वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५
न्यायकन्दली
स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वञ्चेति । वैशेषिकैः स्वयं व्यवहाराय यः सङ्केतः
कृतोऽस्मिन् शास्त्रे 'अर्थशब्दाद् द्रव्यगुणकर्म्माणि प्रतिपत्तव्यानि' इति, तेन द्रव्यादीनि
त्रीणि निरुपपदेनार्थशब्देनोच्यन्ते ।
धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वञ्चेति । धर्म्माधर्म्मयोर्निमित्तत्वं त्रयाणाम्, यथा हि भूमिरैकैव
दीयमानापह्रियमाणा च धर्म्माधर्म्मयोः कारणम् । एकः संयोगो द्वयोः कारणम्, यथा
कपिलास्पर्शो नरस्थिस्पर्शश्च । एवं कर्म्माप्युभयकारणम्, यथा तीर्थगमनं शौण्डिकगृह-
गमनञ्च, एवमन्यदप्यूह्यम् । धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वमिति त्वप्रत्ययेन धर्म्माधर्म्मजननं प्रति तेषां
निजा शक्तिरुच्यते । ननु जातिरपि तयोः कारणम् ? न, तस्याः स्वाश्रयव्यवच्छेदमात्रेण
चरितार्थत्वात् ।
'स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वञ्च' अर्थात् वैशेषिक शास्त्र के आचार्यों ने सङ्केत
किया है कि 'अर्थ' शब्द से द्रव्यादि तीन समझे जायें । इस सङ्केत के बल से
विशेषण से शून्य केवल 'अर्थ' शब्द से द्रव्यादि तीन ही समझे जाते हैं । (इस
प्रकार वैशेषिक शास्त्र के सङ्केत सम्बन्ध से 'अर्थ' शब्दवत्ता द्रव्यादि तीन पदार्थों
में है), अतः स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्व द्रव्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य है ।
'धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वञ्च' अर्थात् द्रव्यादि तीनों पदार्थों में धर्म्म और अधर्म्म दोनों
की कारणता है, एक ही भूमि जब किसी को दी जाती है, तब वह धर्म्म का
कारण होती है, वही भूमि जब किसी से छीनी जाती है, तब अधर्म्म का कारण
होती है । इसी तरह कपिला गो का स्पर्श (गुण) धर्म्म का एवं मनुष्य की अस्थि
का स्पर्श (गुण) अधर्म्म का कारण है । इसी प्रकार तीर्थगमन क्रिया से धर्म्म और
मद्य बेचनेवाले के गृह में जाने की क्रिया से अधर्म्म होता है । इसी प्रकार और
स्थलों में भी कल्पना करनी चाहिए । 'धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वञ्च' इस वाक्य में प्रयुक्त
'त्व' प्रत्यय से द्रव्यादि तीनों वस्तुओं में धर्म्म और अधर्म्म के उत्पादन करने की
अपनी शक्ति कही गयी है । (प्र.) ¹ जाति भी तो उन दोनों का कारण है ? (उ.)
जाति धर्म्म और अधर्म्म का कारण नहीं है, क्योंकि वह अपने आश्रय को
विजातीय वस्तुओं से भिन्न समझाकर ही चरितार्थ हो जाती है, (अर्थात्) उक्त
शब्द से धर्म्म और अधर्म्म का साक्षात् कारणत्व ही विवक्षित है, (उक्त धर्म्माधर्म्म)
के तो ब्राह्मणादि व्यक्ति ही कारण हैं । जाति का काम वहाँ इतना ही है कि
ब्राह्मणादि से भिन्नजातीय व्यक्तियों से प्रकृत धर्म्म और अधर्म्म की उत्पत्ति का
प्रतिषेध करे, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
- प्रश्न का अभिप्राय है कि द्रव्यादि तीनों पदार्थों की तरह जाति भी धर्म और
अधर्म का कारण है, क्योंकि ब्राह्मणों के लिए विहित क्रिया के अनुष्ठान से क्षत्रियादि
४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कार्य्यात्वनित्यत्वे कारणवतामेव ।
कारणों से उत्पन्न पदार्थों के कार्यत्व और अनित्यत्व ये दो साधर्म्य
हैं ।
न्यायकन्दली
कार्य्यात्वानित्यत्वे कारणवतामेव । येषां द्रव्यादीनामुत्पत्तिकारणमस्ति तेषां कार्यत्व-
मनित्यत्वञ्च धर्म्मो न सर्वेषामित्यर्थः । स्वकारणे समवायः , प्रागसतः सत्तासमवायो वा
कार्यत्वमित्येके । तदयुक्तम् , प्रध्वंसे तदभावात् । तस्मात् कारणाधीनः स्वात्मलाभः
कार्यत्वमिति लक्षणम्, व्यापकत्वात् । प्राक्प्रध्वंसाभावोपलक्षिता वस्तुनः सत्तैवानित्य-
त्वमिति केचित् । तदयुक्तम्, अप्रतीतेः । अनित्य इति विनाशीत्येवं लोकः प्रत्येति, न तु
सत्ताविशिष्टताम् । उत्पत्तिविनाशयोगित्वमित्यपरः । तदप्यसारम्, प्रागभावे उत्पत्ते-
रभावात्, तस्याप्यनित्यत्वेन लोके सम्प्रतिपत्तेः । तस्मात् स्वरूपविनाश एवानित्यत्वमिति ।
यथोक्तम्-"अनित्यत्वं विनाशाख्यं क्रियासामान्यमुच्यते" इति ।
'कार्य्यात्वानित्यत्वे कारणवतामेव' अभिप्राय यह है कि कारणों से जिन
द्रव्यादि वस्तुओं की उत्पत्ति होती है, कारणत्व और अनित्यत्व उन्हीं पदार्थों के
साधर्म्य हैं, सभी पदार्थों के नहीं । कोई कहते हैं कि (प्र.) कारणों में कार्यों का
समवाय ही उनका 'कार्यत्व' है या पहले से अविद्यमान कार्यों में 'सत्ता' (जाति)
का समवाय सम्बन्ध ही 'कार्यत्व' है । (उ.) किन्तु ये दोनों ही पक्ष अयुक्त हैं,
क्योंकि ध्वंसात्मक कार्य में इन दोनों में से एक प्रकार का भी कार्यत्व नहीं है,
अतः कार्यत्व लक्षण के सभी लक्ष्यों में रहने के कारण "कारणों से अपने स्वरूप
का लाभ ही" कार्यत्व का लक्षण है । कोई कहते हैं कि (प्र.) जिन वस्तुओं का
कभी प्रागभाव रहे और कभी जिनका ध्वंस भी हो उनमें रहनेवाली 'सत्ता' ही
'अनित्यत्व' है । (उ.) किन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि अनित्यत्व की प्रतीति इस
आकार की नहीं होती है । 'अनित्यत्व' शब्द से विनाशशीलत्व की ही प्रतीति
होती है, किसी प्रकार की सत्ता की नहीं । (प्र.) कोई कहते हैं कि उत्पत्ति और
विनाश दोनों का सम्बन्ध ही 'अनित्यत्व' है । (उ.) किन्तु यह पक्ष भी ठीक नहीं
है, क्योंकि प्रागभाव में अनित्यत्व की सार्वजनीन अबाधित प्रतीति होती है,
किन्तु उसमें उत्पत्ति का सम्बन्ध नहीं है । अतः वस्तुओं के स्वरूप का नाश
ही अनित्यत्व है । जैसा कहा भी है कि विनाश नाम की सामान्य क्रिया
ही 'अनित्यत्व' शब्द से कही जाती है । (प्र.) यद्यपि वस्तुओं की वर्त्तमान
को पुण्य नहीं होता, एवं ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध सुरापानादि से शूद्रादि को अधर्म्म नहीं
होता, अतः यह कथन असङ्गत है कि उक्त धर्म्माधर्म्मकर्तृत्व केवल द्रव्यादि तीन के ही
साधर्म्य हैं ।