वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४२१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४२१
न्यायकन्दली
हि यत्र विलक्षणसामग्री, तत्र कार्यमपि विलक्षणमेव, यथा प्रत्यभिज्ञानम् ।
संशयोऽप्यविद्या । सा चानिष्टा पुरुषस्येत्यधर्मकार्यत्वं तस्य दर्शितम् । अधर्माच्चेति ।
सामान्यं दृष्ट्वा यदेकं विशेषमनुस्मृत्य विशेषमनुस्मरति, तदा सामान्यदर्शनस्य विनष्टत्वात्
संशयहेतुत्वानुपपत्तिरिति चेन्न, उभयविशेषविषयाभ्यां संस्काराभ्यां युगपल्लब्धबुद्धाभ्यामुभय-
विशेषविषयैकस्मरणजननात्, तत्काले च विनश्यदवस्थस्य सामान्यज्ञानस्य सम्भवात् ।
स च द्विविध इति भेदकथनम् । केन रूपेणेत्यत आह- अन्तर्बहिर्चेति । यः
समानधर्मोपपत्तेरनेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यव्यवस्थातोऽनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च समान-
तान्त्रिकैः पञ्चविधः संशयो दर्शितः, स सर्वो द्वैविध्येनैव संगृहीतः ।
अन्तस्तावद् आदेशिकस्येति । आदेशिको ज्योतिर्वित्, तेनैकदा किञ्चिद्
ग्रहसञ्चारादिनिमित्तमुपलभ्यादिष्टं किञ्चिदिष्टमनिष्टं यात्राभूद्वर्त्तते भविष्यति
और प्रत्यय दोनों ही हो सकता है । जहाँ की सामग्री (कारणसमूह) विशेष रूप
की होगी, वहाँ का कार्य भी विशेष प्रकार का ही होगा, जैसे कि 'प्रत्यभिज्ञा'
(अनुभवात्मक और स्मरणात्मक दोनों हैं) ।
संशय भी अविद्या ही है, अविद्या पुरुष का अनिष्ट करनेवाली है । इसीलिए
कहा गया है कि 'संशय अधर्म से उत्पन्न होता है' । (प्र.) सामान्य ज्ञान के बाद
एक विशेष धर्म का स्मरण कर अगर दूसरे विशेष धर्म का स्मरण होता है, तो
फिर उस समय कथित सामान्य ज्ञान का ही विनाश हो जाएगा । अतः सामान्य
दर्शन संशय का कारण नहीं हो सकता । (उ.) एक ही समय दोनों विशेष धर्मों
के एक ही उद्बुद्ध संस्कार से दोनों विशेष धर्म विषयक एक ही (समूहालम्बन)
स्मरण की उत्पत्ति हो सकती है, उस समय आगे क्षण में ही विनष्ट होनेवाले
(विनश्यदवस्थ) सामान्य धर्म के ज्ञान की सम्भावना है ।
'स च द्विविधः' इस वाक्य के द्वारा संशय के दो भेद कहे गये हैं । कौन से
उसके दोनों प्रकार हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर 'स च द्विविधः' इत्यादि से दिया गया
है । समानतन्त्र (न्याय) के आचार्यों ने जो (१) साधारण धर्म के ज्ञान से उत्पन्न
(२) असाधारण धर्म के ज्ञान से उत्पन्न (३) विप्रतिपत्ति वाक्य से उत्पन्न (४)
उपलब्धि की अव्यवस्था से उत्पन्न एवं (५) अनुपलब्धि की अव्यवस्था से उत्पन्न
इत्यादि संशय के जो पाँच भेद गिनाये गये हैं, वे सभी इन्हीं दो प्रकारों में अन्तर्भूत
हो जाते हैं ।
'आदेशिकस्य' इत्यादि से कहा गया है कि कथित संशय 'अन्तःसंशय' का उदाहरण
है । 'आदेशिक' शब्द का यहाँ 'ज्योतिषशास्त्रवेत्ता' अर्थ है । उन्होंने एक समय
किसी पुरुष को उसके ग्रहसञ्चारादि निमित्त को देखकर 'आदेश' किया कि 'यहाँ
४२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संशय-
न्यायकन्दली
चेति, तत् तथैव तदा संवृत्तम् । अन्यदादिष्टं तद्वितथमभूत् । पुनरिदानीं तस्योत्पन्नं
तथाभूतमेव निमित्तं दृष्ट्वादिशतोऽन्तः स्वज्ञाने संशयो भवति यदेतन्मम नैमित्तिकं
ज्ञानमभूत्, तत्किं सत्यमसत्यं वेति ।
बहिर्द्विविधः-प्रत्यक्षविषये अप्रत्यक्षविषये च । तत्र तयोर्मध्येऽप्रत्यक्षविषये तावत्
साधारणलिङ्गदर्शनादुभयविशेषांनुस्मरणादधर्माच्च संशयो भवति । यथाऽटव्यां विषाण-
मात्रदर्शनाद् गौर्गवयो वेति । वाटान्तरितस्य पिण्डस्याप्रत्यक्षस्य सामान्येन विषाणमात्रदर्शना-
नुमितस्य संशयविषयत्वादप्रत्यक्षविषयोऽयं संशयः ।
प्रत्यक्षविषयेऽपि कथयति-स्थाणुपुरुषयोरित्यादिना । स्थाणुपुरुषयोः
सम्बन्धिनी योर्ध्वता तन्मात्रस्य प्रत्यक्षविषये पुरोवर्त्तिनि धर्मिणि दर्शनात् ।
वक्रादिविशेषानुपलब्धित इत्यादिपदेन शिरःपाण्यादिपरिग्रहः । 'वक्रकोटरादेः
कुछ इष्ट या अनिष्ट था, या है , अथवा होगा, और वे उस प्रकार सङ्घटित भी
हुए । फिर उसी प्रकार का निमित्त उपस्थित होते देखकर उस आदेशिक पुरुष को
अपने ज्ञान में यह संशय होता है कि मेरा वह नैमित्तिक ज्ञान था या मिथ्या ?
(१) प्रत्यक्ष के द्वारा जानने योग्य विषयों का और (२) अप्रत्यक्ष विषयों का
बाह्य संशय के ये दो भेद हैं । (गो और गवय) दोनों में साधारण रूप से
रहनेवाले धर्मों के ज्ञान से एवं पीछे दोनों के असाधारण धर्मों के स्मरण और
अधर्म से जङ्गल में केवल सींग देखने से जो पुरुष को 'यह गो है अथवा गवय'
इस आकार का संशय होता है, वह 'अप्रत्यक्ष विषयक संशय' है । यह अप्रत्यक्ष
विषयक इसलिए है कि विषाणरूप साधारण हेतु से अनुमित एवं रास्ते में छिपा
हुआ अप्रत्यक्ष पिण्ड (गो और गवय) उसका विषय है । 'स्थाणुपुरुषयोः' इत्यादि
ग्रन्थ से उस संशय का निरूपण किया है, जिसका विषय प्रत्यक्ष के द्वारा जाना
जाता है । स्थाणु और पुरुष दोनों में समान रूप से रहनेवाली जो ऊँचाई
(ऊर्ध्वता) है, आगे स्थित एवं प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत धर्मी में उसके प्रत्यक्ष से
'स्थाणुर्वा पुरुषः' यह संशय उत्पन्न होता है । एवं 'वक्रादिविशेषानुपलब्धितः' इस
वाक्य में 'आदि' पद से (पुरुष में रहनेवाले) शिर एवं हाथ-पैर प्रभृति धर्मों का
ग्रहण समझना चाहिए । अर्थात् वक्रता और कोटर प्रभृति स्थाणु के विशेष धर्मों
की अनुपलब्धि तथा शिर एवं पैर प्रभृति पुरुष के विशेष धर्मों की अनुपलब्धि से
प्रकृत में प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का संशय होता है ।
'स्थाणुत्वादिसामान्यविशेषानभिव्यक्तो' इस वाक्य में प्रयुक्त 'आदि' पद से
'पुरुषत्वादि' धर्मों का संग्रह अभीष्ट है । वक्रता और कोटर प्रभृति धर्म स्थाणुत्व
की अभिव्यक्ति के कारण हैं । शिर और पैर प्रभृति धर्म पुरुषत्व की अभिव्यक्ति के
कारण हैं । इन (स्थाणुत्व और पुरुषत्व के अभिव्यञ्जक) धर्मों की अनुपलब्धि के कारण