वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६३५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६३५
प्रशस्तपादभाष्यम्
कामोऽभिलाषः, रागः सङ्कल्पः, कारुण्यम्, वैराग्यमुपधा-
भाव इत्येवमादय इच्छाभेदाः । मैथुनेच्छा कामः । अभ्यवहारेच्छाऽ-
भिलाषः । पुनः पुनर्विषयानुरानेच्छा रागः । अनासन्नक्रियेच्छा
सङ्कल्पः । स्वार्थमनपेक्ष्य परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् । दोषदर्शनाद्
काम, अभिलाषा, राग, संकल्प, वैराग्य, उपधा एवं भाव प्रभृति इच्छा
के ही भेद हैं । (जैसे कि) मैथुन की इच्छा ही 'काम' है । भोजन करने की
इच्छा ही 'अभिलाषा' है । बार-बार विषयों को भोगने की इच्छा ही
'राग' है । शीघ्र किसी काम को करने की इच्छा ही 'संकल्प' है । अपने
कुछ स्वार्थ के बिना दूसरों के दुःख को छुड़ाने की इच्छा ही 'कारुण्य'
है । दोष के ज्ञान से विषय को छोड़ने की इच्छा ही 'वैराग्य' है । दूसरे
न्यायकन्दली
सुखसाधने वस्तुनीच्छा उपजायते, तदुत्पत्तौ च तद्विषयसाध्यं सुखमनागतमपि बुद्धिसिद्ध-
त्वान्निमित्तकारणम् । यदाह न्यायवार्त्तिककारः--"फलस्य प्रयोजकत्वात्" इति ।
अतिक्रान्ते सुखहेताविच्छोत्पत्तेः स्मृतिः कारणम् । प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः । उपादाने-
च्छायास्तदनुगुणः प्रयत्नो भवति, स्मरणेच्छातः स्मरणम्, विहितेषु ज्योतिष्टोमादिषु
फलेच्छया प्रवृत्तस्य धर्मो जायते । प्रतिषिद्धेषु रागात् प्रवृत्तरयाधर्मः । कामादयोऽपि सन्ति
ते कस्मान्नोक्ताः ? अत आह-काम इत्यादि ।
कामादय इच्छाप्रभेदाः, न तत्त्वान्तरमिति यदुक्तं तदेव दर्शयति--
भी अनागत ही रहता है (वर्त्तमान नहीं), फिर भी वह भविष्य सुख भी बुद्धि के द्वारा
सिद्ध होने के कारण इच्छा का निमित्तकारण होता है । जैसा कि न्यायवार्तिककार
ने 'फलस्य प्रयोजकत्वात्' इत्यादि ग्रन्थ से कहा है कि सुख के कारणीभूत विषयों के
नष्ट हो जाने पर भी जो उन विषयों की इच्छा होती है, उस इच्छा के प्रति उन
विषयों की स्मृति कारण है । 'प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः' विषयीभूत वस्तु की इच्छा
से उसे प्राप्त करने या त्याग करने के उपयुक्त प्रयत्न की उत्पत्ति होती है (इस
प्रकार इच्छा प्रयत्न की भी कारण है) । स्मरण की इच्छा से भी स्मृति होती है ।
स्वर्गादि के लिए वेदों से निर्दिष्ट ज्योतिष्टोमादि यागों में स्वर्गादि फलों की इच्छा
से जो प्रवृत्ति होती है, उस इच्छा से धर्म होता है । एवं राग से जो प्रतिषिद्ध
हिंसादि में किसी की प्रवृत्ति होती है, उससे अधर्म की उत्पत्ति होती है, उस अधर्म
के प्रति उक्त रागरूप इच्छा कारण है (इस प्रकार इच्छा प्रयत्नादि का हेतु है) ।
काम प्रभृति गुण भी तो हैं, वे क्यों नहीं कहे गए ? इसी प्रश्न का उत्तर
'कामः' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । यह जो कहा है कि "कामादि इच्छा के ही
६३६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे इच्छा-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विषयत्यागेच्छा वैराग्यम् । परवञ्चनेच्छा उपधा । अन्तर्निगूढेच्छा भावः ।
चिकीर्षाजिहीर्षेत्यादिक्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति ।
को ठगने की इच्छा ही 'उपधा' है। भीतर छिपी हुई इच्छा ही 'भाव'
है । (इसी प्रकार) चिकीर्षा (कुछ करने की इच्छा), जिहीर्षा (छोड़ने
की इच्छा) इत्यादि भी (अपने अन्तर्गत) क्रियाओं के भेद के रहने पर
भी (वस्तुतः) इच्छा के ही प्रभेद हैं ।
न्यायकन्दली
मैथुनेच्छा काम इति । निरुपपदः कामशब्दो मैथुनेच्छायामेव प्रवर्तते, अन्यत्र तस्य
पदान्तरसमभिव्याहारात् प्रवृत्तिः, यथा स्वर्गकामो यजेत इति । अभ्यवहारेच्छा
अभिलाषः । अभ्यवहारो भोजनम्, तत्रेच्छा अभिलाषः । पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा
रागः । पुनर्विषयाणां भोगेच्छा राग इत्यर्थः । अनासन्नक्रियेच्छा सङ्कल्पः ।
अनागतस्यार्थस्य करणेच्छा सङ्कल्पः । स्वार्थमनपेक्ष्य परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् ।
स्वार्थप्रयोजनं किमप्यनभिसन्धाय या परदुःखप्रहाणे अपनयने इच्छा सा कारुण्यम् ।
दोषदर्शनाद् दुःखहेतुत्यागयमे विषयाणां परित्यागे इच्छा वैराग्यम् । परवञ्चनेच्छा
परप्रतारणेच्छा उपधा । अन्तर्निगूढेच्छा लिङ्गैरविभाविता येच्छा सा भावः । चिकीर्षा
जिहीर्षा इत्यादिक्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति । करणेच्छा चिकीर्षा, हरणेच्छा जिहीर्षा
गमनेच्छा जिगमिषेत्येवमादय इच्छाभेदाः क्रियाभेदाद् भवन्ति ।
प्रभेद हैं, स्वतन्त्र गुण नहीं'', उसी का उपपादन "मैथुनेच्छा कामः" इत्यादि सन्दर्भ से
करते हैं । बिना विशेषण का केवल 'काम' शब्द मैथुन की इच्छा में ही प्रयुक्त होता
है, दूसरी तरह की इच्छाओं में 'काम' शब्द की प्रवृत्ति दूसरे पदों के साथ रहने
से ही होती है । जैसे कि 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि । 'अभ्यवहारेच्छा अभिलाषः'
इस वाक्य के 'अभ्यवहार' शब्द का अर्थ है भोजन, उसकी इच्छा ही 'अभिलाष'
शब्द से कही जाती है । 'पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः' अर्थात् विषयों को
बार-बार भोगने की इच्छा ही 'राग' है । 'अनासन्नक्रियेच्छा सङ्कल्पः' अर्थात् भविष्य
काम को करने की इच्छा ही 'संकल्प' है । 'स्वार्थमनपेक्ष्य दुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम्'
अपने किसी प्रयोजन के साधन की अभिसन्धि के बिना जो दूसरों को दुःख से छुड़ाने
की इच्छा, उसे ही 'कारुण्य' कहते हैं । 'दोषदर्शनात्' अर्थात् दुःख के कारणों को
अनिष्ट समझने पर विषयों को छोड़ने की इच्छा ही 'वैराग्य' है । 'परवञ्चनेच्छा'
दूसरों को ठगने की इच्छा को ही 'उपधा' कहते हैं । 'अन्तर्निगूढेच्छा' अर्थात्
लिङ्गों से ही ज्ञात होनेवाली इच्छा को 'भाव' कहते हैं । 'चिकीर्षा', 'जिहीर्षा' इत्यादि
'क्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति' । काम करने की इच्छा को ही 'चिकीर्षा' कहते हैं ।
किसी की वस्तु का अपहरण करने की इच्छा को ही 'जिहीर्षा' कहते हैं ।