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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७३

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७३
न्यायकन्दली
अतिथिशेषभोजनं च धर्मसाधनम्। यः प्राजापत्यामिष्टिं निरूप्य सर्वस्वं दक्षिणां दत्वात्मन्यग्निं
समाधाय पुत्रे भार्या निक्षिप्य प्रव्रजितः, न तस्य होमो न तस्यातिथिपरिग्रहः। यस्तु सह
पत्न्या सहैवाग्निना वनं प्रस्थितः, तस्य हुतशेषभोजनमतिथिशेषभोजनं च धर्मसाधनम्।
यतिधर्मं निरूपयति-त्रयाणामिति। यत्याश्रमपरिग्रहेऽपि नियमो नास्ति, श्रद्धोपगमे
सति ब्रह्मचार्येव यतिर्भवति, गृहस्थो वा भवति, वानप्रस्थो वेत्यनेनाभिप्रायेणोक्तं
त्रयाणामन्यतमस्येति । श्रद्धावतः चित्तप्रसादवतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा भूतानि
मया न जातु हिंसितव्यानीति अद्रोहसङ्कल्पं गृहीत्वा, स्वानि कर्माणि काम्यानि संन्यस्य
परित्यज्य यमनियमेष्वप्रमत्तस्य। अहिंसा-सत्यादयो यमाः। यथाह भगवान् पतञ्जलिः-
"अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः" इति। तपःशौचादयस्तु नियमाः। यथाह स एव
भगवान्-"शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः" इति । न्यायभाष्यकारस्तु
प्रत्याश्रमं विशिष्टं धर्मसाधननियममाह। तेष्वप्रमत्तस्य ताननतिक्रमतः। षट्पदार्थ-
प्रस्थियों के) धर्म के साधन हैं। जो गृहस्थ प्राजापत्य नाम की इष्टि करके अपने
सर्वस्व को दक्षिणा रूप में देकर एवं पत्नी का भार पुत्र को सौंप कर वानप्रस्थ
को ग्रहण करते हैं, उनके लिए होम और अतिथि की सेवा निर्दिष्ट नहीं है (अतः
उनके लिए ये दोनों धर्म के साधन नहीं हैं)। जो पत्नी और अग्नि को साथ
लेकर ही वानप्रस्थाश्रम को ग्रहण करते हैं, उनके लिए ही होम से बचे हुए हवि
का भोजन और अतिथि से बचे हुए अन्न का भोजन ये दोनों धर्म के साधन हैं।
'त्रयाणाम्' इत्यादि ग्रन्थ से यतियों (संन्यासियों) के धर्म का निरूपण करते हैं ।
संन्यासाश्रम ग्रहण करने का भी कोई नियम नहीं है (कि किस आश्रम से संन्यास
ग्रहण करे); क्योंकि उपयुक्त श्रद्धा के रहने पर ब्रह्मचारी, गृहस्थ ये दोनों ही
संन्यास ले सकते हैं । वानप्रस्थाश्रमी तो ले ही सकते हैं, इसी नियम को दृष्टि में
रखकर लिखा गया है कि 'त्रयाणामन्यतमस्य' । 'श्रद्धावतः' चित्त प्रसाद से युक्त
पुरुष के लिए 'सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा' अर्थात् 'मुझसे किसी प्राणी की हिंसा
न हो' इस प्रकार से अद्रोह का संकल्प करके 'स्वानि कर्माणि' अर्थात् अपने काम्य
कर्मों को 'संन्यस्य' अर्थात् छोड़कर 'यमनियमेष्वप्रमत्तस्य' इनमें अहिंसा, सत्य
प्रभृति 'यम' कहलाते हैं। जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि-अहिंसा, सत्य,
अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (ये पाँच) 'यम' हैं। प्रकृत में 'नियम' शब्द से तपस्या,
शौच प्रभृति इष्ट हैं। जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ही कहा है कि-शौच, सन्तोष,
तपस्या, स्वाध्याय और ईश्वर का प्रणिधान (ये पाँच) 'नियम' हैं । न्यायभाष्यकार
ने प्रत्येक आश्रम के लिए निर्दिष्ट धर्म के नियमित अनुष्ठान को ही नियम बतलाया
है । 'तेष्वप्रमत्तस्य' अर्थात् यम और नियम के विरुद्ध आचरण न करनेवाले

६७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
प्रसंख्यानात् षष्णां पदार्थानां तत्त्वज्ञानाद् योगस्यात्मज्ञानोत्पादनसमर्थस्य समाधिविशेषस्य
प्रसाधनमुत्पादनं प्रव्रजितस्य धर्मसाधनम् । यथैतानि धर्मं साधयन्ति, तथा कथयति-दृष्टं
चेति । लाभपूजादिप्रयोजनमनुद्दिश्यानभिसन्धाय यदैतानि साधनानि क्रियन्ते, तदैतानि
साधनानि भावप्रसादं चाभिप्रायविशुद्धिं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्मोत्पत्तिरिति ।
प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य तत्त्वतो विज्ञातेषु दुःखनिदानेषु विषयेषु विरक्तस्यात्यन्तिकं
दुःखवियोगमिच्छतः "आत्मख्यातिर्विप्लवा हानोपायः", "तस्याश्च समाधिविशेषो
निबन्धनम्" इति श्रुतवतः "संन्यस्य सर्वकाम्यकर्माणि समाधिमनुतिष्ठामः"
तत्प्रत्यनीकभूयिष्ठं ग्रामं परित्यज्य वनमाश्रितस्य यमनियमाभ्यां कृतात्मसंस्कारस्य
समाध्यभ्यासान्निवर्तको धर्मो जायते । तस्मादस्य प्रकृष्टः समाधिस्ततोऽन्यः प्रकृष्टतरो
धर्मः, तस्मादप्यन्यः प्रकृष्टतमः समाधिरित्यनेन क्रमेणान्ये जन्मनि स तादृशः समाधिविशेषः
पुरुषों के लिए ये आचरण धर्म के साधन हैं । 'षट्पदार्थप्रसंख्यानात्' द्रव्यादि छः
पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा योग का अर्थात् आत्मज्ञान में पूर्ण क्षम विशेष प्रकार
के समाधि का जो उत्पादन वह 'प्रव्रजितों' के लिए धर्म का साधन है । 'दृष्टञ्च'
इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह उपपादन करते हैं कि ये साधन किस प्रकार धर्म का
सम्पादन करते हैं । अर्थात् 'दृष्ट' लाभ पूजादि प्रयोजनों का उद्देश्य न रखकर
जब यम-नियमादि साधनों का अनुष्ठान किया जाता है, उस समय ये साधन
'भावशुद्धि' अर्थात् अभिप्राय की विशुद्धि के साहाय्य से आत्मा और मन के
संयोग के द्वारा धर्म का उत्पादन करते हैं ।
जिस पुरुष का चित्त दुःखों से प्रतिदिन अभिहत होता रहता है, उसे यदि
दुःखों के कारणीभूत विषय यथार्थ रूप से ज्ञात हो जाते हैं, तो फिर उन विषयों
से उसे वैराग्य हो जाता है । ऐसा पुरुष दुःखों से सदा के लिए छूटने की इच्छा
करता है । (अन्वेषण करने पर) उसे यह ज्ञात होता है कि 'आत्मा का तत्त्वज्ञान
ही दुःख के आत्यन्तिक निवृत्ति का अव्यर्थ साधन है एवं वह तत्त्वज्ञान विशेष
प्रकार की 'समाधि' से ही प्राप्त हो सकता है । तो फिर सभी काम्य कर्मों का
त्याग कर 'मैं समाधि का ही अनुष्ठान करूँ' वह ऐसा संकल्प करता है । फिर
समाधि के अधिकतर विघ्नों से युक्त होने के कारण वह ग्राम को छोड़ देता है
और वन का आश्रय ले लेता है । ऐसा पुरुष यम और नियम से आत्मा को
सुसंस्कृत कर लेता है । ऐसी स्थिति में जब वह समाधि का अभ्यास करता है, तो
उससे (संसार को निवृत्त करनेवाले) निवर्तक धर्म की उत्पत्ति होती है । इस
निवर्तक धर्म के द्वारा पहले की समाधि से उत्कृष्ट समाधि की उत्पत्ति होती है ।
इस उत्कृष्ट समाधि से उत्पन्न निवर्तक धर्म से उत्कृष्टतर निवर्तक धर्म की उत्पत्ति
होती है । इस उत्कृष्ट निवर्तक धर्म से उत्कृष्टतम समाधि की उत्पत्ति होती है, इस