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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१३

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१३
प्रशस्तपादभाष्यम्
समूहज्ञानस्य संस्कारहेतुत्वात् । समूहज्ञानमेव संस्कारकारणं नालोचन-
ज्ञानमित्यदोषः ।
क्योंकि समूह ज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान संस्कार का कारण है । अर्थात्
समूह ज्ञान ही संस्कार का कारण है, आलोचन (निर्विकल्पक) ज्ञान
नहीं, अतः उक्त आपत्ति नहीं है । अतः उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान का
अनुत्पत्तिरूप दोष नहीं है ।
न्यायकन्दली
तर्हि वध्यघातकपक्षेऽपि तदनुत्पत्तिः । अत्रोपपत्तिमाह-सामान्यबुद्धिसमकालं संस्काराद-
पेक्षाबुद्धिविनाशादिति । यथापेक्षाबुद्धिरुत्पन्ना द्वित्वं जनयति तथा संस्कारमपि, स च
तस्या विनाशकः । तेन संस्कारस्य द्वित्वस्य चोत्पादे द्वित्वसामान्यज्ञानस्य
चोत्पद्यमानतापेक्षाबुद्धेर्विनाशश्चेत्येकः कालः । ततो द्वित्वसामान्यज्ञानस्य चोत्पादो
गुणबुद्धेश्चोत्पद्यमानतापेशाबुद्धेर्विनाशो द्वित्वस्य विनश्यतेत्येकः कालः । ततो गुण-
बुद्धेरुत्पादो द्वित्वस्य विनाश इति क्षणान्तरे तदपेक्षस्य द्वे इति ज्ञानस्यानुत्पाद इति
वध्यघातकपक्षेऽपि तुल्यो दोषः । समाधत्ते-न, समूहज्ञानस्य संस्कारहेतुत्वादिति ।
एतदेव विवृणोति-समूह इत्यादिना । समूहज्ञानं द्वित्वगुणविशिष्टद्रव्यज्ञानमेव संस्कारं
करोति, नालोचनज्ञानम्, न निर्विकल्पकमपेक्षाज्ञानम्, अतो नास्य संस्काराद्विनाश इत्यर्थः ।
इसी विषय में 'समानबुद्धिसमकालम्' इत्यादि ग्रन्थ लिखा गया है । अभिप्राय
यह है कि जैसे अपेक्षाबुद्धि स्वयं उत्पन्न होकर द्वित्व को उत्पन्न करती है,
वैसे ही संस्कार भी (स्वयं उत्पन्न होकर ही द्वित्व को उत्पन्न करता है),
एवं संस्कार अपेक्षाबुद्धि का विनाशक भी है, अतः संस्कार और द्वित्व इन दोनों
के उत्पन्न हो जाने पर सामान्यरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) विषयक ज्ञान की उत्पद्यमानता
(उक्त ज्ञान के सभी कारणों का एकत्र होना) और अपेक्षाबुद्धि की विनश्यत्ता
(अर्थात् विनाश के सभी कारणों का एकत्र होना) इतने काम एक समय में होते
हैं (यह मानना पड़ेगा)। इसके बाद गुणरूप द्वित्व का ज्ञान और द्वित्व का नाश,
ये दो काम होते हैं । अतः इसके बाद के क्षण में द्वित्व से उत्पन्न होनेवाले 'द्वे
द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होगी । इस प्रकार वध्यघातक पक्ष में भी
द्रव्यज्ञान का उक्त अनुत्पत्तिरूप दोष तो समान ही है । "न, समूहज्ञानस्य
संस्कारहेतुत्वात्" इत्यादि से इस आक्षेप का समाधान कर 'समूह' इत्यादि से
इसकी व्याख्या करते हैं । अभिप्राय यह है कि 'समूहज्ञान' अर्थात्
द्वित्वगुण-विशिष्ट द्रव्य का ज्ञान ही संस्कार का उत्पादक है, आलोचन (केवल
विशेष्य) ज्ञान नहीं, निर्विकल्पक ज्ञानरूप अपेक्षाज्ञान भी नहीं, अतः संस्कार

२९४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ज्ञानयौगपद्यप्रसङ्ग इति चेत् ? स्यान्मतम्-ननु ज्ञानानां
वध्यघातकविरोघे ज्ञानयौगपद्यप्रसङ्ग इति । न, अविनश्यतोरवस्थान-
प्रतिषेधात् । ज्ञानायौगपद्यवचनेन ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्तिरविनश्यतोश्च
(प्र.) इस पक्ष में 'ज्ञानयौगपद्य' की आपत्ति होगी ? अर्थात् अगर
'वध्यघातक' रूप विरोध मानें तो एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की
उत्पत्ति (ज्ञानयौगपद्य) की आपत्ति होगी । (उ.) नहीं, क्योंकि
(ज्ञानयौगपद्य के खण्डन से) एक ही क्षण में अविनाशावस्था वाले दो
ज्ञानों की सत्ता खण्डित होती है । अर्थात् उक्त 'ज्ञानायौगपद्य' वाक्य
न्यायकन्दली
अपेक्षाज्ञानस्य संस्काराहेतुत्वे द्रव्यविवेकैनैकगुणयोः स्मरणं प्रमाणम्, गुणविशिष्टद्रव्य-
ज्ञानस्य तद्धेतुत्वे चाविशिष्टद्रव्यस्मरणं प्रमाणम् । यदि ज्ञानमुत्पद्य पूर्वोत्पन्नं ज्ञानं विनाशयति
तदेतस्मिन् पक्षे तयोः सहावस्थानं प्राप्नोति, ततश्च ज्ञानायौगपद्यादिति सूत्रविरोध इति
केनचिदुक्तं तदाशङ्कते-ज्ञानयौगपद्यप्रसङ्ग इति चेत् ? स्यान्मतमित्यादिना । अस्य विवरणं
करोति-नन्वित्यादिना । समाधत्ते-नेति । एकस्मिन् क्षणे विनाश्यविनाशकज्ञानयोः
सहावस्थानं न दोषाय, ज्ञानायौगपद्यादिति सूत्रेणाविनश्यतोरवस्थानप्रतिषेधात् । एतदेव
दर्शयति-ज्ञानायौगपद्यवचनेन ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्तिरविनश्यतोश्च युगपदवस्थानं
से द्वित्व का विनाश नहीं हो सकता है । द्रव्य को छोड़कर दोनों गुणरूप एकत्वों
के स्मरणरूप प्रमाण से ही यह समझते हैं कि 'उक्त अपेक्षाज्ञान संस्कार का
कारण नहीं है' । एवं गुणविशिष्ट द्रव्य के स्मरणरूप प्रमाण से ही यह भी
समझते हैं कि 'गुणविशिष्ट द्रव्य का ज्ञान संस्कार का कारण है' । किसी का
कहना है कि (प्र.) अगर एक ज्ञान उत्पन्न होकर पहले उत्पन्न दूसरे ज्ञान को
(अपने अगले ही क्षण में) नष्ट करता है तो फिर इस (वध्यघातक) पक्ष में उन
दोनों ज्ञानों की एक ही (विनाशक ज्ञानोत्पत्ति) क्षण में स्थिति प्राप्त हो जाती है ।
ऐसा होने पर 'ज्ञानायौगपद्यात्' यह सूत्र विरुद्ध होता है । यही आक्षेप
'ज्ञानायौगपद्यप्रसङ्गः स्यान्मतम्' इत्यादि से करते हैं । 'ननु' इत्यादि से इसी
आक्षेपोक्ति की व्याख्या करते हैं । 'न' इत्यादि से इस आक्षेप का समाधान इस
प्रकार करते हैं कि एक क्षण में विनाश्य एवं विनाशक इन दो ज्ञानों की
अवस्थिति से ज्ञानयौगपद्यरूप दोष नहीं होता है । 'ज्ञानायौगपद्यात्' इस सूत्र के
द्वारा विनाश्यविनाशकभावानापन्न परस्पर निरपेक्ष दो ज्ञानों की एक क्षण में सत्ता
का ही निषेध महर्षि कणाद को उक्त सूत्र से अभीष्ट है । 'ज्ञानायौगपद्य-
वचनेन' इत्यादि भाष्य के द्वारा यही उपपादन किया गया है । अर्थात् वध्यघातक
पक्ष में अनेक ज्ञानों की एक क्षण में (एक आत्मा में) उत्पत्ति की आपत्ति