वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१
न्यायकन्दली
महत्त्वानेकद्रव्यवत्त्वरूपविशेषाद्यात्मिका व्यवधानेऽपि न निवृत्तैव, आर्जवावस्थानमपि
तदवस्थमेव । अथ मतम्- आवरणाभावोऽप्यर्थप्रतीतिकारणं संयोगाभाव इव पतन-
कर्म्मणि, आवरणे सत्यावरणाभावो निवृत्त इति प्रतीतेरनुत्पत्तिः कारणाभावादिति ।
नैतत्सारम्, आवरणस्य स्पर्शवद्द्रव्यप्राप्तिप्रतिषेधभावोपलब्धेः, छत्रादिकं हि पततो जलस्य
सावित्रस्य च तेजसः प्रतिषेधति, न तु स्वस्याभावमात्रं निवर्त्तयति । तथा सति सुलभ-
मेतदनुमानम्-प्राप्तप्रकाशकं चक्षुः, व्यवहितार्थाप्रकाशकत्वात् प्रदीपवत्, बाह्येन्द्रियत्वात् त्वगि-
न्द्रियवत् । नन्वेवं तर्हि विप्रकृष्टार्थग्रहणं कुतः ? रश्म्यर्थसन्निकर्षादनुद्भूतरूपस्पर्शा नायना
ही हैं। विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता है महत्त्व, अनेकद्रव्यवत्त्वादि, सो दीवाल
से घिर जाने पर भी विषयों से हट नहीं जाती । दीवाल से घिर जाने पर भी वे
इन्द्रियों के सामने ही रहती हैं । (प्र.) जिस प्रकार संयोग का अभाव भी पतन का
कारण है, उसी प्रकार आवरण का अभाव भी प्रत्यक्ष का कारण है । आवरण के
रहते हुए आवरण का अभाव नहीं रह सकता, अतः दीवाल से घिरी हुई वस्तुओं
का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि वहाँ आवरणाभावरूप कारण ही नहीं है । (उ.) आवरण
का इतना ही काम है कि स्पर्श से युक्त द्रव्यों के साथ संयोग न होने दे । जैसे छाता
गिरते हुए पानी या धूप के साथ संयोग को नहीं होने देता । आवरण का इतना
ही काम नहीं है कि अपने अभाव को हटाये । अतः (१) यह अनुमान सुलभ है
कि चक्षु अपने से सम्बद्ध वस्तुओं का ही प्रकाशक है, क्योंकि व्यवहित वस्तुओं का
प्रकाश उससे नहीं होता, जैसे कि प्रदीप । (२) अथवा चक्षुरादि (इन्द्रियाँ) अपने से
सम्बद्ध वस्तुओं के ही प्रकाशक हैं, क्योंकि वे बाह्येन्द्रिय हैं, जैसे कि त्वगिन्द्रिय ।
(प्र.) तो फिर चक्षु से कुछ दूर हटी हुई वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष (क्यों) और कैसे
होता है ? (उ.) चक्षु की रश्मियों के साथ विषयों के संयोग से । 1 अनुद्भूत रूप
और अनुद्भूत स्पर्श से युक्त चक्षु की रश्मियाँ वहाँ विद्यमान वस्तुओं के प्रत्यक्ष को उत्पन्न
- चक्षु की रश्मियाँ दूर की वस्तुओं को ग्रहण करने के लिए अगर उनके देशों तक जाती हैं
तो फिर सूर्य की रश्मियों की तरह उनके रूप और स्पर्श का भी प्रत्यक्ष होना चाहिए,
किन्तु होता नहीं है । अतः "चक्षु की रश्मियाँ दूर जाकर वस्तुओं का ग्रहण करती हैं"
यह कहना ठीक नहीं है । इसी पूर्वपक्ष के समाधान की सूचना देने के लिए कन्दलीकार ने
चक्षु की रश्मियों में अनुद्भूत रूप और अनुद्भूत स्पर्श, ये दो विशेषण लगाये हैं । कहने
का तात्पर्य है कि अगर चक्षु की रश्मियों का विषय देश तक जाना युक्तियों से सिद्ध है
तो फिर उनके रूप और स्पर्श की अनुपलब्धि से वह हट नहीं सकती । उनके
प्रत्यक्षापत्तिवारण का यह उपाय सुलभ है कि रश्मियों के रूप और स्पर्श को अनुद्भूत
मान लेना ।
६२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
न्यायकन्दली
रश्मयो दूरे गत्वा सन्तंमर्थं गृह्णन्ति, अत एव महदणुप्रकाशकत्वात् किमिन्द्रियस्य
भौतिकत्वं न सिद्ध्यति ? प्रदीपस्येव रश्मिद्वारेण तदुपपत्तेः । यत्र च रश्मयो भूयोभिः
स्वावयवैः सहार्थायवयविना तदवयवैश्च सह सम्बद्ध्यन्ते, तत्राशेषविशेषास्कन्दितस्यार्थस्य
ग्रहणात् स्पष्टं ग्रहणम् । यत्र त्ववयवमात्रेण सम्बन्धस्तत्र सामान्यमात्रविशिष्टस्य धर्म्मिणो
ग्रहणादस्पष्टं ग्रहणम् । यद् गच्छति तत् सन्निहितव्यवहितार्थौँ क्रमेण प्राप्नोति । तत् कथं
शाखाचन्द्रमसोस्तुल्यकालोपलब्धिरिति चेत् ? इन्द्रियवृत्तेराशुसञ्चारित्यात् पलाशशतव्यति-
भेदवत् क्रमाग्रहणनिमित्तोऽयं भ्रमो न तु वास्तवं यौगपद्यम् । ननु प्राप्तिपक्षे सान्तरा-
लोऽयमिति ग्रहणं न स्यात् ? न, अन्यथा तदुपपत्तेः । इन्द्रियसम्बन्धस्यातीन्द्रियत्यान्न
तदभावाभावकृतौ सान्तरनिरन्तरप्रत्ययौ, किन्तु शरीरसम्बन्धभावाभावकृतौ, यत्र
शरीरसम्बद्धस्यार्थस्य ग्रहणं तत्र निरन्तरोऽयमिति प्रत्ययः, यत्र तु तदसम्बद्धस्य ग्रहणं तत्र
सान्तर इति ।
करती हैं । इन्द्रियाँ चूँकि छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की वस्तुओं को दिखलाती
हैं, इससे भी उनमें भौतिकत्व की सिद्धि क्यों नहीं होगी ? प्रदीप की तरह रश्मियों
में भी भौतिकता सिद्ध हो सकती है । जहाँ पर रश्मियाँ अपने बहुत से अवयवों
को लेकर अवयवी रूप वस्तु और उनके अवयवों के साथ सम्बद्ध होती हैं, वहाँ
सभी विशेषों से युक्त अवयवी का ज्ञान होता है । अतएव वह ज्ञान 'स्पष्ट ग्रहण'
कहलाता है । जहाँ वे केवल वस्तुओं के किसी अवयव के साथ ही सम्बद्ध होती
हैं, वहाँ सामान्यधर्म से युक्त ही उस धर्मी का ज्ञान होता है, जिसे 'अस्पष्ट
ग्रहण' कहते हैं । (प्र.) गतिशील वस्तु समीप की वस्तुओं के साथ पहले सम्बद्ध
होती है और दूर की वस्तुओं के साथ पीछे, तो फिर गतिशील इन्द्रियों से शाखा
और चन्द्रमा का ग्रहण एक ही समय क्यों होता है ? (उ.) वस्तुतः एक समय में
शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान नहीं होता है । दोनों के ज्ञान क्रमशः ही होते
हैं, किन्तु इन्द्रियाँ इतनी शीघ्रता से चलती हैं कि उनकी गति के क्रम का ज्ञान
नहीं हो पाता । अतएव यह भ्रम होता है कि शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान
एक ही समय होता है । जैसे फूल के सौ पत्रों को सूई से छेदने पर उसका क्रम
उपलब्ध नहीं होता और भ्रम होता है कि एक ही समय में सभी पत्रों का छेदन
हुआ है । (प्र.) 'इन्द्रियाँ अपने से सम्बद्ध वस्तुओं का ही ग्रहण करती हैं' इस पक्ष
में विषय और इन्द्रियों में सार्वजनीन व्यवधान की प्रतीति अनुपपन्न होगी ? (उ.)
नहीं, क्योंकि दूसरी रीति से उसकी उपपत्ति हो सकती है। इन्द्रियों का सम्बन्ध अतीन्द्रिय
है, अतः उसकी सत्ता से व्यवधान की प्रतीति और असत्ता से अव्यवधान की प्रतीति
नहीं हो सकती, किन्तु शरीरसम्बन्ध की सत्ता और असत्ता से ही उक्त दोनों प्रतीतियाँ