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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३४३

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३४३
न्यायकन्दली
यदेतेषु सम्भूय व्याप्रियमाणेष्वसन्नेव पटः सम्भवति । असतोऽसम्बद्धस्य जन्यत्वेऽति-
प्रसक्तिरिति चेन्नैतत्, तन्तुजातीयस्य पटजातीय एव सामर्थ्यात् । कुत एतत् ? त्वत्पक्षेऽपि
कुत एतत् ? तन्तुष्वेव पटात्मता, न सर्वत्रेति ? वस्तुस्वभावादिति चेत् ? सैवात्रापि
भविष्यति । अत एव चोपादाननियमः, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां तज्जातीयनियमने तज्जा-
तीयस्य शक्त्यवधारणात् । यत् पुनरेतत् कार्यकारणयोरव्यतिरेकात् कारणावस्थानादेव
कार्यस्याप्यवस्थानमिति, तदसिद्धमसिद्धेन साधितम्, कार्यकारणयोः स्वरूपशक्तिसंस्थान-
भेदस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । प्रधानात्मकविश्वस्यातीन्द्रियत्वप्रसङ्गाच्च । तद्देशत्वं तु
तदाश्रितत्वमात्रनिबन्धनमेवेत्यलं बुद्धेस्थितिनिर्बन्धेन ।
एतत् तु विमृश्यतां केयं शक्तिरिति ? अतीन्द्रिया काचिदित्यार्याः ।
तदयुक्तम्, तस्याः सद्भावे प्रमाणाभावात् । अथ मन्यसे यथाभूतादेव
करते हैं, तब पहले से असत् होने पर भी पट सत् हो जाता है । (प्र.) पहले से
बिलकुल असत् एवं कारणों के साथ बिलकुल असम्बद्ध कार्य की अगर उत्पत्ति
मानें तो 'अतिप्रसक्ति' (अर्थात् कपालादि कारणों से भी पट की उत्पत्ति) होगी ।
(उ.) (यह अतिप्रसङ्ग) नहीं होगा; क्योंकि तन्तुजातीय वस्तुओं में पट जाति की
वस्तुओं के उत्पादन का ही सामर्थ्य है । (प्र.) यही क्यों है ? (उ.) (इसके उत्तर
में हम भी पूछ सकते हैं कि) तन्तु ही पटस्वरूप क्यों हैं (कपालादि पटस्वरूप क्यों
नहीं हैं), अगर इसका आप यह उत्तर दें कि (प्र.) यह इसका स्वभाव है ? (उ.)
तो फिर यही उत्तर मेरे लिए भी होगा । अतएव यह नियम भी ठीक बैठता है
कि 'अमुक वस्तु ही अमुक वस्तु का उपादान है'; क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक
से तज्जातीय (पटादिजातीय) वस्तुओं के उत्पादन की शक्ति तज्जातीय
(तन्त्वादिजातीय) वस्तुओं में ही निश्चित है । आपने जो यह कहा कि 'कार्य और
कारण अभिन्न हैं, अतः कारण अगर सत् हो तो फिर उससे अभिन्न कार्य भी सत्
ही है' यह तो असिद्ध (हेतु) से ही असिद्ध का साधन करना है (कारण और
कार्य का अभेद ही सिद्ध नहीं है); क्योंकि कार्य और कारण दोनों के स्वरूप
(आकार), शक्ति और विन्यास सभी में विभिन्नता देखी जाती है । अगर पूरा
संसार ही प्रकृति से अभिन्न हो तो फिर पूरा संसार ही अतीन्द्रिय होगा । कार्य में
जो उपादान का अन्वय देखा जाता है, उसका मूल तो इतना ही है कि वही कार्य
का आश्रय है (और कारण नहीं) ।
यह विचारिये कि यह 'शक्ति' क्या वस्तु है ? आर्यों (मीमांसकों) का कहना है
कि 'शक्ति एक अतीन्द्रिय स्वतन्त्र पदार्थ है'; किन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं
है; क्योंकि उसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अगर आप (मीमांसक) यह मानते हों

३४४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-
न्यायकन्दली
वन्हेर्दाहोत्पत्तिरवगता तथाभूतादेव मन्त्रौषधिसन्निधाने सति न दृश्यते, यदि दृष्टमेव रूपं
दाहस्य कारणं स्यात् तस्य सम्भवाद् दाहानुत्पादो न स्यात् । अस्ति च तदनुत्पत्तिः,
सेयमदृष्टरूपस्य वैगुण्यं गमयन्ती हुतभुजि शक्तेरतीन्द्रियायाः सत्त्वं कल्पयति,
यस्या मन्त्रादिनाभिभवो विनाशो वा क्रियते । यत्र प्रतीकारवशेन पुनः
कार्योदयस्तत्राभिभवः, यत्र तु सर्वथैवानुत्पत्तिः कार्यस्य तत्र विनाशः । न चैतद्वाच्यम्, न
मन्त्रो वह्निसंयुक्तो नापि तत्समवेतः कथं व्यधिकरणां शक्तिं विनाशयेत्, विनाशयति
चेदतिप्रसङ्गः स्यादिति, तद्देशेन प्राप्तत्वात् । यथैवासम्बद्धोऽप्यभिचारो यमुद्दिश्य क्रियते
तमेव हिनस्ति, न पुरुषान्तरम्, एवं यामेव व्यक्तिमभिसन्धाय मन्त्रः प्रयुज्यते
तस्या एव शक्तिं निरुणद्धि, न सर्वासाम् । नाप्येतदुद्घोषणीयम्-यदि शक्तिर्द्रव्यात्मिका ?
कि (प्र.) जिस प्रकार की वह्नि से दाह देखा जाता है, उस प्रकार की ही वह्नि से
(दाह के प्रतिरोधक) मन्त्र और औषध का सामीप्य रहने पर दाह की उत्पत्ति नहीं
भी होती है, अगर केवल अपने दृष्टस्वरूप से ही वह्नि दाह का कारण हो तो
फिर उस रूप से युक्त वह्नि तो मन्त्रादि संनिहित देशों में भी है ही, अतः उन
स्थानों में दाह के अनुत्पाद का निर्वाह नहीं होगा । दाह की उक्त उत्पत्ति और
अनुत्पत्ति इन दोनों से वह्नि में दाह के प्रयोजक किसी अतीन्द्रिय धर्म की कल्पना
अनिवार्य हो जाती है, जो वह्नि में अतीन्द्रिय शक्ति की कल्पना को उत्पन्न करती
है । जिस (शक्ति) का मन्त्रादि से अभिभव या विनाश होता है, (अर्थात्) जहाँ
फिर से प्रतीकार करने पर दाहादि कार्यों की उत्पत्ति होती है, वहाँ शक्ति के
अभिभव की कल्पना करते हैं और मन्त्रादि प्रयोग के बाद जहाँ दाहादि कार्यों की
उत्पत्ति फिर कभी नहीं होती, वहाँ शक्ति के विनाश की कल्पना करते हैं । एवं
यह भी कहना ठीक नहीं है कि (उ.) वह्नि का मन्त्र के साथ न संयोग
सम्बन्ध है, न समवाय, तो फिर विभिन्न अधिकरणों में रहनेवाली शक्ति
का नाश वह कैसे करेगा ? अगर मन्त्र से व्यधिकरण ही शक्ति का नाश
मानें तो अतिप्रसङ्ग होगा (अर्थात् दाह के प्रतिरोधक मन्त्र से संसार के सभी काम
रुक जाएँगे) । (प्र.) यह आक्षेप ठीक नहीं है; क्योंकि शक्ति को नष्ट करने या
प्रतिरुद्ध करने के उद्देश्य से ही मन्त्र का प्रयोग किया जाता है । जैसे कि
अभिचार (मारण प्रयोग) जिस व्यक्ति को उद्देश्य कर किया जाता है, उस व्यक्ति
के साथ सम्बद्ध न रहने पर भी वह उसी व्यक्ति की हत्या करता है । वैसे ही
जिस व्यक्ति को मन में रखकर मन्त्र प्रयुक्त होता है, उसी व्यक्ति की शक्ति को
वह नष्ट करता है या अभिभूत करता है, सभी व्यक्तियों की शक्ति को नहीं । यह
घोषणा भी न करनी चाहिए कि शक्ति अगर द्रव्यरूप है ? तो फिर अपने
समवायिकारण या असमवायिकारण के नाश से ही नष्ट होगी (मन्त्रादि प्रयोग