वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२९
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्व्यणुकेऽणुत्वमारभते । महत्त्ववत् त्र्यणुकादौ कारणबहुत्वमहत्त्वसमान-
जातीयप्रचयेभ्यो दीर्घत्वस्योत्पत्तिः । अणुत्ववद् द्व्यणुके द्वित्वसंख्यातो ह्रस्वत्व-
स्योत्पत्तिः ।
प्रकार महत्त्व की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार समवायिकारणों में
रहनेवाली संख्या, समवायिकारणों में रहनेवाले महत् (दीर्घ) परिमाण
एवं समवायिकारणों में रहनेवाला समानजातीय प्रचय इन्हीं सबों से
त्र्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में दीर्घत्व की भी उत्पत्ति होती है । द्व्यणुक में
अणुत्व परिमाण की तरह ह्रस्वत्व की भी उत्पत्ति द्व्यणुक के अवयव-
भूत दोनों परमाणुओं में रहनेवाली द्वित्व संख्या से ही होती है ।
न्याय्कन्दली
तमत्त्वप्रसक्तिरिति पूर्विकैव युक्तिरावर्तनीया । अधिकं चैतद् यन्नित्यद्रव्य-
परिमाणस्यानारम्भकत्वम् । परमाणुपरिमाणं न भवति कस्यचिदारम्भकं
नित्यद्रव्यपरिमाणत्वात्, आकाशादिपरिमाणवत्, अणुपरिमाणत्वाद्वा मनःपरिमाणवत् ।
दीर्घत्वस्योत्पत्तिमाह-महत्त्ववदिति । तथा महत्त्वस्य कारणबहुत्वात् समान-
जातीयात् कारणमहत्त्वात् प्रचयाच्चोत्पत्तिरिति सर्वमस्य महत्त्वेन सह
तुल्यम् । द्व्यणुके ह्रस्वत्वस्यापि द्वित्वसंख्यैवासमवायिकारणमित्याह-अणुत्ववदिति ।
कथमेकस्मात् कारणात् कार्यभेदः ? अदृष्टविशेषस्य सहकारिणो भेदात् ।
महत्त्वविशेष एव दीर्घत्वम्, अणुत्वविशेष एव ह्रस्वत्वमिति मन्यमान
परिमाणों से भी अल्प हो जाएगा । इस प्रसङ्ग में इतना और भी कहना चाहिए कि
नित्यपरिमाण कभी कारण नहीं होता है, अतः आकाश परिमाण की तरह नित्य
होने के कारण परमाणुओं के परिमाण किसी के कारण नहीं हो सकते । एवं जिस
प्रकार मन का परिमाण अणु होने से किसी का कारण नहीं होता है, उसी प्रकार
परमाणुओं का परिमाण भी अणु होने से किसी का कारण नहीं हो सकता ।
'महत्त्ववत्' इत्यादि सन्दर्भ से दीर्घत्व परिमाण की उत्पत्ति का क्रम
कहते हैं । जैसे कि महत्परिमाण की उत्पत्ति (उसके आश्रय द्रव्य के उत्पादक
अवयवरूप) कारणों की बहुत्व (संख्या) से और कारणों के महत्त्व और प्रचय
से होती है, ये सभी दीर्घत्व में भी महत्त्व के ही जैसे हैं । द्व्यणुक के
ह्रस्वत्व में भी (उसके अणुत्व की तरह) कारणों में रहनेवाली द्वित्व
संख्या ही कारण है, यही बात 'अणुत्ववत्' इत्यादि से कहते हैं । (प्र.)
(परमाणुओं की) एक ही (द्वित्व संख्यारूप ) कारण से (अणुत्व और
ह्रस्वत्वरूप) दो विभिन्न कार्य कैसे होते हैं ? (उ.) अदृष्ट रूप सहकारि
कारणों के भेद से (उक्त एक कारण से) विभिन्न कार्यों की उत्पत्ति होती है ।
३३० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अथ त्र्यणुकादिषु वर्त्तमानयोर्महत्त्वदीर्घत्वयोः परस्परतः को
विशेषः ? द्व्यणुकेषु चाणुत्वह्रस्वत्वयोरिति । तत्रास्ति महत्त्व-
दीर्घत्वयोः परस्परतो विशेषः, महत्सु दीर्घमानीयताम्, दीर्घेषु
(प्र.) त्र्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में रहनेवाले महत्त्व और दीर्घत्व
एवं द्व्यणुकादि में रहनेवाले अणुत्व और ह्रस्वत्व इनमें क्या
अन्तर है ? (उ.) 'भारी वस्तुओं में से जो लम्बी हो उसे ले
आओ' यह व्यवहार ही प्रकृत में महत्त्व और दीर्घत्व में भेद का
न्यायकन्दली
आह-अथेति । समाधत्ते-तत्रास्तीति । यदि दीर्घमहत्त्वयोरभेदो दीर्घेषु महदानीयतामिति
निर्धारणं न स्यादभेदात् । न हि भवति रूपवत्सु रूपवदानीयतामिति, अस्ति चेदं
निर्धारणम् । तेन दीर्घत्वमहत्त्वयोर्भेदः कल्प्यते, परिमाणस्य व्याप्यवृत्तित्वादेकस्मिन् द्रव्ये
परिमाणद्वयानुपपत्तिरिति चेत्, न, विजातीययोरेकत्र वृत्त्यविरोधात्, अवान्तरजाति-
भेदेऽपि नीलपीतयोरेकत्र समावेशो न दृष्ट इति चेत् ? ययोर्न दृष्टस्तयोर्मा भूत्,
दीर्घत्वमहत्त्वयोस्तु सद्भावः सर्वलोकप्रतीतिसिद्धत्वादशक्यनिराकरणः ।
'अथ' इत्यादि से कोई आक्षेप करते हैं कि (प्र.) दीर्घत्व विशेष प्रकार के महत्त्व से
कोई अलग वस्तु नहीं है । एवं ह्रस्वत्व भी अणुत्व का ही एक विशेष रूप है (दीर्घत्व
और ह्रस्वत्व नाम का कोई अलग परिमाण नहीं है) । 'तत्रास्ति' इत्यादि सन्दर्भ से
इसका उत्तर देते हैं कि अगर महत्त्व और दीर्घत्व दोनों अभिन्न हों तो फिर 'इन
लम्बे द्रव्यों में जो सबसे भारी हो उसे ले आओ' इत्यादि प्रकार के निर्द्धारणों की
उपपत्ति नहीं होगी; क्योंकि दोनों अभिन्न हैं । यह निर्द्धारण नहीं होता कि
'रूपयुक्तों में से रूपयुक्त को ले आओ; किन्तु (पहला) निर्द्धारण होता है, अतः
दीर्घत्व और महत्त्व में अवश्य ही अन्तर है । (प्र.) परिमाण व्याप्यवृत्ति (अपने
आश्रय को व्याप्त करके रहने वाली) वस्तु है, अतः एक द्रव्य में दो (दीर्घत्व और
महत्त्व या ह्रस्वत्व और अणुत्व) परिमाण नहीं रह सकते । (उ.) विभिन्न जाति के
दो (व्याप्यवृत्ति) वस्तुओं का भी एक आश्रय में सत्ता मानने में कोई विरोध नहीं
है । (प्र.) (रूपत्व धर्म के एक होने पर भी) अवान्तर (रूपत्वव्याप्यनीलत्वादि)
रूपों से विभिन्न नील-पीतादि रूप एक आश्रय में नहीं देखे जाते । (उ.)
जिन्हें एकत्र नहीं देखा जाता है उनका एकत्र रहना मत मानिए; किन्तु
इससे साधारण जनों के अनुभव से सिद्ध महत्त्व और दीर्घत्व का एकत्र रहना
आप नहीं रोक सकते ।