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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 759 में से

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पृष्ठ 204

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४९
प्रशस्तपादभाष्यम्
शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् ।
अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणैकपृथक्त्वसांसिद्धिकद्रवत्वगुरुत्वस्नेहानां यावद्-
द्रव्यभावित्वम् ।
शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वञ्चेति ।
अवशिष्ट सभी गुण अपने आश्रय के सभी अंशों में रहते हैं ।
अपाकज रूप, अपाकज रस, अपाकज गन्ध, अपाकज स्पर्श, परिमाण,
एकत्व, एकपृथक्त्व, सांसिद्धिक द्रवत्व, गुरुत्व और स्नेह इन दश गुणों
का 'यावद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है ।
'शेष' अर्थात् कथित अपाकज रूपादि से भिन्न सभी गुणों का 'अया-
वद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है ।
न्यायकन्दली
शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् । उक्तेभ्यो येऽन्ये ते शेषाः । तेषामाश्रयव्यापित्वं संयोगा-
दिवदव्यापकं न भवतीत्यर्थः ।
अपाकजरूपादीनां यावद्द्रव्यभावित्वम् । यावदाश्रयद्रव्यं तावद्रूपादयो विद्यन्ते ।
पाकजरूपादयः सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यपाकजग्रहणम् ।
शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वम् । अपाकजरूपादिव्यतिरिक्ता गुणा यावद्द्रव्यं न सन्ति,
सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यर्थः ।
शेष सभी गुणों का 'आश्रयव्यापित्व' साधर्म्य है । ऊपर जितने भी गुण कहे
गये हैं, उनसे भिन्न सभी गुण यहाँ 'शेष' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन सबों का 'आश्रय-
व्यापित्व' (साधर्म्य है), अर्थात् वे संयोगादि गुणों की तरह अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं ।
कथित अपाकज रूपादि गुणों का 'यावद्द्रव्यभावित्व' (साधर्म्य है), अर्थात्
जब तक आश्रयरूप द्रव्य रहते हैं, तब तक ये अपाकज रूपादि रहते हैं । इसमें
'अपाकज' पद का उपादान इसलिए किया गया है कि पाकज रूपादि आश्रय के
रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं ।
'शेष' गुणों का 'अयावद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है । अर्थात् उक्त अपाकज
रूपादि से भिन्न जितने भी गुण हैं, वे तब तक नहीं रहते, जब तक उनके आश्रय
द्रव्य रहते हैं, किन्तु उनके रहते ही नष्ट हो जाते हैं ।
अब प्रत्येक गुण का असाधारण धर्म कहना है, अतः 'रूपादीनाम्' इत्यादि वाक्य
लिखते हैं । 'रूपमादिर्येषाम्' इस व्युत्पत्ति से सिद्ध 'रूपादि' शब्द से युक्त प्रकृत