वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ७७१
प्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ७७१
प्रशस्तपादभाष्यम्
भवति यथा घटादिषु प्रदीपात्, न तु प्रदीपे प्रदीपान्तरात् । यथा
गवाश्वमांसादीनां स्वत एवाशुचित्वं तद्योगादन्येषाम्, तथेहापि तादात्म्या-
दन्त्यविशेषेषु स्वत एव प्रत्ययव्यावृत्तिः, तद्योगात् परमाण्वादिष्विति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये विशेषपदार्थः समाप्तः ॥
●
कारण के ही) होंगी । (उ.) यह नहीं हो सकतीं; क्योंकि परमाणु में
परमाणु का तादात्म्य है । जो वस्तु जिस स्वरूप का नहीं है, उस वस्तु
में उक्त अन्य वस्तु की बुद्धि उस वस्तु से भिन्न वस्तु रूप कारण से ही
उत्पन्न होती है, जैसे कि घटादि की प्रतीति प्रदीप से होती है; किन्तु
प्रदीप की प्रतीति के लिए दूसरे प्रदीप की अपेक्षा नहीं होती । जिस
प्रकार गो और अश्व के मांसों में अशुचित्व स्वतः (बिना किसी और
सम्बन्ध के ही) है; किन्तु उनसे सम्बद्ध वस्तुओं में उसी के सम्बन्ध
से अशुचित्व होता है, उसी प्रकार यहाँ भी अन्त्य-विशेषों में तादात्म्य
से अर्थात् और किसी के सम्बन्ध के बिना ही व्यावृत्ति-प्रतीति होती
है; किन्तु परमाणुओं में अन्त्यविशेष के सम्बन्ध से ही व्यावृत्ति-प्रतीति
होती है ।
॥ प्रशस्तपादभाष्य में विशेष का निरूपण समाप्त हुआ ॥
●
न्यायकन्दली
अतदात्मकेष्वन्यनिमित्तः प्रत्ययो भवति, न तदात्मकेषु । यथा घटादिष्वप्रकाश-
स्वभावेषु प्रदीपादेः प्रकाशस्वभावात् प्रकाशो भवति, न तु प्रदीपे प्रदीपान्तरात्
प्रकाशः किन्तु स्वत एव । यथा गवाश्वमांसादीनां स्वत एवाशुचित्वम्, स्प्रष्टुः
विवरण 'इह' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । अभिप्राय यह है कि
जिन दो वस्तुओं में तादात्म्य नहीं है, उनमें से एक में अन्य दूसरे के
सम्बन्ध के लिए अन्य कारण की अपेक्षा होती है । जो अभिन्न हैं, उनमें से
किसी में सम्बन्ध के लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं होती है । जैसे कि
घटादि प्रकाशस्वभाव के नहीं हैं (प्रकाश के साथ उनका तादात्म्य नहीं है),
अतः घट में प्रकाश के लिए प्रकाशस्वभाव के प्रदीप रूप अन्य पदार्थ की
अपेक्षा होती है; किन्तु प्रदीप के प्रकाश के लिए किसी दूसरे प्रदीप की अपेक्षा
७७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | विशेषनिरूपण-
न्यायकन्दली
प्रत्यवायकरत्वं तयोगात् । तत्सम्बन्धादन्येषामशुचित्वम् । तथेहापि तादात्म्याद-
त्यन्तव्यावृत्तिस्वभावत्वादनन्यविशेषेषु स्वत एव स्वरूपादेव प्रत्ययव्यावृत्तिर्न विशेषान्तर-
सम्भवात्¹ । अतदात्मकेषु तु परमाणुषु सामान्यधर्मकेषु विशेषयोगादेव प्रत्ययव्यावृत्तिरुक्ता
न स्वरूपमात्रादिति ।
नित्यद्रव्येषु सर्वेषु परस्परसधर्मसु ।
प्रत्येकमनुवर्तन्ते विशेषा भेदहेतवः ॥
॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां
विशेषपदार्थः समाप्तः ॥
नहीं होती है; क्योंकि प्रदीप में स्वतः प्रकाश होता है । इसी प्रकार गौ, अश्व
प्रभृति के मांस अपने तो वे स्वतः 'अशुचि' हैं; किन्तु निषिद्ध मांसों को छूनेवाले
पुरुष में प्रत्यवाय की कारणता उन (मांसों) के स्पर्श से आती है । एवं उस पुरुष
से सम्बन्ध रखनेवाली वस्तुओं में जो अशुचिता होगी, उसके कारण उन वस्तुओं
के साथ उस पुरुष को सम्बन्ध है । इसी प्रकार प्रकृत में भी
अत्यन्तव्यावृत्ति-स्वभाव के अन्य-विशेषों में व्यावृत्ति-प्रत्यय 'स्वतः' अर्थात् उनके
अत्यन्तव्यावृत्ति-स्वभाव के कारण ही होता है । इसके लिए दूसरे 'विशेष' के
सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं है । 'अतदात्मक' अर्थात् एक सामान्य धर्मवाले परमाणुओं
में जो व्यावृत्ति-बुद्धि होगी, उसके लिए उनमें 'विशेष' पदार्थ का सम्बन्ध ही
कारण है । उसकी उत्पत्ति स्वतः नहीं हो सकती ।
एक साधारण धर्म से युक्त सभी नित्य द्रव्यों में से प्रत्येक में परस्पर भेद
(व्यावृत्ति) के लिए उनमें से प्रत्येक में अलग विशेष का मानना आवश्यक है;
क्योंकि वे ही उनमें व्यावृत्ति-बुद्धि के कारण हैं ।
॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित एवं पदार्थों के सम्यक् ज्ञान में समर्थ
न्यायकन्दली नाम की टीका का विशेषनिरूपण समाप्त हुआ ॥
- यहाँ 'न विशेषान्तरसम्भवात्' इसके स्थान में 'न विशेषान्तरसम्बन्धात्' ऐसा पाठ उचित
जान पड़ता है, अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।
॥ अथ समवायपदार्थनिरूपणम् ॥
प्रशस्तपादभाष्यम्
अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इह-
प्रत्ययहेतुः स समवायः । द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणां
कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानां वाऽयुतसिद्धानामाधार्याधार-
एक आश्रय एवं दूसरा आश्रित इस प्रकार के दो अयुतसिद्धों का
जो सम्बन्ध 'यह (आश्रित) यहाँ (आश्रय में) है' इस प्रकार के प्रत्यय
का कारण हो, वही सम्बन्ध 'समवाय' है । (विशदार्थ यह है कि) द्रव्य,
गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन सभी पदार्थों में से जो (दो वस्तु
यथासम्भव) कार्यकारणभावापन्न हों अथवा स्वतन्त्र ही हों, किन्तु अयुतसिद्ध
न्यायकन्दली
अन्तर्व्याप्तमिदं विश्वंसंहारोत्पत्तिहेतवे ।
निर्मलज्ञानदेहाय नमः सोमाय शम्भवे ॥
समवायनिरूपणार्थमाह- अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां कार्यकारणभूतानाम-
कार्यकारणभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः । तदेतत्कृतव्याख्याने-
मुद्देशावसरे । के ते अयुतसिद्धा येषां सम्बन्धः समवायो भवेत् ? अत आह-
द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणामिति । कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानामिति
नियमकथनम् । अवयवावयविनामनित्यद्रव्यतद्गुणानां नित्यद्रव्यतत्समवेतानाम्-
नित्यगुणानां कर्मतद्वतां कार्यकारणभूतानां समवायः, नित्यद्रव्यतद्गुणानां सामान्य-
अन्तःकरण के मालिन्य को समूल नाश करनेवाले एवं विश्व की उत्पत्ति,
स्थिति और विनाश के हेतु एवं विशुद्ध विज्ञानरूप शरीरवाले (क्षित्यादि आठ
मूर्त्तिक शिवों में से) सोममूर्ति स्वरूप भगवान् शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ ।
"अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः" यह
सन्दर्भ समवाय के निरूपण के लिए लिखा गया है । इस पङ्क्ति की व्याख्या इसी
ग्रन्थ के उद्देश प्रकारण में कर दी गयी है । "अयुतसिद्ध' कौन-कौन से पदार्थ
हैं ? जिनका सम्बन्ध समवाय होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर "द्रव्यगुणकर्म-
सामान्यविशेषाणाम्" इत्यादि से दिया गया है । इस वाक्य में 'किन वस्तुओं में
समवाय सम्बन्ध होता है' इस प्रसङ्ग में 'नियम' को दिखलाने के लिए
"कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानाम्" यह वाक्य लिखा गया है । उस वाक्य
के 'कार्यकारणभूतानाम्' इस पद के द्वारा यह नियम दिखलाया गया है कि
कारणों में कार्य का समवाय होता है, अर्थात् कार्यकारणभावापन्न वस्तुओं में से
अवयवरूप कारणों में से अवयवीरूप कार्य का एवं अनित्य द्रव्यरूप कारण
और उनमें होनेवाले गुणों का एवं नित्य द्रव्य और उनमें उत्पन्न होनेवाले
गुणों का एवं क्रियाश्रय और क्रिया का ही समवाय सम्बन्ध होता है । एक-
७७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
भावेनावस्थितानामिहेदमिति बुद्धिर्यतो भवति, यतश्चा-
सर्वगतानामधिगतान्त्यत्वानार्मावष्वग्भावः स समवायाख्यः सम्बन्धः । कथम् ?
यथेह कुण्डे दधीति प्रत्ययः सम्बन्धे सति दृष्टः, तथेह तन्तुषु
हों एवं आधार-आधेय रूप हों, उन दोनों में से एक (आधेय) का दूसरे
(आधार में) 'यह यहाँ है' इस आकार का प्रत्यय जिससे हो वही
(सम्बन्ध) 'समवाय' है । (एवं) नियमित देश में ही रहनेवाले एवं
परस्पर भिन्न रूप में ज्ञात होनेवाले दो वस्तुओं की स्वतन्त्रता जिस
सम्बन्ध से जाती रहे वही (सम्बन्ध) 'समवाय' है । (प्र.) इस सम्बन्ध की
सत्ता में प्रमाण क्या है ? (उ.) (यह अनुमान ही प्रमाण है कि) जिस
न्यायकन्दली
तदतामन्त्यविशेषतद्वतां चाकार्यकारणभूतानां समवायोऽयुतसिद्धानामिति नियमः ।
एवमाधार्याधारभावेनावस्थितानामित्यपि नियम एव । इहेदमिति बुद्धिर्यतः कारणाद्
भवति यतश्चासर्वगतानां नियतदेशावस्थितानामधिगतान्त्यत्वाना मधिगतस्वरूपभेदा-
नामविष््वग्भावो ऽपृथग्भावोऽस्वातन्त्र्यं स समवायः, भिन्नयोः परस्परोपश्लेषस्य
सम्बन्धकृतत्वोपलम्भात् । एतदेव कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकमुपपादयति-
यथा इह कुण्डे दधीति प्रत्ययः कुण्डदध्नोः सम्बन्धे सति दृष्टः,
दूसरे का कार्य या कारण न होते हुए भी जिन वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध होता
है, वे हैं सामान्य (जाति) और उनके आश्रय, एवं अन्त्यविशेष और उनके
आश्रय (इनमें भी समवाय सम्बन्ध होता है) । समवाय के ये कार्यकारणभूत और
अकार्यकारणभूत प्रतियोगी और अनुयोगी यतः 'अयुतसिद्ध' हैं, अतः यह 'नियम'
उपपन्न होता है-समवाय अयुतसिद्धों का ही सम्बन्ध है । इसी प्रकार
"आधार्याधारभावेनावस्थितानाम्" यह वाक्य भी नियमार्थक ही है । अर्थात् यतः
विभिन्न दो वस्तुओं में विशेष्यविशेषणभाव की प्रतीति किसी सम्बन्ध से ही होती
है, अतः 'इहेदम्' यह प्रतीति जिस कारण के द्वारा होती है (वही समवाय है) एवं
जिसके द्वारा अव्यापक अथवा नियत आश्रय में रहनेवाले उन वस्तुओं में-जिनमें
कि परस्पर भेद पहले से ज्ञात है, अर्थात् जिनके अलग-अलग स्वरूप ज्ञात हैं,
उन्हें 'अविष््वग्भाव' अर्थात् अपृथग्भाव फलतः अस्वातन्त्र्य जिसके द्वारा हो, वही
'समवाय' है; क्योंकि वस्तुओं का उक्त 'अविष््वग्भाव' किसी सम्बन्ध से ही देखा
जाता है । यही बात 'कथम्' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न कर 'यथेह कुण्डे' इत्यादि
वाक्य से उत्तर रूप में कहते हैं । अर्थात् जिस प्रकार 'इस मटके में दही है' इस
आकार की प्रतीति मटका और दही के सम्बन्ध रहने पर ही देखी जाती
है, उसी प्रकार 'इन तन्तुओं में पट है' इस आकार की प्रतीति भी होती है ।
इससे समझते हैं कि तन्तु और पट (प्रभृति अयुतसिद्धों) में भी कोई सम्बन्ध