वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५३
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम् ।
प्रत्येकं स्वाश्रयेषु लक्षणाविशेषाद् विशेषलक्षणाभावाच्चैकत्वम् । यद्यप्य-
परिच्छिन्नदेशानि सामान्यानि भवन्ति, तथाप्युपलक्षणनियमात्
द्रव्यत्वादि कोई भी सामान्य द्रव्यादि कुछ आश्रयों में ही नियत रूप
से रहते हैं एवं भिन्न रूप से प्रतीत भी होते हैं, अतः (द्रव्यत्व-
गुणत्वादि) सामान्य परस्पर विभिन्न हैं । एवं प्रत्येक सामान्य अपने
आश्रयों में समान रूप से प्रतीत होता है एवं उसको अनेक मानने में
कोई प्रमाण भी नहीं है इससे सिद्ध होता है कि द्रव्यादि नियत आश्रयों
में रहनेवाले द्रव्यत्वादि सामान्यों में से प्रत्येक सामान्य एक-एक ही हैं ।
यद्यपि सामान्य अनन्त (प्रकार के) आश्रयों में रहता है, फिर भी
उसकी अभिव्यक्ति के कारणों की एकरूपता और उसके आश्रयों का
न्यायकन्दली
प्रत्येकं द्रव्यादिव्येव नियताः । प्रत्ययभेदश्चैतेषु दृश्यते, तस्माद् द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात्
प्रत्ययभेदाच्च द्रव्यत्वादीनां परस्परतो भेदः ।
अभेदात्मकं सामान्यमिति पूर्वं प्रतिज्ञामात्रेणोक्तं तदिदानीं प्रमाणसिद्धं
तस्य करोति-प्रत्येकं स्वाश्रयेष्विति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणमनुगताकारज्ञानम् ।
प्रत्येकं प्रतिपिण्डमविशेषाद् वैलक्षण्याभावाद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च
सामान्यस्य स्वाश्रयेष्वेकत्वमभिन्नस्वभावमित्यर्थः । स्वविषये सर्वत्र सामान्यं
समवैति नान्यत्रेति यत् पूर्वमुक्तं तस्य कारणमाह-यद्यपीति । यद्यपि
सामान्यानि यत्र तत्रोत्पद्यमानेन पिण्डेन सम्बन्धादपरिच्छिन्नदेशान्यनियतदेशानि,
में से प्रत्येक सामान्य यतः द्रव्यादि व्यक्तियों में ही नियमित रूप से रहता है एवं
इनमें इनकी प्रतीतियाँ भी विभिन्न आकार की होती हैं । तस्मात् द्रव्यादि में ही
नियमित रूप से रहने के कारण और उक्त प्रतीति भेद के कारण समझते हैं कि
द्रव्यत्वादि जातियाँ परस्पर भिन्न हैं ।
'प्रत्येकं स्वाश्रयेषु' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पहले केवल प्रतिज्ञावाक्य के द्वारा
सिद्धवत् कही हुई सामान्य की अभिन्नता को प्रमाण के द्वारा 'प्रत्येकं स्वाश्रयेषु'
इत्यादि वाक्य से सिद्ध करते हैं । 'लक्ष्यते अनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत
में 'लक्षण' शब्द का अर्थ है, अनुगत एक आकार का ज्ञान । उसका 'प्रत्येक में'
अर्थात् गोप्रभृति प्रत्येक व्यक्ति में 'अविशेष से' अर्थात् विभिन्नता के न रहने से,
एवं 'विशेष में' अर्थात् द्रव्यत्वादि प्रत्येक जाति के भेद में अर्थात् अनेकत्व में 'लक्षण'
अर्थात् किसी प्रमाण के न रहने से समझते हैं कि एक सामान्य अपने सभी आश्रयों
में एक ही है, अर्थात् अभिन्न स्वभाव का है । पहले जो यह कहा गया है कि
"सामान्य अपने विषयों अर्थात् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहता है, अन्यत्र
नहीं" उसी के हेतु का प्रतिपादन 'यद्यपि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है ।
७५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषयसर्वगतानि । अन्तराले च संयोगसमवाय-
वृत्त्यभावादव्यपदेश्यानीति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये सामान्यपदार्थः समाप्तः ॥
नियमित रूप से समान कारणों से उत्पन्न होना, इन दोनों से समझते हैं
कि सामान्य अपने सभी आश्रयों में समानरूप से रहता है । (कार्योत्पत्ति
के) बीच के द्रव्यों में उस कार्य में रहनेवाले सामान्य का न संयोग
सम्बन्ध है, न समवाय सम्बन्ध, अतः उनमें सामान्य का व्यवहार नहीं
होता । (अतः सन्निहित होने पर भी उनमें वह नहीं रहता है ।)
॥ प्रशस्तपादभाष्य का सामान्यनिरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
तथाप्युपलक्षणस्याभिव्यञ्जकस्यावयवसंस्थानविशेषस्य नियमाश्रितत्वात् पिण्डोत्पादक-
कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषये सर्वत्र समवयन्ति नान्यत्रेति ।
एतदुक्तं भवति-सास्नादिसंस्थानविशेषो गोत्वस्य व्यञ्जकः, केसरादिसंस्थानविशेषोऽ-
श्वत्वस्य, विशिष्टग्रीवादिसंस्थानविशेषो घटत्वस्य, प्रतीतिनियमात् । एते च संस्थानविशेषा
न सर्वेषु पिण्डेषु साधारणाः; अपि तु प्रतिनियतेषु भवन्ति । तत्र यद्यपि सर्वं सामान्यं
सर्वत्रोपजायमानेन स्वविषयेणैव¹ पिण्डान्तरेणापि सम्बद्धं क्षमते, तथापि यस्याभिव्यञ्जकं यत्र
यद्यपि सामान्य जहाँ तहाँ उत्पन्न पिण्डों के साथ सम्बद्ध होने के कारण
'अपरिच्छिन्न देश' में अर्थात् अनियत देशों में रहनेवाले हैं । फिर भी उसके
'उपलक्षण' अर्थात् अभिव्यञ्जक जो अवयवों के विशेष प्रकार के संयोग हैं, वे
नियमित हैं । इस नियम के कारण और आश्रयीभूत पिण्डों के कारणों के
नियमित होने से वे अपने ही विषयों में समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होते हैं ।
इससे यह अभिप्राय निकला कि सास्ना प्रभृति अवयवों का विशेष प्रकार का
संयोग (संस्थान) ही गोत्व जाति की अभिव्यक्ति का कारण है । एवं केसर
प्रभृति संस्थान अश्वत्व जाति की अभिव्यक्ति का हेतु है । इसी प्रकार विशेष
प्रकार के ग्रीवादि संस्थान घटत्व के ज्ञापक हैं; क्योंकि नियमित रूप से तत्तत्
संस्थान से युक्त पिण्डों में ही तत्तत् सामान्य का प्रतिभास होता है । ये
कथित संस्थान सभी पिण्डों में समान रूप से नहीं रहते; किन्तु अपने नियमित
पिण्डों में ही रहते हैं । इस प्रकार सभी सामान्य जिस प्रकार सभी जगह उत्पन्न
होनेवाले अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होंगे, उसी प्रकार दूसरे पिण्डों के साथ
- यहाँ 'स्वविषयेणैव' के स्थान में 'स्वविषयेणेव' ऐसा 'इवकार' घटित पाठ ही उचित जान
पड़ता है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।