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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०१
न्यायकन्दली
विशेषनिष्ठं व्याप्तिग्रहणमाचक्ष्महे । विशेषहान्या सामान्येन व्याप्तिग्रहणे तु सर्वत्रैव निर्वि-
शङ्कः प्रत्ययः, तस्य सर्वत्रैकरूपत्वात् । किं व्यक्तयो व्याप्तावप्रविष्टा एव ? को वै ब्रूते न
प्रविष्टा इति । किन्तु सामान्यरूपतया, न विशेषरूपेण । अत एव धूमसंविन्त्या वह्निमात्र-
मेवानुसन्दधानस्तमनुधावति, न विशेषमाद्रियते । यदि तु सामान्येन सर्वत्र निश्चितेऽपि
नियमे निष्प्रामाणिकैराशङ्का क्रियते, तदा त्वत्पक्षेऽपि प्रत्यक्षेण दृष्टासु वह्निधूमव्यक्तिषु गृही-
तेऽपि कार्यकारणभावे देशकालव्यवहितात् तद्भावसन्देहादत्रानुमानाप्रवृत्तिं को निवारयति ?
अथोच्यते-भूयोदर्शनेन कार्यकारणभावो निर्धार्यते सकृद्दर्शनेन तदुपाधिजत्य-
शङ्काया अनिवर्तनात् । भूयोदर्शनं च सामान्यविषयम्, क्षणिकानां व्यक्तीनां
पुनः पुनर्दर्शनाभावात् । तेनानग्निब्यावृत्तस्याधूमव्यावृत्तस्य च सामान्य-
अनन्त हेतु (धूमादि) व्यक्तियों में (वह्नि आदि) साध्य के नियम (व्याप्ति) का
(प्रत्यक्ष रूप) ग्रहण कैसे होगा ? (उ.) हम लोग विशेष व्यक्तियों में अलग-अलग
व्याप्तिग्रहण नहीं मानते, किन्तु विशेष को छोड़कर केवल हेतुसामान्य में
साध्यसामान्य की व्याप्ति का ग्रहण मानने से ही सभी हेतुओं में व्याप्ति का शङ्का
से सर्वथा रहित निश्चय हो जाएगा । क्योंकि सामान्यमुखी व्याप्ति सभी व्यक्तियों
में समान है । (प्र.) तो क्या व्याप्तिग्रहण में विशेष्य रूप से (हेतु) व्यक्तियों का
प्रवेश नहीं होता ? (उ.) कौन कहता है कि व्याप्ति के ग्रहण में व्यक्तियों का
प्रवेश नहीं होता है । 'व्याप्ति सामान्य विषयक ही है, विशेष विषयक नहीं' इसका
इतना ही अभिप्राय है कि व्याप्तिबुद्धि में विशेष भी सामान्य रूप से ही भासित
होते हैं, अपने असाधारण तत्तद्व्यक्तित्वादि रूपों से नहीं । अत एव धूम के ज्ञान
से वह्नि सामान्य की अनुमिति के द्वारा प्रमाता वह्नि सामान्य का ही अनुधावन
करता है, किसी विशेष प्रकार के वह्नि का आदर वह नहीं करता । यदि हेतु
सामान्य में साध्य सामान्य की व्याप्ति के निश्चित हो जाने पर भी अप्रामाणिक
लोग यह शङ्का करें कि तुम्हारे मत में भी यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष के
द्वारा गृहीत धूम और प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत वह्नि इन दोनों में कार्यकारणभाव के
गृहीत होने पर भी विभिन्न देशों के धूमों और वह्नियों में एवं विभिन्न काल के धूमों
और वह्नियों में कार्यकारणभाव का सन्देह बना ही रहेगा तो फिर इस सन्देह के
कारण सभी अनुमानों के उच्छेद का निवारण कौन कर सकेगा ?
यदि यह कहें कि (प्र.) हेतु और साध्य को बार-बार एक स्थान में देखने (भूयो-
दर्शन) से दोनों में कार्यकारणभाव का निश्चय होता है । कहीं एक बार हेतु और
साध्य दोनों में सामानाधिकरण्य के देखने पर भी यह संशय रह ही जाता है कि इन
दोनों का सम्बन्ध स्वाभाविक है, या औपाधिक ? बार-बार का यह देखना (भूयो-
दर्शन) साध्य सामान्य का हेतु सामान्य के साथ ही हो सकता है, एक साध्य व्यक्ति

५०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
विषयः कार्यकारणभाव एकत्र निश्चीयमानः सर्वत्र विनिश्चितो भवति, सामान्यस्यैक-
त्यादिति चेत् ? अस्माभिरपीत्थमेव सर्वत्र निश्चीयमानो नियमः किं भवद्भ्यो न रोचते ?
किञ्च, भवतां प्रत्यक्षागोचरः सामान्येन कार्यकारणभावः, अनुभवतोऽवस्तुत्वात्, व्यक्तय-
स्तादृश्यः । तासु सर्वाणि प्रत्यक्षेण गृह्यन्ते । न चातीतानागतानां व्यक्तीनां मनसा
संकलनमिति न्याय्यम्, मनसो बहिरर्थे स्वातन्त्र्येऽन्धबधिराद्यभावप्रसङ्गात् । दृष्टासु व्यक्तिषु
कार्यकारणभावोऽध्यवसायश्चादृष्टासु नानुमानोदयस्तदन्वयत्वात् । नापि व्यक्तीनां साध्य-
साधनभावो युक्तः, परस्परमनन्वितत्वात् । न च तासामेकेन सामान्येनोपग्रहः, वस्त्व-
वस्तुनोः सम्बन्धाभावात्, असम्बद्धस्योपग्राहकत्वे चातिप्रसङ्गात् । तत्किंविषयः प्रत्यक्ष-
साधनस्तदुत्पादविनिश्चयः, यस्मादनुमानप्रवृत्तिरिति न विद्मः ।
का एक हेतु व्यक्ति के साथ नहीं, क्योंकि व्यक्ति क्षणिक हैं । अतः उनको बार
बार साथ देखना सम्भव नहीं है । तस्मात् अनग्निनाव्यावृत्त (अपोह या अग्नित्व
जाति) अधूम व्यावृत्त (अपोह या धूमत्व जाति) इन दोनों का सामान्य विषयक
कार्यकारणभाव ही गृहीत होता है । 'धूम सामान्य की उत्पत्ति वह्निसामान्य से होती
है' यह निश्चित हो जाने पर सभी धूमों और सभी वह्नियों में कार्यकारणभाव
गृहीत हो जाता है, क्योंकि सामान्य (अपोह) एक ही है । (उ.) इसी प्रकार जब
हम हेतु सामान्य में साध्य सामान्य के नियम (व्याप्ति) का उपपादन करते हैं, तो
आप लोगों को क्यों पसन्द नहीं आता ? आप लोगों का सामान्य (अपोह) चूँकि
अभाव रूप है, अतः सामान्यों में आप लोग (बौद्धगण) कार्यकारणभाव का
अनुभव नहीं कर सकते । व्यक्ति सभी प्रत्यक्ष के विषय हैं अतः उनमें
कार्यकारणभाव का ग्रहण होता है । यह कहना भी उचित नहीं है कि (प्र.) भूत
और भविष्य व्यक्तियों का (चक्षुरादि से ज्ञान सम्भव न होने पर भी) मन से
ग्रहण हो सकता है (अतः अतीत और अनागत व्यक्तियों में भी कार्यकारणभाव
का ग्रहण असम्भव नहीं है) । (उ.) (यह सम्भव इसलिए नहीं है कि)
मन को यदि बाह्य अर्थों के ग्रहण में स्वतन्त्र (अर्थात् चक्षुरादि निरपेक्ष) मान
लिया जाय तो जगत् में कोई गूँगा या बहरा न रह जाएगा । इस प्रकार भी बौद्धों
के मत से उपपत्ति नहीं की जा सकती कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत व्यक्तियों में
ही कार्यकारण भाव गृहीत हो सकता है, किन्तु (व्याप्ति) का निश्चय अदृष्ट
व्यक्तियों में भी होता है, चूँकि व्यक्ति भिन्न भिन्न हैं । व्यक्तियों में परस्पर
कार्यकारणभाव भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वे परस्पर असम्बद्ध हैं । उन सभी
व्यक्तियों का एक सामान्य धर्म (अपोह) के द्वारा संग्रह भी सम्भव नहीं
है, क्योंकि वस्तु (भाव) और अवस्तु (अभाव) इन दोनों में सम्बन्ध हो ही
नहीं सकता, यदि सम्बन्ध के न रहने पर भी संग्रह मानें तो (अघटव्यावृत्ति
रूप अपोह से पट व्यक्तियों का संग्रह रूप) अतिप्रसङ्ग होगा । अतः यह