वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८३
प्रशस्तपादभाष्यम्
संयोगाद्विनाशो भवति । कस्मात् ? संयुक्तप्रत्ययवद्विभक्तप्रत्ययानुवृत्त्यभावात् ।
तस्मादुत्तरसंयोगावधिसद्भावात् क्षणिक इति ।
का विनाश विभाग की दोनों अवधियों के संयोग से ही नहीं होता;
किन्तु विभाग के एक अवधि के उत्तर देश के साथ संयोग से भी होता
है । (उत्तर संयोग होते ही विभाग का नाश हो जाता है; किन्तु) संयोग
से युक्त दो द्रव्यों में 'ये दोनों संयुक्त हैं' इस प्रकार की प्रतीति की तरह
विभक्त हो जानेवाले दो द्रव्यों में 'ये दोनों विभक्त हैं' इस आकार की
प्रतीति चिरकाल तक नहीं होती । इससे सिद्ध होता है, उत्तर देश
संयोग तक ही विभाग की सत्ता है, अतः विभाग क्षणिक है ।
न्यायकन्दली
स्वाश्रययोरेव परस्परसंयोगाद् विनश्यति; किन्तु स्वाश्रयस्यान्येनापि संयोगात् । तथा हि
वृक्षस्य मूले पुरुषेण विभागस्तयोः परस्परसंयोगाद्विनश्यति, पुरुषस्य प्रदेशान्तरसंयो-
गाद्वा । एवं चेत् सिद्धमुत्तरसंयोगावधित्वं विभागस्य, तदारम्भकस्य कर्मणः स्वाश्रयस्य
देशान्तरप्राप्तिमकृत्या पर्यवसानाभावात् । नन्वेतदपि साध्यसमं संयोगमात्रेण विभाग-
निवृत्तिरिति ? तत्राह-संयुक्तप्रत्ययवदिति । यथा संयुक्तप्रत्ययश्चिरमनुवर्तते, नैवं स्वाश्रयस्य
देशान्तरसंयोगे भूते विभक्तप्रत्ययानुवृत्तिरस्ति । अतस्तस्य संयोगमात्रेणैव निवृत्तिः ।
उपसंहरति-तस्मादिति ।
जिस प्रकार अपने आश्रयों के विभाग से ही संयोग का नाश होता है, उसी प्रकार
विभाग का विनाश केवल अपने आश्रयों के संयोग से ही नहीं होता है; किन्तु
अपने आश्रय का दूसरे देश के (उत्तरदेश के ) साथ संयोग से भी (विभाग का)
नाश होता है; क्योंकि वृक्ष के मूल के साथ पुरुष का विभाग, उन दोनों के
परस्पर संयोग से विनष्ट होता है, अथवा पुरुष का दूसरे प्रदेश के साथ संयोग से
भी (उक्त विभाग विनष्ट होता है) । अगर ऐसी बात है तो फिर यह सिद्ध है कि
उत्तरदेश का संयोग ही विभाग की अवधि है । विभाग के आश्रय का दूसरे देश
के साथ संयोग को उत्पन्न किये बिना विभाग के कारणीभूत क्रिया का नाश नहीं
होता, अतः यह सिद्ध होता है कि उत्तरदेश का संयोग विभाग की अवधि है ।
(प्र.) संयोग (की उत्पत्ति) होते ही विभाग का नाश हो जाता है, यह भी तो
'साध्यसम' ही है, अर्थात् सिद्ध नहीं है; किन्तु इसे भी सिद्ध ही करना है ? इसी
आक्षेप के समाधान के लिए 'संयुक्तप्रत्ययवत्' यह वाक्य लिखा गया है । जिस
प्रकार 'ये संयुक्त हैं' इत्यादि आकार के संयोगवैशिष्ट्य की प्रतीतियाँ चिरकाल
तक रहती हैं, उसी प्रकार 'ये विभक्त हैं' इत्यादि आकार के विभागवैशिष्ट्य
३८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
क्वचिच्चाश्रयविनाशादेव विनश्यतीति । कथम् ? यदा
द्वितन्तुककारणायवे अंशौ कर्मोत्पन्नमंशवन्तरात् विभागमारभते तदैव
तन्त्वन्तरेऽपि कर्मोत्पद्यते, विभागाच्च तन्त्वारम्भकसंयोगविनाशः, तन्तु-
कर्मणा तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियत इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव
काले विभागात् तन्तुसंयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले संयोगविनाशात्
तन्तुविनाशस्तस्मिन् विनष्टे तदाश्रितस्य तन्त्वन्तरविभागस्य विनाश
कहीं आश्रय के विनाश से भी विभाग का नाश होता है । (प्र.) किस प्रकार ?
(आश्रय के नाश से विभाग का नाश होता है ? ) (उ.) (जहाँ) जिस
समय दो तन्तुओं से बने हुए पट के कारणीभूत एक तन्तु के अवयवरूप
एक अंशु में उत्पन्न हुई क्रिया दूसरे अंशु से विभाग को उत्पन्न करती है,
उसी समय उक्त पट के अवयवरूप दूसरे तन्तु में भी क्रिया उत्पन्न होती
है, इस विभाग से दोनों तन्तुओं के उत्पादक अंशुओं में रहनेवाले संयोग
का नाश होता है । एवं तन्तु की क्रिया से इस तन्तु का दूसरे तन्तु से
विभाग उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद
जिस समय दोनों तन्तुओं के विभाग से (पट के आरम्भक दोनों) तन्तुओं के
संयोग का नाश होता है, उसी समय (अंशुओं के) संयोग के विनाश से
तन्तु का भी विनाश होता है । तन्तु का विनाश हो जाने पर उसमें
न्यायकन्दली
क्वचिदाश्रयविनाशादपि विनाशः । कथमित्यज्ञस्य प्रश्नः । उत्तरम्-
यदेति । द्वितन्तुककारणस्य तन्तोरवयवे अंशौ कर्मोत्पन्नमंश्वन्तरस्यांशोर्विभाग-
मारभते यदा, तदैव तन्त्वन्तरेऽपि कर्म, विभागाच्चांशोस्तन्त्वारम्भकसंयोग-
विनाशो यदा, तदा तन्तुकर्मणा तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियत इत्येकः कालः ।
की प्रतीतियाँ चिरकाल तक नहीं होती रहतीं, अतः संयोग से ही विभाग का नाश
होता है । 'तस्मात्' इत्यादि वाक्य से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
'कहीं आश्रय के विनाश से भी (विभाग का) विनाश होता है' । 'कथम्' इत्यादि
वाक्य से इस विषय में अनभिज्ञ का प्रश्न सूचित किया गया है और 'यदा' इत्यादि
से इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । जहाँ दो तन्तुओं से निष्पन्न पट के अवयविभूत
एक तन्तु के समवायिकारण अंशु में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय उस अंशु के
दूसरे अंशु से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय दूसरे तन्तु में भी क्रिया