वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३७
प्रशस्तपादभाष्यम्
मानसं तत् स्वप्नज्ञानम् । कथम् ? यदा बुद्धिपूर्वादात्मनः
शरीरव्यापारादहनि खिन्नानां प्राणिनां निशि विश्रामार्थ-
विषयों के ग्रहण से विमुख रहते हैं, उस व्यक्ति को केवल मन रूप इन्द्रिय
से जो ज्ञान होता है, वही 'स्वप्न ज्ञान' है । (प्र.) यह किस प्रकार उत्पन्न
न्यायकन्दली
कोटिसंस्पर्शी संशयो न त्वयमिति भेदः । विद्या त्वयं न भवति, व्यवहारानङ्गत्वादिति ।
स्वप्ननिरूपणार्थमाह-उपरतेन्द्रियग्रामस्येत्यादि । उपरतः स्वविषयग्रहणाद् विरत
इन्द्रियग्रामो यस्य असावुपरतेन्द्रियग्रामः । प्रकर्षेण सर्वात्मना लीनं मनो यस्यासौ
प्रलीनमनस्क इति । तस्योपरतेन्द्रियग्रामस्य प्रलीनमनस्कस्येन्द्रियद्वारेण यदनुभवनं
पूर्वाधिगमनिरपेक्षं परिच्छेदस्वभावं मानसं मनोमात्रप्रभवं तत् स्वप्नज्ञानम् । यदा यथा
पुरुषस्य मनः प्रलीयते, इन्द्रियाणि च विरमन्ति तद्दर्शयति-कथमित्यादिना । आत्मनः
शरीरव्यापाराद् गमनागमनादहनि खिन्नस्य परिश्रान्तस्य प्राणिनो निशि रात्रौ विश्रामार्थं
श्रमोपशमार्थं भुक्तपीतस्याहारस्य रसादिभावेन परिणामार्थं चादृष्टेन कारितं प्रयत्न-
मपेक्षमाणादात्मन्तःकरणसंयोगान्मनसि' यः क्रियाप्रबन्धः क्रियासन्तानो जातस्तस्मादन्त-
र्हृदये निर्निन्द्रिये बाह्येन्द्रियसम्बन्धशून्ये आत्मप्रदेशे निश्चलं मनस्तिष्ठति यदा, तदा
पुरुषः प्रलीनमनस्क इत्याख्यायते । प्रलीने च तस्मिन् मनस्युपरतेन्द्रिय-
से व्यवहार नहीं चल पाता, अतः यह ज्ञान 'अविद्या' रूप ही है, यह विद्या के
अन्तर्गत नहीं आ सकता ।
'उपरतेन्द्रियग्रामस्य' इत्यादि वाक्य स्वप्न के निरूपण के लिए लिखे गये हैं ।
'उपरतः इन्द्रियग्रामो यस्य असौ उपरतेन्द्रियग्रामः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस
पुरुष की इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों के ग्रहण से 'उपरत' हैं अर्थात् अपने
विषयों को ग्रहण करना छोड़ दी हैं, वही पुरुष 'उपरतेन्द्रियग्राम' शब्द का अर्थ
है । 'प्रकर्षेण लीनं मनो यस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रकर्षेण' अर्थात् पूर्ण रूप
से (किसी विषय में) लीन है मन जिसका, वही पुरुष 'प्रलीनमनस्क' शब्द का अर्थ
है । (इस प्रकार के) उपरतेन्द्रियग्राम और प्रलीनमनस्क पुरुष को इन्द्रिय के द्वारा
जो विचार रूप एवं मानस अर्थात् मनोमात्रजन्य पहिले के ज्ञानों से सर्वथा अनपेक्ष
अनुभव होता है, वही 'स्वप्न' है । 'कथम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह दिखलाया
गया है कि किस समय और किस प्रकार से मन प्रलीन होता है एवं इन्द्रियाँ
विषयों के ग्रहण से उपरत होती हैं । शरीर के व्यापार अर्थात् गमन और
आगमन के द्वारा 'खिन्न' अर्थात् थके हुए प्राणियों को निशा अर्थात् रात में
'विश्राम' अर्थात् थकावट को मिटाने के लिए एवं खाये और पिये हुए द्रव्य को
रसादि रूप में परिणत करने के लिए आत्मा और अन्तःकरण के संयोग से मन
४३८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वप्न-
प्रशस्तपादभाष्यम्
माहारपरिणामार्थं चादृष्टकारितप्रयत्नापेक्षादात्मन्तःकरणसम्बन्धान्मनसि क्रिया-
प्रबन्धादन्तर्हृदये निरिन्द्रिये आत्मप्रदेशे निश्चलं मनस्तिष्ठति, तदा प्रलीन-
मनस्क इत्याख्यायते । प्रलीने च तस्मिन्नुपरतेन्द्रियग्रामो भवति, तस्याम-
वस्थायां प्रबन्धेन प्राणापानसन्तानप्रवृत्तावात्ममनःसंयोगविशेषात् स्वापाख्यात्
संस्काराच्चेन्द्रियद्वारेणैवासत्सु विषयेषु प्रत्यक्षाकारं स्वप्नज्ञानमुत्पद्यते ।
होता है ? (उ.) शरीर के अति सञ्चालन से श्रान्त प्राणियों को विश्राम
देने के लिए एवं भोजन के परिपाक के लिए हृदय के बीच बाह्य
इन्द्रियों से रहित आत्मा के प्रदेश में जिस समय जिस पुरुष का मन
(इष्ट प्राप्ति या अनिष्ट की निवृत्ति के लिए) आत्मा के द्वारा जानबूझ-
कर निष्क्रिय होकर बैठ जाता है, उस समय उस व्यक्ति को
'प्रलीनमनस्क' कहते हैं । (बाह्येन्द्रिय प्रदेश में मन की यह निष्क्रिय
स्थिति) मन की उन क्रियाओं से होती है, जो अदृष्ट युक्त आत्मा और
अन्तःकरण (मन) के सम्बन्ध से उत्पन्न होती हैं । इस प्रकार मन के
निष्क्रिय होकर बैठ जाने के कारण बाह्य इन्द्रियाँ अपने कामों को करने
में (उस समय) असमर्थ हो जाती हैं । ऐसी अवस्था में प्राणवायु और
अपान वायु की प्रवृत्तियाँ अधिक हो जाती हैं । ऐसी स्थिति में 'स्वाप'
नाम के आत्मा और मन के विशेष प्रकार के संयोग, एवं संस्कार इन
दोनों से (मन रूप) इन्द्रिय के द्वारा ही अविद्यमान विषयक प्रत्यक्षा-
कारक (प्रत्यक्ष नहीं) जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'स्वप्नज्ञान' कहते हैं ।
न्यायकन्दली
ग्रामो भवति, अन्तःकरणानधिष्ठितानामिन्द्रियाणां विषयग्रहणाभावात् । तस्यां
प्रलीनमनोऽवस्थायां प्रबन्धेन बाहुल्येन प्राणापानवायुसन्ताननिर्गमप्रवेशलक्षणायां
प्रवृत्तौ सम्भवन्त्यात्ममनःसंयोगात् स्वापाख्यात् स्वाप इति नामधेयात्
में 'क्रियासन्तान' अर्थात् क्रियाओं के समूह की उत्पत्ति होती है । उस संयोग को इस
काम के लिए अदृष्ट से प्रेरित प्रयत्न के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । पुरुष के
हृदय के बीच 'निरिन्द्रिय' अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के सम्बन्ध से रहित आत्मा के एक प्रदेश
में जिस समय मन निश्चल रहता है, उसी समय वह पुरुष 'प्रलीनमनस्क' कहलाता है ।
उसके अर्थात् मन के प्रलीन होने पर पुरुष 'उपरतेन्द्रियग्राम' होता है, (अर्थात् उसकी
इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करने से विमुख हो जाती हैं) क्योंकि अन्तःकरण (मन) प्राण
और अपान वायुओं के समुदाय के गमनागमन रूप प्रलीन वृत्ति के उत्पन्न होने पर