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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३
प्रशस्तपादभाष्यम्
बहिर्द्विविधः-प्रत्यक्षविषये चाप्रत्यक्षविषये च। तत्राप्रत्यक्षविषये तावत् साधारण-
लिङ्गदर्शनादुभयविशेषांनुस्मरणार्द्धर्माच्च संशयो भवति । यथाऽटव्यां विषाणमात्र-
दर्शनाद् गौर्गवयो वेति । प्रत्यक्षविषयेऽपि स्थाणुपुरुषयोरूर्ध्वतामात्रसादृश्यदर्शनाद्
बहिःसंशय दो प्रकार का है १. जिसके विषय प्रत्यक्ष प्रमाण के
द्वारा गृहीत हों एवं २. जिसके विषय प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत न हो सकें ।
इनमें अप्रत्यक्षविषय का बहिःसंशय वह है जो दोनों कोटियों में
रहनेवाले (साधारण) धर्म के ज्ञान, एवं दोनों कोटियों में से प्रत्येक के
असाधारण धर्म की अनुस्मृति (पश्चात्स्मरण) और अधर्म इन कारणों
से उत्पन्न होता है । जैसे जङ्गल में (जाने पर) केवल सींग के देखने पर
यह संशय होता है कि यह (सींगवाला) गो है या गवय ? प्रत्यक्ष के
द्वारा गृहीत होनेवाले विषयों के संशय (का यह उदाहरण है कि) स्थाणु
और पुरुष दोनों में समान रूप से रहनेवाला उच्चता (ऊँचाई) रूप
से सादृश्य का ज्ञान, दोनों में से प्रत्येक में रहनेवाली वक्रता
न्यायकन्दली
बुद्धेरेकत्वे विषयाकारवतीनां तद्वतीनामप्येकत्वात् त्रिचतुरादिप्रत्ययो दुर्लभः,
परस्परविलक्षणाकारसंवेदनाभावाद् बुद्ध्यारूढाकारमात्रवेदित्वाच्च पुरुषस्य । यथोक्तम् -
'बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुष' इति । वृत्तीनां वा नानात्वे बुद्धेरपरापि नानात्वादेकत्वव्याघात'
इत्यादि दूषणमूह्यम् ।
बुद्धेर्भेदं निरूपयति-सा चानेकप्रकारेति । अत्र कारणमाह-अर्था-
उत्पत्ति और विनाश दोनों ही होते हैं । एवं जिसका कोई दूसरा आश्रय है ।
जिसमें उसकी उत्पत्ति से प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही उपपन्न होती हैं । (बुद्धि के
प्रसङ्ग में) इन्हीं दोनों प्रकारों का प्रत्येक आत्मा अनुभव करता है, दूसरे का नहीं ।
(इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न भी उठता है कि) बुद्धि की यह कथित 'वृत्ति' बुद्धि से
भिन्न है या अभिन्न ? सांख्याचार्यगण वृत्ति और उसके आश्रय दोनों में अत्यन्त
अभेद मानते हैं, अतः (उनके मत से) ये दोनों भिन्न तो हो नहीं सकते । यदि
वृत्ति और वृत्तिमान में भेद मानें, तो ये तीन हैं, ये चार हैं इत्यादि विभिन्न प्रकार
की प्रतीतियाँ दुर्लभ होंगी, क्योंकि बुद्धि के एक होने के कारण उसकी वृत्ति
भी एक ही होगी, अतः वृत्तियों में परस्पर विशेष नहीं हो सकता, क्योंकि
सभी आकार एक ही बुद्धि में आरूढ हैं । जैसा कि (भगवान् पतञ्जलि ने)

४१४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे बुद्धि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
वक्रादिविशेषानुपलब्धितः स्थाणुत्वादिसामान्यविशेषानाभिव्यक्तावुभयविशेषानु-
स्मरणादुभयत्राकृष्यमाणस्यात्मनः प्रत्ययो दोलायते— किं नु खल्वयं स्थाणुः
स्यात् पुरुषो वेति ?
(टेढ़ापन) और हस्तपादादि असाधारण धर्मों का अज्ञान, दोनों कोटियों
में से प्रत्येक में रहनेवाले स्थाणुत्वपुरुषत्वादि जाति रूप विशेष धर्मों का
अप्रत्यक्ष, एवं इन दोनों जातियों की पश्चात् स्मृति, इन सभी कारणों से
पुरुष का चित्त झूले की तरह स्थाणु और पुरुष दोनों तरफ डोलता है
और उसे संशय होता है कि यह (सामने दीखनेवाला) स्थाणु है ? या पुरुष ?
न्यायकन्दली
नन्वादिति । यदि नामार्थस्य विषयस्यानन्तत्वं बुद्धेरनेकविधत्वे किमायातम् ? तत्राह-
प्रत्यर्थनियतत्त्वाच्चेति । प्रत्यर्थं प्रतिविषयमस्मदादिबुद्धयो नियताः, अर्थाश्चानन्ता इति
प्रत्येकं तत्र बुद्धयोऽप्यनन्ताः । यदि क्वचिदनेकविषयमेकं विज्ञानं तदपि तावदर्थनियत-
त्वात् तदर्थाद् विज्ञानान्तराद् विलक्षणमेवेत्यदोषः ।
बुद्धेर्विषयभेदेन सत्यपि भेदे संक्षेपतो द्वैविध्यमाह—तस्या इति ।
निःसन्दिग्धाबाधिताध्यवसायात्मिका प्रतीतिर्विद्या, तद्विपरीता चाविद्येति । अत्र
प्रतिपादनमात्रस्य विवक्षितत्वात् पश्चादुद्दिष्टामप्यविद्यां प्रथमं कथयति-
कहा है कि 'बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः ।' अर्थात् बुद्धि में आरूढ़ आकारों को ही
पुरुष अनुभव करता है । वृत्ति को यदि अनेक मानें तो फिर बुद्धि को भी नाना
मानना पड़ेगा ही, जिससे बुद्धि की एकता खतरे में पड़ जाएगी, इन सभी दोषों
की भी कल्पना करनी चाहिए ।
'सा चानेकप्रकारा' इत्यादि सन्दर्भ से बुद्धि के भेदों का निरूपण करते हैं ।
'अर्थानन्त्यात्' इस पद के द्वारा इसमें हेतु दिखलाया गया है (कि बुद्धि अनेक
प्रकार की क्यों है?) यदि अर्थ या विषय अनन्त हैं, तो फिर इसलिए बुद्धियाँ क्यों
अनेक हों ? इसी प्रश्न का समाधान 'प्रत्यर्थनियतत्त्वाच्च' इस वाक्य के द्वारा दिया
गया है । 'प्रति अर्थ' अर्थात् प्रत्येक विषय में हम लोगों की बुद्धियाँ नियत रूप से
अलग हैं । ये 'अर्थ' या विषय असंख्य हैं, फिर बुद्धियाँ भी अवश्य ही अनन्त
होंगी । जहाँ कहीं अनेक विषयक एक ज्ञान उपलब्ध भी होता है, वह भी उतने
अर्थों में नियत तो है ही, किन्तु जो अपने विषयों से भिन्नविषयक या
अल्पाधिक-विषयक ज्ञानों से भिन्न भी हैं । इस प्रकार (विषयभेद से ज्ञानभेद