सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४१५

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४१५
न्यायकन्दली
तत्रेति । तयोर्विद्याऽविद्ययोर्मध्ये अविद्या चतुर्विधा चतुष्प्रकारा संशयविपर्ययानध्य-
वसायस्वप्नलक्षणा ।
नन्वविद्या चतुर्विधेति परिसंख्यानानुपपत्तिः, रूढस्य तर्कज्ञानस्यापि सम्भवात् ।
अनुभूयते ह्यन्तरा संशयं निर्णयं च तर्कः । तथा हि-उत्पत्तिधर्मक आत्मेत्येके ।
अनुत्पत्तिधर्मक इत्यपरे । ततो विप्रतिपत्तेः किंस्विदयमुत्पत्तिधर्मा आहोस्विदेवं न भवतीति
संशये विचारात्मकस्तर्कः प्रवर्तते । यद्ययमुत्पत्तिधर्मकः, तदैकस्यानेकशरीरादिसंयोग-
लक्षणः संसारस्तदत्यन्तविमोक्षलक्षणश्चापवर्गो नोपपद्यते । अनुत्पत्तिधर्मके तु ज्ञातरि
स्यातां संसारापवर्गावित्यनुत्पत्तिधर्मकेणानेन भवितव्यमिति ।
किमस्य सम्भावनाप्रत्ययस्य प्रयोजनम् ? तत्त्वज्ञानमेव, प्रतिपक्षनिश्चयवत् प्रतिपक्ष-
संशयेऽपि हि हेतोरप्रवृत्तिरेव, वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् । यथाहर्भट्टमिश्राः-
यावद्व्यतिरेकित्वं शतांशेनापि शङ्क्यते ।
विपक्षस्य कुतस्तावद्धेतोर्गमनिकाबलम् ॥ इति ।
के मानने में) कोई दोष नहीं है । 'तस्याः' इत्यादि से कहते हैं कि विषयों के भेद
से बुद्धियों के असंख्य भेद होने पर भी संक्षेपतः उसके दो ही प्रकार हैं । सन्देह
से भिन्न वह निश्चयात्मक ज्ञान ही 'विद्या' है, जिसके विषय बाधित न हों । यहाँ
जिस किसी प्रकार से विषयों का प्रतिपादन ही इष्ट है, अतः पीछे कही गयी
अविद्या का भी 'तत्र' इत्यादि से पहिले ही निरूपण करते हैं । 'तयोः' अर्थात्
विद्या और अविद्या इन दोनों में अविद्या 'चतुर्विधा' अर्थात् (१) संशय
(२) विपर्यय (३) अनध्यवसाय और (४) स्वप्न भेद से चार प्रकार की है ।
(प्र.) 'अविद्या चार ही प्रकार है' संख्या का यह नियम ठीक नहीं है; क्योंकि
अविद्या के अन्तर्गत इनसे भिन्न तर्क रूप पाँचवें ज्ञान की भी सम्भावना है ।
क्योंकि संशय और विपर्यय के मध्यवर्ती तर्क का भी अनुभव होता है । जैसे कि
कोई कहता है कि आत्मा की उत्पत्ति होती है । दूसरे उसे अनुत्पत्तिशील कहते
हैं । इस विप्रतिपत्ति से यह संशय होता है कि 'आत्मा उत्पत्तिशील है या नहीं ?'
इस संशय के बाद यह विचार रूप तर्क उपस्थित होता है कि अगर आत्मा
उत्पत्तिशील वस्तु हो, तो फिर अनेक शरीरों के साथ इसका सम्बन्ध रूप संसार
और उस सम्बन्ध के अत्यन्त विनाश रूप अपवर्ग ये दोनों ही अनुपपन्न होंगे । यदि
इसे अनुत्पत्तिधर्मक मान लेते हैं, तो फिर कथित संसार और अपवर्ग दोनों ही
उपपन्न हो जाते हैं । अतः इसे अनुत्पत्तिधर्मक ही होना चाहिए ।

४१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे बुद्धि-
न्यायकन्दली
अनेन तृत्पत्तिधर्मकत्वं व्युदस्यानुत्पत्तिधर्मकत्वं सम्भावयिताविषये विवेचिते सत्य-
सत्प्रतिपक्षत्यादनुमानं प्रवर्तते इति विषयविवेचनद्वारेण प्रमाणानुग्राहकतया तर्कस्तत्त्व-
ज्ञानाय घटते, प्रमाणस्य करणत्वेनेतिकर्तव्यतास्थानीयतर्कसहायस्यैव स्वकार्ये पर्यवसानात् ।
न ह्यनपेक्षितदृढमुष्टिनिपीडितो जाल्मकरपञ्जरोदरे विलुठन्नपि कठोरधारः कुठारः प्रतिति-
ष्ठति निष्ठुरस्यापि काष्ठस्य छेदाय । तथा चोक्तम्-
नहि तत्करणं लोके वेदे वा किञ्चिदीदृशम् ।
इतिकर्तव्यतासाध्ये यस्य नानुग्रहेऽर्थिता ॥ इति ।
यदि पुनरेवं तर्को नेष्यते परस्यानिष्टापादनरूपः प्रसङ्गोऽपि नाभ्युपगन्तव्यः स्यात् ?
स हि तर्कादनतिरिक्तयमानात्मा, अस्ति च वैशेषिकाणामपि प्रसङ्गः, प्रसङ्गो हेतुरा-
श्रयासिद्धतादिदोषात् ।
(प्र.) इस 'सम्भावना प्रत्यय' रूप तर्क का प्रयोजन क्या है? (उ.) तत्त्व का
ज्ञान ही इसका भी प्रयोजन है । क्योंकि प्रतिपक्ष (बाध) निश्चय की तरह प्रतिपक्ष
संशय के रहने पर भी हेतु की प्रवृत्ति नहीं होती है । क्योंकि कोई भी वस्तु
(परस्पर विरुद्ध) दो रूपों का नहीं होता । जैसा कि भट्टमिश्र ने कहा है कि 'जब
तक विपक्ष में अव्यतिरेकित्व अर्थात् बाधाभाव का संशय (भी) रहेगा, तब तक
हेतु में साध्य की सिद्धि करने का सामर्थ्य कहाँ से आएगा ?' इस प्रकार आत्मा
से उत्पत्तिधर्मकत्व को हटा कर विषय के विवेचित होने पर सत्प्रतिपक्ष दोष के हट
जाने के कारण सम्भावयिता (तर्क करनेवाला पुरुष) अनुमान में प्रवृत्त होता है ।
इस रीति से विषय-विवेचन के द्वारा प्रमाण का सहायक होने के कारण तर्क भी
तत्त्वज्ञान का सम्पादक होता है । प्रमाण करण रूप है । 'इतिकर्त्तव्यता' (करण से
कार्य सम्पादन की रीति) के साहाय्य के बिना कोई करण अपना कार्य नहीं कर
सकता । प्रमाण रूप करण का तर्क ही 'इतिकर्त्तव्यता' की जगह है । अतः इसके
साहाय्य से ही प्रमाण अपने कार्य में सफल हो सकता है । कैसी ही तीखे धार की
कुल्हाड़ी हो, उसको पकड़नेवाला चाहे जितना बलवान् हो, यदि वह गलत ढंग से
उसको पकड़ता है, तो फिर उससे कठोर काठ का छेदन नहीं हो सकता, (अतः
इतिकर्त्तव्यता का साहाय्य आवश्यक है) । जैसा कहा भी गया है कि लौकिक
(कुठारादि) या वैदिक (यागादि) कोई भी ऐसा करण नहीं है, जिसे अपने कार्य
के सम्पादन में इतिकर्त्तव्यता के साहाय्य की अपेक्षा न हो । इस प्रकार तत्त्वज्ञान
के लिए उपयोगी तर्क को यदि स्वीकार नहीं करेंगे, तो फिर (प्रसङ्ग) को भी
मानना सम्भव नहीं होगा, क्योंकि वह भी प्रतिपक्षी के अनभीष्ट पक्ष का
उपस्थापन स्वरूप ही है । इस प्रकार तर्क से प्रसङ्ग में कोई अन्तर नहीं है । किन्तु
वैशेषिक लोग भी प्रसङ्ग की सत्ता मानते ही हैं ।