वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३४१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३४१
न्यायकन्दली
यच्छक्यं शक्तिविषयो योऽर्थः, तस्य करणात् प्रागपि शक्यं सदेव । इतोऽपि सत्
कार्यम्, कारणभावात्, कारणस्वभावं कार्यमिति नान्योऽवयवी अवयवेभ्यस्तद्देशत्वात् ।
यत्तु यस्मादन्यन्न तत्तस्य देशो यथा गौरश्वस्येत्यादिभिः प्रमाणैः प्रतिपादितम्, कारणं च
सत्, अतस्तदव्यतिरेकि कार्यमपि सदेवेति । तदेतदुक्तम्-
असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् ।
शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत् कार्यमिति ॥
अत्रोच्यते, यदि कारणव्यापारात् प्रागपि पटस्तन्तुषु सन्नेव, किमित्युपलब्धिकारणेषु सत्सु
सत्यामपि जिज्ञासायां नोपलभ्यते ? अनभिव्यक्तत्वादिति चेत् ? केयमनभिव्यक्तिः ? यद्युप-
लब्धेरभावस्तस्यैवानुपपत्तिश्चोदिता कथं तदेवोत्तरम् ? अथोपलब्धियोग्यस्यार्थक्रियानिर्वर्तन-
क्षमस्य रूपस्य विरहोऽनभिव्यक्तिः ? तदानीमसत्कार्यवादः, तथाभूतस्य रूपस्य प्रागभावे
पश्चाद्भावात् । अथ मतं पटस्य चक्षुरादिवत् कुविन्दादिकारणव्यापारोऽप्युपलब्धिकारणं तस्या-
उस कारण से उत्पन्न होनेवाला एवं शक्ति का विषय वह कार्यरूप अर्थ अपने
कारण में उत्पत्ति से पहले भी 'सत्' ही है । 'कारणभाव' हेतु से भी यह सिद्ध
होता है कि कार्य अपनी उत्पत्ति से पहले भी 'सत्' है । अभिप्राय यह है कि कार्य
अपने (उपादान) कारण के स्वभाव का होता है, अतः अवयवों से भिन्न अवयवी
नाम की कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है; क्योंकि अपने अवयव ही उसकी उत्पत्ति के
देश हैं । जो जिससे भिन्न होता है, वह उसकी उत्पत्ति का देश नहीं होता, जैसे कि
गाय का भैंस उत्पत्ति देश नहीं होता । इन प्रमाणों से यह सिद्ध है कि कार्य अपने
उपादानों से अभिन्न है । उपादान तो अवश्य ही सत् हैं, अतः उनसे अभिन्न कार्य
भी 'सत्' है । (सत्कार्यवाद के साधक इन हेतुओं की ही सूचना 'असदकरणात्'
इत्यादि (सां. का. ९) कारिका से दी गई है ।
(सत्कार्यवाद के साधक इन हेतुओं का खण्डन असत्कार्यवादी वैशेषिकादि)
इस प्रकार करते हैं कि कारणों के व्याप्त होने के पहले भी अगर तन्तुओं में पट
है तो फिर पट को जानने की इच्छा रहने पर भी एवं पटप्रत्यक्ष के कारणों के
रहते हुए भी सूत में पट का प्रत्यक्ष क्यों नहीं होता ? (प्र.) उस समय पट अन-
भिव्यक्त रहता है, अतः उस समय उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है । (उ.) यह
'अनभिव्यक्ति' क्या है ? अगर वह उपलब्धि का अभाव ही है, तो फिर पूर्वपक्ष
और समाधान दोनों एक ही हो गये । अगर उपलब्ध हो सकनेवाली वस्तु में उस
वस्तु से होनेवाले प्रयोजन के सम्पादक रूप का अभाव ही अनभिव्यक्ति है,तो उस
समय 'असत्-कार्यंवाद' स्वीकार करना पड़ेगा; क्योंकि पट में पहले से अविद्यमान
उसके प्रयोजन सम्पादक रूप की उत्पत्ति हुई है । अगर यह कहें कि (प्र.) जैसे
कि चक्षुरादि इन्द्रियाँ पट प्रत्यक्ष के कारण हैं, वैसे ही पट के जुलाहे
प्रभृति कारणों का व्यापार भी पट के प्रत्यक्ष का कारण है । इन कारणों के न
३४२ न्यायकदलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-
न्यायकदली
भावात् सतोऽप्यनुपलब्धिरिति ? न, कारणव्यापारस्यापि सर्वदा तत्र सम्भवात्,
व्यापारोऽपि पूर्वमनभिव्यक्तः सम्प्रति कारणैरभिव्यज्यमानो भावमुपलम्भयतीति चेत् ?
अभिव्यक्तिरपि यद्यसती ? कथं तस्याः कारणम् ? सतीति चेद्भावोपलम्भप्रसङ्गस्तदवस्थ
एवेति कस्यचिदपूर्वस्य विशेषस्योपजनन मन्तरेण प्रागनुपलब्धस्य पश्चादुपलम्भो दुर्घटः ।
यच्चोक्तम्- असदशक्यकरणं व्योमकुसुमवदिति, तत्र स्वभावभेदाद् असदेकस्वभावं
गगनकुसुमम्, सदसत्स्वभावं तु घटादिकम् ? तत्पूर्वमसत् पश्चात्सद्भवति । कथं
सदसतोरेकत्र न विरोध इति चेत् ? कालभेदेन समावेशात् । प्रागुत्पत्तेः पटस्य
धर्मिणोऽभावात् कथमसत्त्वं तस्य धर्म इति चेत् ? यादृशो यक्षस्तादृशो बलिः,
सत्त्वमसतो धर्मो न स्यादसत्त्वं त्वसत एव युक्तम् । यदसत् पूर्वमासीत् तस्य
कथं सत्त्वमिति चेत् ? कारणसामर्थ्यात्, अस्ति स कोऽपि महिमा तुर्यादीनां
रहने से ही उत्पत्ति से पहले तन्तुओं में विद्यमान रहने पर भी पट का प्रत्यक्ष नहीं
होता है । (उ.) ऐसा आप नहीं कह सकते; क्योंकि आपके मत से सभी कार्य
उत्पत्ति से पहले भी सत् हैं, अतः जुलाहे प्रभृति का व्यापार भी सत् है, अतः वे
भी सर्वदा रहेंगे ही । (प्र.) कारणों का वह व्यापार भी पहले से अनभिव्यक्त ही
रहता है, उन्हीं कारणों से अभिव्यक्त होकर पटादि कार्यों के प्रत्यक्ष में सहायक
होता है । (उ.) कारणों की यह अभिव्यक्ति सत् है ? या असत् ? अगर असत्
है तो फिर वह उस प्रत्यक्ष का कारण कैसे हो सकती है ? अगर सत् है तो
पटादि प्रत्यक्ष की उक्त आपत्ति है ही । अतः किसी अपूर्व विशेष की उत्पत्ति के
बिना पहले से अनुपलब्ध वस्तु की पीछे उपलब्धि सम्भव नहीं है ।
यह जो आपने कहा कि 'आकाशकुसुम' की तरह असत् वस्तु का उत्पादन
असम्भव है, यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वस्तु भिन्न-भिन्न स्वभाव की होती है ।
आकाश-कुसुम का केवल 'असत्त्व' ही स्वभाव है । घटादि वस्तुओं के सत्त्व और
असत्त्व दोनों ही स्वभाव हैं । वे पहले असत् रहते हैं, पीछे से सत् हो जाते हैं ।
(प्र.) एक आश्रय में सत्त्व और असत्त्व दोनों में विरोध क्यों नहीं होता
है ? (उ.) (यद्यपि वे दोनों एक ही समय एक आश्रय में नहीं रह
सकते फिर भी) कालभेद से वे दोनों एक आश्रय में रह सकते हैं । (प्र.) उत्पत्ति
से पहले तो पटरूप धर्मी ही नहीं है, फिर असत्त्व उसका धर्म किस प्रकार होगा ?
(उ.) 'जैसा देवता वैसा ही उसका भोग' (इस न्याय से) असत् वस्तुओं का सत्त्व
धर्म तो होगा नहीं, अतः यही ठीक है कि असत्त्व ही उसका धर्म है । (प्र.) जो
पहले असत् रहा कभी भी सत्त्व उसका धर्म कैसे हो सकता है ? (उ.) कारणों के
सामर्थ्य से (असत् वस्तुओं का भी सत्त्व धर्म हो सकता है) तुरीवेमादि
कारणों की ही यह अपूर्व महिमा है कि जब ये मिलकर काम