जिस समय विभाग के द्वारा तन्तु के उत्पादक (दोनों अंशुओं के)
संयोग का विनाश होता है । उसी समय एक तन्तु की क्रिया से उसका दूसरे तन्तु
से विभाग भी उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस
समय विभाग से दोनों तन्तुओं के संयोग का नाश होता है, उसी समय विभागजनित
दोनों अंशुओं के संयोग के नाश के द्वारा उन दोनों अंशुओं से उत्पन्न तन्तु का भी
विनाश होता है । इसलिए (इस विभाग के विनाश का) आश्रयविनाश ही कारण
है; क्योंकि किसी दूसरे कारण से उसके विनष्ट होने की सम्भावना नहीं है ।
'एवं तर्हि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग में फिर आक्षेप करते हैं । अगर
दो तन्तुओं से निष्पन्न पट के विनाश के समय में ही तन्तुविभाग का भी विनाश
हो जाता है, तो फिर उत्तरविभाग की अर्थात् क्रिया से युक्त तन्तु के आकाशादि
देशों के साथ विभागज विभाग की उत्पत्ति न हो सकेगी; क्योंकि (इस विभागज
विभाग के) कारण अर्थात् दोनों तन्तुओं का विभाग वहाँ नहीं है । (प्र.) अगर
'उत्तरविभाग' (अर्थात् उक्त विभागज विभाग) की उत्पत्ति न हो सकेगी तो
क्या हानि होगी ? इसी प्रश्न के समाधान के लिए 'ततः' इत्यादि सन्दर्भ
लिखा गया है । 'ततः' अर्थात् उत्तर विभाग की उत्पत्ति न होने के कारण, तन्तु
३८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्मणश्चिरकालावस्थायित्वं नित्यद्रव्यसमवेतस्य च नित्यत्वमिति दोषः ।
कथम् ? यदाप्यद्व्यणुकारम्भकपरमाणौ कर्मोत्पन्नमप्यनन्तराद्
(विभागज) विभाग के कारणीभूत दोनों तन्तुओं का विभाग विनष्ट हो
चुका है । इससे (१) जहाँ आश्रय के नाश से विभाग उत्पन्न होगा, उस
विभाग के अवधिभूत अनित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया चिरकालस्थायिनी
होगी (तीन क्षणों से अधिक समय तक रहेगी), (२) एवं नित्य द्रव्य में
रहनेवाली क्रिया तो नित्य ही हो जाएगी; क्योंकि (उक्त उत्तरदेश विभागरूप
विभागज विभाग के उत्पन्न न होने के कारण तन्तु का उत्तरदेश के
साथ संयोग रहेगा ही, एवं) एक प्रदेश में एक संयोग के रहते दूसरे
संयोग की उत्पत्ति नहीं हो सकती, अतः क्रिया के विरोधी (दूसरे)
न्यायकन्दली
प्रतिबन्धकस्यनिवृत्तेः प्रदेशान्तरेण सह संयोगो न भवति, अतः कारणाद् विरोधिनो
गुणस्योत्तरसंयोगस्याभावात् कर्मणः कालान्तरावस्थायित्वं स्यात्, यावदाश्रयविनाशो विनाश-
हेतुर्नोपनिपतति-नित्यद्रव्यसमवेतस्य नित्यत्वमिति दोषः । कथमिति प्रश्नः । उत्तरमाह-
यदेति । आप्यद्व्यणुकस्यारम्भके परमाणौ कर्मोत्पन्नमप्यनन्तराद् विभागं करोति यदा, तदैव
द्व्यणुकसंयोगिन्यनारम्भकपरमाण्वन्तरेऽपि कर्म । ततो यस्मिन्नेव काले परमाणुसंयोग-
और आकाश के संयोग की भी निवृत्ति नहीं होगी, जो कि पूर्ववर्ती संयोग का
प्रतिबन्धक है । जिससे दूसरे प्रदेशों का संयोग रुक जाएगा । अतः
विरोधी संयोग रूप गुण के न रहने से क्रिया में से स्थायित्व की आपत्ति होगी ;
क्योंकि (उत्तरदेश संयोग को छोड़कर केवल) आश्रय का विनाश ही क्रिया के
नाश का कारण है, सो जब तक नहीं होता, तब तक क्रिया की सत्ता रहेगी ही ।
फलतः, नित्यद्रव्यों (परमाणुओं) में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली क्रिया नित्य हो
जाएगी । उक्त क्रिया के आश्रय परमाणु नित्य होने के कारण विनष्ट नहीं हो
सकते, अतः विभागज विभाग के न मानने से क्रिया में नित्यत्व रूप दोष की
आपत्ति होगी । 'कथम्' यह पद प्रश्न का बोधक है । 'यदा' इत्यादि सन्दर्भ के
द्वारा इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । जिस समय जलीय द्व्यणुक के एक
परमाणु में उत्पन्न हुई क्रिया, उसके दूसरे जलीय परमाणु के साथ विभाग को उत्पन्न
करती है, उसी समय दूसरे परमाणु में भी क्रिया उत्पन्न होती है, जो जलीय द्व्यणुक
का उत्पादक तो नहीं है; किन्तु उसमें जलीय द्व्यणुक का संयोग है । इसके
बाद जिस समय (जलीय दोनों) परमाणुओं के संयोग के विनाश से, उन परमाणुओं