वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०९
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धितोऽपेक्षाबुद्धिविनाशः, विभागाच्च दिक्पिण्डसंयोगविनाश इत्येकः कालः ।
ततः संयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशः। त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां
युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते, तदा पिण्डावयवे कर्म, ततो
यस्मिन्नेव काले कर्मणाऽवयवान्तराद्विभागः क्रियतेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वस्य
चोत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले पिण्डेऽपि कर्म, ततोऽवयवविभागात् पिण्डारम्भकसंयोग-
(७) (प्र.) समवायिकारण (परत्वादि के आधारभूत द्रव्य) असमवायि-
कारण (दिक्प्रदेशसंयोग) और निमित्तकारण (अपेक्षाबुद्धि) इन तीनों के
नाश से परत्वादि गुणों का नाश (कहाँ और) किस स्थिति में होता है ?
(उ.) जहाँ जिस समय अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय
(परत्वादि के समवायिकारण) पिण्ड के अवयव में क्रिया उत्पन्न होती है ।
इसके बाद जिस समय उक्त क्रिया से (एक अवयव का) दूसरे अवयव से
विभाग उत्पन्न होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि और परत्वादि गुण इन
दोनों की उत्पत्ति होती है । एवं पिण्ड (अवयवि) में भी क्रिया उसी समय
उत्पन्न होती है । इसके बाद अवयवों के उक्त विभाग से पिण्ड के
न्यायकन्दली
समवायि चासमवायि च निमित्तं च समवाय्यसमवायिनिमित्तानि, तानि च कारणानि चेति
समवाय्यसमवायि निमित्तकारणानि द्रव्यसंयोगापेक्षाज्ञानानि, तेषां त्रयाणां युगपद्विनाशात्
कथं परत्वस्य विनाश इति प्रश्ने कृते प्रत्युत्तरमाह - यदेति । इत्येतत् सर्वं युगपद्भवति कारण-
यौगपद्यात्, ततश्च त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश
इति । परत्वस्य विनाश इत्युपलक्षणमिदम् । अपरत्वस्याप्ययमेव विनाशक्रमो दर्शयितव्यः ।
संयोग रूप असमवायिकरण, एवं अपेक्षाबुद्धिरूप निमित्तकारण, इन तीनों कारणों
के एक ही समय विनाश के कारण परत्व का विनाश किस प्रकार होता है ? इसी
प्रश्न के उत्तर में 'यदा' इत्यादि भाष्य सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जब एक ही
समय उक्त तीनों कारणों के विनाश कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं, तो फिर तीनों
का एक ही समय विनाश हो जाता है । इसके बाद परत्व के तीनों कारणों के
विनाश से परत्व का विनाश हो जाता है । इस प्रकरण में 'परत्वविनाश' शब्द
उपलक्षणमात्र है (नियामक नहीं), अतः इसी से अपरत्व नाश का भी यही क्रम
जानना चाहिए ।
४१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे बुद्धि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशः पिण्डकर्मणा च दिक्पिण्डविभागः क्रियते, सामान्यबुद्धेश्चोत्पत्ति-
रित्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात् पिण्डविनाशः, विभागाच्च दिक्पिण्ड-
संयोगविनाशः, सामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाश इत्येतत् सर्वं युगपत् त्रयाणां
समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश इति ॥
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः । सा चानेकप्रकारा, अर्थानन्त्यात्
प्रत्यर्थनियतत्वाच्च ।
उत्पादक संयोग का विनाश, और अवयवी (पिण्ड) की क्रिया, उसका
पूर्वदिक्प्रदेश के साथ विभाग और सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति,
इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद उक्त संयोग के
विनाश से पिण्ड का विनाश एवं पूर्वदिशा और पिण्ड के विभाग से इन
दोनों के संयोग का नाश, एवं सामान्य ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का नाश
होता है । इस प्रकार एक ही समय समवायिकारण (परत्वादि के
आधारभूत पिण्डद्रव्य), असमवायिकारण (उक्त पिण्ड का पूर्वादि
दिक्प्रदेशों के साथ संयोग) और निमित्तकारण (अपेक्षाबुद्धि) इन तीनों
के विनाश से (भी) परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय (ये सभी) शब्द अभिधावृत्ति के
द्वारा एक ही अर्थ के बोधक हैं ।
यह अनेक (अनन्त) प्रकार की है, क्योंकि इसके विषय अनन्त हैं
और यह प्रत्येक विषय में स्वतन्त्र रूप से (भी) अवश्य ही सम्बद्ध है ।
न्यायकन्दली
बुद्धिजे परत्वापरत्वे इति समर्थिते । अथ केयं बुद्धिरित्याह-बुद्धिरित्यादि ।
प्रधानस्य विकारो महदाख्यमन्तःकरणं चित्तपर्यायबुद्धिः । बुद्धी-
यह समर्थन कर चुके हैं कि परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धि से उत्पन्न होते
हैं । किन्तु 'यह बुद्धि कौन-सी वस्तु है ?' (इस स्वाभाविक प्रश्न का उत्तर)
'बुद्धिः' इत्यादि पङ्क्ति से देते हैं ।
सांख्याचार्यों का कहना है कि प्रकृति (प्रधान) का महत् नाम का विकाररूप
अन्तःकरण ही 'बुद्धि' है, जिसे 'चित्त' भी कहते हैं। इस बुद्धि की वह विषयाकार की