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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३१७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३१७
न्यायकन्दली
एवं व्यवस्थिते परिमाणे तस्य भेदं कथयति-तच्चतुर्विधमिति । येन रूपेण
चातुर्विध्यं तद्दर्शयति--अणु महत् दीर्घं ह्रस्वं चेति । चतुरस्रादिकं त्ववयवानां
संस्थानविशेषो न परिमाणान्तरम् । दीर्घत्वादयोऽपि तथा भवन्तु ? न,
अवयवसंस्थानानुपलम्भेऽपि दूराद् दीर्घादिप्रत्ययस्य दर्शनात् । अपि च भोः !
द्व्यणुकपरिमाणं तावदणु, महत्परिमाणोत्पत्तौ कारणाभावात् । तस्माच्च
परमाणुपरिमाणमपकृष्टम्, कार्यपरिमाणात् कारणपरिमाणस्य हीनत्वदर्शनात् । ततश्च
परमाणोः परिमाणं द्व्यणुकपरिमाणाद्भिन्नम् । एवं घटादीनां परिमाणादन्यदेव
प्रकर्षपर्यन्तप्राप्तमाकाशादिपरिमाणम्, तथा दीर्घ ह्रस्वं चेति परिमाणमष्टविधमेव,
कुतश्चातुर्विध्यमित्याह-तत्रेति । तेषु चतुर्षु परिमाणेषु मध्ये महद् द्विविधं नित्यमनित्यं
चेति । केषु नित्यमित्याह-नित्यमाकाशाकालदिगात्मसु । तच्च परममहत्त्वमित्युच्यते ।
क्योंकि दूर से द्रव्य का ज्ञान होने पर भी विशेष प्रकार के परिमाण का ज्ञान नहीं
होता है, अतः भूल से बड़ी चीज भी छोटी प्रतीत होती है ।
इस प्रकार परिमाण की सत्ता सिद्ध हो जाने पर 'तच्चतुर्विधम्' इत्यादि से
उसके भेद कहे गये हैं । जिन भेदों से परिमाण के चार भेद हैं, यह 'अणु महद्दीर्घ
ह्रस्वञ्चेति' .इस पङ्क्ति से कहा गया है । चौकोर आदि आश्रय द्रव्यों के अवयवों
के विशेष प्रकार के विन्यास ही हैं, कोई स्वतन्त्र परिमाण नहीं । (उ.) फिर
दीर्घत्वादि भी अवयवों के विशेषविन्यास ही हों, स्वतन्त्र परिमाण नहीं । (उ.)
संस्थान की अर्थात् अवयवों के विशेष विन्यास की प्रतीति दूर से नहीं होती है;
किन्तु दीर्घत्वादि की प्रतीति दूर से भी होती है । (प्र.) द्व्यणुक 'अणु' परिमाण
वाला है; क्योंकि वह महत्परिमाण का कारण नहीं है । एवं परमाणु का परिमाण
(अणु होते हुए भी) द्व्यणुक के परिमाण से न्यून है; क्योंकि कार्य के परिमाण से
कारण का परिमाण न्यून ही देखा जाता है । अतः परमाणु के परिमाण और
द्व्यणुक के परिमाण (दोनों ही अणु होते हुए भी) भिन्न प्रकार के हैं । एवं
घटादि के महत्परिमाण एवं महत्परिमाण के अन्तिम अवधि आकाशादि का
महत्परिमाण दोनों ही (महत्त्वत्वेन समान होने पर भी) भिन्न प्रकार के हैं ।
इसी प्रकार दीर्घ और ह्रस्व में भी समझना चाहिए । अतः परिमाण का
आठ भेद होना ही उचित है, चार भेद नहीं¹ । इसी प्रश्न का उत्तर 'तत्र' इत्यादि

  1. मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक में 'षड्विधमेव' ऐसा पाठ है, किन्तु वह असङ्गत मालूम होता
    है; क्योंकि जैसे द्व्यणुक और परमाणु के अणुत्व में अन्तर है, वैसे ही दोनों के ह्रस्वत्व में
    भी अन्तर है । एवं जैसे कि घट और आकाशादि के महत्परिमाण में अन्तर है, वैसे ही
    दोनों की दीर्घता में भी । फलतः ह्रस्वत्व एवं अणुत्व के दो-दो भेद एवं महत्त्व और दीर्घत्व
    के दो-दो भेद सब मिलाकर आठ भेद की ही आपत्ति ठीक बैठती है और यह बात

३१८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
माकाशकालदिगात्मसु परममहत्त्वम् । अनित्यं त्र्यणुकादावेव । तथा
चाण्यपि द्विविधम्-नित्यमनित्यं च । नित्यं परमाणुमनस्सु तत् पारि-
इनमें महत् (परिमाण) नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का
है । नित्य महत्परिमाण आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन
चार द्रव्यों में है; क्योंकि वे परममहत्त्व रूप हैं। इसी तरह
अणु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है । इन
दोनों में से नित्य अणु (परिमाण) परमाणुओं और मनों में है ।
न्यायकन्दली
अनित्यं महत्परिमाणं त्र्यणुकादावेव नाकाशादित्यर्थः । यथा महद् द्विविधं तथाण्वपि
द्विविधं नित्यमनित्यं च । उभयत्रापि चकारः प्रकारान्तरव्यवच्छेदार्थः । नित्यमणुपरिमाणं
परमाणुमनःसु, उत्पत्तिविनाशकारणाभावात् । पारिमाण्डल्यमिति सर्वापकृष्टं परिमाणम् ।
अनित्यमणुपरिमाणं द्व्यणुक एव नान्यत्रेत्यर्थः । एतेनैतदुक्तं भवति, अणुपरिमाणप्रभेद एव
परमाणुपरिमाणं महत्परिमाणप्रभेदश्च परममहत्परिमाणम्, अन्यथा परमशब्देन विशेषणा-
योगात् । यत् खलु परिमाणं रूपसहायं स्वाश्रयं प्रत्यक्षयति तत्र महदिति व्यपदेशः, यच्च
से देते हैं । 'तत्र' अर्थात् उन चारों प्रकारों के परिमाणों में 'महत्' नित्य और
अनित्य भेद से दो प्रकार का है । किन द्रव्यों में वह नित्य है ? इस आकाङ्क्षा
की पूर्ति 'नित्यमाकाशकालदिगात्मसु' इस वाक्य से की गयी है । आकाशादि द्रव्यों
में रहनेवाले 'महत्त्व' को ही 'परममहत्त्व' कहते हैं । अनित्य महत्परिमाण
त्र्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में ही है, आकाशादि द्रव्यों में नहीं । जिस प्रकार महत्त्व
नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है, उसी प्रकार 'अणु' भी दो प्रकार का
हैं । दोनों वाक्यों के 'च' शब्द परिमाण की और प्रकार की सम्भावनाओं को
हटाने के लिए हैं । परमाणुओं और मनों में केवल नित्य अणुपरिमाण ही रहता है;
क्योंकि उनके परिमाणों का कोई विनाशक नहीं है । सब से छोटे परिमाण को
पारिमाण्डल्य कहते हैं । अनित्य अणुपरिमाण केवल द्व्यणुकों में ही है, और
कहीं नहीं । इससे यह अर्थ निकला कि परमाणुओं का परिमाण भी अणुपरिमाण
का ही एक भेद है । एवं आकाशादि का परममहत्परिमाण भी महत्परिमाण का ही
एक भेद है । अगर आकाशादि का परिमाण महत् न हो तो फिर उसमें
'परम' विशेषण ही व्यर्थ हो जाएगा । रूप के साहाय्य से जो परिमाण अपने
आश्रय के प्रत्यक्ष का कारण होता है, उसे महत्परिमाण कहते हैं । जिससे यह

न्यायकन्दली के 'दीर्घं ह्रस्वञ्चेति' इस वाक्य से भी स्पष्ट होती है अतः मैंने 'षड्विधमेव'
के स्थान पर 'अष्टविधमेव' ऐसा ही पाठ रखना उचित समझा ।