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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५१
न्यायकदली
सरति ? हतं तर्हीदमनवस्थया । अथेयं स्वसामर्थ्यात् प्रवर्तते ? तदा यथा यद् वस्तु यद्
दर्शयति तथैव तत्, न त्येतदन्यत्रादर्शनेन प्रत्याख्यानमर्हति सर्वभावप्रत्याख्यानप्रसङ्गात् ।
तस्मात् सामान्यं व्यक्त्युत्पादविनाशयोरुत्पादविनाशवत्त्वाद् व्यक्त्यन्तरावस्थाने चावस्थाना-
न्नित्यमनित्यं च, न पुनर्नित्यमेव ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते किं जातिव्यक्त्योर्विलक्षणमाकारं गृह्णाति तत्प्रतीतिः ? उत
तयोरभेदं गृह्णाति ? आहोस्वित् परस्परविलक्षणावाकारौ ? आद्ये कल्पे तावदेकमेव वस्तु
स्यात्, नोभयोरेकात्मकत्वम्, अविलक्षणाकारबुद्धिर्वेद्यत्वस्याभेदलक्षणत्वात् । द्वितीये तु
कल्पे व्याहतिरेव, विलक्षणाकारसंवित्तिरेव हि भेदसंवितिः । तस्याः सम्भवे सति
तयोरभेदप्रतिपत्तिरेव नास्ति, कथं भिन्नयोरभेदो व्यवस्थाप्यते ? कथं तर्हि तादात्म्य-
प्रतीतिः ? न कथञ्चिदिति वदामः ।
यदि तावदेक आकारोऽनुभूयते, एकस्यैव वस्तुनः प्रतीतिरियं नोभयोः ।
अथ द्वावाकारावनुभूयेते तदास्याः प्रतीतेरसम्भव एव । यत् पुनर्गौरित्यय-
कहें कि (उ.) एक ही वस्तु के भेद और अभेद इन दोनों की अवस्थिति एक ही
वस्तु में कहीं नहीं देखी जाती है । अतः उक्त भेदाभेद पक्ष अयुक्त है । (प्र.) तो
इसके उत्तर के लिए यह पूछना है कि क्या अनुमान की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण को
भी अपने विषय की सिद्धि के लिए उसका अन्यत्र देखा जाना आवश्यक है ?
यदि ऐसी बात मानें तो अनवस्थादोष के कारण प्रत्यक्ष प्रमाण का ही लोप हो
जायगा । यदि प्रत्यक्ष (अन्यत्र दर्शन की अपेक्षा न करके) केवल अपने बल से ही
अपने विषय को दिखाने के लिए प्रवृत्त होता है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि
अपने जिस वस्तु को वह जिस रूप में दिखलाता है, वह वस्तु उसी रूप का है ।
इस वस्तुस्थिति का केवल इस हेतु से निरादर नहीं किया जा सकता कि 'अन्यत्र
इस प्रकार से देखा नहीं जाता' । प्रत्यक्ष का यदि यह स्वभाव न मानें तो संसार से
सभी वस्तुओं की सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि सामान्य
यतः अपने आश्रयरूप व्यक्तियों के उत्पन्न होने पर ही उत्पन्न होता है और उनके
विनष्ट होने पर विनष्ट भी होता है, अतः 'अनित्य' है । एवं उस व्यक्ति के नाश
के बाद भी उसी जाति की दूसरी व्यक्ति में रहता है, अतः वह 'नित्य' भी है ।
तस्मात् सामान्य नित्य एवं अनित्य दोनों ही है, केवल नित्य ही नहीं है।
(उ.) ऐसी स्थिति में हम (तार्किक) लोग पूछते हैं कि (१) 'अयं गौः' यह
प्रतीति जाति और व्यक्ति दोनों को एक ही आकार में ग्रहण करती है । (२)
अथवा दोनों के अभेद का ग्रहण करती है ? (३) अथवा जाति और व्यक्ति दोनों
को परस्पर विभिन्न आकारों में ग्रहण करती है ? इनमें यदि पहला पक्ष मानें तो

७५२ न्यायकन्दलीसंतलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
मविभागेन संवेदनं तत् समवायसामर्थ्यात् । संयोगे हि द्वयोः संसर्गावभासः, समवायस्य
पुनरेष महिमा यदत्र सम्बन्धिनावयःपिण्डवह्नियत् पिण्डीभूतावेव प्रतीयेते जातिरेव न च
व्यक्तेः स्वरूपम् । तेन सत्यपि भेदे बदरादिवत् कुण्डस्य जातितो व्यक्तेः स्वरूपं पृथग् न
निष्कृष्यते । परस्परपरिहारेण तूपलम्भोऽस्त्येव, दूरे गोत्वाग्रहणेऽपि पिण्डस्य ग्रहणात् ।
पूर्वपिण्डाग्रहणेऽपि पिण्डान्तरे गोत्वग्रहणात् । तस्माद् व्यक्तेरत्यन्तं भिन्नमेव सामान्यमिति
तार्किकाणां प्रक्रिया ।
द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम्, द्रव्यत्वादयः
फिर जाती या व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक का मानना ही सम्भव होगा, दूसरे
का नहीं, जाति और व्यक्ति एतदुभयात्मक किसी वस्तु की कल्पना सम्भव नहीं होगी;
क्योंकि अभिन्नता का यही लक्षण है कि जो अविलक्षण आकार की बुद्धि के द्वारा
ज्ञात हो । यदि दूसरा पक्ष मानें तो परस्पर विरोध ही उपस्थित होगा; क्योंकि
किन्हीं दो वस्तुओं का परस्पर विभिन्न आकारों से गृहीत होना ही उन दोनों के
भेद का ज्ञान है । भेद का यह ज्ञान यदि सम्भव है, तो फिर उन दोनों में
तादात्म्य की प्रतीति कैसी ? अतः हम लोग कहते हैं कि जाति और व्यक्ति इन
दोनों के तादात्म्य की प्रतीति किसी भी प्रकार से नहीं होती; क्योंकि यदि एक ही
आकार का अनुभव होता है तो फिर वह अनुभव एक ही वस्तु की प्रतीति होगी,
दो वस्तुओं की नहीं । यदि दो आकारों का अनुभव होता है, तो फिर उस एक
आकार की प्रतीति की सम्भावना ही मिट जाती है । 'गौरयम्' इत्यादि प्रतीतियों
में जो गोत्वजाति और गोव्यक्ति विना अलग हुए से प्रतीत होते हैं, वह तो दोनों
के समवाय का सामर्थ्य है । संयोग की प्रतीति में उसके प्रतियोगी और अनुयोगी
दोनों के सम्बन्धियों का भान होता है । समवाय की ही यह विशेष महत्ता है कि
इसमें उसके दोनों सम्बन्धी (प्रतियोगी और अनुयोगी) परस्पर एक होकर ही
प्रतीत होते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड वस्तुतः पृथक् होते हुए भी एक
होकर ही ज्ञान में भासित होते हैं । सुतराम् (व्यक्ति-सम्बद्ध) जाति की ही प्रतीति
होती है, केवल व्यक्ति के स्वरूप की नहीं । अतः जाति और व्यक्ति में वस्तुतः
भेद रहते हुए भी जैसे कि (संयोगयुक्त) कुण्ड और बेर को अलग कर दिखलाया
जा सकता है, उस प्रकार जाति से व्यक्ति के स्वरूप को अलग नहीं किया जा
सकता । कुछ स्थानों में जाति और व्यक्ति की प्रतीति एक-दूसरे को छोड़कर भी
होती है । जैसे दूर में गोपिण्ड (व्यक्ति) की प्रतीति तो होती है, (किन्तु 'यह गो है'
इस प्रकार से) गोत्व की प्रतीति वहाँ नहीं होती । एवं पूर्वपिण्ड का ग्रहण न रहने पर भी
दूसरे पिण्ड में गोत्व का ग्रहण होता है । तस्मात् तार्किकों की रीति के अनुसार
जाति और व्यक्ति अत्यन्त भिन्न हैं । (किसी भी प्रकार वास्तव में अभिन्न नहीं हैं) ।
द्रव्यादि सामान्य यतः नियमित रूप से द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही रहते हैं,
एवं प्रत्येक सामान्य की प्रतीति भिन्न-भिन्न आकार की होती है, अतः समझते हैं कि
द्रव्यत्व व गुणत्वादि सामान्य परस्पर भिन्न हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि सामान्यों