वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३९९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३९९
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशस्त्वपेक्षाबुद्धिसंयोगद्रव्यविनाशात् ।
अपेक्षाबुद्धिविनाशात् तावदुत्पन्ने परत्वे यस्मिन् काले सामान्य-
बुद्धिरुत्पन्ना भवति, ततोऽपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता, सामान्यज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः
(परत्व और अपरत्व इन दोनों का) विनाश (इन सात) रीतियों में
से किसी रीति से होता है—१. अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से, २. संयोग के
विनाश से, ३. द्रव्य के विनाश से, ४. द्रव्य और अपेक्षा-बुद्धि इन
दोनों के विनाश से, ५. द्रव्य और संयोग इन दोनों के विनाश से,
६.संयोग और अपेक्षा-बुद्धि इन दोनों के विनाश से एवं ७. अपेक्षा-
बुद्धि, द्रव्य एवं संयोग इन तीनों के विनाश से ।
१. अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से परत्व और अपरत्व का विनाश इस
प्रकार होता है कि परत्व (या अपरत्व) की उत्पत्ति के बाद जिस समय
(परत्व या अपरत्व में रहनेवाले) सामान्य (परत्वत्वादि जातियों) की
न्यायकन्दली
श्मश्रुकार्कशाद्यभावानुमितमल्पोत्पत्तिकालमवधिं कृत्वा रूढश्मश्रुवलिपलितादिमति स्थविरे
विप्रकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते, तां बुद्धिमपेक्ष्य परेणादित्यपरिवर्तनभूयस्त्ववता कालप्रदेशेन
संयोगादसमवायिकारणात् तस्मिन्नेव स्थविरे परत्वस्योत्पत्तिः, स्थविरं चावधिं कृत्वा यूनि
सन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते, तां बुद्धिमपेक्ष्यापरेणादित्यपरिवर्त्तनोपलक्षितेन कालप्रदेशेन
संयोगादपरत्वस्योत्पत्तिः । युवस्थविरशरीरयोः कालसंयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वे शरीर-
सन्तानापेक्षया, न तु व्यक्तिविषयत्वेन, तयोः प्रतिक्षणं विनाशात् ।
होती है, जिसमें वह पुरुष समवायिकारण है एवं सूर्य की अधिक क्रियावाले काल
प्रदेश के साथ उस पुरुष का संयोग असमवायिकारण है एवं उक्त विप्रकृष्ट बुद्धि
निमित्तकारण है । (इसी प्रकार) वृद्ध पुरुष को अवधि मानकर युवा पुरुष में
अल्पकाल सम्बन्धरूप सन्निकृष्ट बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इसी बुद्धिरूप
निमित्तकारण से युवा पुरुषरूप समवायिकारण में कालिक अपरत्व (कनिष्ठत्व) की
उत्पत्ति होती है, जिसका असमवायिकारण आदित्य की अल्पगति से परिमित
कालप्रदेश और उस युवा पुरुष का संयोग है । यद्यपि युवा शरीर और वृद्ध
शरीर दोनों ही क्षणिक हैं, (अतः दोनों ही के एक-एक शरीर में समान ही काल
का सम्बन्ध है) अतः दोनों में अधिककाल सम्बन्ध और अल्पकाल सम्बन्ध
वर्तमानकाल के दोनों शरीर के समुदायों को दृष्टि में रखकर कहा गया है ।
४०० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
परत्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमानतत्येकः कालः। ततोऽपेक्षाबुद्धेर्विनाशो गुणबुद्धे-
श्चोत्पत्तिः, ततोऽपेक्षाबुद्धिविनाशाद् गुणस्य विनश्यत्ता, गुणज्ञान-
बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि को विनष्ट करनेवाले
कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं एवं (परत्वादि में रहनेवाले उक्त) सामान्य
एवं सामान्य के ज्ञान और परत्वादि गुणों के साथ उक्त सामान्य का
सम्बन्ध इन सबों से परत्वादि गुणविषयक बुद्धि के उत्पादक कारण-
समूह भी एकत्र हो जाते हैं । ये सभी कार्य एक समय में होते
हैं । उसके बाद (एक ही समय) अपेक्षा-बुद्धि का विनाश और
(परत्वादि) गुणविषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है, इसके बाद
अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से परत्वादि गुणों के विनाशक कारणसमूह का
एकत्र होना, परत्वादि गुण, उसके ज्ञान एवं द्रव्य के साथ परत्वादि
न्यायकन्दली
कृतकस्यावश्यं विनाशः, स च निर्हेतुको न भवतीति परत्वापरत्वयोर्विनाशहेतुमाह-
विनाशस्त्विति । परत्वापरत्वयोर्विनाशोऽपेक्षाबुद्धिविनाशात्, संयोगविनाशात्, द्रव्यविना-
शात्, द्रव्यापेक्षाबुद्धयोर्विनाशात्, द्रव्यसंयोगयोर्विनाशात्, संयोगापेक्षाबुद्धयोर्विनाशात्, अपेक्षा-
बुद्धिसंयोगद्रव्याणां विनाशादिति सप्तविधो विनाशक्रमः ।
(१) अपेक्षाबुद्धिविनाशात् तावद्विनाशः कथ्यते । उत्पन्ने परत्वे
यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्ये बुद्धिरुत्पन्ना भवति। तत इति सप्तम्यर्थे सार्व-
जिसकी उत्पत्ति होती है उसका विनाश भी अवश्य ही होता है । एवं विनाश
भी बिना कारणों के नहीं होता । अतः (परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति के
निरूपण के बाद) परत्व और अपरत्व के विनाश के हेतुओं का निरूपण
'विनाशस्तु' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । विनाश इन सात प्रकार के
विनाशक्रमों में से ही किसी से होता है-(परत्व और अपरत्व का विनाश) (१)
अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से, (२) संयोग के विनाश से, (३) द्रव्य के विनाश से,
(४) द्रव्य और अपेक्षा-बुद्धि दोनों के विनाश से, (५) द्रव्य और संयोग इन दोनों
के विनाश से (६) संयोग और अपेक्षा-बुद्धि इन दोनों के विनाश से एवं (७)
अपेक्षा-बुद्धि, संयोग और द्रव्य, इन तीनों के विनाश से ।
इनमें क्रमप्राप्त सबसे पहले (१) अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से होनेवाले परत्व और
अपरत्व के विनाश का क्रम 'अपेक्षाबुद्धिविनाशात्तावत्' इत्यादि सन्दर्भ से उपपादित
हुआ है । 'ततः' इस पद में सप्तमी विभक्ति के अर्थ में 'तसिल्' प्रत्यय है । इसी समय
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४०१
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्सम्बन्धेभ्यो द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः ततो द्रव्यबुद्धेरुत्पत्तिर्गुणस्य
विनाश इति ।
संयोगविनाशादपि कथम् ? अपेक्षाबुद्धिसमकालमेव परत्वाधारे
कर्मोत्पद्यते । तेन कर्मणा दिक्पिण्डविभागः क्रियते । अपेक्षाबुद्धितः
गुणों का सम्बन्ध इन सबों से (परत्वादि गुण से युक्त) द्रव्यविषयक बुद्धि
के उत्पादक कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं । इतने सारे काम एक ही
समय होते हैं । इसके बाद (परत्वादि गुणविशिष्ट) द्रव्य विषयक
(विशिष्ट) बुद्धि की उत्पत्ति और परत्वादि गुणों का विनाश ये दोनों
काम एक ही समय होते हैं ।
२. (प्र.) केवल संयोग के विनाश से (परत्व और अपरत्व का विनाश)
किस प्रकार होता है ? (उ.) (जहाँ) अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति के समय ही
परत्वादि गुणों के आधारभूत द्रव्य में क्रिया होती है, एवं उस क्रिया के द्वारा
उस द्रव्य और दिक्प्रदेश इन दोनों का विभाग उत्पन्न होता है, और अपेक्षा-
न्यायकन्दली
विभक्तिस्तसिलिति तसिल् । एतस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता विनाश-
कारणासन्निध्यम् । सामान्यतज्ज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः परत्वसामान्यं च, परत्वसामान्यज्ञानं च,
परत्वगुणसम्बन्धश्च, तेभ्यः परत्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । परत्वसामान्यज्ञान-
मेवापेक्षाबुद्धिविनाशकारणम्, गुणबुद्धेश्चोत्पत्तिकारणम्, अतस्तदुत्पाद एवापेक्षाबुद्धे-
र्विनश्यत्ता गुणबुद्धेश्चोत्पद्यमानता स्यात् । ततः क्षणान्तरेऽपेक्षाबुद्धेर्विनाशः,
परत्वगुणबुद्धेश्चोत्पादः । ततस्तस्मादपेक्षाबुद्धिविनाशाद् गुणस्य विनश्यत्ता । गुणश्च
गुणज्ञानं च तत्सम्बन्धश्च तेभ्यो द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । अपेक्षाबुद्धिविनाशो
(अर्थात् परत्व की उत्पत्ति हो जाने पर जिस समय परत्व गुण में रहनेवाले सामान्य का
ज्ञान होता है, उसके बाद) अपेक्षा-बुद्धि की 'विनश्यत्ता' अर्थात् विनाश के सभी
कारणों का समावेश होता है । 'सामान्यतज्ज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः' (इस भाष्य सन्दर्भ
का) 'परत्वसामान्यञ्च परत्वसामान्यज्ञानञ्च परत्वगुणसम्बन्धश्च तेभ्यः' इस व्युत्पत्ति
के अनुसार यह अभिप्राय है कि परत्वसामान्य एवं परत्वसामान्य का ज्ञान और
परत्वगुण का सम्बन्ध, इन तीन कारणों से 'परत्वगुण की उत्पद्यमानता' अर्थात् परत्व-
गुण के उत्पादक सभी कारणों का संनिवेश होता है, ये सभी काम एक ही समय
होते हैं । परत्वसामान्य का ज्ञान ही अपेक्षाबुद्धि के विनाश एवं गुणबुद्धि की उत्पत्ति
इन दोनों का कारण है। अतः अपेक्षाबुद्धि की विनश्यत्ता और गुणबुद्धि की उत्पद्यमा-
नता दोनों ही वस्तुतः परत्वसामान्य बुद्धि की उत्पत्ति स्वरूप ही हैं । इसके बाद
दूसरे क्षण में अपेक्षाबुद्धि का विनाश होगा एवं परत्वगुणबुद्धि की उत्पत्ति होगी । 'ततः'
४०२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः, ततः सामान्यबुद्धेरुत्पत्तिः, दिक्पिण्ड-
संयोगस्य च विनाशः । ततो यस्मिन् काले गुणबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव
बुद्धि के द्वारा परत्वादि गुणों की उत्पत्ति होती है । उसके बाद (परत्वादि
गुणों में रहनेवाले) सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति, उक्त द्रव्य और पूर्व-
दिक्प्रदेश इन दोनों के संयोग का नाश, ये दोनों काम एक ही समय होते
हैं । इसके बाद जिस समय परत्वादिविषयक (विशिष्ट) बुद्धि की उत्पत्ति
होती है, उसी समय (कथित) दिक्प्रदेश और (परत्वादि गुणों के आधार-
न्यायकन्दली
गुणविनाशस्य कारणम्, गुणबुद्धिश्च द्रव्यबुद्धेः कारणम्, अपेक्षाबुद्धिविनाशगुणबुद्ध्युत्पादौ
च युगपत् स्याताम्, अतो गुणस्य विनश्यत्ता द्रव्यबुद्धेश्चोत्पद्यमानतापि युगपत् स्यात् ।
ततः परत्वविशिष्टद्रव्यबुद्धेरुत्पादः परत्वगुणस्य च विनाशः ।
संयोगविनाशादपि कथं परत्वापरत्वयोर्विनाश इति प्रश्ने कृते
सत्याह-अपेक्षाबुद्धिसमकालमेव परत्वस्याधारे पिण्डे कर्मोत्पद्यते,
क्षणान्तरे तेन कर्मणा दिशः परत्वाधारपिण्डस्य च विभागः क्रियते, अपेक्षा-
इसके बाद, अपेक्षाबुद्धि के विनाश से गुण की विनश्यत्ता (उत्पन्न होती है) ।
'गुणज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः' (इस भाष्यपङ्क्ति का) गुणश्च गुणज्ञानञ्च तत्सम्बन्धश्च
तेभ्यः' (इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह अभिप्राय है कि) गुण एवं गुण का ज्ञान
और गुण का सम्बन्ध इन तीनों से द्रव्यबुद्धि (अर्थात् परत्व गुणविशिष्ट द्रव्य बुद्धि
की) उत्पद्यमानता निष्पन्न होती है । ये सभी काम एक ही समय होते हैं ।
अपेक्षाबुद्धि का विनाश (परत्वादि) गुणों के विनाश का कारण है । गुणबुद्धि
(गुणविशिष्ट) द्रव्यबुद्धि का कारण है । अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश और
गुणबुद्धि का उत्पादन दोनों एक ही समय होते हैं । इसीलिए गुण की विनश्यत्ता
और द्रव्यबुद्धि की उत्पद्यमानता ये दोनों ही एक ही समय होंगी । एवं इसी कारण
(परत्व) गुण की विनश्यत्ता और (परत्वगुण विशिष्ट) द्रव्य बुद्धि की उत्पद्यमानता
ये दोनों भी एक ही समय होंगी । इसके बाद परत्वगुण विशिष्ट द्रव्यबुद्धि की
उत्पत्ति एवं परत्व गुण का विनाश होगा ।
(२) केवल संयोग के विनाश से परत्व और अपरत्व का विनाश किस रीति से
(किस स्थिति में) होता है ? यह प्रश्न किये जाने पर 'अपेक्षाबुद्धिसमकालमेव' इत्यादि
सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जहाँ निम्नलिखित स्थिति होती है, वहाँ संयोग के
विनाश से परत्व का विनाश होता है । (जैसे) अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति के समय ही
पिण्ड (परत्वादि के आधार पर भूत द्रव्य) में क्रिया उत्पन्न होती है । इस क्रिया के
द्वारा आगे दूसरे क्षण में उक्त पिण्ड का पूर्व दिशा के साथ विभाग उत्पन्न होता है,