वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५५
प्रशस्तपादभाष्यम्
गन्धो घ्राणग्राह्यः पृथिवीवृत्तिर्घ्राणसहकारी सुरभिरसुरभिश्च । अस्यापि
पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः ।
जिस गुण का प्रत्यक्ष घ्राणेन्द्रिय से हो वही 'गन्ध' है । वह केवल
पृथिवी में ही रहता है । (प्रत्यक्ष के उत्पादन में) वह घ्राण का सहायक
है । सुरभि एवं असुरभि भेद से वह दो प्रकार का है । इसकी उत्पत्ति
और विनाश प्रभृति पहले की तरह जानना चाहिए ।
न्यायकन्दली
रोग्यनिमित्तम् । जीवनं प्राणधारणम्, पुष्टिरवयवोपचयः, बलमुत्साहविशेषः,
आरोग्यं रोगाभावः, एषां रसो निमित्तम् । एतच्च सर्वं वैद्यशास्त्रादवगन्तव्यम् ।
रसनसहकारी । स्वगतो रसो रसनस्य बाह्यरसोपलम्भे सहकारी ।
मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायभेदभिन्नः । मधुरादिभेदेन भिन्नः षट्प्रकार इत्यर्थः । तस्य
च नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत् । यथा रूपं पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगादुत्पत्तिविनाशवत्
सलिलपरमाणुषु नित्यं कार्ये कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशाद्विनश्यति, तथा रसोऽपि ।
गन्धो घ्राणग्राह्यः । गन्ध एव घ्राणग्राह्यो घ्राणग्राह्य एव गन्धः ।
ननु कथमयं नियमः ? स्वाभावनियमात् । ईदृशो गन्धस्य स्वभावो यदयमेव
घ्राणेनैकेन गृह्यते नान्यः, दृष्टानुमितानां नियोगप्रतिषेधाभावात् । पृथिवीवृत्तिः ।
रोगों का अभाव ही 'आरोग्य' है । रस इन सबों का कारण है । ये सभी बातें
आयुर्वेद से जाननी चाहिए । 'रसनसहकारी' अर्थात् रसनेन्द्रिय रूप द्रव्य में रहने
वाला रस रसनेन्द्रिय के द्वारा होनेवाले रस के बाह्य प्रत्यक्ष में सहकारी कारण है ।
'मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायादिभेदभिन्नः' अर्थात् मधुरादि भेदों से विभक्त होकर
वह छः प्रकार का है । रस के नित्यत्व एवं अनित्यत्व की निष्पत्ति रूप की तरह
जाननी चाहिए, अर्थात् जिस प्रकार से रूप पार्थिव परमाणुओं में अग्निसंयोग से
उत्पन्न भी होता है और नष्ट भी होता है एवं (रूप) जलादि परमाणुओं में नित्य है
और कार्य द्रव्यों में कारण के गुणों से उत्पन्न होता है, एवं आश्रय के विनाश से
नाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार से रस के प्रसङ्ग में भी व्यवस्था समझनी
चाहिए ।
'गन्धो घ्राणग्राह्यः' (उक्त गुणों में से) केवल गन्ध का ही ग्रहण घ्राणेन्द्रिय से होता
है, अतः घ्राण से जिस गुण का प्रत्यक्ष हो वही 'गन्ध' है । (प्र.) (गन्ध का ही
प्रत्यक्ष घ्राण से होता है) यह नियम क्यों ? (उ.) स्वाभाविक नियम के अनुसार
गन्ध का ही यह स्वभाव निर्णीत होता है कि गुणों में से केवल वही घ्राणेन्द्रिय के
द्वारा गृहीत होता है, कोई और गुण नहीं; क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा
२५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्पर्श-
प्रशस्तपादभाष्यम्
स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यः क्षित्युदकज्वलनपवनवृत्तिस्त्वक्सहकारी रूपानुविधायी
शीतोष्णानुष्णाशीतभेदात् त्रिविधः । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववत् ।
त्वगिन्द्रिय से गृहीत होनेवाला गुण ही 'स्पर्श' है। वह पृथिवी, जल,
तेज और वायु इन चार द्रव्यों में रहता है। स्पर्श त्वगिन्द्रिय (से प्रत्यक्ष के
उत्पादन में उसका) सहायक है। रूप के आश्रयों में वह अवश्य ही रहता
है । वह शीत, उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से तीन प्रकार का है ।
इसके नित्यत्व और अनित्यत्व की रीति पहले की तरह जाननी चाहिए ।
न्यायकन्दली
पृथिव्यामेव वर्तते नान्यत्र । घ्राणसहकारी । स्वगतो गन्धो घ्राणस्य सहकारी ।
सुरभिरसुरभिश्चेति भेदः । अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः । यथा रसः
पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगादुत्पत्तिविनाशवान् कार्ये कारणगुणपूर्वक आश्रयविनाशाद्धि-
नश्यति, तथा गन्धोऽपि । नित्यत्वं पुनरस्य नास्त्येव ।
स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यः । त्वचि स्थितमिन्द्रियं त्वगिन्द्रियम्, तेनैव
स्पर्शो गृह्यते नान्येन । क्षित्युदकज्वलनपवनवृत्तिः । एतेष्वेव वृत्तिरेव ।
त्वक्सहकारी । स्पर्शस्त्वगिन्द्रियस्य विषयग्रहणसहकारी । रूपानुविधायी
रूपमनुविधातुमनुगन्तुं शीलमस्य, यत्र रूपं नियमेन तस्य सद्भावात् । शीतोष्णा-
सिद्ध विषयों में नियोग या प्रतिषेध नहीं किया जा सकता । 'पृथिवीवृत्तिः' अर्थात्
गन्ध पृथिवी में ही रहता है और किसी द्रव्य में नहीं। इसके सुरभि (सुगन्ध) एवं
असुरभि (दुर्गन्ध) दो भेद हैं । 'अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः' अर्थात्
जिस प्रकार पार्थिव परमाणुओं के रस की उत्पत्ति और विनाश दोनों ही अग्नि के
संयोग से होते हैं एवं कार्य द्रव्यों में वे कारणगत गुणों से उत्पन्न होते हैं एवं
आश्रय के विनाश से विनष्ट होते हैं, उसी प्रकार से गन्ध में भी समझना चाहिए ।
गन्ध नित्य होता ही नहीं ।
त्वचा में रहनेवाली इन्द्रिय ही 'त्वगिन्द्रिय' है । स्पर्श का प्रत्यक्ष इसी से होता है,
और किसी इन्द्रिय से नहीं । 'क्षित्युदकज्वलनपवनवृत्तिः' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज
और वायु इन चार द्रव्यों में वह रहता है और अवश्य रहता है । 'त्वक्सहकारी'
'त्वगिन्द्रिय में रहनेवाला स्पर्श) त्वगिन्द्रिय के द्वारा स्पर्श के प्रत्यक्ष में सहायक है ।
'रूपानुविधायी' 'रूपमनुविधातुं शीलमस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का
यह अभिप्राय है कि स्पर्श रूपानुगमनशील है, अर्थात् जहाँ रूप रहता है, वहाँ स्पर्श भी
अवश्य ही रहता है । शीत, उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से स्पर्श तीन प्रकार का है ।