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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१७
प्रशस्तपादभाष्यम्
कथम् ? अनित्यः शब्द इत्यनेनानिश्चितानित्यत्वमात्रविशिष्टः
शब्दः कथ्यते । प्रयत्नानन्तरीयकत्वादित्यनेनानित्यत्वसाधनधर्ममात्रम-
भिधीयते । "इह यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्यं दृष्टम्, यथा घटः"
इत्यनेन साध्यसामान्येन साधनसामान्यस्यानुगममात्रमुच्यते । नित्यम-
(प्र.) (प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों की आवश्यकता) किस प्रकार
सिद्ध है ? (उ.) 'अनित्यः शब्दः' (शब्द अनित्य है) इस प्रतिज्ञावाक्य
से अनिश्चित अनित्यत्व से युक्त शब्द का ही बोध होता है । प्रतिज्ञावाक्य
के बाद प्रयुक्त 'प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्' (यतः प्रयत्न के बाद ही शब्द की
सत्ता उपलब्ध होती है) इस हेतुवाक्य से 'शब्द में अनित्यत्व का
न्यायकन्दली
इति । तत्र को हेतुरित्यपेक्षायां प्रयत्नानन्तरीयकत्वात् पूर्वमसतः प्रयत्नानन्तरमुप-
लभ्यमानत्वादिति हेतुवचनेनानित्यत्वसाधनधर्ममात्रमभिधीयते । मात्रग्रहणेन
पक्षधर्मताया अन्वयव्यतिरेकयोश्चानभिधानं दर्शयति । अवगतसाधनस्य कथमिदं
साध्यं गमयतीति साधनसामर्थ्यापेक्षायाम् 'इह जगति यत् प्रयत्नानन्तरीयकं
तदनित्यं दृष्टम्' इत्युदाहरणेन साध्यसामान्येन साधनसामान्यस्यानुगममात्रं करोति
न तु स्वरूपान्तरमिति मात्रशब्दार्थः । नित्यमप्रयत्नानन्तरीकमिति वैधर्म्य-
निदर्शनेन साध्याभावे साधनाभावः प्रदर्श्यते-यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्य-
इस प्रकार की आकाङ्क्षा के उठने पर उसके शमन के लिए 'प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्'
इस हेतुवाक्य का प्रयोग किया जाता है । प्रयत्न के बाद ही पहले से अविद्यमान
वस्तु की उपलब्धि होती है । इस हेतुवाक्य के द्वारा शब्द में अनित्यत्व का साधक
'प्रयत्नानन्तरीयकत्व' ही केवल उपस्थित किया जाता है । इस वाक्य में 'मात्र' शब्द
का प्रयोग यह समझाने के लिए किया गया है कि इस वाक्य से हेतु का अन्वय और
व्यतिरेक अर्थात् व्याप्ति और पक्षधर्मता का प्रतिपादन नहीं होता है (केवल हेतु
का ही अभिधान होता है) । बोद्धा को जब हेतु का ज्ञान हो जाता है, तब उसे
जिज्ञासा होती है कि 'किस रीति से यह हेतु इस साध्य की अनुमिति का उत्पादन
कर सकता है ?' हेतु के सामर्थ्य के प्रसङ्ग की इस जिज्ञासा की निवृत्ति के लिए
ही (उक्त स्थल में) 'इह' इत्यादि उदाहरण वाक्य का प्रयोग किया जाता है । जिनका
अभिप्राय है कि 'इह' अर्थात् संसार में प्रयत्न के बाद ही जिसकी उपलब्धि होती
है, वह अर्थ अनित्य ही देखा जाता है । उदाहरण वाक्य से सभी साधनों में सभी
साध्यों की केवल अनुगति अर्थात् व्याप्ति ही दिखलायी जाती है, पक्षधर्मता नहीं ।
यही बात उक्त सन्दर्भ में 'मात्र' शब्द के प्रयोग से दिखलायी गई है । 'नित्यमप्रयत्ना-
नन्तरीयकम्' इस वैधर्म्यनिदर्शन वाक्य के द्वारा साध्य के अभाव में हेतु के अभाव

६१८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रयत्नानन्तरीयकं दृष्टम्, यथाकाशमित्यनेन साध्याभावेन साधनस्या-
सत्त्वं प्रदर्श्यते । तथा च प्रयत्नानन्तरीयकः शब्दो दृष्टो न च
तथाकाशवदप्रयत्नानन्तरीयकः शब्द इत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां दृष्ट-
सामर्थ्यस्य साधनसामान्यस्य शब्देऽनुसन्धानं गम्यते । तस्मादनित्यः
साधक प्रयत्नानन्तरीयकत्व की सत्ता है' केवल इतना ही बोध होता है ।
(इसके बाद प्रयुक्त) 'प्रयत्न के बाद जो सत्ता लाभ करते हैं, वे सभी अनित्य
ही देखे जाते हैं, जैसे कि घटादि' इस (साधर्म्य) निदर्शन वाक्य से सभी
साध्यों के साथ सभी हेतुओं के केवल अन्वय का बोध होता है । 'जितने
भी नित्य पदार्थ उपलब्ध हैं, उन सभी की सत्ता बिना प्रयत्न के ही देखी
जाती है, जैसे कि आकाश की' इस (वैधर्म्य) निदर्शन वाक्य से साध्य के
अभाव के साथ हेतु के अभाव की नियमित सत्तारूप व्यतिरेक ही प्रतिपादित
होता है । 'शब्द घटादि की तरह प्रयत्न के बाद ही सत्ता लाभ करते
दीखते हैं' एवं 'आकाशादि की तरह बिना प्रयत्न के ही सत्ता लाभ करते
नहीं दीखते' इस अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा (प्रयत्नानन्तरीयकत्वरूप)
हेतु में अनित्यत्वरूप साध्य के साधन का व्याप्तिरूप सामर्थ्य ज्ञात
होता है । (इस प्रकार) ज्ञान के सामर्थ्य (व्याप्ति) से युक्त हेतु सामान्य
का शब्दरूप पक्ष में अनुसन्धान ही अनुसन्धान-वाक्य से किया जाता है ।
न्यायकन्दली
मिति । दृष्टमेतत्, किन्तु शब्दे तदस्ति न वेति जिज्ञासायाम्-तथा च प्रयत्ना-
नन्तरीयकः शब्द इति । यथा घटः प्रयत्नानन्तरीयकः, तथा शब्दोऽपि प्रयत्ना-
नन्तरीयकः । न चाकाशवदप्रयत्नानन्तरीयक इत्यनुसन्धानेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां
दृष्टसामर्थ्यस्य दृष्टाविनाभावस्य प्रयत्नानन्तरीयकत्वस्य शब्दे धर्मिण्यनुसन्धान-
मुपस्थापनं गम्यते । यथा यत् कृतकं तदनुष्णं दृष्टम्, यथा घट इति सत्यपि
की व्याप्ति दिखलायी गयी है। 'यत् प्रयत्नानन्तरीयकम्, तदनित्यम्' इस साधर्म्य निदर्शन
वाक्य से "यह तो समझा कि प्रयत्न की सत्ता के अधीन जिनकी
सत्ता होती है, वे सभी अनित्य होते हैं, किन्तु शब्द में यह प्रयत्नानन्तरीयकत्व
है कि नहीं" ? यह जानने की इच्छा तब भी बनी ही रहती है, इसी इच्छा की
निवृत्ति के लिये "तथा च प्रयत्नानन्तरीयकः शब्दः" इस वाक्य का प्रयोग
किया जाता है । अर्थात् जिस प्रकार घट में प्रयत्नानन्तरीयकत्व है, उसी प्रकार
शब्द में भी प्रयत्नानन्तरीयकत्व है । एवं आकाश की तरह शब्द प्रयत्नानन्त-
रीयक नहीं है । इस प्रकार दोनों अनुसन्धान वाक्यों से अन्वय और व्यतिरेक
के द्वारा 'दृष्टसामर्थ्य' अर्थात् जिस प्रयत्नानन्तरीयकत्व हेतु की व्याप्ति ज्ञात
हो गयी है, उसी प्रयत्नानन्तरीयकत्व का 'शब्द' में अर्थात् पक्ष में 'अनुसन्धान'
अर्थात् उपस्थापन होता है । जिस प्रकार "जो कृति से उत्पन्न होता है, वह
अनुष्ण होता है" इस प्रकार की बाह्य व्याप्ति की सम्भावना इससे मिट जाती है