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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४७७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४७७
न्यायकन्दली
दर्शनाज्ज्ञानात् सम्यग् जायमानं लैङ्गिकमिति वाक्यार्थः । तस्य च ज्ञानस्य सम्यग्जातीयस्य
यथार्थपरिच्छेदकतयोत्पादः, सर्वधियां यथार्थपरिच्छेदकत्वस्य कुलधर्मत्वात् । संशय-
विपर्ययौ तावद्यथासावर्थो न तथा परिच्छिन्नः । स्मृतिरप्यर्थपरिच्छेदिका न भवति,
अनुभवपारतन्त्र्यादिति वक्ष्यामः । अन्ये तु विद्याधिकारेण संशयविपर्ययौ व्युदस्यन्ति ।
अनर्थजायाश्च स्मृत्युदासार्थं 'तद्धि द्रव्यादिषु पदार्थेषूत्पद्यते' इत्यावर्त्तयन्ति । तदयुक्तम्,
वाक्यलभ्येऽर्थे प्रकरणस्यानपेक्षणात्, अनर्थजत्वात्, स्मृतिव्युदासे चातीतानागतविषयस्य
लैङ्गिकज्ञानस्यापि व्युदासप्रसङ्गात् ।
'लिङ्गदर्शनात् संजायमानम्' के बाद 'ज्ञानम्' पद का अध्याहार स्वभावतः प्राप्त
है । (अतः संस्कार को ज्ञानरूप न होने के कारण अतिव्याप्ति दोष नहीं है) ।
('सञ्जायमानम्' इस पद में प्रयुक्त) 'सम्' शब्द 'सम्यक्' अर्थ में प्रयुक्त है, (अतः
'लिङ्गदर्शन से उत्पन्न 'सम्यक्' ज्ञान ही अनुमान है' ऐसा लक्षण निष्पन्न होने के
कारण) संशय, विपर्यय एवं स्मृति इन तीनों की अनुमान से व्यावृत्ति हो जाती
है; क्योंकि ये (ज्ञान होते हुए भी) सम्यग् ज्ञान अर्थात् यथार्थ ज्ञान नहीं हैं । सभी
सम्यग् ज्ञानों का यह स्वभाव है कि अपने विषयों को उनके यथार्थस्वरूप में
उपस्थित करें, चूँकि अपने विषयों को यथार्थरूप में उपस्थित करना सभी
(यथार्थ) ज्ञानों का मौलिक धर्म है । संशय और विपर्यय तो अपने विषयों को
उसी रूप में उपस्थित नहीं करते जो कि उनका यथार्थस्वरूप है । स्मृति के प्रसङ्ग
में हम आगे कहेंगे कि स्मृति चूँकि अनुभव के अधीन है, अतः वह अपने विषयों
की परिच्छेदिका नहीं है । (पूर्वानुभव ही स्मृति के विषयों का परिच्छेदक है ) ।
कोई कहते हैं कि यह विद्या (यथार्थ ज्ञान) का प्रकरण है, अतः प्रकरण के बल
से बुद्धि विद्यारूप ही होगी, इसी से संशय और विपर्यय इन दोनों की अनुमिति से
व्यावृत्ति हो जाएगी । स्मृति में अनुमिति लक्षण की अतिव्याप्ति के लिए वे लोग
(प्रत्यक्ष प्रकरण में पठित) 'तद्धि द्रव्यादिषु पदार्थेषूत्पद्यते' इस वाक्य की यहाँ
आवृत्ति करते हैं । अतः स्मृति अर्थजनित न होने के कारण अनुमिति के अन्तर्गत
नहीं आती । किन्तु ये (दोनों ही बातें) असङ्गत हैं, क्योंकि वाक्य के द्वारा जिस
अर्थ का लाभ हो सकता है, उसे प्रकरण की अपेक्षा नहीं होती । एवं अर्थजनित
न होने के कारण यदि स्मृति की व्यावृत्ति करें, तो फिर भूत और भविष्य
विषयक अनुमान की भी अनुमिति से व्यावृत्ति हो जायगी¹ ।

  1. अभिप्राय यह है कि संशय और विपर्यय में अनुमिति लक्षण की अतिव्याप्ति हटानी
    है । 'सञ्जायमानम्' पद घटक 'सम्' शब्द को सम्यगर्थक मान लेने से भी उक्त

४७८ न्यायकन्दलीसंविलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लिङ्गं पुनः-
यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्विते ।
तदभावे च नास्त्येव तल्लिङ्गमनुमापकम् ॥
जो अनुमिति में प्रधानरूप से विषय होनेवाली वस्तु के साथ
अर्थात् पक्ष के साथ सम्बद्ध हो (इसे पक्षसत्त्व कहते हैं), एवं
जो साध्यरूप धर्म से युक्त (दृष्टान्त) में यथार्थरूप से ज्ञात
हो (इसे सपक्षसत्त्व कहते हैं), साध्य का न रहना जिसमें निश्चित
न्यायकन्दली
लिङ्गस्य लक्षणमाह-लिङ्गं पुनरिति । अनुमेयः प्रतिपिपादयिषितधर्मविशिष्टो धर्मी,
तेन यत् सम्बद्धं तस्मिन् वर्तत इत्यर्थः । यथा विपक्षैकदेशे वर्तमानमपि च लिङ्गं
विपक्षवृत्ति भवति, एवं पक्षैकदेशे वर्तमानमनुमेयेन सम्बद्धमेव । ततश्चतुर्विधाः
परमाणवोऽनित्या गन्धवत्त्वादित्यस्यापि भागासिद्धस्य हेतुत्वं प्राप्नोतीति चेत् ? न,
वैधर्म्यात् । यः साध्यसाधनव्यावृत्तिविषयोऽर्थः, स विपक्षः । साध्यसाधनयोर्व्या-
वृत्तिर्न समुदितेभ्यः, किन्तु प्रत्येकमेव सम्भवतीति प्रत्येकमेव विपक्षता । पक्षस्तु
स भवति यत्र वादिना साध्यो धर्मः प्रतिपादयितुमिष्यते । न च वादिना
'लिङ्गं पुनः' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा 'लिङ्ग' का लक्षण कहा गया है । ('यदनुमेयेन'
इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त) अनुमेय' शब्दका अर्थ वह 'धर्मी' है, जिसमें (अनुमान प्रयोग
करनेवाले को अपने अभीष्ट वस्तु अर्थात् साध्यरूप) धर्म का प्रतिपादन इष्ट हो ।
(फलतः प्रकृत में 'अनुमेय' शब्द से पक्ष अभिप्रेत है) 'तेन यत् सम्बद्धम्' उस (पक्ष)
में जो विद्यमान रहे (वह हेतु है) । (प्र.) जिस प्रकार विपक्षीभूत किसी एक वस्तु में
यदि (हेतु) रहता है, तो वह हेतु 'विपक्षवृत्ति' (हेत्वाभास) हो जाता है, उसी प्रकार
किसी एक पक्ष में भी यदि हेतु की सत्ता है, तो फिर वह हेतु 'अनुमेयसम्बद्ध' (पक्ष-
वृत्ति) होगा । (इस वस्तुस्थिति के अनुसार यदि कोई इस अनुमान का प्रयोग करे
कि) चारों प्रकार के (अर्थात् पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों द्रव्यों के) पर-
माणु अनित्य हैं, क्योंकि उन सभी में गन्ध है, तो फिर इस अनुमान का उक्त गन्ध
दोनों अतिव्याप्तियाँ हट सकती हैं। एवं अनुमिति चूँकि विद्यारूप सम्यग्ज्ञान के प्रकरण में
पठित है, अतः लिङ्गदर्शन से उत्पन्न ज्ञान में सम्यक्त्व का लाभ प्रकरण से भी हो सकता
है । फलतः अनुमिति लक्षणघटक ज्ञान में सम्यक्त्व विशेषण देने से ही दोनों मतों में
संशय और विपर्यय में अतिव्याप्ति का वारण हो जाता है । यह सम्यक्त्व प्रथम पक्ष में
वाक्य लभ्य है, दूसरे पक्ष में प्रकरण लभ्य है। प्रकरण की अपेक्षा वाक्य बलवान् है ।
(देखिए बलाबलाधिकरण) । अतः प्रकरणापेक्षी द्वितीय पक्ष असङ्गत है ।