वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०९
न्यायकदली
छिदिक्रिया छेद्येन सम्बध्यते भिद्यते च, तथा ज्ञानक्रियापि ज्ञेयेन सह संभन्त्स्यते भेत्स्यते
च । सहोपलम्भनियमस्यापि विपक्षाद् व्यावृत्तिः सन्दिग्धा, ज्ञानस्य स्वपरसंवेद्यतामात्रेणैव
नीलतद्धियोर्युगपद्ग्रहणनियमस्योपपत्तेः । बाह्याभावाज्ज्ञानं परस्य संवेदकं न भवतीति
चेत् ? बाह्याभावसिद्धौ हेतोर्विपक्षाद् व्यावृत्तिसिद्धिः, तत्सिद्धौ चास्य विपक्षाभावं प्रति
हेतुत्वमित्यन्योन्यापेक्षित्यम् ? तदेवास्तु किमनेन ? असिद्धश्च सहोपलम्भनियमो नीलमेतदिति
बहिर्मुखतयार्थेऽनुभूयमाने तदानीमेवान्तरस्य तदनुभवस्यानुभवात्। ज्ञानस्य स्वसंवेदनतासिद्धौ
सहोपलम्भनियमसिद्धिरिति चेत् ? स्वसंवेदनसिद्धौ किं प्रमाणम् ? यत्प्रकाशं तत्स्वप्रकाशे
परानपेक्षं यथा प्रदीप इति चेत् ? प्रदीपस्य तद्देशवर्त्तितमोपनयने व्यापारः, स चानेन
स्वयमेव कृत इति तदर्थं प्रदीपान्तरं नापेक्षते, वैयर्थ्यात् । स्वप्रतिपत्तौ तु चक्षुरादि-
कमपेक्षत एवेति साध्यविकलता दृष्टान्तस्य । अथ प्रकाशकत्वं ज्ञानत्वमभिप्रेतम् ?
तस्मात् परानपेक्षा, तदानीमसाधारणो हेतुः ।
किसी राजा की आज्ञा भी नहीं है कि जड़ और प्रकाश में सम्बन्ध न हो, जैसे कि
छेदन क्रिया छेद्य वस्तु से भिन्न होती हुई भी उसके साथ सम्बद्ध होती है, उसी
प्रकार ज्ञानरूप क्रिया भी ज्ञेय वस्तु से भिन्न होने पर भी उसके साथ सम्बद्ध
होगी । एवं कथित 'सहोपलम्भ नियम' रूप हेतु में भी विपक्ष की व्यावृत्ति सन्दिग्ध
ही है; क्योंकि ज्ञान को 'स्व' एवं 'स्व' से भिन्न (अपना विषय) दोनों का
प्रकाशक मान लेने से ही उक्त 'सहोपलम्भ' नियम की उपपत्ति हो जाएगी । (प्र.)
बाह्य वस्तु की तो सत्ता ही नहीं है, फिर ज्ञान दूसरे का ज्ञापक कैसे होगा ? (उ.)
यह कहना तो स्पष्ट ही अन्योन्याश्रय से दूषित है; क्योंकि बाह्य वस्तु की सत्ता के
उठ जाने पर सहोपलम्भ रूप हेतु में विपक्षव्यावृत्ति का निश्चय होगा और
विपक्षव्यावृत्ति के सिद्ध हो जाने पर सहोपलम्भ नियम रूप हेतु के विपक्ष (बाह्य
वस्तु) के अभाव की सिद्धि होगी । (प्र.) उक्त हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति के न
रहने से ही क्या ? (उ.) वस्तुतः सहोपलम्भ नियम रूप हेतु ही असिद्ध है;
क्योंकि नील और नीलविषयक ज्ञान इन दोनों का अनुभव एक समय में नहीं
होता । नील की बहिर्मुख प्रतीति हो जाने के अव्यवहित उत्तर क्षण में नील ज्ञान
की अन्तर्मुखतया उपलब्धि होती है । (प्र.) ज्ञान को स्वतः प्रकाश मान लेने से ही
सहोपलम्भ नियम की सिद्धि होगी । (उ.) ज्ञान को स्वसंवेदन (स्वतः प्रकाश)
मानने में ही क्या युक्ति है ? (प्र.) जो प्रकाश रूप होता है वह अपने प्रकाश के
लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता, जैसे कि प्रदीप । (उ.) प्रत्यक्ष के उत्पादन में
प्रदीप का इतना ही उपयोग है कि वह विषयदेश के अन्धकार को हटाता है ।
प्रदीप अपने प्रत्यक्ष के लिए भी अन्धकार को हटाने का काम स्वयं कर लेता है,
अतः प्रदीप के प्रत्यक्ष में दूसरे प्रदीप की आवश्यकता नहीं होती है; किन्तु चक्षुरादि
३१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
यच्चोक्तं यस्याव्यक्तः प्रकाशस्तत्स्वयमव्यक्तं यथा पिहितं वस्त्विति, तत्र पिहितस्या-
व्यक्ता अप्रकाशः, तन्न, स्वयमव्यक्तत्वात्; किन्त्वभावादेवेति व्याप्यसिद्धिः । यच्च प्रत्य-
यत्वादिति तदप्यसारं दृष्टान्तासिद्धेः । स्वप्नादिप्रत्यया अपि समारोपितबाह्यालम्बना न
स्वात्ममात्रपर्यवसायिनः, जाग्रदवस्थोपयुक्तानामेवार्थानां संस्कारवशेन तथा प्रतिभासनात्,
अन्यथा दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु तदुत्पत्तिनियमायोगात् । किञ्च, यदि बाह्यं नास्ति किमिदानीं
नियताकारं प्रतीयते नीलमेतदिति । विज्ञानाकारोऽयमिति चेत्, न, ज्ञानाद्वहिर्भूतस्य संवेद-
नात् । ज्ञानाकारत्वे त्वहं नीलमिति प्रतीतिः स्यान्न त्विदं नीलमिति । ज्ञानानां प्रत्येकमाकार-
भेदात् कस्यचिदहमिति प्रतीतिः कस्यचिदिदं नीलमिति चेत् ? नीलाद्याकारवदहमित्या-
को अपेक्षा तो रहती ही है । अतः प्रदीपरूप दृष्टान्त में स्वतः प्रकाशकत्व का
ज्ञापक परानपेक्षत्व रूप हेतु नहीं है । यदि ज्ञानत्व को ही प्रकाशकत्व रूप मानें तो
फिर 'स्वतः प्रकाशत्व' का साधक परानपेक्षत्व हेतु उस समय असाधारण नाम
का हेत्वाभास होगा ।
यह जो आपने कहा कि- "ढँकी हुई चीज की तरह जिसका प्रकाश अव्यक्त
रहता है वह स्वयं भी अव्यक्त ही रहता है ।" इस प्रसङ्ग में कहना है कि आवृत्त
वस्तु का अप्रकाश ही उसकी अव्यक्तता है, जो वस्तुतः उस वस्तु के प्रकाश का
अभाव मात्र है । उस वस्तु के प्रकाशक की अव्यक्तता उस वस्तु की अव्यक्तता
नहीं है । अतः ज्ञान के स्वतः प्रकाशत्व की साधक उक्त व्यतिरेक व्याप्ति भी
सिद्ध नहीं है । (बाह्य वस्तुओं की असत्ता के साधक या ज्ञान में विषय शून्यत्व या
निरालम्बनत्व का साधक) प्रत्यक्त्व (ज्ञानत्व) हेतु में भी कुछ बल नहीं है; क्योंकि
इस हेतु का (स्वप्नज्ञान रूप ) दृष्टान्त ही असिद्ध है । स्वप्नज्ञान भी बाह्य-
विषयक है ही । वहाँ वे केवल अपने स्वरूप में नहीं हैं । जाग्रत् अवस्था
के ज्ञान में भासित होने योग्य विषयों का ही संस्कारवश स्वप्नज्ञान में भान
होता है । अगर यह बात न हो तो स्वप्नज्ञान में नियमतः उसी विषय का
भान कैसे हो, जो वस्तु पहले से ही श्रुत या दृष्ट हो । दूसरी बात यह है कि
अगर बाह्य वस्तु नहीं है तो फिर 'यह नील है' इत्यादि प्रतीतियों में नियमित
रूप से किसका भान होता है ? (प्र.) प्रतीतियों में भासित होनेवाले आकार
विज्ञान के हैं ? (उ) ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि उक्त प्रतीतियाँ ज्ञान से
भिन्न अर्थविषयक ही होती हैं । अगर उक्त प्रतीतियों में भासित होने वाले
आकार भी विज्ञान के ही हों तो फिर उन प्रतीतियों का अभिलाप 'यह नील
है' इस प्रकार का न होकर 'मै नील हूँ' इत्यादि आकार का होगा । (प्र.)
ज्ञानों के प्रत्येक आकार भिन्न-भिन्न हैं । इनमें से किसी आकार की प्रतीति
'अहम्' के साथ होती है एवं किसी आकार की प्रतीति 'इदम्' के साथ । (उ.)
ऐसी बात नहीं है; क्योंकि नीलादि आकारों की तरह 'अहम्' आकार नियमित