शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
५६२ शतपथ ब्राह्मण
क्षिणा॒ अन्यं॒ वाऽए॒तऽए॒तस्या॒त्मानग्ं॒ सं॒स्कुर्वन्त्ये॒तं य॒ज्ञमृ॒ङ्मयं॑ य॒जुर्म॒यग्ं॒ साम॑मय-
मा॒हुति॑मयग्ं॒ सो॒ऽस्यामु॒ष्मिंल्लो॒केऽन्ना॒त्मा॑ भवति॒ तद्ये माऽजी॑जन॒न्नेति॒ तस्मा॑दृ॒त्विग्भ्य॑
ए॒व दक्षि॑णा दद्या॒न्नानृ॑त्वि॒ग्भ्यः ॥५॥ अथ प्रति॒परे॑त्य गा॒र्हप॑त्यम् । दा॒क्षि॒णानि॑
जु॒हो॒ति॒ स दशा॑ल्होमी॒ये वास॑सि॒ हिर॑ण्यं प्र॒बध्या॑व॒धाय॑ जुहोति देवलो॒के मेऽप्य॑-
स॒दिति॒ वै य॑जते॒ यो यज॑ते॒ सो॒ऽस्यैष य॒ज्ञो दे॑वलो॒कमे॒वाभि॒प्रेति॒ तद॒नूची॒ दक्षि॑णा
यां ददा॑ति॒ सैति॒ दक्षि॑णाम॒न्वार॑भ्य॒ यज॑मानः ॥६॥ चत॑स्रो॒ वै दक्षि॑णाः । हिर॑ण्यं
गौर्वासो॒ऽश्वो॒ न वै तद॑वकल्पते॒ यदश्व॑स्य पा॒दम॑वद॒ध्याद्यद्वा॒ गोः पा॒दम॑वद॒ध्यात्-
स्माद्दशा॑ल्होमी॒ये वास॑सि॒ हिर॑ण्यं प्र॒बध्या॑व॒धाय॑ जुहोति ॥७॥ सौ॒रीभ्या॒मृग्भ्यां॑ जु-
होति । तम॑सा॒ वाऽअसौ॑ लो॒कोऽन्त॑र्हितः॒ स ए॒तेन॒ ज्योति॑षा॒ तमो॒ऽपह॑त्य
स्व॒र्गं लो॒कमुप॑संक्रामति॒ तस्मात्सौ॒रीभ्या॒मृग्भ्यां॑ जुहोति ॥८॥ स जु॑होति । उदु॒
त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑ । दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्यग्ं॒ स्वाहेत्ये॑तया गाय॒त्र्या
गाय॒त्री वाऽइ॒यं पृ॑थि॒वी सेयं प्रति॑ष्ठा॒ तद॒स्यामे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठति ॥९॥
अथ द्वि॒तीयां॑ जुहोति । चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः । आप्रा॒
द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरि॑क्षग्ं॒ सूर्य॑ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च॒ स्वाहेत्ये॑तया त्रि॒ष्टुभा॑ लो॒-
कमे॒वैत॒योप॒प्रेति॑ ॥१०॥ अथा॒ग्नीध्रे॑ । द्वे वैकां॑ वा जुहोति॒ तद्यद॑त्रावा॒ग्नीध्रे॒ द्वे वै-
कां वा जु॒होत्य॒ग्निर्वे प॒शूना॒मीष्टे॒ तऽए॑नम॒भितः॒ परि॑णिविशन्ते॒ तमे॒तयाऽऽहु॑त्या प्री-
णाति॒ सो॒ऽस्मै प्री॒तोऽनु॑मन्यते॒ तेना॑नुम॒तां द॑दाति ॥११॥ स जु॑होति । अग्ने॒ नय॑
सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । यु॒यो॒ध्य॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भू-
यिष्ठां॑ ते॒ नम॑उक्तिं विधेम॒ स्वाहेत्यथ॒ यद्यश्वं॑ यु॒क्तं वाऽयु॑क्तं वा दा॒स्यन्त्स्या॒दथ॑ द्वि-
तीयां॑ जुहुया॒द्यद्यु॒ न नाद्रि॑येत ॥१२॥ स जु॑होति । अ॒यं नो॒ऽअ॒ग्निरु॒र्वरि॑वस्कृणो-
त्वयं॒ मृधः॑ पु॒र ए॑तु प्रभि॒न्दन् । अ॒यं वाजा॑ञ्जयतु॒ वाज॑साताव॒यग्ं॒ शत्रू॑ञ्जयतु॒ जर्हृ॑-
षा॒णः स्वाहेति॒ वाज॑सा॒ ह्यश्वः॑ ॥१३॥ अथ॒ हिर॑ण्यमा॒दाय॒ शाला॑म॒भ्येति॑ । दक्षि॑-
कॉ० ४, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / ५६३
आहुतिमय यज्ञ है, यह यजमान का मानो एक नया आत्मा बनाया जाता है। यह इसका परलोक
में आत्मा होता है। इस आत्मा को इन्हीं ऋत्विजों ने बनाया है। इसलिए यह दक्षिणा ऋत्विजों
की ही होनी चाहिए, उनकी नहीं जो ऋत्विज न हों ॥५॥
गार्हपत्य के पास जाकर दक्षिणा की आहुति देता है। झालरदार कपड़े में सोने का
टुकड़ा बाँधकर और उसे चमसे में रखकर आहुति देता है यह कहकर कि 'देवलोक में मेरा
स्थान हो।' जो कोई यज्ञ करता है वह इसलिए करता है कि यह यज्ञ देवलोक को जाता है। और
जो दक्षिणा देता है वह भी देवलोक को जाती है। और दक्षिणा से लगा हुआ यजमान भी
जाता है ॥६॥
चार प्रकार की दक्षिणा होती है-सोना, गौ, कपड़ा और घोड़ा। यह उचित नहीं है कि
घोड़े के पैर को चमसे में रख दे या गौ के पैर को। इसलिए झालरदार कपड़े में सोना बाँधकर
रखता है और उसकी आहुति देता है ॥७॥
सूर्य की दो ऋचाओं से आहुति देता है। सूर्य की दो ऋचाओं से आहुति इसलिए देता
है कि वह (पर) लोक अन्धकार से छिप गया है। वह ज्योति से अन्धकार को हटाकर स्वर्ग-
लोक को जाता है ॥८॥
इस आहुति के मन्त्र ये हैं, “उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय
सूर्य्यं॒ स्वाहा" (यजु० ७।४१, ऋ० १।५०।१) - “ये प्रकाश की किरणें उस सूर्य्य जातवेद
देव सूर्य्य तक ले जाती हैं, सर्वत्र विश्व को दिखाने के लिए।" इस गायत्री से। यह पृथिवी
गायत्री है। यह पृथिवी प्रतिष्ठा है। इसी प्रतिष्ठा में वह प्रतिष्ठित होता है ॥६॥
दूसरी आहुति का मन्त्र यह है, “चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
आप्रा द्यावापृथिवी ऽ अन्तरिक्षं॒ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा" (यजु० ७।४२)-
"विचित्र (आश्चर्य-युक्त) देवों अर्थात् प्रकाशों का अनीक अर्थात् समूह उदय होता है। यह मित्र,
वरुण और अग्नि की आंख है अर्थात् इसी से सब प्रकाश को लेते हैं। यह सूर्य द्यौ, पृथिवी और
अन्तरिक्ष में फैल जाता है। यह जंगम और स्थावर जगत् का आत्मा है। यह त्रिष्टुभ् है। इसके
द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त करता है ॥१०॥
अब अग्नीध्र में एक या दो आहुति देता है। अग्नीध्र में एक या दो आहुतियाँ इसलिए
देता है कि अग्नि पशुओं पर राज करता है। ये पशु उसको चारों ओर से घेर लेते हैं। उस
अग्नि को इस आहुति से प्रसन्न करता है। वह अग्नि इससे प्रसन्न होकर अनुमति देता है।
अनुमति से वह (गाय की) दक्षिणा देता है ॥११॥
आहुति का मन्त्र यह है, "अग्ने नय सुपथा राये ऽ अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि
विद्वान्। युयोध्यस्मज् जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमऽउक्तिं विधेम स्वाहा" (यजु० ७।४३, ऋ०
१।१८६।१) - "हे अग्नि ! धन के लिए हमको ठीक मार्ग पर ले चल। हे देव, तू सब कर्मों को
जानता है। हमको पाप से बचा कि हम तेरी बहुत-बहुत स्तुति कर सकें।" अब यदि युक्त (सजे
हुए) या अयुक्त (बेसजे) घोड़े को देना चाहे तो एक और आहुति पढ़े, अन्यथा नहीं ॥१२॥
वह आहुति का मन्त्र यह है, "अयं नो ऽ अग्निव॑रिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्।
अयं वाजान् जयतु वाजसातवयँ॒ शत्रून् जयतु जहृ॑षाणोः स्वाहा" (यजु० ७।४४)- "यह अग्नि
होम को धन (वरिवः = धनं) दे। यह युद्धों का भेद न करते हुए आगे बढ़े। यह अन्नों को जीते।
यह जोश में आकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे।" घोड़ा विजय प्राप्त करनेवाला है ॥१३॥
अब सोने को लेकर शाला में जाता है। वेदी के दक्षिण की ओर दक्षिण की गौएँ खड़ी
५६४ शतपथ ब्राह्मण
णेन॒ वेदिं॒ दक्षि॑णा उप॒तिष्ठ॑न्ते सोऽग्रे॑ण शालां॒ तिष्ठ॑न्नभिम॒न्त्रय॑ते रूपे॑ण वो रू॒प-
म॒भ्यागा॒मिति॑ न ह वाऽअ॒ग्रे पश॑वो दा॒नाय॑ चक्षमि॒रे तेऽप॑निधाय॒ स्वानि॑ रू॒पा-
णि श॒रीरैः प्रत्यु॒पाति॑ष्ठन्त॒ ताने॒तद्देवाः स्वैरे॒व रूपै॒र्यज्ञस्यार्धाद॒पाय॑ꣳस्ते॒ स्वानि॑ रू॒-
पाणि॑ जाना॒ना अ॒भ्यवा॑यंस्ते रा॒तमन॑सोऽलं दा॒नाया॑भवंस्त॒थोऽए॒वैना॑ने॒ष ए॒तत्स्वै॑-
रे॒व रूपै॒र्यज्ञस्यार्धादुपै॑ति॒ ते स्वानि॑ रू॒पाणि॑ जाना॒ना अ॒भ्यवा॑यन्ति॒ ते रा॒तमन॑सो
ऽलं दा॒नाय॑ भवन्ति ॥ १४॥ तुथो॑ वो वि॒श्ववे॑दा वि॒भज॒त्विति॑ । ब्रह्म॒ वै तुथस्त॑-
दे॒ना ब्रह्म॑णा वि॒भज॑ति ब्रह्म॒ वै दक्षि॑णीयं चाद॑क्षिणीयं च वेद॒ तथो॒ हास्यै॑ता
दक्षि॑णीयायै॒व दत्ता भव॑न्ति॒ नाद॑क्षिणीयाय ॥ १५॥ ऋ॒तस्य॑ प॒था प्रेतेति॑ । यो वै
दे॒वानां॒ पन्थाः स ऋ॒तस्य॒ पन्था॑ति चन्द्र॒दक्षि॑णा इति॒ तदे॒तेन॒ ज्योति॑षा यन्ति
॥ १६॥ अथ॒ सदो॒ऽभ्ये॑ति । वि॒ स्वः प॑श्य॒ व्य१॒॑न्तरि॑क्षम॒ति वि ब्रूया दक्षि॑णाया लो॒-
कं ख्ये॑षमि॒त्येवैतदा॑ह ॥ १७॥ अथ॒ सदः॒ प्रेक्ष॑ते । यत॑स्व सद॒स्यैरि॑ति॒ मा वा स-
दस्॑या अ॑ति॒रिक्तेत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १८॥ अथ हिर॑ण्यमादा॒याग्नीध्रम॒भ्ये॑ति । ब्राह्म॒णम॒-
द्य वि॑देयं पितृ॒मन्तं॑ पैतृम॒त्यमिति॒ यो वै ज्ञातो ज्ञा॑तकुलीनः॒ स पि॑तृमा॒न्पैतृ॑म॒त्यो
यां वै ज्ञाता॑यापि कतिपयै॒र्द्दक्षि॑णा ददा॑ति॒ ताभि॑र्म॒र्द्धयत्यृषि॑मार्षेय॒मिति॒ यो वै
ज्ञातो॒ऽनूचा॑नः॒ स ऋषि॑रार्षेयः सुधातुदक्षि॑ण॒मिति॒ स हि सु॑धातुदक्षि॑णः ॥ १९ ॥
अथै॑वमुपसृ॒द्य । अग्नीध्रे हिर॑ण्यं ददात्यस्मद्राता दे॒वत्रा ग॑च्छ॒तेति॒ यां वै रा॒तम॑ना
अ॑विचिकित्स॒न्दक्षि॑णां ददा॑ति तया म॒र्द्धय॑ति दे॒वत्रा ग॑च्छ॒तेति॑ देवलो॒के मेऽप्य॑-
सदिति॒ वै यज॑ते यो यज॑ते॒ तद्देवलो॒कऽए॒वैन॑मेतद॒पिवि॑नं करोति प्रदा॒तार॒मावि॑-
शतेति॒ मामा॑विशति॒त्येवैतदा॑ह तथो॒ हास्मादेताः पराच्यो न प्रणाश्य॑न्ति तद्यद॒ग्नी-
ध्रे प्रथ॑माय॒ दक्षि॑णां ददा॑त्य॒तो हि विश्वे॑ दे॒वा अ॒मृत॑त्वम॒पाज॑यंस्तस्माद॒ग्नीध्रे॑ प्रथ॒-
माय॒ दक्षि॑णां ददा॑ति ॥ २०॥ अथै॑वमे॒वोप॑सृद्य । आत्रेयाय॒ हिर॑ण्यं ददाति यत्र
वाऽअ॒दः प्रा॑तरनुवाक॒मन्वा॒हुस्तद॑ स्मैतत्पु॒रा शꣳस॒त्यत्र॑िर्वाऽऋषीणाꣳ होता॑सा-
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ४, क० १४-२१ शतपथब्राह्मण / ५९५
रहती हैं। वह शाला के आगे खड़े होकर उनको सम्बोधन करता है, "रूपेण वो रूपमभ्यागाम्"
(यजु० ७।४५) — "तुम्हारे रूप से मुझे रूप मिला।" पहले-पहल पशु दान में दान दिये जाने के
लिए राजी नहीं हुए। वे अपने रूपों को अलग रखकर केवल (नंगे) शरीरों के द्वारा खड़े हो
गये। देव यज्ञ से उन पशुओं के अपने रूपों को ले गए। उन्होंने अपने इन रूपों को पहचाना
और दान के लिए राजी हो गये। यह यजमान भी इसी प्रकार यज्ञ के सामने से पशुओं के निज
रूपों को ले जाता है और वे अपने रूपों को पहचानकर दान में दिये जाने के लिए राजी हो जाते
हैं ॥१४॥
"तुथो वो विश्ववेदा विभजतु" (यजु० ७।४५) — "सबको जाननेवाला तुथ (ब्राह्मण)
तुमको बाँटे।" 'तुथ' है ब्राह्मण। इस प्रकार वह ब्राह्मण के द्वारा बँटवाता है। ब्राह्मण जानता
है कि कौन दक्षिणा के योग्य है, कौन नहीं। इस प्रकार ये गायें भी उसी को दी जाती हैं जो
दक्षिणा के योग्य है। उसको नहीं जो दक्षिणा के योग्य न हो ॥१५॥
"ऋतस्य पथा प्रेत" (यजु० ७।४५) — "ऋत के मार्ग से चलो।" जो देवों के मार्ग से
चलता है वह ऋत के मार्ग से चलता है। "चन्द्र (चन्द्र = स्वर्ण) दक्षिणावाली।" ये गायें यजमान
के दिये स्वर्ण की ज्योति से चलती हैं ॥१६॥
अब वह सदस् में जाता है, "वि स्वः पश्य व्यन्तरिक्षं" (यजु० ७।४५) — "स्वर्ग और
अन्तरिक्ष को देख।" अर्थात् तुझ दक्षिणा के द्वारा मैं स्वर्ग को प्राप्त करूँ — यह उसका उद्देश्य
है ॥१७॥
अब सदस् को देखता है, "यतस्व सदस्यैः" (यजु० ७।४५) — "सदस्यों के साथ यत्न
कर।" अर्थात् 'सदस्य तुझसे आगे न बढ़ जाय' ऐसा कहता है ॥१८॥
अब सोने को लेकर आग्नीध्र (अग्निशाला) के पास जाता है, "ब्राह्मणमद्य विदेयं
पितुमन्तं पैतृमत्यम्" (यजु० ७।४६) — "आज मैं पिता और पितामह वाले ब्राह्मण को प्राप्त
करूँ।" जो अच्छे कुल का ब्राह्मण है उसी का नाम पितुमान और पैतृमत्य है। ऐसे घोड़ों को भी
दक्षिणा देता है; उसको बहुत बड़ी विजय प्राप्त होती है। "ऋषिमार्षेयम्" (यजु० ७।४६) —
"जो वेद पढ़ा हुआ है वह ऋषि और आर्षे है।" "सुधातु दक्षिणम्" (यजु० ७।४६) — "अच्छी
दक्षिणावाला।" क्योंकि इसको अच्छी दक्षिणा दी गई है ॥१९॥
अब अग्नीध् के समीप (आदरपूर्वक) बैठकर (उपसद्य) उसे स्वर्ण देता है। "अस्मद्राता
देवत्रा गच्छत" (यजु० ७।४६) — "हमारे द्वारा दिया हुआ तू देवलोक को जावे।" जो
दक्षिणा उदार मन से बिना संकोच के दी जाती है उसका फल बड़ा होता है। 'देवलोक को
जावे' का तात्पर्य यह है कि मेरे लिए देवलोक में स्थान कर दे। जो कोई यज्ञ करता है इस
आश्रय से करता है कि देवलोक को पाऊँ। इस प्रकार वह इसके लिए देवलोक में स्थान कर देता
है। "प्रदातारमाविशत" (यजु० ७।४६) — "दाता में प्रवेश करो।" अर्थात् मुझमें प्रवेश करो।
इस प्रकार उन गायों से वह वंचित नहीं होता। अग्नीध् को दक्षिणा पहले दिये जाने का तात्पर्य
यह है कि देवों ने इसी के द्वारा अमृतत्व को पाया था। इसलिए अग्नीध् को दक्षिणा पहले देता
है ॥२०॥
अब इसी प्रकार जाकर आत्रेय (अत्रि-वंशज एक पुरुष) को स्वर्ण देता है। पहले एक
बार जब वह प्रातरनुवाक को बोल रहे थे तो सामने स्तोत्र भी कह रहे थे। ऋषियों का होता
५६६ शतपथ ब्राह्मण
यैतत्सद॒ोऽसुर॒तमसम॑भिपुप्लुवे तऽऋषयो॒ऽत्रिम॑ब्रुवन्ने॒हि प्रत्य॑ङ्किदं तमो॒ऽपह॒न्हीति॑
स ए॒तत्तमो॒ऽपावह॒न्नयं वै ज्योति॒र्य इदं तमो॒ऽपाबधी॒दिति॒ तस्मा॑दे॒तज्ज्योति॒र्हि-
र॒ण्यं दक्षि॑णामनय॒न्ज्योति॒र्हि हिर॑ण्यं तद्यै स तत्तेज॑सा वी॒र्येणा॒ऽविस्तमो॒ऽपज॒घा-
ना॑थि॒ष ए॒तेनैवैतज्ज्योति॑षा तमो॒ऽपह॑न्ति॒ तस्मा॑दात्रे॒याय॒ हिर॑ण्यं दधाति ॥ २१॥
अथ ब्रह्म॑णे । ब्रह्मा हि यज्ञं दक्षि॑णतो॒ऽभिगोपा॑यत्यथोग्दा॒त्रेऽथ॒ होत्रे॒ऽथा॑ध्व॒र्यु-
भ्यांᳵ हविर्धाने॒ऽस्यासीना॑भ्यामथ पुन॒रेत्य॒ प्रस्तोत्रे॒ऽथ मैत्रावरु॑णाय॒ ब्राह्मणा-
च्छं॑सिने॒ऽथ पोत्रे॒ऽथ नेष्ट्रे॒ऽथाच्छावाका॑याथोन्ने॒त्रेऽथ॒ ग्रावस्तुते॒ऽथ सुब्रह्मण्या॑यै
प्रतिह॒र्त्रेऽउ॑त्तमाय ददाति प्रतिहर्ता वा॒ऽए॒ष सो॒ऽस्माऽए॒तदन्तः प्रतिहर॑ति त॒-
थो हास्मादे॒ताः पराच्यो न प्रण॑श्यन्ति ॥ २२॥ अथैन्द्रा॑य म॒रुत्व॑ते॒ऽनुब्रूहीति॑ ।
यत्र॒ वै प्र॒जाप॑तये॒ ददौ॒ तदे॒न्द्र ई॒क्षां चक्रे॒ सर्वं वा॒ऽअयमि॒दं दास्य॑ति॒ नास्मभ्यं॒
किं च॒न परिशि॑क्ष्यतीति॒ स ए॒तं वज्र॑मुदय॑च्छदिन्द्राय म॒रुत्व॑ते॒ऽनुब्रूहीत्य॑दानाय॒ ततो॒
नाद॑दात्स ए॒षोऽप्ये॑त॒र्हि तथै॑व वज्र उद्य॑म्यत॒ऽइन्द्राय म॒रुत्व॑ते॒ऽनुब्रूहीत्य॑दानाय
ततो॒ न द॑दाति ॥ २३॥ च॒तस्रो वै दक्षि॑णाः । हिर॑ण्यमायु॑रे॒वैते॒नात्मन्त्धाय॑त
ऽआयु॒र्हि हिर॑ण्यं तद॒ग्र्यऽआ॑ग्नीध्रं कुर्वते॒ऽददा॑त्तस्माद्य॒तर्त्व्य॑ग्नीधे॒ हिर॑ण्यं दीयते
॥ २४॥ अथ गौः । प्रा॒णमे॒वैतया॒त्मन्त्धाय॑ते प्रा॒णो हि गौ॒रन्नं॑ हि गौ॒रन्नं॑ हि
प्राणास्ताᳵ रु॒द्राय॒ होत्रे॒ऽददा॑त् ॥ २५॥ अथ वासः । त्वच॑मे॒वैते॒नात्मन्त्धाय॑ते त्व-
ग्धि वास॑स्तद्वृह॒स्पत॑य॒ऽउद्गात्रे॒ऽददा॑त् ॥ २६॥ अथाश्वः । वज्रो वा॒ऽअश्वो वज्र॑मे॒-
वैतत्पुरोगां कुरुते यमलोके ने॒ऽव्यथ॑द॒दिति॒ वै यज॑ते यो यज॑ते तद्यमलोक॒ऽए॒वै-
नमेतद॑पिविनं करोति तं य॒माय॒ ब्रह्म॑णे॒ऽददा॑त् ॥ २७॥ स हिर॑ण्यं प्रत्ये॑ति । अ॒-
ग्नये त्वा मह्यं॒ वरु॑णो ददा॒त्वित्य॒ग्नये ह्ये॑तद्वरु॑णो॒ऽददा॒त्सोऽमृत॑त्वमशीया॒युर्दात्र॒ऽए-
धि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे॒ऽइति॑ ॥ २८॥ अथ गां प्रत्ये॑ति । रु॒द्राय त्वा मह्यं॒ वरु॑-
णो ददा॒त्विति रु॒द्राय ह्ये॑तां वरु॑णो॒ऽददा॒त्सोऽमृत॑त्वमशीय प्रा॒णो दा॒त्र॒ऽएधि॑ वयो
कां ४, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २१-२६ शतपथब्राह्मण / ५६७
अत्रि था। उस समय सदस् में असुरों का अन्धकार छा गया। ऋषियों ने अत्रि से कहा, 'यहाँ
लौट आओ और अन्धकार को निकाल दो।' उसने इस अन्धकार को भगा दिया। उन्होंने यह
समझकर कि यह ज्योति है, इसने अन्धकार दूर कर दिया, उसके लिए चमकीली सोने की दक्षिणा
दी। स्वर्ण ज्योति है। उस ऋषि ने अपने तेज और पराक्रम से अन्धकार को दूर कर दिया। यह
भी इसी ज्योति से अन्धकार को दूर करता है। इसलिए यहाँ अत्रि को स्वर्ण देता है ॥२१॥
अब ब्रह्मा को (दक्षिणा देता है)। ब्रह्मा यज्ञ की दक्षिण की ओर से रक्षा करता है।
इसके बाद उद्गाता को, फिर होता को, फिर दोनों अध्वर्युओं को जो हविर्धान में बैठे हों। फिर
लौटकर प्रस्तोता को, फिर मैत्रावरुण को, फिर ब्राह्मणाच्छंसी को, फिर पोता को, फिर नेष्टा
को, फिर अच्छावाक को, फिर उन्नेता को, फिर ग्रावस्तोता को, फिर सुब्रह्मण्य को और सबसे
पीछे प्रतिहर्ता को दक्षिणा देता है। प्रतिहर्ता इसके लिए गौवों को पकड़े रहता है। वे भागकर
जाने नहीं पातीं ॥२२॥
अब (अध्वर्यु मैत्रावरुण से) कहता है कि 'इन्द्र मरुत्वत के लिए अनुवाक पढ़ो।' जब
पहले प्रजापति दक्षिणा दे रहा था तो इन्द्र ने सोचा कि यह तो सब दे डालेगा। हमारे लिए कुछ
भी न छोड़ेगा। उसने 'इन्द्र-मरुत्वत के लिए अनुवाक पढ़ो' इस वचनरूपी वज्र को उठाया कि
वह दान देना बन्द कर दे। उसने दान बन्द कर दिया। यहाँ यह भी 'इन्द्र-मरुत्वंत के लिए
अनुवाक पढ़ो' यह वज्र उठाता है, दान देना बन्द करने के लिए। वह दान देना बन्द कर देता
है ॥२३॥
चार तरह की दक्षिणा होती है। (१) सोना—यह आयु है। इससे वह अपने जीवन की
रक्षा करता है। सोना आयु है। (प्रजापति ने) यह सोना अग्नि को दिया था जो अग्नीध् (अग्नि
प्रज्वलित करनेवाले) का काम कर रही थी। इसीलिए यह भी अग्नीध् को सोना देता
है ॥२४॥
अब (२) गौ—इससे प्राणी की रक्षा होती है। गौ प्राण है, अन्न गौ है, अन्न प्राण है।
इसको रुद्र या होता को देता है ॥२५॥
अब (३) कपड़ा—इससे अपनी खाल की रक्षा करता है। कपड़ा खाल है। उसको गाने-
वाले बृहस्पति को देता है ॥२६॥
अब (४) घोड़ा—घोड़ा वज्र है, वज्र को वह इस प्रकार अपना अगुआ बनाता है। जो
यज्ञ करता है वह इस आशा से करता है कि यमलोक में मुझे स्थान मिलेगा। इस प्रकार वह
इसको यमलोक का हिस्सेदार कर देता है। इस (घोड़े) को वह यम या ब्रह्मा को देता है ॥२७॥
अध्वर्यु सोने को इस मन्त्र से लेता है, "अग्नये त्वा मह्यं वरुणो ददातु" (यजु० ७।४७) –
"वरुण तुझे अग्नि के लिए मेरे लिए देवे।" वरुण ने अग्नि को ही तो दिया था। "सोऽमृतत्त्व-
मशीयायुर्दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे" (यजु० ७।४७) — "मैं अमृतत्व को प्राप्त करूँ।"
दाता के लिए आयु दे। मुझे लेनेवाले के लिए सुख दे" ॥२८॥
अब गाय को इस मन्त्र से लेता है, "रुद्राय त्वा मह्यं वरुणो ददातु" (यजु० ७।४७) –
"वरुण तुझे रुद्र के लिए मुझे दे।" इसको वरुण ने रुद्र के लिए दिया था। "सोऽमृतत्त्वमशीय
प्राणो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे" (यजु० ७।४७)— "मुझे अमृतत्व मिले। दाता को प्राण
अध्याय-३, ब्राह्मण-५
५६८ शतपथ ब्राह्मण
म॒ह्यं प्र॑तिगृह्णी॒त्विति॑ ॥ २९ ॥ अथ वासः प्रत्येति । बृह॒स्पत॑ये त्वा॒ मयं॒ वरु॑णो
ददा॒त्विति॒ बृह॒स्पत॑य ह्येतदरुणोऽद॑दा॒त्सोऽमृ॒तत्वम॑शीय॒ त्वग्दा॒त्रऽए॑धि॒ मयो॒ मयं॑
प्र॑तिगृह्णी॒त्विति॑ ॥ ३० ॥ अथाश्वं प्रत्येति । य॒माय॑ त्वा॒ मयं॒ वरु॑णो ददा॒त्विति॒
य॒माय॒ ह्येतं॒ वरु॑णोऽद॒दा॒त्सोऽमृ॒तत्वम॑शीय॒ हयो॑ दा॒त्रऽए॑धि॒ वयो॒ मयं॑ प्र॑तिग्र-
ह्णी॒त्विति॑ ॥ ३१ ॥ अथ॒ यद॒न्यद्ददा॑ति । का॒मेनै॑व तद्द्॑दाती॒दं मे॒ऽव्यमु॒त्रास॒दिति॑
तत्प्रत्येति॒ कोऽदा॒त्कस्मा॑ऽअदात्कामो॒ऽदा॒त्कामा॑यादात् । कामो॑ दा॒ता कामः॑ प्र-
तिग्रही॒ता कामै॒तत्त्ऽइति॒ तद्देवताया॒ऽअति॑दिशति ॥ ३२ ॥ तदाहुः । न दे॒वता॑या
ऽअति॑दिशेदि॒दं वै यां दे॒वता॒ समि॒न्धे सा दी॒प्यमा॑ना श्वः॒-श्वः॒ श्रेय॑सी भवती॒दं वै
य॒स्मिन्न॒ग्नाव॒भ्याद॑धति स दी॒प्यमा॑न एव॒ श्वः॒-श्वः॒ श्रेया॑न्भवति॒ श्वः॒-श्वो ह॒ वै श्रेया॑-
न्भवति॒ य एवं वि॒द्वान्प्रति॑गृह्णाति॒ तद्यथा॑ स॒मिद्धे॑ जुहु॒यादे॒वमे॒तां जुहोति॒ याम-
धी॒यते॒ ददा॑ति॒ तस्मा॑दधीय॒न्नाति॑दिशेत् ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [३.४.] ॥ ॥
त्रयो वै दे॒वाः । वसवो रुद्रा आदित्या॒स्तेषां॒ विभ॑क्तानि॒ सव॑नानि॒ वसू॑नामे॒व
प्रा॒तःसवनं॑ रु॒द्राणां॒ माध्य॑न्दिन॒ सव॑नमादित्यानां तृतीयसवनं॒ तद्धाऽमिश्र॑मेव
वसू॑नां प्रा॒तःसवन॑ममिश्रं रु॒द्राणां॒ माध्य॑न्दिन॒ सव॑नं मि॒श्रमा॑दित्यानां तृतीय-
सव॑नम् ॥ १ ॥ ते॒ हादित्या॑ ऊचुः । य॑थे॒दममिश्रं वसू॑नां प्रा॒तःसवन॑ममिश्रं रु॒द्रा-
णां॒ माध्य॑न्दिन॒ सव॑नमे॒वं न इ॒मं पुरा मि॒श्राद॒हं जु॑हु॒थेति॒ तथेति॑ दे॒वा अ॑ब्रुवं॒-
स्ते स॒ꣳस्थिता॑ऽए॒व माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने पु॒रा तृ॑तीयसवनादितमजुहुवुः स एषोऽप्ये-
तर्हि तथैव ग्र॒हो हूयते॒ स॒ꣳस्थिता॑ऽए॒व माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने पु॒रा तृ॑तीयसवनात्
॥ २ ॥ ते॒ हादित्या॑ ऊचुः । नेव वाऽइ॒तरा॑स्मिन्सवने स्मो नेवेत॑रस्मि॒न्यद्वै नो॒ र-
क्षाꣳसि॒ न हि॒ꣳस्युरिति॑ ॥ ३ ॥ ते ह द्विदेव॒त्यानूचुः । रक्षो॑भ्यो वै बिभीम ऋ॒त
यु॒ष्मान्प्रवि॑शामे॒ति ॥ ४ ॥ ते ह द्विदेव॒त्या ऊचुः । किम॒स्माकं ततः॑ स्यादि॒त्यस्मा-
भिरनु॑वषट्कृता भवि॒ष्यथेत्यु॑ हादित्या ऊचुस्तथेति॑ ते द्विदेव॒त्यान्प्रावि॑शन् ॥ ५ ॥
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ४-५, कं० २६-३३ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५६६
मिलें। मुझ लेनेवाले को वय अर्थात् आयु मिले" ॥२६॥
अब कपड़ा यह पढ़कर लेता है, “बृहस्पतये त्वा मह्यं वरुणो ददातु” (यजु० ७।४७) —
“वरुण तुझे बृहस्पति के लिए मुझे दे।” वरुण ने इसे बृहस्पति को ही तो दिया था। “सोऽमृतत्त्व-
मstate: मशीय त्वग्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे” (यजु० ७।४७)—“मैं अमृतत्व को पाऊँ, दाता
को त्वचा मिले । मुझ लेनेवाले को सुख" ॥३०॥
अब घोड़े को यह पढ़कर लेता है, “यमाय त्वा मह्यं वरुणो ददातु” (यजु० ७।४७) —
“वरुण तुझे यम के लिए मुझे दे।” वरुण ने इसको यम को दिया था। “सोऽमृतत्त्वमशीय हयो
दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे” (यजु० ७।४७)—“मैं अमरत्तत्त्व को पाऊँ, घोड़ा दाता के
लिए। आयु मुझ लेनेवाले के लिए" ॥३१॥
अब और जो कुछ देता है इस कामना से देता है कि जो मैं यहाँ दूँ वह मुझको उस लोक
में मिले। उसको इस मन्त्र से लेता है, “कोऽदात् कस्मा ऽ अदात् कामोऽदात् कामायादात् ।
कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्त्वे” (यजु० ७।४८)—'किसने दिया, किसको दिया, कामना
ने दिया, कामना को दिया। कामना ही देनेवाली, कामना ही लेनेवाली । हे कामना ! यह सब
तुझको।' इस प्रकार वह इसको एक देवता के लिए निश्चित कर देता है ॥३२॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि किसी देवता को अतिदेश न करे। जिस-जिस देवता को
प्रज्वलित करता है वह देवता प्रकाशित होता और उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती है। जिस
अग्नि में ईंधन डाला जाता है वह प्रकाशित होती है और उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती है।
जो इस रहस्य को समझकर (दक्षिणा) लेता है उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है।
जैसे जलती हुई अग्नि में ही आहुति डालते हैं उसी प्रकार पढ़े हुए को ही दान देता है। इसलिए
विद्वान् को चाहिए कि किसी देवता को अतिदेश न करे ॥३३॥
आदित्यग्रहः
अध्याय ३- ब्राह्मण ५
देव तीन प्रकार के हैं— वसु, रुद्र, आदित्य । सवन इन्हीं में बँटे हुए हैं। प्रातःसवन केवल
वसुओं का है, दोपहर का रुद्रों का और तीसरा सवन आदित्यों का। प्रातःसवन वसुओं का,
बिना साझे का है। दोपहर का सवन रुद्रों का, बिना साझे का है। लेकिन तीसरे सवन में आदित्यों
के साथ दूसरों का भी साझा है ॥१॥
आदित्यों ने कहा, 'चूंकि प्रातःसवन में वसुओं के साथ किसी का साझा नहीं, दोपहर
में रुद्र के साथ किसी का साझा नहीं, इसलिए इस प्रकार हमारे लिए भी एक ग्रह की आहुति
दो, पूर्व इसके कि सबका मिश्रित सवन हो।' देवों ने कहा 'अच्छा।' दोपहर की समाप्ति पर
तीसरे सवन से पहले-पहले उन्होंने आहुति दे दी। इसी प्रकार अब तक भी इस ग्रह की आहुति
दी जाती है। दोपहर के सवन की समाप्ति पर और तीसरे सवन के पहले-पहले ॥२॥
आदित्य बोले, 'हम न तो पहले सवन में साझी हैं, न दूसरे में। ऐसा न हो कि राक्षस
हमको हानि पहुँचावें' ॥३॥
उन्होंने द्विदेवत्य अर्थात् उन ग्रहों से जिनमें दो देवताओं का साझा है, कहा, 'हम राक्षसों
से डरते हैं। ऐसा करो कि हम तुममें घुस बैठें' ॥४॥
उन द्विदेवत्य ग्रहों ने उत्तर दिया, 'हमको इससे क्या लाभ होगा ?' आदित्यों ने कहा
कि 'हमारे साथ अनुवषट्कार में तुम्हारा भी साझा होगा।' उन्होंने कहा 'अच्छा' और वे
द्विदेवत्य ग्रहों में घुस बैठे ॥५॥
६०० शतपथ ब्राह्मण
स॒ यत्प्रातःसवने । द्विदे॒वत्यैः प्रचर॑ति॒ तत्प्रतिप्रस्थातादित्यपात्रेण द्रोणकलशा-
त्प्रतिनि॒गृह्णीत॒ऽउपयामगृहीतोऽसीत्येतावताध्वर्यु॑रे॒वाश्रावयत्यध्व॒र्योरनु॒ होमं॑ जु-
होति प्रतिप्रस्थातादित्ये॒भ्यस्त्वेति॒ सꣳस्रावमवनयत्येतावदेव सर्वॆषु ॥ ६ ॥ तद्य॒-
त्प्रतिप्रस्थाता॑ प्रति॒निगृह्णीते॒ । द्विदे॒वत्यान्वै प्राविशन्नस्माभिरनुवषट्कृता भवि-
ष्येत्यु हादित्या ऊचुर्या वाऽअ॒मूं द्वितीयामाहु॑तिं जु॒होति स्वि॒ष्टकृते॒ वै तां जु॒-
होति स्वि॒ष्टकृतो वाऽए॒तेऽनु॑वषट्क्रियन्ते तथो हास्यैते॒ऽनुवषट्कृता इष्टस्वि॒ष्ट-
कृतो भवन्त्युत्तरार्धे॑ जुहोत्येषा॒ ह्येतस्य॑ देवस्य दिक्तस्मादुत्तरार्धे॒ जुहोति ॥ ७ ॥
यद्वेव प्रतिप्रस्थाता प्रति॒निगृह्णीते॒ । द्विदे॒वत्यान्वै प्राविशंस्त यानेव प्राविशंस्ते-
भ्य ए॒वैतन्निर्मिमीतेऽथापिदधाति ऋ॒तोभ्यो ह्य॑बिभयुर्विष्ण्ऽउरुगायैष ते सोमस्तꣳ
रक्षस्व॒ मा त्वा दभन्निति यज्ञो वै विष्ण्स्तद्यज्ञायैवैतत्परिददाति गु॒प्त्याऽअथाह
सꣳस्थितसꣳशव मा॒ध्यन्दिने॒ सवने पुरा तृतीयसवनादेहि यजमानेति ॥ ८ ॥ ते
सम्पद्यन्ते । अध्व॒र्युश्च यजमानश्चाग्नीध्रश्च प्रतिप्रस्थाता चोन्नेताथ योऽन्यः परिचरो
भवत्युभे द्वारे॒ऽअपिदधति ऋ॒तोभ्यो ह्य॑बिभयुरथाध्वर्युरादित्यस्थालीं चादित्यपात्रं
चादत्ते स॒ उप॒र्युपरि पूतभृतं वि॒गृह्णाति नेद्यवश्चोतदिति ॥ ९ ॥ अथ गृह्णाति । क-
दा चन॒ स्तरीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दाशुषे । उपोपेन्नु मघवन्भूय॒ इन्नु ते दानं॑ दे॒वस्य
पृच्यतऽआदित्ये॒भ्यस्त्वेति ॥ १० ॥ तं वै नोपयामेन गृह्णीयात् । अग्रे ह्ये॑ष उप-
यामेन गृहीतो भवत्यभ्रामितायै जामि ह कुर्याद्यदेनमत्राप्युपयामेन गृह्णीयात्
॥ ११ ॥ अथापमृज्य पुनरानयति । कदा चन प्रयुच्छस्युभे निपासि॒ जन्मनी । तुरी-
यादित्य॒ सवनं॑ त॒ऽइन्द्रियमातस्त्यावमृतं॑ दिव्यादित्येभ्यस्त्वेति ॥ १२ ॥ अथ दधि गृ-
ह्णाति । आदित्यानां वै तृतीयसवनमादित्यान्वाऽअनु॒ पशवस्तत्पशुष्वेवैतत्पयो
दधाति तदिदं पशुषु पयो हितं मध्यत॒ इव गृह्णीयादित्याहुर्मध्यत॒ इव हीदं प-
शूनां पय॒ इति पश्चादिव॒ त्वेव॑ गृह्णीयात्पश्चादिव॒ हीदं॑ पशूनां पयः ॥ १३ ॥ यद्वेव
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ५, कं० ६-१३ शतपथब्राह्मण / ६०१
इसलिए जब प्रातःसवन में (अध्वर्यु) द्विदेवत्य ग्रहों को तैयार करता है तो प्रतिप्रस्थाता
द्रोण कलश से आदित्य-पात्र में इस मन्त्र से सोम निकालता है, "उपयामगृहीतोऽसि” (यजु०
८।१)। अब अध्वर्यु श्रौषट् कहता है और उसके आहुति देने के पश्चात् प्रतिप्रस्थाता।
"आदित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।१) कहकर बचे-खुचे को (आदित्य-स्थाली में) छोड़ देता है।
इसी प्रकार अन्य सब (द्विदेवत्य ग्रहों में भी ऐसा ही होता है) ॥६॥
प्रतिप्रस्थाता (सोमरस को) क्यों लेता है ? इसलिए कि द्विदेवत्य ग्रहों में प्रवेश करते
आदित्यों ने कहा कि हमारे अनुवषट्कार में तुम्हारा भी हिस्सा होगा। यह जो दूसरी आहुति
देता है वह अग्नि-स्विष्टकृत् के लिए देता है, स्विष्टकृत् से ही अनुवषट्कार हो जाता है। इस
प्रकार यह स्विष्टकृत् के लिए दी हुई आहुतियां अनुवषट्कार से युक्त हो जाती हैं। वह उत्तरार्द्ध
में आहुति देता है क्योंकि उस देवता की दिशा यही है। इसलिए उत्तरार्द्ध में आहुति देता है ॥७॥
प्रतिप्रस्थाता इसलिए भी लेता है कि वे द्विदेवत्य ग्रहों में घुस गए। जिनमें वे घुस गए
उनमें से वह लेता है। चूंकि वे राक्षसों से डरते थे, इसलिए वह इस मन्त्र से ढक देता है,
"विष्ण ऽ उरुगायेष ते सोमस्त ॅरक्षस्व मा त्वा दभन्" (यजु० ८।१)- 'हे ऊर्ध्वगति वाले विष्णु,
यह सोम तुम्हारे लिए है। इसकी रक्षा करो, जिससे वे तुमको हानि न पहुँचा सकें।" विष्णु यज्ञ
है। यज्ञ को ही वह देता है रक्षा के लिए। अब दोपहर के सवन की समाप्ति पर और तृतीय
सवन के पहले वह कहता है 'यजमान, यहाँ आओ' ॥८॥
ये सब (हविर्धान में) साथ घुसते हैं—अध्वर्यु, यजमान, आग्नीध्र, प्रतिप्रस्थाता, और
इनके साथ दूसरा जो कोई परिचर हो। दोनों द्वारों को बन्द कर देता है क्योंकि वे राक्षसों से
डरते थे। अब अध्वर्यु आदित्य-स्थाली और आदित्य-पात्र को लेता है और पूतभृत् के ऊपर
रखता है कि कहीं सोमरस गिर न जाय ॥६॥
अब वह (स्थाली में से पात्र में) इस मन्त्र से लेता है, "कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि
दाशुषे। उपोपेन्नु मघवन् भूय ऽ इन्तु ते दानं देवस्य पृच्यत ऽ आदित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।२,
ऋ० ८।५१।७) - "हे इन्द्र, तू कभी संकुचित नहीं होता। तू दानशील सेवक के सदा समीप रहता
है। हे शक्तिशाली मधवा ! तुझ देव का दान अधिक बढ़ता है। हे ग्रह ! तुझको आदित्यों के
लिए" ॥१०॥
'उपयाम गृहीतोऽसि' कहकर न ले। ऐसा कहकर तो आगे ही निकाला था। पुनरुक्ति से
बचने के लिए। यदि 'उपयाम' कहकर लेगा तो अवश्य ही पुनरुक्ति-दोष लगेगा ॥११॥
(उस ग्रह को एक बार कुछ) हटाकर फिर उसी में (सोम रस) लेता है, इस मन्त्र से-
"कदा चन प्रयुच्छस्युभे निपासि जन्मनी। तुरीयादित्य सवनं त ऽ इन्द्रियमातस्थावमृतं दिव्या-
दित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।३, ऋ० ८।५२।७) - "हे आदित्य ! तुम कभी आलस्य नहीं करते ।
तुम दोनों जन्मों की रक्षा करते हो। आपका जो यह तीसरा (या चौथा) सवन है, उस दिव्य सवन
में आपका 'इन्द्रियं अमृतं' अर्थात् पराक्रमशील अमरत्व रक्खा हुआ है। हे ग्रह ! तुझको आदित्य
के लिए ॥१२॥
अब दही लेता है। तीसरा सवन आदित्य का है। पशु आदित्यों के पीछे हैं। इस प्रकार
पशुओं में दूध रखता है। इसीलिए तो पशुओं में दूध होता है। कुछ लोग कहते हैं कि 'इस ग्रह को
ठीक बीच में रक्खे; क्योंकि पशुओं के मध्य में ही दूध होता है', परन्तु उसको कुछ पीछे हटाकर
रखना चाहिए क्योंकि पशुओं में दूध कुछ पीछे की ओर ही होता है ॥१३॥
६०२ शतपथ ब्राह्मण
दधि॑ गृह्णाति । हु॒तोहिष्टा॒ वाऽए॒ते स॒ंस्रवा भ॑वन्ति ना॒लमाहु॑त्यै ताने॒वैतत्पुन॑-
रा॒प्याय॑यति तया॒लमाहु॑त्यै भव॑न्ति तस्माद्दधि॑ गृह्णाति ॥ १४ ॥ स गृह्णाति । य॒ज्ञो
दे॒वानां॒ प्रत्ये॑ति सु॒म्नमा॑दित्यासो भवता मृडयन्तः॑ । आ वो॑ऽर्वाची सु॒मति॑र्ववृत्या-
द॒ं॒होश्चि॒द्या व॑रिवो॒वित्त॒रास॒दादि॑त्येभ्यस्त्वेति॑ ॥ १५ ॥ तमु॒पाँ॒शुस॑वनेन मे॒क्षय॑ति
। वि॒वस्वाँ॒न्वाऽए॒ष आ॑दि॒त्यो निदा॑नेन यदुपाँ॒शुस॑वन आ॑दित्यग्रहो वाऽए॒ष भ-
वति॒ तदे॒नꣳ स्वऽए॒व भागे॑ प्रीणाति ॥ १६ ॥ तं न द॒शभि॑र्न प॒वित्रे॑णो॒पस्पृ॑शति
ए॒ते वै शु॒क्रवती॑ रस॒वती॒ सव॑ने य॒त्प्रातः॑सव॒नं च माध्यं॑दिनं च सव॑नम॒थैतन्नि॑-
र्धौतिशुक्रं यत्तृतीयसवनꣳ स यन्न द॒शभि॑र्न प॒वित्रे॑णोप॒स्पृश॑ति॒ तेनो हा॒स्यैतच्छु-
क्रवद्वस॒वत्तृतीयसवनं॑ भवति तस्मान्न द॒शभि॑र्न प॒वित्रे॑णोप॒स्पृश॑ति ॥ १७ ॥ स
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ५, क० १३-२३ शतपथब्राह्मण / ६०३
दही इसलिए लेता है कि यह जो बचा-खुचा सोमरस होता है वह आहुतियों के लिए
काफी नहीं होता। उसको दही से बढ़ा लेता है और यह दही के लिए काफी हो जाता है।
इसलिए दही मिलाता है ॥१४॥
वह इस मन्त्र से लेता है, "यज्ञो देवानां प्रत्येति सुन्ममादित्यासो भवता मृडयन्तः। आ
वोऽर्वाची सुमतिर्ववृत्याद॒होश्चिद्या वरिवोवित्तरासदात्। आदित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।४; ऋ०
१।१०७।१)-"यज्ञ देवों के साथ सुख के लिए आता है। हे आदित्यो ! कृपा करो। आपकी सुमति
हमारे समक्ष हो।" यज्ञ देवों के सुख का सम्पादन करता है। हे आदित्यो ! आप हमको सुख
देनेवाले हों। आपकी अच्छी मति (सुमति) हमारे समक्ष आवे (अर्थात् हम सुमतिवाले हों)।
जो मति दरिद्रतायुक्त मनुष्य को भी अत्यन्त धन देनेवाली है वह भी हमारे समक्ष आवे। हे
ग्रह, तुझको आदित्य के लिए" ॥१५॥
उपांशु सवन पत्थर से पीसकर उसको मिलाता है। यह जो उपांशु सवन है वह तो
वास्तव में आदित्य विवस्वान् (सूर्य) ही है और यह आदित्य का ग्रह है। इस प्रकार इसको
इसी के भाग से प्रसन्न करता है ॥१६॥
इसको न झालर से और न पवित्रे से छूता है। ये जो प्रातःसवन और दोपहर के सवन
हैं ये दोनों शुक्रवाले और रसवाले हैं। परन्तु यह जो तीसरा सवन है वह सोम से शून्य है
(सोम इसमें से निकल चुका है)। झालर या पवित्रे से न छूने से यह शुक्रवाला और रसवाला
हो जाता है। इसलिए वह न झालर से और न पवित्रे से छूता है ॥१७॥
वह इस मन्त्र से मिलाता है, "विवस्वन्नादित्यैष ते सोमपीथस्तस्मिन् मत्स्व" (यजु०
८।५)-"हे प्रतापी आदित्य ! आ ! यह तेरा सोम-भाग है। इससे तृप्त हो।" अब उपांशु सवन
को उन्नेता को दे देता है। फिर उन्नेता से कहता है, 'ग्रावा (पत्थर) को डाल दे।' उसको
आधवनीय या चमसे में डाल देता है ॥१८॥
सोम राजा को निकालकर-तीसरा सवन आदित्यों का है। ये पत्थर भी आदित्य
ही हैं। इस प्रकार इनको इन्हीं के भाग से प्रसन्न करता है। अब दरवाजे को खोल देते हैं ॥१९॥
उस ग्रह को ढककर बाहर निकल आता है, क्योंकि आदित्यों को राक्षसों से भय था।
अब वह कहता है कि आदित्यों के लिए अनुवाक कहो। यदि चाहे तो (उनके गुणों को) गिना
दे। श्रौषट् कहकर गिनावे, इस प्रकार-'प्रिय, प्रियधाम, प्रियव्रत, महान् घर के पति, बड़े
अन्तरिक्ष के अधिपति, आदित्यों के लिए प्रेरणा कर।' वषट्कार करके आहुति देता है। अनु-
वषट्कार नहीं किया जाता कि कहीं पशुओं को अग्नि के समर्पण न कर दे। बचा-खुचा प्रति-
प्रस्थाता को दे देता है ॥२०॥
अब वह फिर (हविर्धान में) आकर आग्रयण को लेता है। उत्तर की ओर झालर और
पवित्रे को फैला देते हैं। अध्वर्यु आग्रयण में से (रस) उंडेलता है। प्रतिप्रस्थाता बचे-खुचे दोनों
भागों को पकड़ता है। उन्नेता (आधवनीय में से) कुछ रस मिलाता है, चमसे या उदंचन
से ॥२१॥
इस प्रकार आग्रयण को चार धाराओं में लेता है। तीसरा सवन आदित्यों का है। गायें
आदित्यों के पीछे हैं। इसीलिए गायों का दूध चार प्रकार का होता है। इसलिए आग्रयण को
चार धाराओं में लेता है ॥२२॥
प्रतिप्रस्थाता उन बचे-खुचे दोनों भागों को इसलिए पकड़ता है कि बचा-खुचा आदित्य
अध्याय-४, ब्राह्मण-१
६०४ शतपथ ब्राह्मण
ऽआदित्यग्रह॒स्यानु॑वषट्करोत्ये॒तस्मा॒द्वै सा॑वि॒त्रं ग्र॒हं ग्र॑हीष्य॒न्भव॑ति॒ तद॑स्य सावि॒-
त्रे॒णैवा॒नु॑वषट्कृतो भ॑वति ॥ २३॥ य॒द्वेव प्रतिप्रस्था॒ता संस्रा॒वौ सम्प्र॑गृह्णा॒ति ।
पु॒रा वाऽए॒भ्य ए॒तन्मिश्रा॒द्वहम॑हौषुः पु॒रा तृतीयसवना॒त्तृती॑यसवनाय॒ वाऽए॒ष
ग्र॒हो गृ॑ह्यते॒ तदा॑दि॒त्याँस्तूतीयसवनमपियन्ति॒ तथा॒ न ब॒हिर्धा य॒ज्ञाद्भव॑न्ति॒ तस्मा॑-
त्प्रतिप्रस्था॒ता संस्रा॒वौ सम्प्र॑गृह्णा॒ति॑ ॥ २४॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ २ [३. ५.] ॥ तृती॒यो
ऽध्यायः [२७.] ॥ १॥
मनो॒ ह वा॒ऽअस्य सवि॒ता । तस्मा॑त्सावि॒त्रं गृह्णाति प्रा॒णो ह वा॒ऽअस्य स-
वि॒ता तमे॒वास्मिन्ने॒तत्पु॒रस्ता॒त्प्राणं॑ दधाति॒ यऽपा॒श्शुं गृ॒ह्णाति॒ तमे॒वास्मिन्नेतत्प॒-
श्चात्प्रा॒णं द॑धाति॒ यत्सा॑वि॒त्रं गृह्णा॑ति तावि॒माऽउ॑भयतः॒ प्रा॒णौ हि॒तौ यश्चाय॒मुप॑-
रि॒ष्टाद्यश्चा॒धस्ता॑त् ॥ १॥ ऋ॒तवो॒ वै सं॑वत्स॒रो य॒ज्ञः । तेऽदः॑ प्रातःसव॒ने प्रत्य॑क्षम्-
वकल्पन्ते॒ यदृ॑तुग्र॒हान्गृ॒ह्लात्यथै॑त॒त्परो॒ऽक्षं मा॑ध्यन्दि॒ने सव॑ने॒ऽवक॑ल्प्यन्ते॒ यदृ॑तुपा-
त्राभ्यां॑ म॒रुत्वती॑यान्गृ॒ह्णाति॒ न वा॒ऽअत्र॒ऽर्तुभ्य॒ इति॒ कं चन॒ ग्र॒हं गृ॒ह्णन्ति॒ नर्त्तुपा-
त्राभ्यां॒ कश्चन॒ ग्र॒हो गृ॑ह्यते॒ ॥ २॥ ए॒ष वै स॑वि॒ता य॒ एष तप॑ति । ए॒ष उ॒ऽएव
सर्व्व॒ऽऋत॑वस्तदृतवः संवत्स॒रस्तृती॑यसवने॒ प्रत्य॑क्षम॒वक॑ल्प्यन्ते॒ तस्मा॑त्सावि॒त्रं गृ॒-
ह्णाति॒ ॥ ३॥ तं वा॒ऽउपा॑श्शुपात्रेण गृह्णाति । मनो॒ ह वा॒ऽअस्य सवि॒ता प्रा॒ण
उपा॑श्शुस्तस्मा॑दुपा॑श्शुपात्रेण गृह्णात्यन्तर्यामपात्रेण वा समान् ᳪ ह्ये॒तद्यदु॑पा॑श्श्वन्त-
र्या॒मौ प्रा॒णोदा॒नौ हि ॥४॥ आग्रयणाद्गृह्णाति । मनो॒ ह वा॒ऽअस्य सवि॒तात्मा-
ऽग्रय॑ण॒ आत्म॑न्ये॒वैतन्मनो॑ दधाति प्रा॒णो ह वा॒ऽअस्य सवि॒तात्माग्रय॑ण॒ आत्म॑न्ये-
वैतत्प्रा॒णं द॑धाति ॥ ५॥ अथातो गृह्णात्येव । वा॒मम॒द्य स॑वितर्वा॒ममु॒ श्वो दि॒वे-दि॑-
वे वा॒मम॒स्मभ्य॑ ᳪ सावीः । वा॒मस्य॒ हि क्षय॑स्य देव॒ भूरे॑रया धि॒या वा॑म॒भाजः॑ स्याम
। उपयामगृहीतोऽसि सा॒वि॒त्रोऽसि चनो॒धाश्च॑नो॒धा अ॑सि॒ चनो॒ मयि॑ धेहि । जि॒-
न्व य॒ज्ञं जि॑न्व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑येति ॥ ६॥ तं गृहीत्वा न सादयति । मनो॒ ह वा॑
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कां० ४, अ० ३-४, ब्रा० ५-१, क० २३-२४ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६०५
ग्रह का है। आदित्य ग्रह का अनुवषट्कार तो होता नहीं। इसी आदित्य ग्रह से तो सावित्र ग्रह
को निकालेंगे। इस प्रकार सावित्र ग्रह के द्वारा इसका भी अनुवषट्कार हो जायगा ॥२३॥
प्रतिप्रस्थाता उन शेष भागों को इसलिए भी पकड़ता है कि इस मिश्रण कृत्य के पहले,
तीसरे सवन से पहले (आदित्यों के लिए) ग्रह दिया जा चुका है। यह ग्रह तीसरे सवन के लिए
है। इस प्रकार आदित्य इस सवन में भी भाग ले लेते हैं और यज्ञ से निकाले नहीं जाते। इस-
लिए प्रतिप्रस्थाता उन शेष भागों को लेता है ॥२४॥
सावित्रग्रहः
अध्याय ४—ब्राह्मण १
सविता इस (यज्ञ) का मन है। इसलिए सावित्र ग्रहों को लेता है। सविता इसका प्राण
भी है। जब उपांशु ग्रह को लेता है तो प्राण को आगे रख लेता है, और जब सावित्र ग्रहों को
लेता है तो प्राण को पीछे रख लेता है। इस प्रकार वे दोनों प्राण हितकर हो जाते हैं, वह जो
ऊपर है और वह जो नीचे ॥१॥
यज्ञ ऋतुएँ या संवत्सर है। प्रातःसवन में तो ऋतुएँ प्रत्यक्ष रीति से मनाई जाती हैं
क्योंकि ऋतु-ग्रहों को निकाला जाता है। दोपहर के सवन में परोक्ष रीति से, क्योंकि दोनों ऋतु-
पात्रों में मरुत्वती ग्रहों को निकाला जाता है। यहाँ न तो ऋतुओं के लिए कोई ग्रह निकाला जाता
है और न ऋतु-पात्रों में ही किसी ग्रह को निकालते हैं ॥२॥
यह जो तपता है वही तो सविता है। यही सब ऋतुएँ हैं। इस प्रकार ऋतुएँ या संवत्सर
तीसरे सवन में प्रत्यक्ष रूप से मनाये जाते हैं। इसलिए सावित्र ग्रह को लेता है ॥३॥
उसको उपांशु पात्र में लेता है। इसका मन सविता है और प्राण उपांशुपात्र । इसलिए
उपांशुपात्र से लेता है, या अन्तर्याम पात्र से। क्योंकि ये तो समान ही है। उपांशु और अन्तर्याम
प्राण और उदान हैं ॥४॥
आग्रयण में से लेता है। इसका मन सविता हैं और आत्मा आग्रयण। इस मन को आत्मा
में ही रखता है; इसका प्राण सविता है, और आत्मा आग्रयण। इस प्रकार आत्मा में ही प्राण को
रखता है ॥५॥
इस मन्त्र से लेता है, "वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवे दिवे। वाममस्मभ्यं॒ सावीः।
वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम॥ उपयामगृहीतोऽसि सावित्रोऽसि
चनोधाश्चनोधा ऽ असि चनो मयि धेहि। जिन्व यज्ञं जिन्व यज्ञपतिं भगाय" (यजु० ८।६-७; ऋ०
६।७१।६)—"हे सविता ! आज और कल, प्रतिदिन हमारे लिए उत्तम फल की प्रेरणा कर। हे
देव ! बहुत बड़े सुखवाले निवास को हम इस बुद्धि से पावें।"—"तुझे आश्रय के लिए लिया गया
है। तू सावित्र ग्रह है। तू आनन्द देनेवाला है। मुझे आनन्द दे। यज्ञ को तृप्त कर। यज्ञपति को
तृप्त कर। भाग्य के लिए" ॥६॥
उसको लेकर भूमि पर नहीं रखता। सविता इस यज्ञ का मन है। यह मन चलायमान
ऽश्व॑स्य सवि॒ता तस्मा॑दिद॒मस॑न्नं॒ मनः॑ प्रा॒णो ह॒ वाऽश्व॑स्य सवि॒ता तस्मा॑दय॒मस॑न्नः
प्रा॒णः संच॑रत्यथाह दे॒वाय॑ सवि॒त्रेऽनु॑ब्रूही॒त्याश्रा॑व्याह दे॒वाय॑ सवि॒त्रे प्रेष्येति॑ व-
षट्कृ॑ते जुहोति॒ नानु॑वषट्करोति॒ मनो॑ ह॒ वाऽश्व॑स्य सवि॒ता नेन्मनो॒ऽग्नौ प्रवृ॑ण-
जानी॒ति प्रा॒णो ह॒ वाऽश्व॑स्य सवि॒ता नेत्प्रा॒णम॒ग्नौ प्रवृ॑णजानी॒ति ॥७॥ अथा॑भ-
क्षितेन पात्रे॑ण । वै॒श्व॒दे॒वं ग्र॒हं गृ॑ह्णाति॒ तद्यद॑भक्षितेन॒ पात्रे॑ण वैश्वदे॒वं ग्र॒हं गृ॒-
ह्णाति॒ न वै सा॑वित्र॒स्यानु॑वषट्करोत्ये॒तस्मा॑द्धि वैश्वदे॒वं ग्र॒हं ग्र॑ही॒ष्यन्भ॑वति॒ तद॑स्य
वै॒श्व॒दे॒वेनै॒वानु॑वषट्कृतो भ॑वति ॥८॥ यद्वे॑व वैश्वदे॒वं ग्र॒हं गृ॒ह्णाति॑ । मनो॑ ह॒
वाऽश्व॑स्य सवि॒ता सर्व॒मिदं॒ विश्वे॑ दे॒वा इ॒दमे॒वैतत्सर्वं॒ मन॑सः कृतानु॒कर॒मनु॑वर्त्म
क॑रोति॒ तद॑दि॒ꣳ सर्वं॒ मन॑सः कृतानु॒कर॒मनु॑वर्त्म ॥९॥ यद्वे॑व वैश्वदे॒वं ग्र॒हं गृ॒ह्णा-
ति॑ । प्रा॒णो ह॒ वाऽश्व॑स्य सवि॒ता सर्व॒मिदं॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॒स्मिन्ने॒वैतत्सर्व॑स्मिन्प्रा-
णोदा॒नौ द॑धाति तावि॒माव॒स्मिन्सर्व॑स्मिन्प्राणोदा॒नौ हि तौ ॥१०॥ यद्वे॑व वैश्व-
दे॒वं ग्र॒हं गृ॒ह्णाति॑ । वै॒श्व॒दे॒वं वै तृ॑तीयसवनं॒ तद्यच्यत॒ऽएव॒ सा॑मतो॒ यस्मा॑द्वैश्वदे॒वं
तृ॒तीय॑सवनमुच्यत॒ऽऋक्तो॑ऽथै॒तदे॒व य॑जु॒ष्टः पु॑रश्चरणतो॒ यदे॒तं म॒हावै॑श्वदे॒वं गृ॒ह्णाति॑
॥११॥ तं वै पू॒तभृ॑तो गृह्णाति । वै॒श्व॒दे॒वो वै पू॒तभृदतो॒ हि दे॒वेभ्य॒ उन्न॑यन्त्यतो॒
मनु॒ष्येभ्योऽतः॑ पि॒तृभ्य॒स्तस्मा॑द्वैश्वदे॒वः पू॒तभृत् ॥१२॥ तं वा॒ऽअपू॑रोरु॒कं गृ॑ह्णाति
। विश्वे॑भ्यो ह्ये॑नं दे॒वेभ्यो॒ गृह्णा॑ति॒ सर्वं॒ वै विश्वे॑ दे॒वा यदृचो॒ यद्य॒जूꣳषि॒ यत्सामा॑-
नि॒ स यद्दे॒वं विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यो॒ गृह्णा॑ति॒ तेनो॑ हास्यै॒ष पु॑रो॒रुग्वान्भ॑वति॒ तस्मा॑-
दपू॑रोरु॒कं गृ॑ह्णाति ॥१३॥ अथातो गृह्णात्येव । उप॒यामगृ॑हीतोऽसि सु॒शर्मा॑सि सु-
प्र॑ति॒ष्ठान॒ इति॑ प्रा॒णो वै सु॒शर्मा॑ सुप्रति॒ष्ठानो॑ बृह॒दुक्षा॑य॒ नम॒ इति॑ प्र॒जाप॑तिर्वै
बृ॒हदु॒क्षः प्र॒जाप॑तये॒ नम॒ इत्ये॒वैत॑दाह॒ विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॑ ए॒ष ते॒ योनि॒र्विश्वे॑भ्य-
स्त्वा दे॒वेभ्य॒ इति॑ सादयति॒ विश्वे॑भ्यो ह्ये॑नं दे॒वेभ्यो॒ गृह्णा॒त्यथैत्य॒ प्राङुप॑विशति
॥१४॥ स यत्रेताꣳ होता शꣳसति । एक॑या च दश॑भिश्च स्वभूते द्वाभ्या॑मि॒ष्टये
कां० ४, अ० ४, ब्रा० १, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ६०७
होता है। सविता इसका प्राण है। प्राण चलायमान होता है। अब वह मैत्रावरुण से कहता है
'सविता देव के लिए अनुवाक कहो।' श्रौषट् कहकर कहता है कि 'देव सविता के लिए आहुति
दे।' वषट्कार आहुति देता है। अनुवषट्कार नहीं करता। सविता इसका मन है। ऐसा न हो
कि मन अग्नि के अर्पण हो जाय। सविता इसका प्राण है। ऐसा न हो कि प्राण अग्नि के अर्पण
हो जाय ॥७॥
अब बिना जूठा किये (अभक्षित) पात्र से वैश्वदेव ग्रह को लेता है। वैश्वदेव ग्रह को
अभक्षित पात्र से इसलिए निकालता है कि सावित्र ग्रह का अनुवषट्कार तो होता नहीं। इसी से
वैश्वदेव ग्रह निकालता है। इस प्रकार वैश्वदेव ग्रह के द्वारा ही उसका भी अनुवषट्कार हो
जाता है ॥८॥
वैश्वदेव ग्रह इसलिए भी निकाला जाता है—सविता इस (यज्ञ) का मन है, विश्वेदेव
ये सब-कुछ हैं, इस प्रकार वह इस सबको मन के आधीन कर देता है। इसीलिए यह सब-कुछ
मन के आधीन होता है ॥६॥
वैश्वदेव ग्रह को इसलिए भी लेता है कि सविता इस यज्ञ का प्राण है। विश्वेदेव ये सब-
कुछ हैं। इस सब में इस प्रकार प्राण और उदान को धारण कराता है। इसलिए इस सब में प्राण
और उदान स्थित हैं ॥१०॥
वैश्वदेव ग्रह को इसलिए भी लेता है कि तीसरा सवन विश्वेदेवों का है। यह साम के
हिसाब से भी 'वैश्वदेव' है, ऋक् के हिसाब से भी और यजुः के पुरश्चरण के हिसाब से भी, जब
कि महावैश्वदेव ग्रह निकाला जाता है ॥११॥
इस ग्रह को पूतभृत में से निकालते हैं। पूतभृत वैश्वदेवों का है, क्योंकि इसी से देवों के
लिए भी निकालते हैं, इसी से मनुष्यों के लिए भी और इसी से पितरों के लिए भी। इसलिए
वैश्वदेव ग्रह को पूतभृत से निकालते हैं ॥१२॥
इसको बिना पुरोरुच् के निकालता है। इसको विश्वदेवों के लिए निकालता है। विश्व-
देवा का अर्थ है 'सब'। अर्थात् जो कुछ ऋक् है, जो यजुः है, जो साम है। चूंकि वह इसको सब
देवों के लिए निकालता है इसलिए वह इसके लिए पुरोरुच्-सम्पन्न हो जाता है। इसलिए उसको
बिना पुरोरुच् के निकालता है ॥१३॥
उसको इस प्रकार निकालता है, "उपयामगृहीतोऽसि सुशर्मासि सुप्रतिष्ठानः" (यजु०
८।८)—"तू आश्रय के लिए लिया गया है। तू सुरक्षित और सुप्रतिष्ठित है।" प्राण ही सुशर्मा
और सुप्रतिष्ठान है। "बृहदुक्षाय नमः" (यजु० ८।८)—'बृहदुक्ष' का अर्थ है प्रजापति, तात्पर्य
यह है कि "प्रजापति के लिए नमः।" "विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः"
(यजु० ८।८)—"सब देवों के लिए तुझे। यह तेरा स्थान है, सब देवों के लिए तुझे।" यह कह-
कर उसे रख देता है क्योंकि इसको यह विश्वेदेवों के लिए लेता है। अब वह (सदस् में) जाता है
और (होता के सामने) पूर्वाभिमुख बैठता है ॥१४॥
"एकया च दशभिश्च स्वभूते द्वाभ्यामिष्टये विꣳशती च। तिसृभिश्च वहसे त्रिꣳशता
अध्याय-४, ब्राह्मण-२
वि॑ꣳशती च॒ । ति॒सृभि॑श्च वहसे त्रि॒ꣳशता॑ च नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ह ता वि॑मुञ्चेति त-
दे॒तस्यां॑ वाय॒व्याया॑मृ॒चि पात्रा॑णि वि॒मुच्य॑न्ते वायुप्र॒णेत्रा॒ वै प॒शवः॑ प्रा॒णो वै वा॒-
युः प्रा॒णेन॒ हि प॒शव॑श्च॒रन्ति॑ ॥ १५॥ स ह दे॒वेभ्यः॑ प॒शुरि॑रपचक्राम । तं दे॒वाः
प्रातःसव॒ने॒ऽन्व॑मन्त्रयन्त॒ स नोपा॑ववर्त॒ तं मा॑ध्यन्दि॒ने सव॑ने॒ऽन्व॑मन्त्रयन्त॒ स नै-
वोपा॑ववर्त॒ तं तृ॑तीयसव॒ने॒ऽन्व॑मन्त्रयन्त ॥ १६॥ स हो॒पाव॑र्त्स्य॒न्नुवा॑च । यद्व उ-
पावर्तेय॒ किं मे॒ ततः॑ स्या॒दिति॒ त्वयै॒वैता॑नि पात्रा॑णि यु॒ज्येर॒ꣳस्त्वया॑ वि॒मुच्ये॑र॒न्निति॑
तदे॒नेनैतत्पात्रा॑णि यु॒ज्यन्ते॒ यदि॑न्द्रवाय॒वाग्रा॒न्प्रातः॑सव॒ने गृ॑ह्ण॒न्त्येने॑नैतत्पात्रा॑णि
वि॒मुच्य॑न्ते यदा॒ह नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ह ता वि॑मुञ्चेति प॒शवो॒ वै नि॒युत॒स्तत्प॒शुभि॑रे॒-
वैतत्पात्रा॑णि वि॒मुच्य॑न्ते ॥ १७॥ स यत्प्रातः॑सव॒नऽउपाव॑र्त्स्यत् । गाय॒त्रं वै प्रातः॑-
सव॑नं॒ ब्रह्म॑ गाय॒त्री ब्रा॑ह्म॒णेषु॑ ह प॒शवो॑ऽभविष्य॒न्नथ॒ यन्मा॑ध्यन्दि॒ने सव॑न॒ऽउपा॒-
वर्त्स्य॒दैन्द्रं॒ वै मा॑ध्यन्दि॒नं सव॑नं क्ष॒त्रमिन्द्रः॑ क्ष॒त्रियेषु॑ ह प॒शवो॑ऽभविष्य॒न्नथ॒ य-
त्पृ॑तीयसव॒नऽउपा॑वर्तत वैश्वदे॒वं वै तृ॑तीयसव॒नꣳ सर्व॑मि॒दं विश्वे॑ दे॒वास्तस्मा॑दि॒ने
सर्व॑त्रे॒व प॒शवः॑ ॥ १८॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [४. १.] ॥ ॥
सौम्ये॑न च॒रुणा॑ प्रचरति । सोमो॒ वै दे॒वाना॒ꣳ ह॒विर्यदे॒तत्सोमा॑येव॒ हविर्नि-
र्वप॑ते तथा॒तः सोमो॒ऽनन्त॑र्हितो भवति च॒रुर्भव॑ति च॒रुर्वै दे॒वाना॒मन्न॒मोद॑नो हि
च॒रुरोद॑नो॒ हि प्र॒त्यक्षमन्नं॒ तस्मा॑च्च॒रुर्भव॑ति ॥ १॥ तेन॒ न प्रातः॑सव॒ने प्र॑चरति ।
न मा॑ध्यन्दि॒ने सव॑न॒ऽए॒ते वै दे॒वानां॑ निष्केव॒ल्ये॑ सव॑ने॒ यत्प्रातः॑सव॒नं च मा॒-
ध्यन्दि॑नं च सव॑नं पितृदे॒वत्यो॒ वै सोमः॑ ॥ २॥ स यत्प्रातः॑सव॒ने वा॒ प्रच॑रेत् ।
माध्यन्दि॑ने वा सव॑ने सम॒दꣳ ह कुर्या॑द्दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॑श्च॒ तेन॑ तृतीयसव॒ने प्र॑च-
रति वैश्वदे॒वं वै तृ॑तीयसव॒नं तथा॒ हासम॑दं करोति नानुवा॒क्यामन्वाह सकृद्
द्येव पराञ्चः पितरस्तस्मान्नानुवा॒क्यामन्वाह ॥ ३॥ अथ चतुर्गृहीतमाज्यं गृही-
त्वा । आश्राव्याह घृतस्य यजेति वषट्कृते जुहोति तथा अतः प्राच्य आहुतयो
कां० ४, अ० ४, ब्रा० १-२, कं० १५-१८ व १-४ शतपथब्राह्मण / ६०६
च नियुद्भिर्वायविह ता विमुंचः।”—“एक और दस (ग्यारह) से अपने लिए, दो और बीस
(बाईस) से इष्टि के लिए, तीन और तीस (तैंतीस) से देवों के लिए। हे वायु, तू अपने घोड़ों की
जोड़ी के द्वारा इनको छोड़।” जब होता इस वायुवाली ऋचा को पढ़ता है तो पात्र छूट जाते हैं
(जैसे घोड़े हल या रथ से छोड़ दिये जाते हैं उसी प्रकार)। पशु वायु के ही अनुचर हैं (वायु ही
उनका अगुआ है)। वायु प्राण है। प्राण से ही पशु चलते हैं ॥१५॥
एक बार (प्राण) देवों से निकलकर पशुओं के साथ चला गया। देवों ने उसे प्रातः-
सवन में बुलाया, वह नहीं आया। दोपहर के सवन में बुलाया, वह नहीं आया। तीसरे सवन में
बुलाया, तब—॥१६॥
लौटने की इच्छा करके उसने कहा, 'यदि लौट आऊँ तो मुझे क्या मिलेगा?' उन्होंने
उत्तर दिया कि 'तेरे ही द्वारा ये पात्र नियुक्त हो सकेंगे और तेरे ही द्वारा खुल सकेंगे।' इसलिए
ये पात्र (वायु के) द्वारा ही नियुक्त होते हैं जब प्रातःसवन में इन्द्र, वायु आदि के लिए ग्रहों
को निकालते हैं। और जब कहा कि 'हे वायु, तू अपनी जोड़ियों को खोल दे' तो इसी (वायु) के
द्वारा वे खुलते हैं। जोड़ी का अर्थ है पशु। इस प्रकार पशुओं द्वारा ये पात्र खोले जाते हैं ॥१७॥
अगर वह प्रातःसवन में ही लौट आया होता—प्रातःसवन गायत्री का है और गायत्री
ब्राह्मण है-तो पशु केवल ब्राह्मण के ही हो जाते। यदि वह दोपहर के सवन में लौट आया होता-
दोपहर का सवन इन्द्र का है, इन्द्र क्षत्रिय है-तो पशु केवल क्षत्रिय के ही हो जाते। परन्तु चूंकि
वह तीसरे सवन में लौटा-तीसरा सवन विश्वेदेवों का है और विश्वेदेव का अर्थ है 'सब-कुछ',
इसलिए पशु भी सर्वत्र ही होते हैं ॥१८॥
सौम्यश्चरुः, पात्नीवतग्रहश्च
अध्याय ४-ब्राह्मण २
अब सोम के चरु का कृत्य आरम्भ हुआ। सोम देवों की हवि है। अब यह सोम के लिए
हवि बनाई जाती है। इस प्रकार सोम इससे अलग नहीं होता। यह चरु होता है क्योंकि चरुदेवों
का अन्न है। चरु भात है। भात तो प्रत्यक्ष में अन्न है। इसलिए चरु बनाया जाता है ॥१॥
यह (चरु.को) न तो प्रातःसवन में बनाते हैं, न दोपहर के सवन में, क्योंकि प्रातःसवन
और दोपहर का सवन केवल देवों के ही हैं। सोम पितरों का है ॥२॥
यदि (चरु) प्रातःसवन में बनाता या दोपहर के सवन में, तो देवों और पितरों में झगड़ा
हो जाता। वह इसको तीसरे सवन में बनाता है क्योंकि तीसरा सवन विश्वेदेवों का है। इस
प्रकार वह झगड़ा नहीं होने देता। अनुवाक नहीं पड़ता, क्योंकि पितर तो एक बार ही चले गये।
इसलिए अनुवाक नहीं पढ़ता ॥३॥
पहले चार पात्रों में घी लेकर और (आग्नीध्र से) श्रौषट् कहलवाकर आदेश देता है कि
'घी की आहुति दे' और वषट्कार करके आहुति देता है। अब तक जितनी आहुतियां दी जा चुकीं
६१० शतपथ ब्राह्मण
हुता भव॑न्ति ताभ्य ए॒वैतद्द॑धाति तथा हासमदं करोति ॥४॥ ॥ शतम् २६००॥॥
स आज्यस्योपस्तीर्य॑ । द्विर्श्वरो॒ऽवद्य॑त्यथो॒परिष्टादाज्यस्याभिघारयत्याश्राव्याह॒ सौ-
म्यस्य॒ यजेति वषट्कृते जुहोति ॥५॥ अथापरं॑ चतुर्गृहीतंमाज्यं गृहीत्वा । श्रा-
व्याव्राह घृ॒तस्य यजेति वषट्कृते जुहोति तथा अत ऊर्ध्वा आहुतीर्होष्यान्भवति
ताभ्य ए॒वैतद्द॑धाति तथा हासमदं करोति स यदि कामयेतोभयतः॒ परि॑यजेयु-
र्यु कामयेतान्यतरतः परि॑यजेत् ॥६॥ अथ प्रचरणीति स्रुग्भवति । त्स्यां चतुर्गृ-
हीतंमाज्यं गृहीत्वाध्वर्युः शालाकैर्द्धिष्ण्यान्व्याघारयति तद्यच्छालाकैर्र्द्धिष्ण्यान्व्याघा-
रयति यद्दे॒वैनानदो देवा अब्रुवंस्तृतीयसव॑नं वो घृत्याहुतिः प्राप्स्यति न सौ-
म्यापहतो हि यु॒ष्मत्सोमपीथ॒स्तेन सोमाहुतिं नार्हथेति सैनानिशा तृतीयसवन॒
ऽएव घृत्याहुतिः प्राप्नोति न सौम्या यच्छालाकैर्र्द्धिष्ण्यान्व्याघारयति तानेवैरेव
यजु॑र्भिर्य॒थोपकीर्णा यथापूर्वं व्याघारयति मार्जालीयऽए॒वोत्तमम् ॥७॥ तदैके ।
आग्नीध्रीये पुनराघारयन्त्युदग्ऽइदं कर्मानुसंतिष्ठाता॒ऽइति तडु तथा न कुर्यान्मा-
र्जालीयऽए॒वोत्तम॒७ ॥८॥ स यत्राध्वर्युः । शालाकैर्र्द्धिष्ण्यान्व्याघारयति तत्प्रतिप्र-
स्थाता पत्नीवतं ग्रहं गृह्णाति यज्ञाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते यज्ञात्प्रजायमाना मिथुनात्प्र-
जायन्ते मिथुनात्प्रजायमाना अन्ततो यज्ञस्य प्रजायन्ते तदेना एतदन्ततो॑ यज्ञस्य मि-
थुनात्प्रजननात्प्रजनयति तस्मान्मिथुनात्प्रजननादन्ततो॑ यज्ञस्येमाः प्रजाः प्रजायन्ते
तस्मात्पत्नीवतं गृह्णाति ॥९॥ तं वाऽउपा॒ꣳशुपात्रेण गृह्णाति । यदि सावित्रमुपा॒ꣳ-
शुपात्रेण गृह्णीयादन्तर्यामपात्रेणैतं यदि सावित्रमन्तर्यामपात्रेण गृह्णीयादुपाꣳशुपा-
त्रेणैतꣳ समानꣳ ह्येतद्यदुपाꣳश्वन्तर्यामौ प्राणो हि यो वै प्राणः स उदानो वृषा
वै प्राणो योषा पत्नी मिथुनमेवैतत्प्रजननं क्रियते ॥१०॥ तं वाऽञ्चपुरोरुकं गृ-
ह्णाति । वीर्यं वै पुरोरुङ्तेखीषु वीर्यं दधानीति तस्मादपुरोरुकं गृह्णाति ॥११॥
अथातो गृह्णात्येव । उपयामगृहीतोऽसि॒ बृह॒स्पति॑सुतस्य देव सोम तऽइति ब्रह्मण
का० ४, अ० ४, ब्रा० २, कं० ४-१२ शतपथब्राह्मण / ६११
उनसे इसको अलग कर देता है। इस प्रकार झगड़ा नहीं होने देता ॥४॥
घी की एक तह लगाकर चरु के दो भाग करता है, और ऊपर से भी घी लगा देता है।
श्रौषट् कहलवाकर कहता है 'सौम्य की आहुति दे' और वषट्कार से आहुति देता है ॥५॥
फिर चार जगह घी लेकर, श्रौषट् कहलवाकर और 'आहुति दे' ऐसा आदेश देकर वषट्-
कार से आहुति देता है। इस प्रकार जो आहुतियां आगे दी जानेवाली हैं उनसे इसको अलग कर
देता है। इससे झगड़ा नहीं होने पाता। चाहे तो चरु के आगे और पीछे दोनों बार घी की आहुति
दे दे, चाहे एक बार ॥६॥
एक स्रुक् का नाम है 'प्रचरणी'। उसमें चारों भाग घी लेकर अध्वर्यु शलाकाओं (लकड़ी
की चीपटी) से धिष्ण्या में घी छोड़ता है। धिष्ण्या में शलाकों द्वारा घी छोड़ने का कारण यह है
कि पहले कभी देवों ने उन (गन्धर्व सोम-संरक्षकों) से कहा था कि तीसरे सवन में एक घृत-
आहुति तुम्हारी होगी, लेकिन सोम की नहीं। सोम-पान तो तुमसे छाना जा चुका है। तुम सोम
की आहुति के योग्य नहीं हो। वही घी की आहुति तीसरे सवन में उनको प्राप्त होती है, न सोम
की, क्योंकि वह धिष्ण्या में शलाकाओं पर घी छोड़ता है। उनको उन्हीं यजुओं से क्रमशः पूर्व की
भांति घी से युक्त करता है। सबसे पीछे मार्जालीय को ॥७॥
कुछ लोग आग्नीध्रीय पर फिर घी छोड़ते हैं जिससे अग्नि के उत्तर की ओर इस कार्य
की समाप्ति हो। परन्तु ऐसा न करे। मार्जालीय ही सबसे अन्त में होना चाहिए ॥८॥
जब अध्वर्यु शलाकाओं द्वारा धिष्ण्या में घी छोड़े, तब प्रतिप्रस्थाता पत्नीवत ग्रह को
लेवे। यज्ञ से ही प्रजा उत्पन्न होती है। यज्ञ से उत्पन्न होते हुए मिथुन (जोड़े) से पैदा होते हैं।
जोड़े से पैदा होते हुए यज्ञ के पिछले भाग से पैदा होते हैं। इसलिए यहाँ वह इसको मिथुन से,
यज्ञ के अन्तिम भाग से उत्पन्न करता है। इसलिए वह पत्नीवत ग्रह को लेता है ॥९॥
वह इसको उपांशु पात्र के साथ लेता है। यदि उपांशु पात्र के साथ सावित्र पात्र को लिया
हो तो अन्तर्याम पात्र के साथ। यदि अन्तर्याम पात्र के साथ सावित्र को ले तो इसको उपांशु पात्र
के साथ। यह सब एक ही बात है। उपांशु और अन्तर्याम दोनों ही प्राण हैं। जो प्राण है वही
उदान है। प्राण नर है (प्राणः-पुंल्लिंग) और पत्नी नारी है। इस प्रकार जोड़े से ही उत्पत्ति
होती है ॥१०॥
इस ग्रह को पुरोरुक् के बिना ही लेता है। पुरोरुक् वीर्य है। स्त्री में तो वीर्य होता नहीं।
इसलिए बिना पुरोरुक् के लेता है ॥११॥
इस मन्त्र से लेता है, "उपयामगृहीतोऽसि बृहस्पतिसुतस्य देव सोम ते" (यजु० ८।६)