वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८७
प्रशस्तपादभाष्यम्
विभागं करोति, तदैवाण्यन्तरेऽपि कर्म । ततो यस्मिन्नेव काले विभागाद्
द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, तदैवाण्यन्तरकर्मणा द्वयणुकण्वोर्वि-
भागः क्रियते । ततो यस्मिन्नेव काले विभागाद् द्वयणुकाणुसंयोगस्य
विनाशः, तस्मिन्नेव काले संयोगाद्विनाशाद् द्वयणुकस्य विनाशः ।
उत्तरदेश के साथ तन्तु का संयोग भी उक्त स्थल में नहीं है, (अतः
कथित युक्ति से) तन्तु प्रभृति अनित्य द्रव्यों में रहनेवाली उक्त क्रिया
क्षणिक न होकर अधिक समय तक रहेगी एवं परमाणु प्रभृति नित्य
द्रव्य में रहनेवाली क्रिया तो नित्य ही हो जाएगी । (प्र.) कैसे ?
(अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रियाओं में नित्यत्व की आपत्ति किस
प्रकार किस स्थिति में और किस स्थल में होगी ? (उ.) जिस समय
(जहाँ) जलीय द्वयणुक के उत्पादक जलीय परमाणु में उत्पन्न क्रिया
(जलीय द्वयणुक के अनुत्पादक) दूसरे परमाणु के साथ (जलीय द्वयणुक
के) विभाग को उत्पन्न करती है, उसी क्षण में (जलीय द्वयणुक के )
उत्पादक निष्क्रिय दूसरे परमाणु में भी क्रिया उत्पन्न होती है । इसके
बाद जिस क्षण में विभाग के द्वारा द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश
होता है, उसी क्षण (जलीय द्वयणुक के अनुत्पादक) दूसरे परमाणु की
क्रिया से जलीय द्वयणुक और (उदासीन) परमाणु इन दोनों में भी विभाग
उत्पन्न होता है । इसके अनन्तर जिस क्षण में (इस जलीय द्वयणुक और
उदासीन परमाणु के ) विभाग से जलीय द्वयणुक और (उदासीन)
परमाणु इन दोनों के संयोग का नाश होता है, उसी क्षण (द्वयणुक
के उत्पादक जलीय दोनों परमाणुओं के) संयोग के नाश से जलीय
न्यायकन्दली
विनाशात् तदारब्धस्य द्वयणुकस्य विनाशः, तस्मिन् द्वयणुके विनष्टे तदाश्रि-
तस्य द्वयणुकाणुविभागस्य विनाशः, ततो विभागस्य कारणस्याभावात्
परमाणोराकाशदेशविभागानुत्पादे पूर्वसंयोगानिवृत्तावुत्तरसंयोगस्य विरोधिगुणस्य
के द्वारा उत्पन्न द्वयणुक का विनाश होता है, उसी समय द्वयणुकविनाश के कारण उसमें
रहनेवाले विभाग का भी नाश हो जाता है । इसके बाद विभागरूप कारण के न रहने
से परमाणु का आकाशादि देशों के साथ विभाग उत्पन्न न हो सकेगा, जिससे कि पहले
संयोग का विनाश भी रुक जाएगा । (इस विनाश के रुक जाने पर) उत्तर संयोग रूप
३८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्मिन् विनष्टे तदाश्रितस्य द्व्यणुकाणुविभागस्य विनाशः। ततश्च विरोधि-
गुणासम्भवान्नित्यद्रव्यसमवेतकर्मणो नित्यत्वमिति।
द्व्यणुक का भी नाश हो जाता है। जलीय द्व्यणुक के विनष्ट हो जाने
पर उसमें रहनेवाले जलीय द्व्यणुक और उदासीन परमाणु के विभाग
का भी नाश होता है। अतः (उत्तरसंयोग रूप) विरोधी गुण की
उत्पत्ति की सम्भावना नहीं रहती; क्योंकि उत्तरदेश संयोग के लिए
पूर्वदेश के संयोग का विनाश भी आवश्यक है। एवं पूर्वदेश के संयोग
का विनाश तभी होगा, जब कि उससे अव्यवहित पूर्व काल में जलीय
द्व्यणुक और उदासीन परमाणु के विभाग की सत्ता रहे, (क्योंकि वही
वह विरोधी गुण है, जिससे यहाँ उस पूर्वदेश के संयोग का नाश होगा।
विरोधी गुण की इस असम्भावना से) परमाणुरूप नित्य द्रव्य में
रहनेवाली क्रिया में नित्यत्व की आपत्ति होगी।
न्यायकन्दली
विनाशहेतोरसम्भवान्नित्यपरमाणुसमवेतस्य कर्मणो नित्यत्वं स्यात्।
पूर्वोक्तं तावत्परिहरति—तन्त्वंश्र्वन्तरविभागाद्विभाग इत्यदोषः।
कार्याविष्टे कारणे कर्मोत्पन्नमवयवान्तरेण समं स्वाश्रयस्य विभागं
कुर्वदाकाशादिदेशाद्विभागं न करोतीति नियमः, आकाशादिदेशविभाग-
कर्तृत्वस्य विशिष्टविभागानाम्भकत्वेन व्याप्तत्वात्। अवयवान्तरस्यावयवेन
स्वाश्रयसंयोगिना समं तु करोत्येव, विरोधाभावात्। अतो द्वितन्तुककारणे
(क्रिया का) विरोधी गुण के विनाश का कोई कारण ही नहीं रह पाएगा। अतः
परमाणु में रहनेवाली क्रिया (परमाणु की नित्यता के कारण) नित्य हो जाएगी।
'तन्त्वंश्र्वन्तरविभागाद्विभागः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पूर्वकथित दोष का
परिहार करते हैं।
यह नियम है कि कार्य के साथ सम्बद्ध कारण में उत्पन्न हुई क्रिया अपने आश्रय
के दूसरे अववयव के साथ विभाग को उत्पन्न करने के समय अपने आश्रय के आकाशादि
देशों के साथ विभागों को उत्पन्न नहीं करती; क्योंकि यह व्याप्ति है कि जो अपने
आश्रय का आकाशादि देशों के साथ विभाग का उत्पादक होगा, वह कभी भी विशिष्ट
विभाग (अर्थात् क्रिया के आश्रयीभूत एक अवयव का दूसरे अवयव के साथ विभाग)
का उत्पादक नहीं हो सकता। (किन्तु उक्त क्रिया) अपने आश्रय के संयोग से युक्त
अवयव के साथ तो विभाग को अवश्य ही उत्पन्न करती है; क्योंकि इसमें कोई विरोध
नहीं है। दो तन्तुओं से बने हुए पट के कारणीभूत एक तन्तु में उत्पन्न हुई क्रिया,
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८९
प्रशस्तपादभाष्यम्
तन्त्वंशवन्तरविभागाद्विभाग इत्यदोषः। आश्रयविनाशात् तन्त्वोरेव विभागो
विनष्टो न तन्त्वंशवन्तरविभाग इति। एतस्मादुत्तरो विभागो जायते, अङ्गुल्या-
काशविभागाच्छरीराकाशविभागवत्, तस्मिन्नेव काले कर्म संयोगं कृत्वा
विनश्यतीत्यदोषः।
(उ.) (आश्रय के विनाश से विभागनाश के प्रसङ्ग में जो उत्तर
विभाग की अनुत्पत्ति का अतिप्रसङ्ग दिया गया है, उसका यह समाधान
है कि) उत्तर विभाग आकाशादि देशों के साथ तन्तु के (विभागज)
विभाग एवं तन्तु और तन्तु के अनारम्भक दूसरे अंशु, इन दोनों के
विभाग से उत्पन्न होता है, अतः (प्रकृत में उक्त विभागानुत्पत्ति रूप)
दोष नहीं है; क्योंकि आश्रय के विनाश से दोनों तन्तुओं का विभाग ही
नष्ट होता है, इससे तन्तु और (उसके अनुत्पादक) दूसरे तन्तु, इन
दोनों के विभाग का नाश नहीं होता। इसी विभाग से आकाशादि देशों
के साथ तन्तु के इस उत्तर विभाग की उत्पत्ति होती है, जैसे कि अङ्गुलि
और आकाश के विभाग से शरीर और आकाश के विभाग की उत्पत्ति
होती है। उसी समय क्रिया उत्तर (देश) संयोग को उत्पन्न कर स्वयं भी
विनष्ट हो जाती है। इस प्रकार अनित्य द्रव्यों की क्रिया में चिर-
स्थायित्व और परमाणुओं में रहनेवाली क्रियाओं में नित्यत्व रूप दोनों
दोषों का निराकरण हो जाता है।
न्यायकन्दली
तन्तौ कर्मोत्पन्नं तन्त्वन्तराद् विभागसमकालं तदंशुनापि तन्तुसंयुक्तेन समं विभागमार-
भते। स च विभागस्तन्तोरंशोश्चावस्थानादवस्थित इत्याह-आश्रयविनाशात् तन्त्वोरेव
विभागो विनष्टः, तन्त्वंशवन्तरविभागस्त्ववस्थित इति।
किम्तो यद्येवमित्यत आह-एतस्मादिति । अङ्गुल्याकाश-
विभागाच्छरीराकाशविभागवत् । यथा कर्मजादङ्गुल्याकाशविभागाच्छरीरा-
दूसरे तन्तु के साथ विभाग की उत्पत्ति के समय ही तन्तु के साथ संयुक्त अंशु के
साथ भी विभाग को उत्पन्न करती है। यह विभाग (अपने आश्रय) तन्तु और
अंशु के विद्यमान रहने के कारण रहता ही है। यही बात 'आश्रयविनाशात्त-
न्त्वोरेव विभागो विनष्टः' इत्यादि सन्दर्भ से कहा गया है। अर्थात् आश्रय के
विनाश से दोनों तन्तुओं के विभाग का ही विनाश होता है, तन्तु और दूसरे अंशु
का विभाग तो रहता ही है।
अगर ऐसी बात है तो इससे प्रकृत में क्या? इसी प्रश्न का समाधान 'एतस्मात्'
इत्यादि से दिया गया है। 'अङ्गुल्याकाशविभागाच्छरीराकाशविभागवत्' इस उदाहरण
वाक्य का यह तात्पर्य है कि जैसे अंगुलि और आकाश के विभाग से शरीर और
३१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अथवा अंश्वन्तरविभागोत्पत्तिकालं तस्मिन्नेव तन्तौ
कर्मोत्पद्यते, ततोऽश्वन्तरविभागात् तन्त्वारम्भकसंयोगविनाशः, तन्तु-
अथवा (इस प्रकार से भी आश्रय के विनाश से विभाग का विनाश
हो सकता है) जिस समय (तन्तु के उत्पादक एक अंशु का) दूसरे अंशु
के साथ विभाग उत्पन्न होता है, उसी समय (उन्हीं अंशुओं से आरब्ध)
उसी तन्तु में क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद एक अंशु का दूसरे अंशु
के विभाग से तन्तु के उत्पादक (दोनों अंशुओं के) संयोग का विनाश होता है
न्यायकन्दली
काशविभागः, एवं कर्मजादंशुतन्तुविभागात् तन्त्वाकाशविभाग इत्युदाहरणार्थः ।
हस्ताकाशविभागाच्छरीराकाशविभागो युक्तो न त्वङ्गुल्याकाशविभागात् । अङ्गुलेः शरीरं
प्रत्यकारणत्वादिति चेत् ? हस्तोऽपि बाहोराश्रयो न शरीरस्य, कुतस्तद्विभागादपि
शरीरविभागादपि शरीरविभागः । अथ समस्तावयवव्यापित्वाच्छरीरस्य हस्तोऽप्याश्रयः,
एवमङ्गुल्यप्याश्रयो हस्ताङ्गुल्याद्यवयवसमुदाये शरीरप्रत्यभिज्ञानात् । तस्मिंस्तन्त्वाकाशविभागे
जाते पूर्वसंयोगस्य प्रतिबन्धकस्य निवृत्तौ तन्तुसमवेतं कर्मोत्तरसंयोगं कृत्या ततो विनश्य-
तीत्याह-तस्मिन्निति ।
प्रकारान्तरेणाप्याश्रयविनाशाद् विनाशं कथयति-अथवेति । अंश्वन्तर-
विभागोत्पत्तिकालं तस्मिन्नेव तन्तौ विभज्यमानावयवे कर्मोत्पद्यते,
आकाश का विभाग उत्पन्न होता है, उसी प्रकार क्रियाजनित अंशु और तन्तु के
विभाग से तन्तु और आकाश का विभाग भी उत्पन्न होता है । (प्र.) शरीर और
आकाश का विभाग तो हाथ और आकाश के विभाग से होना चाहिए, अंगुलि
और आकाश के विभाग से नहीं; क्योंकि अंगुलि शरीर का कारण नहीं है ।
(उ.) हाथ भी तो बाँह का आश्रय (अवयव) है, शरीर का नहीं, तो फिर हाथ
और आकाश के विभाग से ही शरीर और आकाश का विभाग कैसे उत्पन्न
होगा ? अगर शरीर सभी अवयवों में व्याप्त है, तो फिर हाथ की तरह अंगुलि
भी शरीर का आश्रय है ही; क्योंकि हाथ, अंगुलि प्रभृति सभी समुदायों में शरीर
की प्रत्यभिज्ञा होती है । 'तस्मिन्' इत्यादि वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि
तन्तु और आकाश के विभाग की उत्पत्ति हो जाने के बाद, प्रतिबन्धकीभूत
पूर्वसंयोग के विनष्ट हो जाने पर, तन्तु में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली क्रिया
उत्तर संयोग को उत्पन्न कर स्वयं भी विनष्ट हो जाती है ।
'अथवा' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा आश्रय के नाश से विभागनाश की दूसरी रीति
दिखलायी गई है । जहाँ दूसरे अंशु में विभाग की उत्पत्ति के समय ही विभक्त अवयव
रूप उसी (अंशु विभाग के आश्रय) तन्तु में क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद विभाग