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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१
प्रशस्तपादभाष्यम्
षण्णामपि पदार्थानामस्तित्वमभिधेयत्वञ्ज्ञेयत्वानि ।
(द्रव्यादि) छहों पदार्थों के १. अस्तित्व, २. अभिधेयत्व और
३. ज्ञेयत्व, ये तीन साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली
धर्म्मान् परित्यज्य धर्म्मिणामुद्देशः कृतः, धर्म्मिणां संज्ञामात्रेण सङ्कीर्तनं कृतमिदानीं धर्म्मा
उद्दिश्यन्त इति भावः । यद्यपि पूर्वं द्रव्यादीनां विभागः कृतस्तथाप्युद्देशः कृत इत्युक्तम्,
विभागस्य नामधेयसङ्कीर्तनमात्रेणोद्देशेऽन्तर्भावात् ।
यद्यपि धर्म्माः षट्पदार्थेभ्यो न व्यतिरिच्यन्ते, किन्तु त एव अन्योन्यापेक्षया धर्म्मा
धम्मिणश्च भवन्तीति । तथापि तेषां धर्मिरूपतया परिज्ञानार्थं पृथगुद्देशं करोति-
षण्णामपीति । अस्तित्वं स्वरूपवत्त्वम्, षण्णामपि साधर्म्यम्, यस्य वस्तुनो यत् स्वरूपं
तदेव तस्यास्तित्वम् । अभिधेयत्वमप्यभिधानप्रतिपादनयोग्यत्वम्, तच्च वस्तुनः स्वरूप-
मेव । भावस्वरूपमेवावस्थाभेदेन ज्ञेयत्वमभिधेयत्वञ्चोच्यते ।
आश्रितत्वञ्च परतन्त्रतयोपलब्धिः, न समवायलक्षणा वृत्तिः, समवाये
तदभावात् । इदञ्चाश्रितत्वं चतुर्विधेषु परमाणुषु आकाश-काल-
समाधान सङ्गति प्रदर्शन के द्वारा 'एवम्' इत्यादि पङ्क्ति से दिखलाते हैं । 'एवम्'
पहले कहे हुये सन्दर्भ से, 'धर्म्मार्थिना' धर्मों को छोड़कर 'धर्म्मिणामुद्देशः कृतः'
अर्थात् धर्म्मियों को ही केवल उनके नाम के द्वारा कहा है, अब उनके धर्मों को
उनके नाम से कहते हैं । यद्यपि पहले के ग्रन्थों से पदार्थों का विभाग भी किया
है, फिर भी 'उद्देशः कृतः' यही वाक्य कहा है, क्योंकि नामों के द्वारा पदार्थों के
कथन रूप उद्देश में ही विभाग का भी अन्तर्भाव हो जाता है ।
यद्यपि ये धर्म भी इन छः पदार्थों के ही अन्तर्गत हैं, तथापि वे ही
यथासम्भव अपने में एक-दूसरे के धर्म और धर्मी कहलाते हैं, फिर भी धर्मी
रूप से उनको समझाने के लिए 'षण्णाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अलग से उनको
कहते हैं । 'अस्तित्व' शब्द का अर्थ 'स्वरूप' है, अर्थात् वस्तुओं का अपना
असाधारण रूप ही अस्तित्व है । यह 'अस्तित्व' द्रव्यादि छहों पदार्थों में रहनेवाला
धर्म है । 'अभिधेयत्व' शब्द का अर्थ है अभिधान, अर्थात् शब्द से कहे जाने की
क्षमता, वह भी वस्तुओं का स्वरूप ही है । वस्तुओं का यह स्वरूप ही अवस्थाओं
के भेद से अभिधेयत्व, ज्ञेयत्व प्रभृति शब्दों से कहा जाता है ।
परतन्त्र रूप से ज्ञात होना ही 'आश्रितत्व' शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध
से कहीं रहना (आश्रितत्व शब्द का अर्थ) नहीं है, क्योंकि समवाय कहीं पर भी समवाय
सम्बन्ध से नहीं रहता है । पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों पदार्थों के परमाणुओं

४२ न्यायकन्दलीसम्बलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
आश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः ।
द्रव्यादीनां पञ्चानां समवायित्वमनेकत्वञ्च ।
नित्य द्रव्यों को छोड़कर और सभी पदार्थों का आश्रितत्व साधर्म्य है ।
द्रव्य, गुण, कर्म्म, सामान्य और विशेष इन पाँच पदार्थों के
समवायित्व और अनेकत्व ये दो साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली
दिगात्ममनःसु नास्तीत्याह- अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति ।
ये तु धर्म्मान् व्यतिरिक्तानिच्छन्ति तेषामेकस्मिन् समस्तवस्तुव्यापिन्यस्तीतिप्रत्ययहेता-
वस्तित्वे कल्पिते द्रव्यादिषु सत्तावैय्यर्थम् । अथास्तित्वं प्रतिवस्तु भिद्यते तदा
तत्कल्पनावैयर्थ्यम्, सत्तायाः स्वरूपसत्तायाश्च सदिति प्रत्ययोपपत्तेः । येषान्तु भावस्व-
रूपमेवास्तित्वं न तेषां व्यर्था सत्ता, स्वरूपस्यानुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वाभावात् । नाप्यस्तित्व-
मनर्थकं निःस्वरूपे सत्तायाः समवायाभावादित्युभयमुपपद्यते ।
द्रव्यादीनां विशेषान्तानां साधर्म्यं साधयति । समवायित्वं
समवायलक्षणा वृत्तिः । अनेकत्वं परस्परविभक्तत्वमितरेतरव्यावृत्तं स्वरूपमेव ।
में तथा आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन इन नौ नित्य द्रव्यों में (इतने ही
द्रव्य नित्य हैं) यह 'आश्रितत्व' नहीं है, अतः "अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः" यह वाक्य
कहा गया है ।
जो समुदाय व्यक्तिभेद से धर्म्मों को भिन्न ही मानना चाहते हैं (वे भी अनेक
वस्तुओं में रहनेवाले और धर्म्मों को न भी मानें, किन्तु) सभी वस्तुओं में एक
प्रकार की 'अस्ति' प्रतीति को उत्पन्न करनेवाला 'अस्तित्व' नाम का धर्म्म उन्हें भी
मानना ही पड़ेगा, किन्तु ऐसा मानने पर द्रव्यादि तीन पदार्थों में ही सत्त्व प्रतीति
के लिए 'सत्ता' जाति की कल्पना व्यर्थ हो जाएगी । अगर अस्तित्व धर्म्म को
प्रतिव्यक्ति भिन्न मानें तो फिर इस प्रकार के अस्तित्व की कल्पना ही व्यर्थ हो
जाती है, क्योंकि 'सत्ता' जाति एवं तत्तद्व्यक्तिगत तद्व्यक्तित्व (रूप स्वरूपसत्ता) से
ही 'सत्प्रतीति' उपपन्न हो जाएगी । जो कोई 'अस्तित्व' को वस्तुओं का स्वरूप ही
मानते हैं, उनके मत में भी 'सत्ता' जाति की कल्पना व्यर्थ नहीं है, क्योंकि (बिना
सत्ता जाति माने) भिन्न रूप से प्रतीत होनेवाले द्रव्यादि तीन पदार्थों में एक
आकार की सत्त्व की प्रतीति नहीं हो सकेगी । अस्तित्व की कल्पना भी व्यर्थ नहीं
है, क्योंकि अपने-अपने व्यक्तिगत स्वरूप (अस्तित्व) से शून्य वस्तुओं में सत्ता
जाति का समवाय भी सम्भव नहीं है, अतः सत्ता जाति और सभी प्रकार की
वस्तुओं में 'अस्ति' प्रतीति का कारण अस्तित्व, इन दोनों को ही मानना
आवश्यक है ।
द्रव्य से लेकर विशेष तक पाँच पदार्थों के साधर्म्य का उपपादन करते हैं । 'समवा-
यित्व' शब्द का अर्थ है समवायरूप सम्बन्ध, (अर्थात्) समवाय सम्बन्ध से कहीं