वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३५
न्यायकन्दली
यत्रार्थोऽन्यथानुपपद्यमानोऽर्थान्तरं गमयति, सा दृष्टार्थापत्तिः । यथा जीवति चैत्रे
गृहे नास्तीत्यत्राभावप्रमाणे गृहे चैत्रस्याभावः प्रतीतो जीवतीति श्रुतेश्च तत्र सम्भवोऽपि
प्रतीयते, जीवतो गृहावस्थानोपलम्भात् । न नैकस्य युगपदेकत्र भावाभावसम्भवः, तयोः
सहावस्थानविरोधात् । तदयमभावः प्रतीयमानो जीवतीति श्रवणान्नोपपद्यते, यद्ययं बहिर्न
भवतीति । अनुपपद्यमानश्च यस्मिन् सति उपपद्यते तत्कल्पयति । जीवतो गृहाभावोऽ-
ऽन्यथा नोपपद्यते । यद्ययं बहिर्न भवतीति जीवतीत्यनेन सह विरोध एव तस्यानुपपत्तिः ।
सा चैत्रस्य बहिर्भावे प्रतीते निवर्तते । चैत्रो जीवति गृहे च नास्ति बहिःसद्भावादिति
सावकाशनिरवकाशयोः प्रमाणयोर्विरोधे सति निरवकाशस्यानुपपत्तिमुखेन सावकाशस्य
विषयान्तरोपपादनात् तयोर्विरोधसाधनमर्थापत्तिः । या पुनर्देशादिनियतस्य सम्बन्धिनो
दर्शनात् सम्बन्धस्मरणद्वारेण सम्बन्ध्यन्तरप्रतीतिः सानुमानमित्यनयोर्भेदो ज्ञानोदय-
प्रकारभेदात् ।
जहाँ प्रकृत अर्थ अनुपपन्न होकर दूसरे अर्थ का ज्ञापक होता है वहाँ
'दृष्टार्थापत्ति' समझनी चाहिए । जैसे 'जीवति चैत्रो गृहे नास्ति' (चैत्र जीते हैं
किन्तु घर में नहीं हैं) इस स्थल में जीवित रहने के कारण चैत्र के घर में रहने
की सम्भावना की भी प्रतीति होती है; क्योंकि जीवित व्यक्ति घर में भी देखे जाते
हैं । एवं अनुपलब्धि रूप अभाव प्रमाण से घर में चैत्र का अभाव भी निश्चित
है; किन्तु एक ही समय चैत्र का घर में रहना और न रहना दोनों सम्भव नहीं है;
क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय सत्ता और असत्ता दोनों का रहना परस्पर
विरोध के कारण सम्भव नहीं है । अतः अभाव प्रमाण के द्वारा चैत्र के घर में न
रहने की जो प्रतीति होती है, वह तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि
चैत्र का घर से बाहर रहना निश्चित न हो । जिसकी अनुपपत्ति होती है, वह
ऐसी ही किसी वस्तु की कल्पना करता है, जिससे कि उसकी उपपत्ति हो सके ।
जीते हुए का घर में न रहना अन्याथानुपपन्न है, अर्थात् यदि वह बाहर नहीं रहता
है तो ठीक नहीं बैठता । 'जीवति' के साथ 'गृहे नास्ति' का यह 'विरोध' ही
उसकी 'अनुपपत्ति' है । यह अनुपपत्ति तब हटती है जब कि चैत्र के इस प्रकार
से बाहर रहने की प्रतीति होती है कि 'चैत्र घर में नहीं रहने पर भी बाहर है;
क्योंकि वह जीवित है' (इससे अर्थापत्ति का यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ कि) एक
सावकाश प्रमाण के साथ दूसरे निरवकाश प्रमाण का विरोध उपस्थित होने पर
निरवकाश प्रमाण की अनुपपत्ति के प्रदर्शन के द्वारा सावकाश प्रमाण को दूसरे
विषय का ज्ञापक मानकर उक्त दोनों प्रमाणों में अविरोध का सम्पादन ही
'अर्थापत्ति' है । एक देश या एक काल में नियमित रूप से रहनेवाले दो सम्बन्धियों
में से एक को देखने से उनके (नियम या व्याप्ति रूप) सम्बन्ध की स्मृति के द्वारा
जो दूसरे सम्बन्धी की प्रतीति होती है, वही अनुमान (या अनुमिति) है । इस
प्रकार चूँकि अनुमान और अर्थापत्ति इन दोनों प्रमाणों से ज्ञान की उत्पत्ति की
५३६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव-
न्यायकन्दली
यथोक्तम्-
अन्वयाधीनजन्मत्वमनुमाने व्यवस्थितम् ।
अर्थापत्तिरियं त्वन्या व्यतिरेकप्रवर्तिनी ॥ इति ।
श्रुतार्थापत्तिरपि यत्रानुपपद्यमानः शब्दः शब्दान्तरं कल्पयति, यथा 'पीनो दिवा न
भुङ्क्ते' इति वाक्याद् रात्रौ भुङ्क्त इति वाक्यैकदेशकल्पना ।
तत्र दृष्टार्थापत्तिं तावदनुमानेऽन्तर्भावयति-दर्शनार्थार्थापत्तिर्विरोध्येवेति । दृश्यत
इति दर्शनम्, दर्शनं च तदर्थश्चेति दर्शनार्थः, पञ्चभिः प्रमाणैरवगतोऽर्थः । तस्माद्
दर्शनार्थादर्थान्तरस्यापत्तिरर्थान्तरस्यावगतिर्विरोध्येव, विरोध्यनुमानमेव । यस्य यथा
नियमस्तस्य तथैव लिङ्गत्वम्, इह तु प्रमाणान्तरविरुद्ध एवार्थोऽर्थान्तराविनाभूत इति
विरोध्येव लिङ्गम् ।
अयमभिप्रायः-गृहाभावो यद्यनुपपत्तिमात्रेण बहिर्भावं कल्पयति,
नियमहेतोरभावाद् अर्थान्तरमपि कल्पयेत् । स्वोपपत्तये गृहाभावोऽर्थान्तरं
रीतियाँ भिन्न हैं, अतः ये दोनों दो भिन्न प्रमाण हैं । (अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञान की
उत्पत्ति की रीति दिखलायी जा चुकी है) जैसा कहा गया है कि-
यह निश्चित है कि अन्वय (व्याप्ति) के द्वारा अनुमान प्रमाण अपने फल रूप
ज्ञान का उत्पादन करता है, अतः व्यतिरेक (व्याप्ति) के द्वारा अपने ज्ञान को
उत्पन्न करनेवाला अर्थापत्ति प्रमाण अनुमान से भिन्न है ।
जहाँ शब्द अनुपपन्न होकर दूसरे शब्द की कल्पना करता है, वहाँ 'श्रुतार्था-
पत्ति' समझनी चाहिए । जैसे कि 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' (यह मोटा तो है, किन्तु
दिन में भोजन नहीं करता है) इस वाक्य के द्वारा 'रात्रौ भुङ्क्ते' (तो फिर रात
में खाता है) इस वाक्यखण्ड का कल्पक होता है ।
'दर्शनार्थार्थापत्तिर्विरोध्येव' इस वाक्य के द्वारा कथित 'दृष्टार्थापत्ति' अनुमान में
अन्तर्भाव दिखलाते हैं । इस भाष्य में प्रयुक्त 'दर्शनार्थ' शब्द की अभीष्ट व्युत्पत्ति
इस प्रकार है, "दृश्यत इति दर्शनम्, दर्शनञ्च तदर्थश्च दर्शनार्थः" तदनुसार प्रत्यक्ष,
अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि (अभाव) इन पाँच प्रमाणों में से किसी
के द्वारा निश्चित अर्थ ही उक्त 'दर्शनार्थ' शब्द से अभिप्रेत है । इस 'दर्शनार्थ'
अर्थात् कथित पाँच प्रमाणों में से किसी के द्वारा अवगत अर्थ से जो दूसरे अर्थ
की 'आपत्ति' अवगति होती है, वह 'विरोधी' ही अर्थात् विरोधी अनुमान ही है ।
हेतु में साध्य का जिस प्रकार का नियम रहेगा, उसी प्रकार से हेतु में साध्य की
ज्ञापकता (हेतुता) भी होगी । यहाँ (अर्थापत्ति स्थल में) दूसरे प्रमाण से विरुद्ध
अर्थ ही दूसरे अर्थ की व्याप्ति से युक्त है । अतः यहाँ विरोधी ही हेतु है ।
कहने का अभिप्राय यह है कि चैत्र का घर में न रहना (गृहाभाव) यदि केवल
अपनी अनुपपत्ति से ही उसके बहिर्भाव (बाहर रहने) की कल्पना करे तो फिर वह
तुल्ययुक्ति से दूसरे की भी कल्पना कर सकता है; क्योंकि ऐसे नियम का कोई कारण
नहीं है कि वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करे और किसी की नहीं ।