वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४५
प्रशस्तपादभाष्यम्
चार्थान्तराद् भवितुमर्हतीति यत् तदर्थान्तरं सा सत्तेति सिद्धा। सत्तानुसम्बन्धात्
सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तस्मात् सा सामान्यमेव ।
आकार की प्रतीति होती है। यह प्रतीति द्रव्य, गुण और कर्म इनसे
भिन्न किसी वस्तु से ही होनी चाहिए। वही वस्तु है 'सत्ता'। इस सत्ता
जाति के सम्बन्ध से 'यह सत् है यह सत् है' इत्यादि आकारों के
अनुवृत्तिप्रत्यय ही हो सकते हैं (कोई भी व्यावृत्तिप्रत्यय नहीं), अतः
सत्ता सामान्य ही है, विशेष नहीं ।
न्यायकन्दली
ष्यिति। तद् व्यक्तम् । द्रव्यादिषु सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः व्यतिरिक्तप्रत्ययनिबन्धना, भिन्नेषु
प्रत्ययानुवृत्तित्वात्, चर्मवस्त्रादिषु नीलप्रत्ययानुवृत्तिवत् । यस्मात् सत्ता त्रिषु द्रव्यादिषु
प्रत्ययानुवृत्तिं करोति न व्यावृत्तिम्, तस्मात् सामान्यमेव, न विशेष इत्युपसंहारार्थः ।
अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च भवति । द्रव्यत्वं
द्रव्येष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । गुणत्वं
गुणेष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिप्रत्ययहेतुत्वाद् विशेषः । तथा
फिर भी जो कोई उसे प्रत्यक्षवेद्य नहीं मानते, उनके सन्तोष के लिए 'परस्पर- विशिष्टेषु'
इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान भी उपस्थित करते हैं। इस अनुमान प्रयोग का
अर्थ स्पष्ट है । जिस प्रकार नीलवस्त्र के नीलधर्म प्रभृति में एक नीलवर्ण के ही
कारण 'यह नील' है, इस एक आकार की प्रतीतियाँ 'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप होती
हैं, उसी प्रकार द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में 'यह सत् है' इस एक आकार की
प्रतीति भी होती है, इन तीनों से भिन्न किसी वस्तु का ज्ञान उक्त प्रतीतियों का
कारण है; क्योंकि उक्त सदाकारक प्रतीतियाँ भी अनुवृत्तिप्रत्यय हैं । (जिसका ज्ञान
उक्त अनुवृत्तिप्रत्ययों का कारण है वही 'सत्ता' है) प्रकृत उपसंहार ग्रन्थ का यह
अभिप्राय है कि यतः सत्ता द्रव्यादि तीनों पदार्थों में 'यह सत् है' इस आकार के
अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, किसी भी व्यावृत्ति (प्रत्यय) का नहीं, अतः
'सत्ता' सामान्य ही है, विशेष नहीं । द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अनुवृत्तिप्रत्यय
और व्यावृत्तिप्रत्यय दोनों की ही कारण हैं, अतः वे 'सामान्य' और 'विशेष' दोनों
ही हैं । जैसे कि द्रव्यत्व जाति सभी द्रव्यों में 'यह द्रव्य है' इस अनुवृत्तिप्रत्यय का
कारण है, अतः 'सामान्य' है । उसी प्रकार द्रव्य में ही 'यह गुण और कर्म से
भिन्न है' (क्योंकि इसमें द्रव्यत्व है) इस व्यावृत्तिप्रत्यय का भी कारण है,
अतः 'विशेष' भी है । एवं गुणत्व जाति सभी गुणों में 'यह गुण है' इस प्रकार की
३४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च
भवति । तत्र द्रव्यत्वं परस्परविशिष्टेषु पृथिव्यादिष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम्,
गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । तथा गुणत्वं परस्परविशिष्टेषु रूपादि-
ष्ष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । तथा
कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यगुणेभ्यो
द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अपर हैं । ये अनुवृत्तिप्रत्यय के
कारण होने से 'सामान्य' और व्यावृत्तिप्रत्यय के कारण होने से
'विशेष' दोनों ही हैं । इनमें द्रव्यत्व परस्पर विभिन्न पृथिवी प्रभृति
नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में 'यह द्रव्य है' इस एक आकार की प्रतीति
के हेतु होने से 'सामान्य' है एवं उन्हीं नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में 'यह
गुण और कर्म से भिन्न है' इस व्यावृत्तिबुद्धि के हेतु होने से 'विशेष'
भी है । इसी प्रकार गुणत्व भी रूपादि चौबीस गुणों में से प्रत्येक में
'यह गुण है' इस एक आकार के प्रत्ययों का हेतु होने से 'सामान्य' है
एवं 'ये रूपादि द्रव्य और कर्म से भिन्न हैं' इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण
होने से 'विशेष' भी है । इसी प्रकार कर्मत्व जाति भी उत्क्षेपणादि
विभिन्न क्रियाओं में से प्रत्येक में 'यह क्रिया है' इस अनुवृत्तिप्रत्यय
का कारण होने से सामान्य है एवं उत्क्षेपणादि क्रियाओं में से
प्रत्येक में 'यह द्रव्य और गुण से भिन्न है' इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण
न्यायकन्दली
कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यं द्रव्यगुणेभ्यो
व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । द्रव्यत्वादिवत् पृथिवीत्वादीनामप्यनुवृत्तिव्यावृत्तिप्रत्यय-
हेतुत्वात् सामान्यविशेषभावोऽस्तीत्याह—एवमिति । प्राणिगतानि सामान्यानि
गोत्वाश्वत्वादीनि, अप्राणिगतानि घटत्वपटत्वादीनि । किं द्रव्यत्वादीनां सामान्य-
अनुवृत्तिप्रतीति का कारण है, अतः सामान्य है । एवं द्रव्य और कर्म इन दोनों से 'गुण
भिन्न है' (क्योंकि वह गुण है) इस व्यावृत्तिबुद्धि का भी कारण है, अतः 'विशेष'
भी है । इसी प्रकार परस्पर विभिन्न उत्क्षेपणादि क्रियाओं में 'ये कर्म हैं' इस समान
आकार की प्रतीति (अनुवृत्तिप्रत्यय) कर्मत्व से होती है, अतः वह सामान्य है और
उन्हीं कर्मों में 'ये द्रव्य और गुण से भिन्न हैं' इस व्यावृत्ति बुद्धि की हेतु होने से
'विशेष' भी है । 'एवम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रव्यत्वादि जातियों की तरह पृथिवीत्वादि
जातियों में भी कथित सामान्य-विशेषभाव का अतिदेश करते हैं । गोत्व, अश्वत्व प्रभृति