वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५१
न्यायकन्दली
प्रत्यक्षेण गृह्यते, हेतुत्वस्य ग्राह्यलक्षणत्वाद्वस्तुनश्च समस्तार्थक्रियाविरहात् ।
क्षणस्तु परमार्थसन्नर्थक्रियासमर्थत्वात् प्रत्यक्षस्य विषयः । स च
विकल्पकालाननुपातीत्युक्तम्, कुतो विषयैकता ? अस्तु वा विकल्पप्रत्यक्षयोर-
निरूपितरूपः कश्चिदेकः प्रवृत्तिसंवादयोग्यो विषयः, तथापि विकल्पः प्रमाणत्वं
नातिवर्तते, धारावाहिकबुद्धिवदर्थपरिच्छेदे पूर्वानपेक्षत्वात्, अध्यवसितप्रापणयोग्य-
त्वाच्च । प्रमाणत्वे चावस्थिते प्रत्यक्षमेव स्याल्लिङ्गाद्यभावादर्थेन्द्रियान्व-
यव्यतिरेकानुविधायित्वाच्च । यत् पुनरयमर्थजो भवन्नपि निर्विकल्पकवदि-
न्द्रियापातमात्रेण न भवति, तदिन्द्रियार्थसहकारिणो वाचकशब्दस्मरणस्या-
वस्तुओं में रहनेवाले अपोह या अन्य व्यावृत्ति) अभाव रूप है, अतः क्षणों का
साधारण रूप हो या सभी क्षणिक वस्तुओं में समारोपित ही हो—किसी भी स्थिति
में उसका प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, क्योंकि अवस्तु (अभाव) से कोई काम नहीं हो
सकता (अतः उससे प्रत्यक्ष रूप कार्य भी नहीं हो सकता, किन्तु प्रत्यक्ष के प्रति
विषय कारण है) चूँकि क्षण (वृत्ति घटादि वस्तुओं) की परमार्थता है, अतः वे ही
अर्थक्रियाकारी होने से अपने निर्विकल्प प्रत्यक्ष रूप कार्य का उत्पादन कर सकते
हैं । किन्तु निर्विकल्पक प्रत्यक्ष काल में रहननेवाले विषय सविकल्पक प्रत्यक्ष के
समय तक (आप के मत से) रह नहीं सकते, अतः (आपके मत से) 'निर्विकल्पक
ज्ञान और सविकल्पक ज्ञान दोनों एक-विषयक हैं' इसकी उपपत्ति किस प्रकार की
जा सकती है ? यदि यह मान भी लें (कि उक्त ऐक्य व्यवहार में समर्थ) दोनों
प्रत्यक्षों का एक ही कोई अनिर्वचनीय विषय है, तब भी सविकल्पक प्रत्यक्ष के
प्रमाणत्व को कोई हटा नहीं सकता, क्योंकि धारावाहिक बुद्धि की तरह इसमें
विषय के निर्धारण के लिए पहिले किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं है, एवं अपने
द्वारा निश्चित विषय को प्राप्त कराने की योग्यता भी है । इस प्रकार सविकल्पक
ज्ञान में प्रमाणत्व के निश्चित हो जाने पर यही कहना पड़ेगा कि वह प्रत्यक्ष प्रमाण
ही होगा, क्योंकि अनुमान प्रमाण मानने के प्रयोजक लिङ्गादिज्ञान वहाँ नहीं हैं, एवं
(प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक) इन्द्रिय का अन्वय और व्यतिरेक भी है । निर्विकल्पक
ज्ञान की तरह अर्थजनित होने पर भी जो विषयों के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध होते
ही सविकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है, उसका यह कारण है कि विषय के
वाचक शब्द का स्मरण उससे पहिले नहीं होता है, उसका यह कारण है कि
विषय के वाचक शब्द का स्मरण उससे पहिले नहीं रहता है, क्योंकि सविकल्पक
ज्ञान के उत्पादन में वाचक शब्द का स्मरण भी इन्द्रिय और अर्थ का सहकारी है
(अर्थात् वाचक शब्द का स्मरण भी सविकल्पक ज्ञान का सहकारी कारण है) ।
(प्र.) तो फिर स्मृति के बाद उत्पन्न होनेवाला यह विकल्प स्मृति से ही उत्पन्न होता
है, इन्द्रिय और अर्थ से नहीं, क्योंकि इन्द्रिय, अर्थ एवं सविकल्पक ज्ञान इनके
मध्य में स्मृति आ जाती है । (उ.) क्या सहकारी कारण मुख्य कारण में जो कार्य
करने की शक्ति है, उसे रोक देता है ? तो फिर बीज भी अङ्कुर का कारण नहीं होगा,
क्योंकि बीज और अङ्कुर के बीच में पृथिवी और जल भी आ जाता है । (जिससे
४५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
भावात् । स्मृत्यनन्तरभावी विकल्पः स्मृतिज एवं नेन्द्रियार्थजः, तयोः स्मृत्या व्यवहितत्वा-
दिति चेत् ? किं भोः सहकारी भावस्य स्वरूपशक्तिं तिरोधत्ते ? क्षित्युदकतिरोहितस्य
बीजस्याङ्कुरजननं प्रति का वार्ता शब्दस्मरणेनेन्द्रियार्थयोः क उपकारो येनेदं तयोः
सहकारि भवतीति चेत् ? यथा विकल्पः स्वोत्पत्तावर्थेन्द्रिययोरन्वयव्यतिरेकावनुकरोति,
तथा स्मृतेरपि । ततश्चेन्द्रियार्थयोरयमेव स्मरणेनोपकारो यदेतौ केवलौ कार्यमकुर्वन्तौ
स्मृतिसहकारिलाभात् कुरुतः । स्वरूपातिशयानाधायिनो न सहकारिण इति क्षणभङ्ग-
प्रतिषेधावसरे प्रतिषिद्धम् ।
स्यादेतत्—कल्पनारहितं प्रत्यक्षम् । कल्पनाज्ञानं तु सविकल्पकम्, तस्मादर्थे न
प्रमाणमिति ।
अथ केयं कल्पना ? शब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिरेका, अर्थसंयोजनात्मिका
चापरा विशिष्टग्राहिणी कल्पना । तद्युक्तम्, विकल्पानुपपत्तेः ।
शब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिः किमर्थं शब्दं संयोजयति ? किं वा स्वयं
व्यवहित होने के कारण बीज में भी कारणता कुण्ठित हो जाएगी) । (प्र.)
(मुख्य कारण तो कार्य के उत्पादन में उपकार करनेवाला ही सहकारी कारण है)
तदनुसार वाचक शब्द का स्मरण इन्द्रिय और अर्थ का क्या उपकार करता है,
जिससे शब्द के स्मरण को सविकल्पक प्रत्यक्ष का सहकारिकारण मानें ? (उ.)
जिस प्रकार सविकल्पक प्रत्यक्ष अपनी उत्पत्ति के लिए इन्द्रिय और अर्थ का
अनुगमन करता है, उसी प्रकार वह स्मृति के अन्वय और व्यतिरेक के अनुगमन
की भी अपेक्षा रखता है । इन्द्रिय और अर्थ को वाचक शब्द की स्मृति से यही
उपकार होता है कि इसके बिना वे दोनों सविकल्पक प्रत्यक्ष रूप अपना काम नहीं
कर पाते और स्मृति रूप सहकारी के रहने से कर पाते हैं । 'मुख्य कारण के
स्वरूप में किसी विशेष का सम्पादन न करनेवाला सहकारी ही नही है' इस
आक्षेप का हम क्षणभङ्गवाद के खण्डन के अवसर पर निराकरण कर चुके हैं ।
(प्र.) 'कल्पना' से भिन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है, किन्तु सविकल्पक ज्ञान तो 'कल्पना'
रूप है, अतः वह अपने अर्थ का ज्ञापक प्रमाण नहीं है ।
(उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि यह 'कल्पना' कौन-सी वस्तु है ?
(१) (निर्विकल्पक ज्ञान के द्वारा ज्ञात) अर्थ को (उसके बोधक) शब्द के
साथ सम्बद्ध करनेवाली (शब्द संयोजनात्मिका) प्रतीति 'कल्पना' है (२) अथवा
उसी अर्थ को विशेषण के साथ सम्बद्ध करनेवाली (विशिष्ट विषयक) अर्थ
संयोजनात्मिका प्रतीति ही 'कल्पना' है ? किन्तु ये दोनों ही पक्ष अयुक्त हैं,
क्योंकि इन दोनों पक्षों के सभी सम्भावित विकल्प अनुपपन्न ठहरते हैं ।