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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २९५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २९५
प्रशस्तपादभाष्यम्
युगपदवस्थानं प्रतिषिध्यते । न हि वध्यघातकविरोधे ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्ति-
रविनश्यतोश्च युगपदवस्थानमस्तीति ।
से एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति एवं अगले ही क्षण में
विनष्ट न होनेवाले ज्ञानों की स्थिति खण्डित होती है । वध्यघातक पक्ष
में एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति एवं अविनष्टावस्थावाले अनेक
ज्ञानों की स्थिति नहीं (माननी पड़ती) है ।
न्यायकन्दली
प्रतिषिध्यत इति । वध्यघातकपक्षे च न ज्ञानयोर्युगपदुत्पादोऽस्ति, नाप्यविनश्यतोः
सहावस्थानमेकस्योत्पादे द्वितीयस्य विनश्यद्रूपत्वादित्याह-न हीति । 'इति'शब्दः समाप्तिं
कथयति ।
अयि भोः सर्वमिदमुत्पत्त्यादिनिरूपणं द्वित्वस्यानुपपन्नम्, तत्सद्भावे प्रमा-
णाभावात् । द्वे इति ज्ञानं प्रमाणमिति चेत् ? न, ग्राह्यलक्षणाभावात् । तथा ह्यर्थो
ज्ञानग्राह्यो भवन्नुत्पन्नो भवति, अनुत्पन्नो वा ? उभयथाप्यनुपपत्तिरनुत्पन्नस्या-
सत्त्वात्, उत्पन्नस्य च स्थित्यभावात् । अतीत एवार्थो ज्ञानग्राह्यस्तज्जनकत्वादिति
चेत् ? न, वर्तमानतावभासविरोधादिन्द्रियस्यापि ग्राह्यत्वप्रसङ्गाच्च । ईदृश एवार्थस्य
स्वकारणसामग्रीकृतः स्वभावो येन जनकत्वाविशेषेऽप्ययमेव ग्राह्यो नेन्द्रियादिकम्-
नहीं है, एवं विनाश्यविनाशकभावानापन्न परस्पर निरपेक्ष अनेक ज्ञानों की स्थिति
की भी आपत्ति नहीं है; क्योंकि एक (विनाशक) ज्ञान की उत्पत्ति के समय दूसरे
(विनाश्य) ज्ञान की विनाशावस्था हो जाती है । यही बात 'न हि' इत्यादि से
कहते हैं । इस 'इति' शब्द का अर्थ समाप्ति है ।
(प्र.) द्वित्व की उत्पत्ति या नाश अथवा ज्ञान, इन सबों का निरूपण ही गलत
है; क्योंकि द्वित्वादि संख्याओं की सत्ता ही प्रमाणशून्य है । (उ.) 'द्वे' (यह दो है)
इस आकार का ज्ञान ही द्वित्व संख्या की सत्ता में प्रमाण है । (प्र.) नहीं; क्योंकि
'द्वित्व' ग्राह्यलक्षण (ज्ञान से गृहीत होने योग्य) नहीं है । (उ.) अभिप्राय यह है
कि उत्पन्न वस्तुओं का या अनुत्पन्न वस्तुओं का ही ज्ञान से ग्रहण होगा । इन दोनों
में से किसी भी प्रकार से द्वित्वादिविषयक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती है;
क्योंकि उत्पन्न वस्तुओं की स्थिति रहती है, एवं अनुत्पन्न वस्तुओं का अस्तित्व
ही नहीं होता है (उ.) अतीत वस्तु ही ज्ञान से गृहीत होता है; क्योंकि वही
अर्थज्ञान का कारण है । (प्र.) नहीं; क्योंकि इससे वर्तमानत्व की स्वाभाविक
प्रतीति विरुद्ध हो जाएगी । एवं (ज्ञान के कारण होने से ही अगर ज्ञान से
ग्राह्य भी हो तो फिर) इन्द्रियों के भी (प्रत्यक्ष) ज्ञान की आपत्ति होगी । यह
कहें कि (उ.) वस्तुओं के अपने उत्पादक कारणों से यही स्वभाव प्राप्त

२९६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
तदनन्तरक्षणविषयश्च वर्तमानतावभास इति चेत् ? किं पुनरिदमस्य
ग्राह्यत्वम् ? ज्ञानं प्रति हेतुत्वमिति चेत् ? पुनरपीन्द्रियस्य ग्राह्यत्वमापतितम्,
हेतुत्वमात्रस्य तत्राप्यविशेषात् । ज्ञानस्य स्वसंवेदनमेवान्यस्य ग्राह्यतेति चेत्? अन्यस्य
स्वरूपसंवेदनमन्यस्य ग्राह्यतेत्यतिचित्रमेतत् । न चित्रम्, स्वभावस्यापर्यनुयोज्यत्वात् ।
अर्थावग्रहस्वभावं हि विज्ञानम् । तेनास्य स्वरूपसंवेदनमेवार्थस्य ग्रहणं भवति । यदर्थजं
चेदं तस्यैवायमवग्रहो न सर्वस्येति नातिप्रसक्तिः ? न, एकार्थत्वात् । अर्थजन्यं नाम
ज्ञानस्यार्थादुत्पत्तिः । सा चैका । न च ज्ञानार्थयोर्धर्म इति नार्थं नियमयेत् । अधार्थस्य न
ज्ञानम् अन्यधर्मत्वात्, उभयनियमाच्च तयोः परस्परग्राह्यग्राहकभावव्यवस्था नैकसम्बन्धि-
नियमात् । न चातीतानागतयोरर्थयोर्ज्ञानं प्रत्यस्ति कारणत्वम्, असत्त्वात् । विषयविषयि-
भावनियमाद् ग्राह्यग्राहकभावनियम इति चेत्, न, अभेदात् । ग्राह्यत्वमेव विषयत्वम्,
है कि घटादि और इन्द्रियादि इन दोनों प्रकार की वस्तुओं में ज्ञान की कारणता
समान रूप से रहने पर भी घटादि वस्तुएँ ही ग्राह्य हैं, इन्द्रियादि वस्तुएँ नहीं ।
एवं वस्तु की उत्पत्ति के अव्यवहित आगे के क्षण का ज्ञान ही वस्तु के वर्तमानत्व
का अवभास है । (प्र.) घटादि वस्तुओं में रहनेवाला एवं इन्द्रियादि वस्तुओं में न
रहनेवाला यह 'ग्राह्यत्व' क्या वस्तु है ? अगर (उ.) ज्ञान के प्रति कारणत्व ही
यह ग्राह्यत्व है तो (प्र.) इन्द्रियादि में फिर ग्राह्यत्व की आपत्ति होगी; क्योंकि ज्ञान
का हेतुत्व भर तो इन्द्रियादि में भी समानरूप से है । (उ.) ज्ञान का 'स्वसंवेदन'
ही घटादि वस्तुओं की ग्राह्यता है । (प्र.) यह तो बड़ी विचित्र बात है कि एक
वस्तु के स्वरूप का ज्ञान दूसरे की ग्राह्यता हो । (उ.) नहीं, इसमें कोई विचित्रता
नहीं है; क्योंकि वस्तुओं का स्वभाव अभियोग की सीमा से बाहर है । विज्ञान
अर्थग्रहण स्वरूप ही है, अतः विज्ञान के स्वरूप के संवेदन से ही अर्थ का ग्रहण
होता है । इनमें से जो अर्थ विज्ञान का (विषयविधया) कारण होता है, उस अर्थ
का ग्रहण ही विज्ञान है, सभी अर्थों का ग्रहण विज्ञान नहीं है, अतः इन्द्रियज्ञान
की आपत्ति नहीं है । (प्र.) नहीं; क्योंकि वह एक ही काम कर सकती है । अर्थ
से ज्ञान की उत्पत्ति ही ज्ञान का अर्थजन्यत्व है, अतः वह अर्थ और ज्ञान दोनों
का धर्म नहीं हो सकता (वह ज्ञान का ही धर्म है, अतः) ज्ञानों का ही नियमन कर
सकता है, अर्थों का नहीं। अगर अर्थ का धर्म है तो फिर ज्ञानों का ही नियमन
नहीं कर सकता; क्योंकि वह दूसरे का धर्म है । दोनों के नियम से ही 'ग्राह्य-ग्राहक
व्यवस्था' की, अर्थात् घटविषयक ज्ञान का ग्राह्य घट ही है, घटजन्य ही घटज्ञान है ।
इस व्यवस्था की उपपत्ति हो सकती है, किसी एक के नियम से नहीं । एवं भूत
और भविष्य अर्थ ज्ञान के कारण भी नहीं हैं; क्योंकि उस समय उनका अस्तित्व