वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५१९
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५१९
प्रशस्तपादभाष्यम्
श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः, "तद्वचनादाम्नायस्य
श्रुति एवं स्मृति रूप शब्द प्रमाणों का भी प्रामाण्य उनके वक्ताओं के प्रामाण्य
के ही अधीन है। यही बात "तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्", "लिङ्गाच्चानित्या
न्यायकन्दली
ननु यदि वक्तृद्वारेण शब्दोऽर्थावबोधकः, तदा वेदवाक्यादर्थप्रत्ययो न घटते,
वक्तुरभावादत आह- श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्ष इति । न केवलं
लौकिक आम्नायः, श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तुः प्रामाण्यमपेक्ष्य प्रत्यायकः । शब्दो
वक्तृधीनदोषः, न त्वयम सुरभिगन्धवत् स्वभावत एव दुष्टः । यथोक्तम्-
शब्दे कारणवर्णादिदोषा वक्तृनराश्रयाः ।
नहि स्वभावतः शब्दो दुष्टोऽसुरभिगन्धवत् ॥
नित्यत्वे वेदस्य वक्तुरभावाद् दोषाणामनवकाशे सति निराशङ्कं प्रामाण्यं
सिद्धयति, पौरुषेयत्वे तु निर्विचिकित्सं प्रामाण्यं न लभ्यते, कदाचित् पुरुषाणां
रागद्वेषादिभिरयथार्थस्यापि वाक्यस्य दर्शनात् । तत्राह- "तद्वचनादाम्नायस्य
प्रामाण्यम्" इति । तदित्यनागतावेक्षणन्यायेन "अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः" इति
(प्र.) यदि वक्ता की विवक्षा के द्वारा ही शब्द अर्थ का बोधक है, तो फिर
वेद-वाक्यों से अर्थों का बोध न हो सकेगा; क्योंकि वेदों का कोई वक्ता नहीं है ।
इसी प्रश्न के समाधान के लिए "श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः"
भाष्य का यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् केवल लौकिक 'आम्नाय' के द्वारा
प्रमाबोध के उत्पादन के लिए ही वक्ता के प्रामाण्य की अपेक्षा नहीं है; किन्तु श्रुति
एवं स्मृति रूप आम्नाय (शब्द) भी अपने द्वारा प्रमात्मक बोध के उत्पादन के लिए
वक्ता के प्रामाण्य की अपेक्षा रखते हैं; क्योंकि शब्द दुर्गन्ध की तरह स्वतः ही
दुष्ट नहीं है । उसमें तो वक्ता के दोष से ही दोष आते हैं । जैसा कहा गया है कि
'शब्द में कारणों के द्वारा वर्णों के जितने भी दोष भासित होते हैं, वे सभी
वस्तुतः वक्ता पुरुष में रहनेवाले दोषों के कारण ही आते हैं । दुर्गन्ध की तरह
शब्द स्वभावतः स्वयं दुष्ट नहीं हैं'।
(प्र.) वेदों को यदि नित्य मान लिया जाता है तो फिर उनमें निःशङ्क प्रामाण्य की
सिद्धि होती है । यदि उन्हें पौरुषेय मानते हैं तो यह शङ्का बनी ही रहती है कि
'कदाचित् इसका कोई अंश अप्रमाण न हो'; क्योंकि कभी-कभी ऐसा देखा जाता
है कि रागद्वेष के कारण मनुष्य अयथार्थ (बोधजनक) वाक्य का भी प्रयोग करता
है । इसी प्रश्न का उत्तर 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' इत्यादि सूत्रों का उल्लेख करते
हुए भाष्यकार ने दिया है । 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' इस सूत्र में 'तत्' शब्द से
'आनेवाले भविष्यवस्तु को भी बुद्धि के द्वारा देखा जा सकता है' (अनागतावेक्षण) इस
५२० न्यायकन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे शब्दान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
सूत्रे प्रतिपादितस्यास्मद्विशिष्टस्य वक्तुः परामर्शः, तद्वचनात् तेन विशिष्टेन पुरुषेण
प्रणयनादाम्नायस्य वेदस्य प्रामाण्यम् ।
अयमभिसन्धिः - दोषाभावप्रयुक्तं प्रामाण्यं न नित्यत्व प्रयुक्तम्, सत्यपि नित्यत्वे
श्रोत्रमनसोरागन्तुकदोषैः क्वचिदप्रामाण्यात् । असत्यपि नित्यत्वे प्रमृष्टदोषाणां
चक्षुरादीनां प्रामाण्यात् । दोषाश्च पुरुषविशेषे नैव सन्तीत्युपपादितम् । तेनैतद्वोक्तस्याम्नायस्य
सत्यपि पौरुषेयत्वे प्रमाण्यम् । न हि यथार्थद्रष्टा प्रक्षीणरागद्वेषः कृपावानुपदेशाय
प्रवृत्तोऽयथार्थ- मुपदिशतीति शङ्कामारोहति ।
अथ पुरुषविशेषप्रणीतो वेद इति कुत एषा प्रतीतिरिति ? सर्वैवर्णश्रमिभि-
रविगानेन तदर्थपरिग्रहात् । यत्किञ्चनपुरुषप्रणीतत्वे तु वेदस्य बुद्धादि-
वाक्यवन्न सर्वेषां परीक्षकाणामविगानेन तदर्थानुष्ठानं स्यात्, कस्यचिद-
न्याय से आगे 'अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः' इस सूत्र में कथित अस्मदादि साधारण
जनों से उत्कृष्ट पुरुष का परामर्श अभिप्रेत है । 'तद्वचनात्' उस विशिष्ट पुरुष के
द्वारा निर्मित होने के कारण ही 'आम्नाय' में अर्थात् वेद में प्रामाण्य है ।
गूढ़ अभिप्राय यह है कि किसी भी प्रमाण में प्रामाण्य के लिए उसका नित्य
होना आवश्यक नहीं है। उसमें दोषों का न रहना ही उसके प्रामाण्य के लिए
पर्याप्त है; क्योंकि श्रोत्रेन्द्रिय और मन ये दोनों ही नित्य हैं (पौरुषेय नहीं हैं); किन्तु
किसी कारण से जब इनमें दोष आ जाते हैं तो फिर (ये नित्य होते हुए भी)
अप्रमाण हो जाते हैं । इसी प्रकार चक्षुरादि इन्द्रियाँ यद्यपि अनित्य हैं फिर भी जब
तक दोषों से शून्य रहती हैं तब तक उनमें प्रामाण्य बना रहता है । अतः विशिष्ट
पुरुष (रूप ईश्वर) के द्वारा रचित आम्नाय में उसके पौरुषेय होने पर भी प्रामाण्य के
रहने में कोई बाधा नहीं है । इसकी तो शङ्का भी नहीं की जा सकती कि यथार्थ
ज्ञान से युक्त और रागद्वेष से रहित कृपाशील महापुरुष जब उपदेश करने के लिए
उद्यत होंगे तो वे अयथार्थ (ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले) वाक्यों का भी कभी प्रयोग
करेंगे ।
(प्र.) यह कैसे समझते हैं कि विशिष्ट (सर्वज्ञ) पुरुष के द्वारा ही वेदों का
निर्माण हुआ है ? (उ.) चूँकि ब्राह्मणादि सभी वर्णों के लोग एवं ब्रह्मचर्यादि सभी
आश्रमों के लोग बिना किसी विरोध के वेदों के द्वारा प्रतिपादित निर्देशों का पालन
करते हैं । यदि किसी साधारण पुरुष से वेदों का निर्माण हुआ होता तो
बुद्धिपूर्वक चलनेवाले इतने शिष्ट जनों के द्वारा वेदों के द्वारा कथित अर्थों का
बिना विरोध के अनुष्ठान होता, जैसे कि बुद्धादि के वाक्यों का अनुसरण कुछ ही
व्यक्तियों के द्वारा हुआ और वह भी बहुत विरोध के बाद । वेदों को बुद्धादि
वाक्यों की तरह अप्रामाणिक मानने पर वर्णाश्रमियों में से भी
किसी को अप्रामाण्य ज्ञान के द्वारा वेदों से अप्रमा ज्ञान भी होता ।
(इससे यह अनुमान होता है कि) जिसमें सभी का प्रामाण्य
होता है, वह प्रमाण ही होता है (अप्रमाण नहीं), जैसे कि प्रत्यक्षादि