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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

कां० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० २०-२७ शतपथब्राह्मण / ५३१
अब वह 'हविर्धान' से बाहर आता है यह कहता हुआ कि मैं अन्तरिक्ष में होकर आता
हूँ। अन्तरिक्ष में राक्षस दोनों ओर से स्वच्छन्द मूलरहित फिरता है। इसी प्रकार यह पुरुष भी
दोनों ओर से स्वच्छन्द मूलरहित अन्तरिक्ष में फिरता है। यह यजुः है, राक्षस को मारनेवाली
स्तुति । इसी स्तुति के द्वारा वह अन्तरिक्ष को निर्भय और राक्षस से मुक्त कर देता है ॥२०॥
अब वर मांगता है—देव इस ग्रह के होम को अत्यन्त चाहते हैं। और वे इसके लिए
उसको वर देते हैं कि शीघ्र ही यह होम हमारे लिए दे देवे। इसलिए वर को माँगता है ॥२१॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"स्वां कृतोऽसि" (यजु० ७।३)—"यह ग्रह इसका
प्राण है।" वह उसी का किया हुआ स्वयं उत्पन्न हुआ है, इसलिए कहा कि 'स्वांकृतः' अर्थात्
अपने-आप बना हुआ है। "विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यः" (यजु० ७।३)—"सब
प्रजाओं के लिए यह स्वयं ही बना है।" "मनस्त्वाष्टु" (यजु० ७।३)—"तुझको मन प्राप्त
करे।" मन प्रजापति है, इसलिए इसका अर्थ हुआ कि प्रजापति तुझको पावे। "स्वाहा त्वा
सुभव सूर्याय" (यजु० ७।३)—"हे भलीभाँति उत्पन्न तुझ सूर्य के लिए स्वाहा।" इस प्रकार
वह दूसरे देवता के लिए स्वाहाकार करता है ॥२२॥
यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, उसी में उसने आहुति दी है। यही सब-कुछ है। इसलिए
वह उस (सूर्य) को सर्वोपरि बनाता है। यदि वह दूसरे स्वाहाकार को पहले देवता के लिए
करता तो वह सूर्य से भी बड़ा हो जाता। इसलिए दूसरे स्वाहाकार को उसी देवता के लिए
करता है ॥२३॥
अब आहुति देकर ग्रह को पोंछता है। इसमें वह जाते हुए प्राण को फिर रखता है।
अब हथेली से मध्यपरिधि में वह पोंछा हुआ सोम लगाता है। इस प्रकार उसमें जाते हुए प्राण
को धारण कराता है इस मन्त्र से —"देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यः" (यजु० ७।३)—"किरणों को
पीनेवाले देवों के लिए तुझको" ॥२४॥
उसी (सूर्यमंडल) में उसने आहुति दी है, जो कि तपता है। उसी की किरणें
'मरीचिपा' (प्रकाश का पान करनेवाली) हैं। उन्हीं को वह प्रसन्न करता है। उसी से प्रसन्न
होकर देव उसे स्वर्गलोक को ले जाते हैं ॥२५॥
इस ग्रह के लिए न कोई अनुवाक्य है न याज्य । वह एक मन्त्र से आहुति देता है, इसी
से वह अनुवाक्य और याज्य दोनों से युक्त हो जाता है। यदि वह कोई अभिचार करना चाहे तो
सोम की डाली को चिपका ले, बाहों से, छाती से या कपड़े से, और इस मन्त्र से आहुति देवे—
'देवाऽशो यस्मै त्वेडे तत् सत्यमुंपरिप्लुता भङ्गेन हतोऽसौ फट्"—"हे दिव्य सोम ! जिस काम के
लिए मैं तेरी स्तुति करता हूँ, वह पूरा होवे। और अमुक पुरुष (मेरा शत्रु) नष्ट हो जाय।" जिस
प्रकार मारे जानेवाले शत्रुओं में से कोई भाग जाता है, इसी प्रकार सोम की कुचली जानेवाली
शाखाओं में से यह एक बच सकती है। जो इस प्रकार करता है उसका कोई शत्रु भागकर बचने
नहीं पाता। इस मन्त्र से वह ग्रह को रख देता है—"प्राणाय त्वा" (यजु० ७।३) क्योंकि यह
ग्रह इस यज्ञ का प्राण है ॥२६॥
कुछ लोग इसको दक्षिण की ओर रखते हैं। वे कहते हैं कि इसी दिशा में सूर्य चलता

अध्याय-१, ब्राह्मण-२

५३२ शतपथ ब्राह्मण
सं॒चर॑तीति॒ तदु॒ तथा॒ न कुर्या॒दुत्त॑रार्द्धऽए॒वैनꣳ॑ सादये॒न्नो ह्ये॑तस्या॒ आहु॑तेः का
च॒न परा॑स्ति॒ तꣳ सादयति प्रा॒णाय॑ त्वेति प्रा॒णो ह्य॑स्यै॒षः ॥ २७॥ अथो॑पा॒ꣳ॒श॒सव॑-
न॒माद॑त्ते । तं॒ न दशा॑भि॒र्न प॒वित्रे॑णोपस्पृशति य॒था व्य॒ह्निः प्र॒णिक्त॑मे॒वं तद्य॒द्य॑थ-
श्च॒राक्लि॑ष्टः स्यात्पा॒णिनै॑व प्र॒ध्र्क्ष्योध्व॑म॒पनि॑पादये॒द्याना॑य त्वेति व्या॒नो ह्य॑स्यै॒षः
॥ २८ ॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ १ ॥ ॥
प्रा॒णो ह्य॒ वाऽअ॑स्योपा॒ꣳ॒शुः । व्या॒न उपा॑ꣳश॒सवन॒ उदा॑न॒स्त्व॒न्तर्या॒मः ॥ १॥
अथ॒ यस्मा॑दन्तर्या॒मो नाम॑ । यो वै प्रा॒णः स॒ उ॑दानः स॒ व्यान॒स्तमे॒वास्मि॑न्नेत॒त्परा॑-
चं प्रा॒णं द॑धाति॒ यदु॑पा॒ꣳ॒शुं गृह्णा॑ति॒ तमे॒वास्मि॑न्नेत॒त्प्रत्यञ्च॑मुदा॒नं द॑धाति॒ यद॑न्तर्या॒मं
गृह्णा॑ति॒ सो॑ऽस्यायमुदा॒नोऽन्त॒रात्म॒न्यत॑स्तद्यद॒स्यैषो॑ऽन्त॒रात्म॒न्यतो यद्वैनेनेमाः प्र॒जा
य॒तास्तस्मा॑दन्तर्या॒मो नाम॑ ॥ २॥ त॒मतः॑प॒वित्रा॑द्गृह्णाति । प्रत्यञ्च॑मे॒वास्मि॑न्नेत॒दुदा॑नं
द॑धाति॒ सो॑ऽस्यायमुदा॒नोऽन्त॒रात्म॒न्हित॒ श्तेनो॑ हास्याप्युपा॒ꣳ॒शुर॒तः॑प॒वित्रा॑द्गृही॒तो
भव॑ति स॒मानꣳ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳ॒श्वन्तर्या॒मौ प्रा॒णोदा॒नौ ह्ये॑तेनो॒ हैवास्यैषो॑ऽपीत॒रेषु॑
ग्र॒हेष्व॑नाच्छिद्रवति ॥ ३॥ अथ य॒स्मात्सोमं॑ प॒वित्रे॑ण पाव॒यति॑ । य॒त्र वै सोमः॑ स्वं
पु॒रोहि॑तं॒ बृह॒स्पति॑म॒जिज्ञा॑ तस्मै॒ पुन॑र्ददौ तेन सꣳशशास तस्मिन्पुनर्द॒ऽइवा॑-
तिशिष्ट॒मेनो॑ यद्दी॒क्षूंनं ब्रह्म॒ ड्यानायाभिद॒धौ ॥ ४॥ तं दे॒वाः प॒वित्रे॑णापावयन् ।
स मेध्यः॑ पू॒तो दे॒वानाꣳ॑ ह॒विर्भव॒त्तथो॑ऽए॒वैन॑मे॒ष ए॒तत्प॒वित्रे॑ण पाव॒यति॒ स मे॑-
ध्यः पू॒तो दे॒वानाꣳ॑ ह॒विर्भव॑ति ॥ ५॥ तद्यदुपया॒मेन॒ ग्रहा॑ गृ॒ह्यन्ते॑ । इ॒यं वाऽअ॑-
दि॒तिस्तस्या॑ अदः प्रायणी॒यꣳ ह॒विरा॑सावादि॒त्यश्च॒रुस्तद्द्वे तत्पु॑रेव सु॒त्या॑यै सा हेयं
दे॒वेषु॑ सु॒त्याया॑मपिबन्मीषेऽस्त्वेव मे॑ऽपि प्रसु॒ते भा॒ग इ॑ति ॥ ६॥ ते ह देवा ऊ-
चुः । व्यादि॑ष्टोऽयं दे॒वता॑भ्यो य॒ज्ञस्त्वयै॑व ग्र॒हा गृ॒ह्यन्तां॑ दे॒वता॑भ्यो हूयन्ता॒मिति॑
तथे॑ति॒ सो॑ऽस्या ए॒ष प्रसु॑ते भा॒गः ॥ ७॥ तद्यदुपया॒मेन॒ ग्रहा॑ गृ॒ह्यन्ते॑ । इ॒यं वाऽउ॑-
पया॒म इ॒यं वाऽइ॒दमन्नाद्य॒मुप॑यच्छति प॒शुभ्यो॑ मनु॒ष्ये॑भ्यो॒ वन॒स्पति॑भ्य इ॒तो वाऽउ॑-

का० ४, अ० १, ब्रा० १-२, कं० २७-२८ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५३३
है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। उसको उत्तर की ओर रक्खे। क्योंकि इससे उत्तर (उत्कृष्ट)
कोई ग्रह है ही नहीं। इसको "प्राणाय त्वा" (यजु० ७।३) कहकर रखता है क्योंकि यह उसका
प्राण है ॥२७॥
अब वह उपांशु सवन को लेता है। वह इसको न झालर से छूता है न पवित्रे से। ऐसा
करने से तो पानी से धोने के तुल्य होगा। यदि कोई अंशु या सोमलता का टुकड़ा लगा हो तो
उसे हाथ से छुटा दे और उस (उपांशु सवन) को (उपांशु-ग्रह के) पास रख दे उत्तर की ओर
मुंह करके, इस मन्त्र से—"व्यानाय त्वा" (यजु० ७।३) क्योंकि यह यज्ञ का व्यान है ॥२८॥
अन्तर्यामग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण २
इस (यज्ञ) का प्राण उपांशु ग्रह है, व्यान उपांशु सवन है और अन्तर्याम ग्रह उदान
है ॥१॥
अन्तर्याम नाम यों पड़ा—जो प्राण है सो उदान, वही व्यान है, इसी में उस जाते हुए
प्राण को धारण करता है; जो उपांशु ग्रह को लेता है, और जो अन्तर्याम ग्रह को लेता है उसमें
लौटते हुए उदान को लेता है, यह उदान उसके अन्तरात्मा में ही है; यह जो उदान अन्तरात्मा
में है और चूंकि इसमें यह प्रजा 'यताः' अर्थात् व्याप्त है, इसलिए इस ग्रह का नाम 'अन्तर्याम'
पड़ गया ॥२॥
उसको पवित्रे के भीतर से निकालता है। इस प्रकार लौटके निकलते हुए उदान को
उसमें धारण करता है। यह उदान उसी में स्थित होता है। इसीसे उसकी उपांशु-आहुति पवित्रे
के भीतर से निकली हुई हो जाती है, क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम एक ही हैं, क्योंकि वे प्राण
और उदान हैं। इसके अतिरिक्त इसके द्वारा उसका प्राण अन्य ग्रहों में भी निरन्तर स्थित हो
जाता है ॥३॥
सोम को पवित्रे से शुद्ध करने का कारण यह है-जब सोम ने अपने ही पुरोहित बृहस्पति
को सताया था तो पीछे से उसने उसका माल वापस कर दिया था और वह शान्त हो गया था।
माल लौटा देने पर भी कुछ दोष तो शेष रह ही गया क्योंकि उसने ब्राह्मण को सताने का विचार
कर लिया था ॥४॥
उसको देवों ने पवित्रे से शुद्ध किया। वह पवित्र होकर देवों की हवि बन गया। इसी
प्रकार यह भी इसे पवित्रे से शुद्ध करता है। यह पवित्र होकर देवों की हवि बन जाता है ॥५॥
उपयाम के साथ ग्रह इसलिए लिये जाते हैं कि यह पृथिवी आहुति है। आदित्य चरु
इसका प्रायणीय हवि है। वह सोम के बनाने से पूर्व की बात है। उसने चाहा कि देवों के साथ
मेरा भी भाग मिल जाय, और कहा कि निचोड़े हुए सोम में से मुझे भी भाग मिले ॥६॥
उन देवों ने कहा, 'यज्ञ तो देवताओं में बँट चुका। तेरे द्वारा ही ग्रह लिये जायेंगे, और
तेरे ही द्वारा देवताओं की आहुतियां दी जावेंगी।' उसने कहा 'अच्छा।' वस्तुतः यह उस अर्पित
सोम का उस (अदिति) का भाग है ॥७॥
उपयाम के साथ ग्रह इसलिए भी लिये जाते हैं कि यह पृथिवी उपयाम है क्योंकि यह अन्न
आदि को रखती है (उपयच्छति) - पशुओं के लिए, मनुष्यों के लिए और वनस्पतियों के लिए।

४. अध्य शतपथ ब्राह्मण
र्धी दे॒वा दि॒वि हि दे॒वाः ॥ ८॥ तद्य॒दुपया॒मेन ग्रहा गृह्य॑न्ते । अन्न॑मेव॒ तद्गृह्य॑न्ते
ऽथ॒ यद्योनौ॑ सा॒दय॑तीयं वाऽअ॒स्य सर्व॑स्य॒ योनि॒रस्यै वाऽइ॒माः प्र॒जाः प्र॒जाताः
॥ ९॥ तं वाऽए॒तत् । रेतो भूतं सो॒ममृ॒त्विजो बिभ्रति॒ यद्वाऽअयोनौ रेतः॑ सिच्य॑-
ते प्र वै तन्मीयते॒ऽथ॒ यद्योनौ॑ सा॒दय॑त्य॒स्यामे॒व तत्सा॒दय॑ति ॥ १०॥ प्रा॒णो॒दा॒नौ
ह वाऽअ॒स्यैतौ ग्रहौ॑ । तयो॒रुदि॑ते॒ऽन्यत॑रं जुहो॒त्यनु॑दिते॒ऽन्यत॑रं प्रा॒णोदा॒नयो॒-
र्व्याकृ॑त्यै प्रा॒णोदा॒नावै॒वैतद्व्याक॑रोति॒ तस्मा॑देतौ समा॒नावेव सन्ता॒ नाने॑वाचक्षते
प्रा॒ण इति॒ चोदा॒न इति॑ च ॥ ११॥ अ॒हो॒रा॒त्रे ह वाऽअ॒स्यैतौ ग्रहौ॑ । तयो॒रुदि॑ते
ऽन्यत॑रं जुहो॒त्यनु॑दिते॒ऽन्यत॑रमहोरा॒त्रयो॒र्व्याकृ॑त्या॒ऽअहोरा॒त्रेऽए॒वैतद्व्याक॑रोति ॥ १२॥
अहः॒ सन्त॑मुपां॒शुम् । तं रात्रौ॑ जुहोत्य॒हरे॒वैतद्रात्रौ॑ दधाति॒ तस्मा॒दपि॑ सुतमि-
श्रायामिव॒ किंचि॑त्ख्यायते ॥ १३॥ रात्रिं॒ सन्त॑मन्तर्या॒मम् । तमुदि॑ते जुहोति॒ रात्रि॑-
मे॒वैतदु॒रुन्ध॑धाति॒ तेनो॒ हासा॒वादित्य उ॒द्यन्ने॒वेमाः प्र॒जा न प्रद॑हति॒ तेने॒माः प्र॒जा-
स्त्राताः ॥ १४॥ अथातो गृह्णात्येव । उपयामगृहीतोऽसीत्युक्त उपयामस्य बन्धु॒र्-
ऽए॒ह म॒घव॒न्पाहि सोम॒मितीन्द्रो॒ वै म॒घवानिन्द्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ ने॒ता तस्मा॒दाह॑ मघ-
व॒न्निति॑ पा॒हि सोम॒मिती॑ गोपाय॒ सोम॒मित्ये॒वैतदा॒होरु॒ष्य रा॒य एषो॑ य॒ज्ञस्वेति॑
प॒शवो॒ वै रा॒यो गोपाय॑ प॒शूनित्ये॒वैतदा॒हैषो॑ य॒ज्ञस्वेति॑ प्र॒जा वाऽइ॒षस्ता ए॒वैत-
द्यायजू॒काः क॑रोति॒ ता इ॒माः प्र॒जा यज॑माना अ॒र्चन्त्यः श्राम्य॑न्त्यश्चरन्ति ॥ १५॥ अ-
न्तस्ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी द॑धामि । अन्त॑र्दधाम्यु॒र्वन्तरि॑क्षम् स॒जूर्दे॒वेभि॒रवरैः परैश्चेति॑ त॒-
देनं॑ वैश्वदे॒वं करोति तद्य॒देने॑ने॒माः प्र॒जाः प्राणा॒त्यञ्चोद॑न॒त्यश्चा॑न्त॒रिक्ष॒मनु॒चर॑न्ति ते-
न वैश्वदे॒वोऽन्त॑र्यामे मघवन्मा॒दय॑स्वेतीन्द्रो॒ वै म॒घवानिन्द्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ ने॒ता तस्मा॒-
दाह॑ मघव॒न्नित्यथ॒ यद॒न्तरिति॑ गृह्णात्य॒न्तस्त्वा॒त्मन्द॑ध॒ऽइत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १६॥ तं गृ-
ही॒त्वा प॒रिमा॒ष्टि॑ । नेद्ब॒हिश्चोत॒दिति॒ तं न सा॒दय॑त्युदा॒नो ह्येष तस्मा॑दयमस॒न्न
उदा॒नः संचरति॒ यद्यु॑त्वभिचरे॒द्येने॑तं सा॒दये॑द॒मुष्य त्वोदा॒नं सादया॒मीति॑ ॥ १७॥ स

का० ४, अ० १, ब्रा० २. कं० ८-१७ शतपथब्राह्मण / ५३५
देव इससे ऊपर हैं क्योंकि वे द्युलोक में हैं ॥८॥
उपयाम के साथ ग्रह इसलिए लिये जाते हैं कि इसी पृथिवी के साथ लिये जाते हैं। इसी
योनि में वे रक्खे जाते हैं क्योंकि पृथिवी योनि है, इसी से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं ॥९॥
ऋत्विज लोग रेत (वीर्य) के रूप में सोम को रखते हैं। जो रेत योनि के बाहर जाता
है वह खराब हो जाता है और जो योनि में रहता है वह ठीक रक्खा जाता है ॥१०॥
ये दोनों ग्रह उसके प्राण और उदान हैं। एक की आहुति सूर्योदय के पीछे देता है और
दूसरे की पहले, जिससे प्राण और उदान अलग-अलग रहें। इस प्रकार वह प्राण और उदान को
अलग-अलग रखता है। इसलिए ये दोनों अर्थात् प्राण और उदान एक होते हुए भी अलग-अलग
कहे जाते हैं ॥११॥
ये दोनों ग्रह उसके लिए रात और दिन हैं। एक की आहुति सूर्योदय के पीछे दी जाती
है और दूसरे की पहले-रात और दिन को अलग-अलग करने के लिए। इस प्रकार वह रात और
दिन को अलग-अलग करता है ॥१२॥
उपांशु दिन है, उसकी आहुति रात में देता है। इस प्रकार दिन को रात्रि में रखता है।
इसलिए अन्धकार-से-अन्धकार में भी कुछ तो दिखाई देता ही है ॥१३॥
अन्तर्याम रात है। उसकी आहुति दिन में देता है। इस प्रकार रात को दिन में रखता
है। इसलिए यह सूर्य उदय होकर इन प्रजाओं को नहीं जलाता। इसी से यह प्रजा सुरक्षित रहती
हैं ॥१४॥
वह उसमें से अन्तर्याम ग्रह को इस मन्त्र से लेता है—"उपयामगृहीतोऽसि” (यजु०
७।४)—"तू उपयाम अर्थात् 'सहारे (आश्रय)' के साथ लिया हुआ है।" यह 'उपयाम' का योग
कहा। "अन्तर्यच्छ मघवन् पाहि सोमम्” (यजु० ७।४)—'मघवा' है इन्द्र या यज्ञ का नेता,
इसलिए कहा कि "हे इन्द्र, सोम की रक्षा कर।" "उरुष्य राय एषो यजस्व" (यजु० ७।४)—
"पशु राय हैं अर्थात् पशुओं की रक्षा कर।" प्रजा इष हैं, इस प्रकार प्रजा को यज्ञ के इच्छुक
बनाता है जिससे ये प्रजा यज्ञ करते हुए, अर्चन करते हुए और श्रम करते हुए रहें ॥१५॥
“अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधामि । अन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम् । सजूर्देवैभिरवरैः परैश्च"
(यजु० ७।५)—"तेरे भीतर द्यौ और पृथिवी को रखता हूँ। तेरे भीतर विस्तृत अन्तरिक्ष को।
देवों से युक्त निचले और ऊँचे।" इस प्रकार इस ग्रह को सब देवों से सम्बन्धित करता है। यह
सब देवों का इसलिए है कि इसी से यह प्रजा प्राण और उदान लेती है और अन्तरिक्ष में चलती
हैं। "अन्तर्यमि मघवन् मादयस्व" (यजु० ७।५)—"हे मघवन् ! अन्तर्याम में आनन्द करो।"
मघवा इन्द्र है। इन्द्र यज्ञ का नेता है इसलिए कहा 'मघवा'। यह जो "अन्तः-अन्तः” कहकर उसे
लेता है इसका अर्थ यह है कि 'मैं तुझे आत्मा के भीतर रखता हूँ' ॥१६॥
उस ग्रह को लेकर पोंछता है कि इसमें से कुछ सोम टपक न जाय। वह इसको रखता
नहीं। यह उदान है। इसीलिए उदान निरन्तर चलता रहता है। यदि उसको कुछ पुरश्चरण
करना हो तो कहे, 'अमुक पुरुष के उदान ! मैं तुझको रखता हूँ' ॥१७॥

५३६ शतपथ ब्राह्मण

य॒द्यु॑पा॒ꣳशु॑ꣳ सा॒दये॑त् । अथैन॑ꣳ सादये॒द्यद्यु॑पा॒ꣳशुं॒ न सा॒दये॒न्नैन॑ꣳ सादये॒द्यद्यु॑पा॒ꣳशु-
म॑पिद॒ध्याद्ये॑नं द॒ध्याद्यद्यु॑पा॒ꣳशुं॒ नापि॑दध्या॒न्नैन॑मपिदध्या॒द्यथो॑पा॒ꣳशोः कर्म॑ तथै॒तस्य॑
समा॒नꣳ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मौ प्रा॒णो॒दानौ हि ॥ १८ ॥ ताण्ड ह चरकाः । ना-
नैव म॒न्त्राभ्यां॑ जुह्वति प्रा॒णो॒दानौ वा॒ऽअस्यै॒तौ ना॑नावी॒र्यौ प्रा॒णो॒दानौ॑ कुर्म॒ इति॑
वद॑न्त॒स्तदु॑ तथा॒ न कु॑र्यान्मो॒हुर्य॑न्ति ह ते यज॑मानस्य प्रा॒णो॒दानावपी॒द्वाऽए॑नं तू-
ष्णीं जु॑हुयात् ॥ १९ ॥ स यद्वा॒ऽउपा॒ꣳशुं मन्त्रे॑ण जु॒होति॑ । तदे॑वास्ये॒ष्टोऽपि॒ मन्त्रे॑ण
हु॒तो भ॑वति॒ किमु॒ तत्तू॒ष्णीं जु॑हुयात्स॒मानꣳ॒ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मौ प्रा॒णो॒दानौ हि॑
॥ २० ॥ स येनै॒वोपा॒ꣳशुं मन्त्रे॑ण जु॒होति॑ । तेनै॒वैतं मन्त्रे॑ण जुहोति॒ स्वांकृ॑तोऽसि
विश्वे॑भ्य इन्द्रि॒येभ्यो॑ दि॒व्येभ्यः॒ पार्थि॑वेभ्यो॒ मन॑स्त्वाष्टु॒ स्वाहा॑ सु॒भव॒ सूर्या॑ये॒त्युक्तो॑
यजु॑षो॒ बन्धुः॑ ॥ २१ ॥ अथ ध्रु॒वावा॑चं॒ ग्रहम॑वमा॒र्ष्टि । इदं॒ वाऽउ॑पा॒ꣳशुं॒ ध्रुवोᳵर्द्ध-
मु॒न्मा॒र्क्ष्यथा॒त्रावा॑चमवमा॒र्ष्टि प्र॒त्यञ्च॑मे॒वास्मि॑न्ने॒तदु॑दा॒नं द॑धाति ॥ २२ ॥ अथ॒ नीचा॑
पाणि॑ना । मध्य॑मे परि॒धौ प्र॒त्यगु॑पमा॒र्ष्टीदं॒ वा उपा॒ꣳशुं॒ ध्रुवोत्ताने॑न पाणि॑ना म-
ध्य॑मे परि॒धौ प्रागु॑पमा॒र्क्ष्यत्र॒ नीचा॑ पाणि॑ना मध्य॑मे परि॒धौ प्र॒त्यगु॑पमा॒र्ष्टि प्र॒त्य-
ञ्च॑मे॒वास्मि॑न्ने॒तदु॑दा॒नं द॑धाति दे॒वेभ्य॑स्त्वा मरीचि॒पेभ्य॒ इति॒ सोऽसा॑वे॒व बन्धुः॑ ॥२३॥
तं प्र॒त्याक्र॑म्य सा॒दय॑ति । उदा॒नाय॑ त्वे॒त्युदा॒नो ह्य॑स्यै॒ष तानि॒ वै सृ॒ष्ट्य॒ष्टानि॑ सा-
दयति प्रा॒णो॒दाना॒वेवैतत्सꣳ॑स्प॒र्शय॑ति प्रा॒णो॒दाना॒न्त्सन्द॑धाति ॥ २४॥ तानि॒ वाऽग्र-
नि॒ङ्ग्यमा॑नानि॒ शेरॆ॑ । आ तृ॒तीय॑सवना॒त्तस्मा॑दि॒मे म॑नु॒ष्याः॑ स्वप॑न्ति॒ तानि॒ पुन॑-
स्तृ॒तीय॑सवने प्र॒युज्य॑न्ते॒ तस्मा॑दि॒मे म॑नु॒ष्याः॑ सु॒प्ता प्र॒बुध्य॑न्ते॒ तेऽनि॑शिताश्चराच॒रा य-
ज्ञस्यै॒वैतद्वि॑धा॒मनु॒ वय॒-इव॑ ह॒ वै य॒ज्ञो वि॑धी॒यते॒ तस्यो॑पा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मावे॑व प॒क्षावा-
त्मो॑पा॒ꣳशु॒सवनः॑ ॥ २५ ॥ तानि॒ वाऽअनि॑ङ्ग्यमानानि॒ शेरॆ॑ । आ तृ॒तीय॑सवना॒त्ता-
यते य॒ज्ञ इति॑ वै॒ तद्यत्ताय॑ते॒ तस्मा॑दि॒मानि॒ वया॑ꣳसि वि॒गृह्य॑ प॒क्षाव॒नायु॑वानानि
पत॑न्ति॒ तानि॒ पुन॑स्तृतीयसवने प्र॒युज्य॑न्ते॒ तस्मा॑दि॒मानि॒ वया॑ꣳसि समा॒सं प॒क्षावा-

का० ४, अ० १, ब्रा० २, क० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ५३७ -
अगर वह उपांशु को रक्खे तो इस अर्थात् अन्तर्याम को भी रक्खे । यदि उपांशु को न
रक्खे तो इसको भी न रक्खे । यदि उपांशु को (हाथ से) ढके तो इस अन्तर्याम को भी ढके । वह
उपांशु को न ढके तो इस अन्तर्याम को भी न ढके । जैसा उपांशु के लिए, वैसा इसके लिए, क्योंकि
उपांशु और अन्तर्याम दोनों एक ही हैं । वे प्राण और उदान हैं ॥१८॥
चरक लोग इन आहुतियों को दो और मन्त्रों से देते हैं । उनका कहना है कि दोनों यज्ञ
के प्राण और उदान हैं। हम इन दोनों को भिन्न-भिन्न पराक्रमवाले बनाते हैं। परन्तु ऐसा न
करना चाहिए। इससे यजमान के प्राण और उदान बिगड़ जाते हैं। इस आहुति को चुपचाप भी
दिया जा सकता है ॥१९॥
जिस मन्त्र से उपांशु की आहुति दी जाती है उसी से इसकी भी दी हुई समझ ली जाती
है। फिर इसको चुपचाप कैसे दिया जाय ? क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम दोनों एक ही हैं। ये
उसके प्राण और उदान हैं ॥२०॥
वह जिस मन्त्र से उपांशु की आहुति देता है उसी से इस (अन्तर्याम) की भी देता है—
“स्वाङ्कृतोऽसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा सुभव सूर्याय”
(यजु० ७।६)—"तू स्वयं-बना हुआ है, सब पार्थिव और दिव्य शक्तियों के लिए । मन तेरा
हो । हे स्वयं होनेवाले ! सूर्य के लिए।" इस मन्त्र का महत्त्व कहा जा चुका ॥२१॥
आहुति देकर ग्रह को नीचे से पोंछ डालता है । उपांशु की आहुति देकर उसने ग्रह को
ऊपर से पोंछा था। इसको नीचे से पोंछता है। इस प्रकार उदान को उसमें निर्धारित करता
है ॥२२॥
अब हथेली को नीचे को करके बीच की परिधि (समिधा) में सोम मलता है । उपांशु
की आहुति देकर उसने हथेली को ऊपर को करके पश्चिम से पूर्व की ओर मध्य समिधा को मला
था । परन्तु अब की बार पूर्व से पश्चिम की ओर हथेली को नीचा करके मलता है, इस मन्त्र से,
“देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यः” (यजु० ७।६)—इसका महत्त्व वही है जो पहले का ॥२३॥
(हविर्धान की ओर) चलकर वह ग्रह को इस मन्त्र से रख देता है, “उदानाय त्वा”
(यजु० ७।६)—यह उसका उदान है। वह इस प्रकार रखता है कि वे एक-दूसरे को छूते हैं। इस
प्रकार वह प्राण और उदान को छुआता है। उन दोनों में संसर्ग उत्पन्न करता है ॥२४॥
ये (उपांशु और सवन) सायंकाल के सवन तक वैसे ही रक्खे रहते हैं जैसे मनुष्य भूमि
पर सोते हैं। इनका सायंकाल के सवन में प्रयोग होता है। जैसे ये मनुष्य सोकर उठते हैं, और
कारबार में लगते हैं। यह यज्ञ के अनुसार है। यज्ञ एक पक्षी है। उपांशु और अन्तर्याम इसके
पक्ष हैं। उपांशु-सवन इसका आत्मा (शरीर) है ॥२५॥
सायंकाल के सवन तक वे वैसे ही रहते हैं। यज्ञ ताना जाता है। जो ताना जाता है उसमें
गति होती है। जैसे पक्षी पंख खोलकर उड़ते हैं, सिकोड़कर नहीं उड़ते । सायंकाल के सवन में
इनका फिर प्रयोग होता है। ये पक्षी अपने पंखों को सिकोड़कर उड़ते हैं जब उड़ान को बन्द

अध्याय-१, ब्राह्मण-३

युवाना॒नि प॑तन्ति य॒ज्ञस्यै॒वैतद्दिधा॒मनु॑ ॥ २६॥ ॥ शतम् २३०० ॥ ॥ इ॒यं वै ह वा
ऽउ॒पाꣳशुः॑ । प्रा॒णो व्यु॑पा॒ꣳशुरि॒माꣳ ह्येव प्रा॒णन्न॒भिप्राणि॒त्यसा॒वेवा॒न्तर्या॒म उ॑दा॒नो
ह्य॒न्तर्या॒मोऽमुꣳ ह्येव लो॒कमुद॑नन्न॒भ्युद॑नित्य॒न्तरि॑क्षम॒वोपा॑ꣳशुसवनो व्या॒नो व्यु॑-
पा॑ꣳशुसवनो॒ऽन्तरि॑क्षꣳ ह्येव व्या॒नन्न॒भिव्या॑निति ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ २॥ ॥
वा॒ग्व वा॒ऽअस्यैन्द्रवाय॒वः । ए॒तद्ब्या॑त्म॒मिन्द्रो॒ ह यत्र वृ॒त्राय॒ वज्रं॑ प्रज॒हार॑
सो॒ऽबलीयान्मन्य॑मानो॒ नास्तृषीतीव बिभ्य॑न्निल॒यां च॑क्रे॒ तदे॑वापि दे॒वा अ॒पन्य॑-
लयन्त ॥ १॥ ते ह दे॒वा ऊचुः । न वै ह॒तं वृ॒त्रं वि॑द्म॒ न जी॒वं क॒त्त न एको॑
वे॒त्तु यदि॑ ह॒तो वा वृ॒त्रो जी॑वति॒ वेति॑ ॥ २॥ ते वायुमब्रुवन् । अ॒यं वै वायुर्यो
ऽयं प॑वते॒ वाय्वि॒दं वि॑द्धि॒ यदि॑ ह॒तो वा वृ॒त्रो जी॑वति वा॒ त्वं वै न आशि॑-
ष्ठो॒ऽसि यदि॑ जीवि॒ष्यति॒ त्वमे॒व क्षिप्रं पुन॒रागमिष्यसीति॑ ॥ ३॥ स होवाच । किं
मे ततः स्या॒दिति॑ प्रथमवषट्का॒र ए॒व ते॒ सोम॑स्य॒ राज्ञ इति॒ तथेत्ये॑याय वायु॒रेह॒तं
वृ॒त्रꣳ स होवाच ह॒तो वृ॒त्रो यद्व॑ते कुर्या॒त तत्कुरुतेति॑ ॥ ४॥ ते दे॒वा अ॒भ्यसृ॑-
ज्यन्त । यथा वि॒त्तिं वेत्स्य॑माना ए॒वꣳ स यमेको॑ऽलभत स ए॑कदे॒वत्यो॒ऽभव॒द्यं
द्वौ स द्वि॑देव॒त्यो यं ब॒हवः॒ स ब॑हुदेव॒त्यस्तद्यदेनं॑ पात्रै॒र्व्यगृह्णत॒ तस्माद्ग्रहा ना॑म
॥ ५॥ स एषामापू॑यत् । स एनां॑दु॒क्तः पूतिर॑भि॒ववौ स ना॑ल॒माहुत्या॑ऽऽस्रान्नारलं
भक्षा॑य ॥ ६॥ ते दे॒वा वायुमब्रुवन् । वाय्वि॒मं नो विवाही॒मं नः स्वदयति॒ स
होवाच किं मे ततः स्या॒दिति॒ त्वयै॒वैतानि॒ पात्रा॒ण्याचरी॑र॒न्निति॒ तथेति॒ होवाच
यूयं तु मे सच्या॑पवातेति॑ ॥ ७॥ तस्य देवाः । यावन्मा॒त्रमिव ग॒न्धस्या॑पज॒घ्नुस्तं॑ प-
श्चा॒दधुः॒ स ए॒ष प॒शुषु कुणापगन्धस्तस्मात्कुणपगन्धा॒न्नापि॑गृह्णीत॒ सोम॑स्य॒ ह्येष रा-
ज्ञो गन्धः ॥ ८॥ नोऽस्य॒ निष्ठीवेत् । तस्माद्यद्यप्यासक्त-इव म॒न्येताभिवातं॑ प॒-
रीया॒द्धीवै॑ सोमः पाप्मा वृ॒त्रः स यथा॒ श्रेयस्यायति पापीयान्प्रत्यव॒रोहे॑दे॒वꣳ हा-
स्मात्पा॒प्मः प्रत्यव॑रोहति ॥ १॥ अथे॒तरं वायुर्व्य॑वात् । तद॒स्वदय॒त्ततो॒ऽलमाहुत्या॑

कां० ४, अ० १, ब्रा० २-३, कं० २६-२७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ५३६
करना चाहते हैं ॥२६॥
यह पृथिवी उपांशु है। उपांशु प्राण है। प्राण के द्वारा ही तो प्राणी पृथिवी पर साँस लेता
है। अन्तर्याम द्यौ है, क्योंकि अन्तर्याम उदान है। उदान से ही प्राणी द्यौ में साँस लेता है। उपांशु-
सवन व्यान है। उपांशु-सवन अन्तरिक्ष है, क्योंकि अन्तरिक्ष में ही प्राणी व्यान-वायु को छोड़ता
है ॥२७॥
ऐन्द्रवायवग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण ३
ऐन्द्र-वायव ग्रह उसकी वाणी है और वह उसका आत्मा है। इन्द्र ने जब वृत्र के लिए
वज्र मारा तब उसने समझा कि 'मैं निर्बल हूँ, मैं उसे मार नहीं पाया।' इसलिए वह छिप गया।
अन्य देवता भी वहीं छिप गये ॥१॥
उन देवों ने कहा, 'हम नहीं जानते कि वृत्र मारा गया या नहीं। हममें से एक को देखना
चाहिए कि वह मारा गया या नहीं' ॥२॥
उन्होंने वायु से कहा, इसी वायु से जो बहता है—'हे वायु, पता तो लगा कि वृत्र जीता
है या नहीं ? हम लोगों में तू सबसे अधिक तेज है। यदि वह जीता होगा तो जल्दी से भाग आ
सकता है' ॥३॥
वायु ने कहा, 'इससे मुझे क्या लाभ ?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'सोम राजा का प्रथम
वषट्कार तुझे मिलेगा।' उसने कहा 'अच्छा' और वह गया। वृत्र तो मर चुका था। उसने कहा,
'वृत्र मर चुका है। जो मरे हुए के लिए किया जाता है उसे कीजिए' ॥४॥
देवता वहाँ दौड़े गये जैसे धन की इच्छा में लोग दौड़ते हैं। उसमें से जिसको एक देवता
ने पकड़ा वह एक-देवत्य हुआ, जिसे दो ने पकड़ा वह द्विदेवत्य, जिसको बहुतों ने पकड़ा वह
बहुदेवत्य। चूंकि उसको पात्रों के द्वारा ग्रहण किया इसलिए इनका नाम ग्रह पड़ा ॥५॥
उसमें से उनको दुर्गन्ध आई। वह खट्टा और सड़ा प्रतीत हुआ। वह न आहुति के योग्य
था, न भक्षण के ॥६॥
देवों ने वायु से कहा, 'हे वायो ! इसमें होकर बह। इसको हमारे लिए स्वादिष्ट कर
दे।' उसने कहा, 'मुझे क्या लाभ?' उन्होंने कहा कि, 'इन ग्रहों का नाम तेरे ही नाम पर
पड़ेगा।' उसने कहा, 'अच्छा ! परन्तु मेरे साथ तुम भी फूंको' ॥७॥
देवों ने उसकी जितनी दुर्गन्ध निकाल दी उतनी पशुओं में रख दी। यह वही बदबू है
जो मुर्दा पशुओं में पाई जाती है। इस दुर्गन्ध पर नाक नहीं सिकोड़ना चाहिए, क्योंकि यह सोम
राजा की गन्ध है ॥८॥
उस पर थूकना भी नहीं चाहिए। चाहे उस पर कितना ही असर क्यों न हुआ हो,
उसको वायु की ओर मुड़ जाना चाहिए। सोम का अर्थ है बड़ाई और रोग का अर्थ है बुराई।
जिस प्रकार बड़े के आने पर छोटा दब जाता है, इसी प्रकार सोम के आने पर रोग दब जाता
है ॥६॥
अब वायु ने फिर फूंका। वह स्वादिष्ट हो गया--आहुति के भी योग्य और भक्षण के

५४० शतपथ ब्राह्मण

ऽश्रासा॒न्तं भ॑जाय॒ तस्मा॑दे॒तानि॑ नानादे॒वत्यानि सन्ति वायव्यानी॒त्याच॑क्षते॒ सो
ऽस्यैष प्रथमवषट्कार॒श्च सो॒मस्य॒ राज्ञ ए॒तान्यु॒ऽनेन पात्रा॑ण्याचक्षते ॥ १०॥ इन्द्रो
ह॒ वाऽई॒क्षां च॑क्रे । वायु॒र्वै नो॒ऽस्य य॒ज्ञस्य॒ भूयि॑ष्ठभाग॒स्य प्रथमवषट्कार॒श्च सो॒म-
स्य॒ राज्ञ ए॒तान्यु॒ऽनेन पात्रा॑ण्याचक्षते हन्ता॒स्मिन्नप॑वमि॒भाऽइति॑ ॥ ११॥ स हो-
वाच । वाय॒वा मा॒स्मिन्य॒ज्ञे भ॑जेति किं ततः स्या॒दिति॒ निरु॑क्तमेव वाग्व॑दे॒दिति॒
निरु॑क्तं चेद्वाग्व॑दे॒द्वा वा भ॑जामीति॒ तत एष ऐन्द्रवाय॒वो ग्रहो॑ऽभवद्वाय॒व्यो हैव
ततः पुरा ॥ १२॥ स इन्द्रो॑ऽब्रवीत् । अ॒र्धं मेऽस्य॒ ग्रह॒स्येति तुरी॑यमेव त॒ऽइति॑
वायु॒रर्ध॒मेव म॒ऽइतीन्द्र॑स्तुरी॒यमेव त॒ऽइति॑ वायुः ॥ १३॥ तौ प्र॒जाप॑तिं प्रति॒प्रश्न-
मेयतुः । स प्रजाप॑तिर्गृहं द्वेधा च॑कार स॒ होवा॑चे॒दं वायोरित्य॑थ पुन॒रर्धं द्वेधा॑ च-
कार स॒ होवा॑चे॒दं वायोरिती॒दं तवेतीन्द्रं॑ तुरी॒यमे॒व भाज॑यां चकार॒ यद्वै चतुर्थं
तन्तुरी॒यं तत॑ एष ऐन्द्रतुरी॒यो ग्रहो॑ऽभवत् ॥ १४॥ तस्य॒ वाऽए॒तस्य॒ ग्रह॑स्य । द्वे
पुरो॒रुचौ॑ वाय॒व्यैव पूर्वेन्द्रवायव्युत्तरा द्वेऽऽनुवा॒क्ये वाय॒व्येव पूर्वेन्द्रवायव्युत्तरा
द्वौ प्रैषौ वाय॒व्य एव पूर्व ऐन्द्रवायव उत्तरो द्वे या॒ज्ये वाय॒व्यैव पूर्वेन्द्रवायव्यु-
त्त॒रैव॒मेनं॑ तुरीयं-तुरीयेणैव भाज॑यां चकार ॥ १५॥ स॒ होवाच । तुरीयं-तुरीयं चे-
न्माम॑बीभजुस्तुरी॒यमेव तर्हि वाङ्निरु॑क्तं वदिष्यतीति॒ तदे॒तन्तुरी॒यं वा॒चो निरु॑क्तं
यन्मनु॑ष्या व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनिरु॑क्तं॒ यत्प॒शवो॑ व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनि-
रु॑क्तं यद्वया॑सि व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनिरु॑क्तं॒ यदि॒दं क्षु॒द्रं स॑रीसृ॒पं व॑दति ॥ १६॥
तस्मा॑दे॒तदृषि॑णाभ्य॒नूक्तम् । च॒त्वारि॒ वाक्परि॑मिता प॒दानि॒ तानि॑ विदु॒र्ब्राह्मणा ये
म॑नी॒षिणः॑ । गुहा॒ त्रीणि॒ निहि॑ता॒ नेङ्ग॑यन्ति तुरी॒यं वा॒चो म॑नु॒ष्या व॑दन्तीति ॥ १७॥
अथातो गृह्णात्येव । आ वायो भूष शुचिपा उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववा-
र । उपो तेऽन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वेति ॥ १८॥ अ-
थापगृह्य पुनरानयति । इन्द्रवायूऽइमे सुता उप प्रयोभिरागतम् । इन्दवो वामु-

कां० ४, अ० १, ब्रा० ३, कं० १०-१६ शतपथब्राह्मण / ५४१
भी योग्य। इसलिए यह ग्रह भिन्न-भिन्न देवताओं के होते हुए भी वायु के ही कहे जाते हैं।
सोम राजा का पहला वषट्कार भी वायु का है और ये ग्रह भी वायु के ही कहे जाते हैं ॥१०॥
इन्द्र ने सोचा—हमारे इस यज्ञ का सबसे बड़ा भाग तो वायु का हो गया, क्योंकि सोम
राजा का पहला वषट्कार उसका है। इसके अतिरिक्त ये ग्रह भी उसी के नाम से पुकारे जाते
हैं। इनमें से मैं भी भाग लूंगा ॥११॥
उसने कहा, 'वायु ! इस ग्रह में मुझे भी भाग दे ।' 'मुझे क्या लाभ ?' 'वाणी व्यक्त हो
जायगी।' 'यदि वाणी व्यक्त हो जायगी तो मैं तुझे भाग दे दूंगा।' इसलिए इस ग्रह का नाम
ऐन्द्रवायव पड़ा। पहले केवल इन्द्र का ही था ॥१२॥
इन्द्र ने कहा, 'इस ग्रह का आधा मेरा ।' वायु ने कहा, 'इस ग्रह का चौथाई तेरा।' इन्द्र
ने कहा, 'आधा मेरा।' वायु ने कहा, 'चौथाई तेरा' ॥१३॥
वे दोनों फैसले के लिए प्रजापति के पास गये। उस प्रजापति ने ग्रह के दो भाग कर
दिये। उसने कहा, 'यह वायु का।' फिर आधे के दो भाग किये, और कहा, 'यह वायु का और
यह तेरा।' तब उसने अपने भाग का चौथाई इन्द्र को दिया। चतुर्थ और तुरीय का एक अर्थ है।
इसलिए इसका नाम ऐन्द्र-तुरीय ग्रह हो गया ॥१४॥
इस ग्रह के दो पुरोरुच मन्त्र होते हैं—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु-सम्बन्धी;
दो प्रैष—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु सम्बन्धी; दो याज्य—पहला वायु-सम्बन्धी,
दूसरा इन्द्र-वायु-सम्बन्धी। इस प्रकार वह सदा इन्द्र के लिए चौथाई भाग रखता है ॥१५॥
उसने कहा कि अगर मुझे चौथाई भाग दिया है तो वाणी भी चौथाई भाग ही स्पष्ट
बोलेगी। इससे केवल यही चौथाई वाणी समझ में आती है जो मनुष्य बोलता है, और जिस
चौथाई को पशु बोलते हैं वह समझ में नहीं आती। वह चौथी वाणी समझ में नहीं आती जिसे
पक्षी बोलते हैं और वह चौथाई वाणी भी समझ में नहीं आती जिसको क्षुद्र कीड़े बोलते हैं ॥१६
इसीलिए ऋषि ने कहा, “चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनी-
षिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति” (ऋ० १।१६४।४५)—
“वाणी से परिमित चार पद होते हैं। बुद्धिमान्, ब्राह्मण उनको जानते हैं। तीन गुहा में रक्खे
हुए स्पष्ट नहीं होते हैं। चौथाई वाणी को मनुष्य बोलते हैं” ॥१७॥
अब उस (सोम) में से ग्रह को मारता है, इस मन्त्र से—“आ वायो भूष शुचिपा ऽ उप
नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार। उपो ते ऽअन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वा”
(यजु० ७।७, ऋ० ७।६२।१)—“हे शुद्ध व्यान करनेवाले वायु, आ। तेरे हजारों अश्व हैं। तू सब
वरों का दाता है। हे देव, जिसका तू पहला घूंट पीता है वह आनन्द-युक्त रस तुझको अर्पण किया
गया” ॥१८॥
इस ग्रह को लेकर फिर भरता है, इस मन्त्र से—“इन्द्र वायू ऽ इमे सुता ऽ उप प्रयो-

अध्याय-१, ब्राह्मण-४

५४२ शतपथ ब्राह्मण

श॒क्ति हि । उपयामगृ॒हीतो॑ऽसि वाय॒वऽइ॑न्द्रवा॒युभ्यां॑ त्वै॒ष ते॒ योनिः॑ स॒जोषो॑भ्यां
त्वेति॑ सादयति स॒ यदा॒ह स॒जोषो॑भ्यां त्वेति॒ यो वै वायुः स इन्द्रो॒ य इन्द्रः॑ स वा-
युस्तस्मा॒दाहै॒ष ते॒ योनिः॑ स॒जोषो॑भ्यां॒ त्वेति॑ ॥ ११॥ ब्राह्मणम् ॥ ३॥॥
क्रतू॒दक्षौ॑ ह॒ वाऽअ॑स्य मित्रावरुणौ । ए॒तन्म॒ध्या॒त्म स॒ यदे॒व मन॑सा कामय-
तऽइ॒दं मे॑ स्यादि॒दं कु॑र्वी॒येति॑ स॒ एव क्रतु॒रथ॒ यदस्मै॒ तत्समृ॒ध्यते॑ स द॒क्षो मित्र॑
ए॒व क्रतु॑र्वरु॒णो दक्षो॒ ब्रह्मैव॑ मित्रः॑ क्ष॒त्रं व॑रु॒णोऽभिग॒न्तेव॒ ब्रह्म॑ क॒र्ता क्ष॒त्रियः॑
॥ १॥ ते॒ हैतेऽग्रे॒ नानेवासतुः । ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं च॒ ततः॑ शशा॒कैव॒ ब्रह्म॑ मित्र
ऋ॒ते क्ष॒त्राद्वरु॑णा॒त्स्थातुम् ॥ २॥ न क्ष॒त्रं वरु॑णः । ऋ॒ते ब्रह्म॑णो मित्रा॒द्यद् किं च॒
वरु॑णः कर्म॑ चक्रे॒ऽप्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण॒ न हैवास्मै॒ तत्समानृधे॑ ॥ ३॥ स क्ष॒त्रं
वरु॑णः । ब्रह्म॑ मि॒त्रमुप॑मन्त्रयां च॒क्रऽउप॒ माव॑र्तस्व॒ सꣳसृ॒जाव॑है पु॒रस्ता॑ करवै
त्वत्प्रसूतः॒ कर्म॑ करवा॒णीति॒ तथेति॒ तौ सम॑सृजेतां॒ तत ए॒ष मैत्रावरुणो ग्र॒होऽभ॑-
वत् ॥ ४॥ सोऽए॒व पु॑रो॒धा । तस्मा॒न्न ब्रा॑ह्म॒णः॒ सर्व॑स्येव क्ष॒त्रिय॑स्य पुरो॒धां का-
मयेत स॒ꣳ ह्ये॑तौ सृ॒जेते॑ सुकृ॒तं च॑ दुष्कृ॒तं च॒ नोऽए॒व क्ष॒त्रियः॑ सर्व॑मिव ब्राह्म॒णं
पुरो॒दधी॑त स॒ꣳ ह्ये॑वैतौ सृ॒जेते॑ सुकृ॒तं च॑ दुष्कृ॒तं च॒ स यत्ततो वरु॑णः कर्म॑ चक्रे
प्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण स॒ꣳ हैवास्मै॒ तदानृधे ॥ ५॥ तत्तदे॒वानु॑क्लृ॒प्तमेव॑ । य॒द्ब्राह्म॒णो
ऽरा॒जन्यः॑ स्या॒द्यद्यु॒ राजा॑नं ल॒भेत॒ समृ॑द्धं॒ तदे॒तद्ध॒ त्वेवानव॑क्लृप्तं॒ यत्क्षत्रियो॒ऽब्राह्म-
णो भव॑ति॒ यद्ध॒ किं च॒ कर्म॑ कुरु॒तेऽप्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण॒ न हैवास्मै॒ तत्समृ॑-
ध्यते॒ तस्मा॒द् क्ष॒त्रिये॑ण कर्म॑ करिष्यमा॒णेनोप॑स॒र्त्य एव॑ ब्राह्म॒णः स॒ꣳ ह्यै॒वास्मै॑
तद्ब्रह्म॑प्रसूतं॒ कर्म॒ऽर्धते ॥ ६॥ अ॒थातो गृ॒ह्णात्येव॑ । अ॒यं वां॑ मित्रावरुणा सु॒तः
सोम॑ ऋतावृधा । ममेदि॒ह श्रुतꣳ॒ हव॒म् । उपयामगृ॒हीतो॑ऽसि मित्रावरु॑णाभ्यां
त्वेति॑ ॥ ७॥ तं पय॑सा श्रीणाति । तद्यत्पय॑सा श्रीणा॒ति वृ॒त्रो वै सोम॑ आसी॒त्तं
यत्र॑ दे॒वा अ॒घ्नꣳस्तं॑ मि॒त्रम॑ब्रुवंस्त्वमपि जही॒तीति॑ स॒ न च॑कमे सर्व॑स्य वा॒ऽअ॒हं मि-

कां० ४, अ० १, ब्रा० ३-४, कं० १६ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५४३
भिरागतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि । उपयामगृहीतोऽसि वायव ऽ इन्द्र वायुभ्यां'' (यजु० ७।८,
ऋ० १।२।४)—"हे इन्द्र-वायु, यह सोम है। आप दोनों इसके पान के लिए आइये। बूंदें आपको
चाहती हैं। तू उपयाम के साथ लिया गया है। इन्द्र और वायु के लिए तू है।" अब वह यह
कहकर रखता है कि 'यह तेरी योनि है। तुझको ही मिले हुओं के साथ लेता हूँ।' जो वायु है वह
इन्द्र है; जो इन्द्र है सो वायु है, इसलिए कहा, 'यह तेरी योनि है।' दोनों मिले हुओं के साथ
तुझको लेता हूँ' ॥१६॥
मैत्रावरुणग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण ४
मित्र और वरुण इसके ऋतु और दक्ष हैं। यह इनका अध्यात्म है, अर्थात् ऋतु और दक्ष
आत्मिक वृत्तियाँ हैं। जब वह मन में सोचता है कि 'मेरा ऐसा हो जाय, मैं यह करूँ' यही ऋतु
अर्थात् मित्र है। और जब उसकी इच्छा पूरी हो जाती है तो यह दक्ष हुआ। मित्र ऋतु है और
वरुण दक्ष। ब्रह्म मित्र हैं, क्षात्र वरुण । ब्राह्मण सोचता है और क्षत्रिय करता है ।।१।।
आरम्भ में ये ब्राह्मण और क्षत्रिय अलग-अलग थे। तब मित्र अर्थात् ब्राह्मण वरुण
अर्थात् क्षत्रिय बिना रह सकता था ॥२॥
लेकिन वरुण या क्षत्रिय मित्र अर्थात् ब्राह्मण के बिना नहीं रह सकता था। वरुण जो
कुछ कर्म मित्र या ब्राह्मण की प्रेरणा के बिना करता उसी में असफलता हो जाती ।।३।।
वह क्षत्रिय वरुण ब्राह्मण मित्र के पास आया और कहा, 'तू मेरी ओर आ कि हम दोनों
मिल जायें। तुझी को आगे रक्खूँ। तेरी प्रेरणा से काम करूं।' उसने कहा, 'अच्छा।' वे दोनों
मिल गये। इसीलिए यह मित्र और वरुण का ग्रह हुआ ॥४॥
यही पुरोहित है। इसलिए ब्राह्मण को चाहिए कि (बिना पता लगाये) हर किसी
क्षत्रिय का पुरोहित न बने जिससे पुण्य और पाप मिल न जावें, और क्षत्रिय को चाहिए कि
(बिना पता लगाये) हर ब्राह्मण को अपना पुरोहित न बना ले कि पाप और पुण्य मिल न जायँ।
वरुण ने मित्र ब्राह्मण की प्रेरणा से जो कर्म किये उनमें उसकी सफलता हुई ॥५॥
यदि ब्राह्मण राजा के बिना रहे तो कोई दोष नहीं है। यदि राजा हो तो इसमें दोनों का
भला है। परन्तु क्षत्रिय को बिना ब्राह्मण के नहीं रहना चाहिए। क्षत्रिय जो कुछ कर्म बिना
मित्र ब्राह्मण की प्रेरणा के करता है उसमें उसकी सफलता नहीं होती। इसलिए क्षत्रिय जो कुछ
करना चाहे उसमें वह ब्राह्मण के पास जाय, क्योंकि जो कुछ वह ब्राह्मण की प्रेरणा से करेगा
उसमें उसे सफलता होगी ॥६॥
अब वह इसको इस मन्त्र से लेता है— "अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऽ ऋतावृधा ।
ममेदिह श्रुतं ु हवम् । उपयामगृहीतोऽसि मित्रावरुणाभ्यां त्वा" (यजु० ७।६, ऋ० २।४१।४) -
"हे पवित्र मित्र और वरुण, यह सोम तुम दोनों के लिए निचोड़ा गया। मेरे निमन्त्रण को
सुनो। तुमको उठाया गया है मित्र वरुण के लिए" ॥७॥
उसमें दूध मिलाता है। दूध इसलिए मिलाता है। सोम ही वृत्र था। जब देवों ने उसे
मारा तो उन्होंने मित्र से कहा, 'तू भी मार।' उसने न माना- 'मैं सबका मित्र हूँ। मित्र होकर

अध्याय-१, ब्राह्मण-५

५४४ शतपथ ब्राह्मण
त्र॒मस्मि॒ न॒ मित्रँ॑ स॒न्नमित्रो॑ भविष्या॒मीति॒ तं वै॑ वा यज्ञाद॒न्तरे॑ष्याम इत्यु॒तमे॒पि
कु॒र्व्वीति॒ होवाच॒ तस्मा॒त्पश॒वोऽपा॑क्रामन्नमित्रँ॑ स॒न्नमित्रो॑ऽभूदिति॒ स प॒शुभि॒र्व्य्या॑-
र्धय॒त्तमे॒ते दे॒वाः प॒शुभिः॒ सम॑ार्धय॒न्यत्पय॑साश्रीणाँ॒स्तद्यो॒ऽस्यै॒नमे॒ष ए॒तत्प॒शुभिः॒ स-
र्मार्धयति॒ यत्पय॑सा श्री॒णाति॑ ॥८॥ तदाहुः । शश्व॒द् नैव॒ चकमे कॢप्त॒मिति॒ तद्य॒दे-
वात्र॑ पय॒स्तन्मित्र॑स्य॒ सोम॑ ए॒व वरु॑णस्य॒ तस्मा॒त्पय॑सा श्रीणाति॒ ॥ ९॥ स॒ श्रीणा-
ति । रा॒या वयँ॒ सस॑वा॒ँसो म॑देम ह॒व्येन॑ देवा॒ यव॑सेन॒ गावः॑ । तां धे॒नुं मि॑त्रा-
वरुणा यु॒वं नो॒ विश्वा॑हा धत्तम॒नप॑स्फुरन्तीमे॒ष ते॒ योनि॑र्ऋ॒तायुभ्यां॒ त्वेति॑ सादय-
ति॒ स यदा॒ह॒र्त्तायु॑भ्यां॒ त्वेति॒ ब्रह्म॒ वाऽऋ॒तं ब्रह्म॒ हि मित्रो॒ ब्रह्मो॒ त्ऋ॒तं वरु॑ण
ए॒वायुः सं॑वत्स॒रो हि वरु॑णः संवत्सर॒ आयु॒स्तस्मा॑दाहै॒ष ते॒ योनि॑र्ऋता॒युभ्यां॑ त्वेति॑
॥१०॥ ब्राह्मणम् ॥४॥॥
श्रोत्रँ॑ ह॒ वाऽअ॒स्याश्विनः॑ । तस्मा॒त्सर्व्वतः परिहारं॒ भज॑यति॒ सर्व्व॑तो ह्ये॒नेन
श्रोत्रे॑ण शृणोति॒ यत्र॒ वै भृग॑वो वाऽङ्गि॑रसो वा स्व॒र्गं लो॒कँ समा॑श्नुवत तच्च्यव॑-
नो वा भा॒र्गवश्च्यव॑नो वाऽङ्गि॑रसस्तद्दे॒व जी॒र्णिः कृत्व्या॑रूपो जहे ॥१॥ शर्या॑तो ह॒
वाऽइ॒दं मान॑वो ग्रामे॑ण चचार । स त॒देव प्रति॑वेशो निवि॑विशे॒ तस्य कुमा॒राः
क्रीड॑न्त इ॒मं जी॒र्णिं कृत्व्या॒रूपमनर्थ्यं॑ मन्य॑माना लो॒ष्टैर्वि॑पिपिषुः ॥२॥ स॒ शर्या॑ति॒-
र्भ्यचु॑क्रोध । तेभ्यो॒ऽसंज्ञां॑ चकार॒ पितेव॒ पुत्रे॑ण युयुधे॒ भ्राता भ्रात्रा॑ ॥३॥ शर्या॑तो
ह॒ वाऽई॒क्षां चक्रे । यत्किमक॑रं॒ तस्मा॑दिदमाप॒दीति॒ स गो॒पालाँ॒श्चावि॒पालाँ॒श्च
सँ॒हूयित्वा॑ऽउवाच ॥४॥ स होवाच । को वो॒ऽद्येह किं॑चिदद्राक्षी॒दिति॒ ते हो-
चुः पुरु॑ष ए॒वायं जी॒र्णिः कृत्व्या॑रूपः शेते॒ तमन॑र्ध्यं मन्य॑मानाः कुमा॒रा लो॒ष्टैर्व्वि॑-
पिपन्तीति॒ स वि॒दां च॑कार स वै च्यव॑न॒ इति॑ ॥५॥ स रथं॑ युक्त्वा । सुक॒न्याँ॒
शार्या॒तीमु॑पाधा॒य प्रति॑ष्यन्द॒ स आ॒जगाम॒ यत्र॒ऽर्षिरा॑स॒ तत् ॥६॥ स होवाच ।
ऋषे॒ नम॑स्ते यन्नावे॑दिषं॒ तेनाहिँ॑सिषमियँ॒ सुक॒न्या तया॑ तै॒ऽपह्नु॑वे॒ संजा॑नीतां मे

कां० ४, अ० १, ब्रा० ४-५, कं० ८-१० व १-७ शतपथब्राह्मण / ५४५
अमित्र नहीं होना चाहता।' 'तो हम तुझे यज्ञ से निकाल देंगे।' तब उसने कहा 'अच्छा, मैं भी
मारूँगा।' तब पशु उसके पास से चले गये कि यह मित्र था, अमित्र हो गया। तब वह पशुओं से
वंचित रह गया। सोम में दूध मिलाने से देवों ने उसको पशुओं से युक्त कर दिया। इसी प्रकार
यह भी सोम में दूध मिलाकर इस यजमान या मित्र को पशुओं से युक्त कर देता है ॥८॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि उसने तो मारना नहीं चाहा था। इसलिए इसमें जितना
दूध है वह मित्र का है और जितना सोम है वह वरुण का। इसलिए सोम में दूध मिलाता है ॥६॥
वह इस मन्त्र से मिलाता है—“राया वयँ॒ ससवाꣳ॑सो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः ।
तां धेनुं मित्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमपस्फुरन्तीमेष ते योनिर्ऋतायुभ्यां त्वा” (यजु०
७।१०, ऋक् ४।४२।१०)—“जो सम्पत्ति हमको मिली है उससे हम आनन्दित हों। देव हव्य से
और गायें घास से। हे मित्र-वरुण, तुम हमको यह सदा दूध देनेवाली गाय दो।” यह कहकर वह
उस ग्रह को रख देता है—“यह तेरी योनि है। ऋत और आयु के लिए तुझको।” 'ऋत और आयु
के लिए' क्यों कहा ? अह्म ऋत है। अह्म मित्र है। वरुण आयु है। संवत्सर वरुण है, संवत्सर
आयु है। इसलिए कहा कि 'यह तेरी योनि है, ऋत और आयु के लिए तुझको' ॥१०॥
आश्विनग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण ५
आश्विन ग्रह इसका श्रोत्र हैं। इसलिए चारों ओर घुमाकर पीता है। इस श्रोत्र से चारों
ओर की बात सुनता है। जब अङ्गिरा-वंशी भृगु लोग स्वर्ग को गये, च्यवन भार्गव या च्यवन
आंगिरस जीर्ण और आकृति-मात्र पीछे छूट गया ॥१॥
उसी समय मनुवंशी शर्याति अपने स्वजनों के साथ उधर आया और वहीं बस गया।
उसके कुमारों ने खेलते हुए इस जीर्ण भयानक पुरुष को देखा और उसको अनर्थ्य या नाचीज
समझकर उस पर ढेले मारने लगे ॥२॥
उसने शर्याति वालों पर क्रोध किया और उनमें उसने विद्रोह उत्पन्न कर दिया। बाप
बेटे से और भाई भाई से लड़ने लगा ॥३॥
शर्याति ने सोचा कि मैंने कुछ किया है जिससे ऐसी आपत्ति आई है। उसने ग्वालों और
गडरियों को बुलाकर कहा—॥४॥
उसने कहा, 'अरे तुमने आज कोई नई बात देखी है?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'एक
जीर्ण और दीन पुरुष लेटा हुआ है, उसको नाचीज समझकर कुमारों ने उस पर ढेले फेंके थे।'
वह समझ गया कि यह च्यवन है ॥५॥
उसने रथ जोतकर उसमें अपनी सुकन्या नामक लड़की को बिठाया और वहाँ आया
जहाँ वह ऋषि था ॥६॥
और कहा, 'ऋषि, नमस्ते ! मैंने जाना नहीं इसलिए आपको दुःख दिया। यह सुकन्या है.

५४६ शतपथ ब्राह्मण
ग्रा॒म इति॒ तस्य॑ ह॒ तत॑ ए॒व ग्रामः॒ संज॑ज्ञे॒ स ह॒ तत॑ ए॒व शर्या॑तो मान॒व उच्चु॑-
यु॒जे नेद॒पर॑ꣳ हि॒नसा॒नीति॑ ॥ ७॥ अ॒श्विनौ॑ ह वाऽइ॒दं भि॒षज्य॑न्तौ चेरतुः। तौ सु॒-
क॒न्या॑मुपेयतु॒स्तस्यां॑ मिधु॒नमी॑षाते॒ तन्न ज॑ह्रौ ॥ ८॥ तौ॒ होच॑तुः। सुकन्ये॒ कनिमं
जी॒र्णिं कृ॒त्यारू॑पमु॒पशे॒षऽश्रावा॒मनु॒प्रेहीति॒ सा हो॑वाच॒ यस्मै॒ मां पि॒तादा॒न्नैवाहं
तं जी॒वन्त॑ꣳ हास्या॒मीति॒ तद्धायमुषि॒राज्ञौ॑ ॥ ९॥ स॒ होवा॑च । सुकन्ये॒ किं वैत॒-
द॑वोचता॒मिति॒ तस्मा॑ऽए॒तद्व्या॑चचक्षे॒ स ह॒ व्या॑ख्यात उवाच॒ यदि॑ वैत॒त्पुन॑र्ब्रूवतः॒
सा त्वं॒ ब्रूता॒न्न वै सु॒सर्वा॑विव स्थो॒ न सु॒समृ॑द्धावि॒वाथ॑ मे॒ पतिं॑ निन्दथ॒ इति॒ तौ
यदि॑ वा ब्रूवतः॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति सा त्वं॑ ब्रूतात्प॒तिं नु मे॒ पु-
न॑र्युवाणं कुरुत॒मथ॑ वां वक्ष्या॒मीति॒ तां॒ पुन॒रुपे॑यतु॒स्ताꣳ हैत॒द्वेवो॑चतुः ॥ १०॥ सा॒
हो॑वाच । न वै सु॒सर्वा॑विव स्थो॒ न सु॒समृ॑द्धावि॒वाथ॑ मे॒ पतिं॑ निन्दथ॒ इति॒ तौ॒
हो॑चतुः॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति सा॒ हो॑वाच॒ पतिं॑ नु मे पुन॑र्युवाणं
कुरुत॒मथ॑ वां वक्ष्या॒मीति॑ ॥ ११॥ तौ॒ हो॑चतुः । ए॒तं ह्र॒दम॒भ्यव॑हर॒ स येन॒ व-
यसा कमि॒ष्यते॒ तेनोदे॒ष्यतीति॒ तꣳ ह्र॒दम॒भ्यव॑जहार॒ स येन॒ वय॑सा चक॒मे तेनो-
दे॑याय ॥ १२॥ तौ॒ हो॑चतुः । सुकन्ये॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति तौ ह॒र्-
षिरि॑व प्र॒त्युवा॑च कुरु॒क्षेत्रे॑ऽमी दे॒वा य॒ज्ञं त॑न्वते॒ ते वां य॒ज्ञाद॒न्तर्य॑न्ति॒ तेनासर्वौ॑
स्थ॒स्तेनासमृ॑द्धावि॒ति तौ ह॒ तत॑ ए॒वाश्विनौ॑ प्रेयतु॒स्तावा॑जग्मतु॒र्देवान्य॒ज्ञं त॒न्वाना-
ꣳस्तु॑ते ब॒हिष्प॑वमाने ॥ १३॥ तौ॒ हो॑चतुः । उप॒ नौ व्ह॑यध्व॒मिति॒ ते ह॒ देवा॑ ऊ-
चुर्न॑ वामुप॒ह्वयि॑ष्यामहे॒ बहु म॑नु॒ष्येषु॒ सꣳसृ॑ष्टमचारिष्टं भि॒षज्य॑न्ताविति॑ ॥ १४॥
तौ॒ हाचतुः । वि॒शीर्णा॒ वै य॒ज्ञेन य॒ज्ञधु॒ऽइति॒ कथं॑ वि॒शीर्णेत्युप॒ नु नौ व्हय॑ध्व॒मथ॑
वो वक्ष्याव॒ इति॒ तथेति॑ ताऽउपा॒ह्वयन्त ताभ्यामे॒तमा॑श्वि॒नं ग्र॒हम॑गृह्ण॒न्तावध्व॒र्यू प-
ज्ञ॒स्याभ॑वतां॒ तावेतद्य॒ज्ञस्य॒ शिरः॒ प्रत्य॑धत्तां॒ तद्गद॑स्तद्दिवाकीर्त्यानां॒ ब्राह्म॑णे व्या-
ख्यायते॒ यथा॒ तद्य॒ज्ञस्य॒ शिरः॒ प्रति॑दधु॒स्तस्मा॑दे॒ष स्तु॒ते ब॒हिष्प॑वमाने ग्र॒हो गृ-

कां० ४, अ० १, ब्रा० ५, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ५४७
इससे मैं उसका प्रतीकार करता हूँ । अब मेरे लोग ठीक रहें।' तब से वे लोग ठीक रहे । लेकिन
मनुवंशी शर्याति वहाँ से चलता बना कि कहीं मैं इसे फिर अप्रसन्न न कर दूँ ॥७॥
उसी समय चिकित्सा करते-करते अश्विन आ निकले । उन्होंने सुकन्या को ग्रहण करना
चाहा परन्तु वह राजी न हुई ॥८॥
वे दोनों बोले, 'सुकन्या, तू किस जीर्ण नाचीज पुरुष के पास रहती है ? हमारे पास
आ।' वह बोली, 'मेरे पिता ने मुझे जिसके साथ ब्याहा है उसी के पास रहूँगी, जब तक यह जीवित
है।' ऋषि को यह बात मालूम हो गई ॥६॥
वह बोला, 'सुकन्या, इन दोनों ने तुझसे क्या कहा ?' उसने उससे सब-कुछ कह दिया ।
यह सुनकर उसने कहा, 'अगर तुझसे ये फिर कहें तो उनसे कहना कि तुम दोनों पूर्ण तो हो नहीं
फिर मेरे पति की क्यों निन्दा करते हो ? यदि वे पूछें कि किस बात में हम कम हैं या निर्बल हैं
तो कहना कि पहले मेरे पति को युवा कर दो तब कहूँगी।' वे फिर उसके पास आये और उससे
वही बात कही ॥१०॥
वह बोली, 'तुम न तो पूर्ण हो, न समृद्धवान् । फिर मेरे पति की क्यों निन्दा करते हो ?'
वे दोनों बोले, 'हम किस बात में कम हैं ? किस बात में निर्बल हैं ?' वह बोली, 'मेरे पति को
युवा कर दो तब मैं बताऊँ' ॥११॥
वे बोले, 'उस तालाब में इसको ले जा, यह जिस अवस्था की कामना करेगा उसी
अवस्था का होकर निकलेगा।' वह उसको तालाब पर ले गई। उसने जिस आयु की कामना की,
उसी आयु का होकर निकला ॥१२॥
वे बोले, 'सुकन्या, हम किस बात में अधूरे हैं, किसमें कम हैं?' तब ऋषि ने स्वयं
उत्तर दिया, 'कुरुक्षेत्र में देव यज्ञ करते हैं और तुमको बाहर निकाल दिया है। यही तुममें
अधूरापन है, यही कमी है।' यह सुनकर ये दोनों अश्विन लौट गये । वे वहाँ पहुँचे जहाँ देवों ने
बहिष्पवमान स्तुति करने के पश्चात् यज्ञ रच रक्खा था ॥१३॥
वे बोले, 'हमको भी यज्ञ में बुलाओ।' देव बोले, 'हम नहीं बुलाते। तुम तो चिकित्सा
करते-करते सब प्रकार मनुष्यों में फिरते रहे हो' ॥१४॥
वे बोले, 'अरे तुम तो बे-सिर के यज्ञ को करते हो?' 'बे-सिर का कैसे?' 'हमको बुलाओ
तब हम बतायेंगे।' 'अच्छा।' उन्होंने उन अश्विनों का आवाहन कर लिया और उनके लिए
इस आश्विन-ग्रह को लिया । ये दोनों यज्ञ के अध्वर्यु हो गये । उन्होंने यज्ञ को सिर-वाला बना
दिया । 'दिवाकीत्यों' के ब्राह्मण में लिखा है कि उन्होंने यज्ञ के सिर को किस प्रकार सम्पादित
किया । इसलिए बहिष्पवमान की स्तुति के पश्चात् यह ग्रह लिया जाता है, क्योंकि बहिष्पवमान

अध्याय-२, ब्राह्मण-१

५४८ शतपथ ब्राह्मण
ष्यति स्तु॒ते हि ब॑हिष्पवमा॒नेऽआ॑ग॒हताम् ॥ १५॥ तौ हो॑चतुः । मु॒ख्यौ वा॒ऽआवा॑-
ञ्द्य॒ज्ञस्य॒ स्वो याव॑ध॒र्युङ्ङ॒हू नावि॒मं पु॒रस्ता॒दहं पर्येाहर॒ताभि॑ द्विदे॒वत्या॑नीति॒ ता-
भ्यामे॒तं पु॒रस्ता॒दहं पर्याज॑हुर॒भि द्विदे॒वत्यां॑स्तस्मादे॒ष द॑श॒मो ग्र॒हो गृ॑ह्यते तृती॑य
एव वषट्क्रियतॆऽथ यद॑श्विना॒विती॒मे ह॒ वै द्यावा॑पृथि॒वी प्र॒त्यक्ष॑मश्वि॒नावि॒मे ही-
दꣳ सर्व॒माश्नु॑वातां पुष्करस्रजा॒वित्य॒ग्निर्हैवास्यै॒ पुष्क॑रमादि॒त्योऽमुष्यै॑ ॥ १६॥ अथा॑-
तो गृ॒ह्णात्ये॒व । या वां॑ क॒शा मधु॑मत्यश्विना सू॒नृता॑वती । तया॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम् ।
उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽस्य॒श्विभ्यां॑ त्वै॒ष ते॒ योनि॒र्माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑ सादयति॒ तं वै मधु॑मत्य॒-
ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑ सादयति तद्यन्मधु॑मत्य॒ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑
साद॒यति॑ ॥ १७॥ दध्यङ् ह वा॒ऽआ॑भ्या॒माथा॑र्वणः । मधु॒ नाम॑ ब्रा॒ह्मण॑मुवाच॒ तद्दे॒-
नयोः प्रि॒यं धाम॒ तद्दे॒वेनयोरे॒तेनो॑पग॒ह्यत॒ तस्मान्मधु॑मत्य॒ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॑
त्वेति॑ सादयति ॥ १८॥ तानि वा॒ऽए॒तानि॑ । षड्ढानि पात्रा॑णि भवन्ति॒ राज्ञाव-
मैन्द्रवायवपात्रं तत्तस्य द्वितीयꣳ रूपं तेन तद्विदेवत्यमथैकाग्रं मैत्रावरुणपात्रं त-
त्तस्य द्वितीयꣳ रूपं तेन तद्विदेवत्यमौष्ठमाश्विनपात्रं तत्तस्य द्वितीयं रूपं तेन त-
द्विदेवत्यमथ यदश्विना॒विति मुख्यौ वा॒ऽअ॒श्विनावौष्ठमिव वा॒ऽइदं मुखं तस्मादौ-
ष्ठमाश्विनपात्रं भवति ॥ १९॥ ब्राह्मणम् ॥ ५॥ प्रथमोऽध्यायः [६५.] ॥ ॥
चक्षु॑षी ह वा॒ऽअ॒स्य शुक्रा॒मन्थिनौ॑ । तद्या॒ऽए॒ष ए॒व शुक्रो य॒ एष॒ तपति त-
द्येदे॒ष एतत्तप॑ति तेनै॒ष शु॒क्रश्च॒न्द्रमा ए॒व मन्थी॑ ॥ १॥ तꣳ सक्तुभिः श्रीणाति ।
तदेनं मन्थं करोति तेनोऽएष मन्ध्येतौ ह वाऽआसां प्रजानां चक्षुषी न यदिदौ
नोदियातां न हैवेह स्वौ चन पाणी निर्जानीयुः ॥ २॥ तयोरत्तैवान्यतरः । आ-
द्योऽन्यतरोऽत्तैव युक्त आद्यो मन्थी ॥ ३॥ तयोरत्तैवान्यतरमनु । आद्योऽन्यत-
रमन्वतैव शुक्रमन्वाद्यो मन्थिनमनु तौ वाऽअन्यस्मै गृह्येतेऽअन्यस्मै हूयेते श-
ण्डामर्कावित्यसुररक्षसे ताभ्यां गृह्येते देवताभ्यो हूयेते तद्यत्तथा ॥ ४॥ यत्र वै

कां० ४, अ० १-२, ब्रा० ५-१, कं० १५-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ५४६
की स्तुति के पश्चात् ही वे आये थे ॥१५॥
वे बोले, 'हम अध्वर्यु हैं, हमीं यज्ञ में मुख्य हैं । हमारे इस पहले ग्रह को द्विदेवतों के लिए
दे दो ।' उन्होंने उस पहले ग्रह को द्विदेवतों को दे दिया । इसलिए यह दसवाँ ग्रह है और तीसरा
वषट्कार होता है । ये अश्विन कौन हैं ? द्यौ और पृथिवी । यही दो तो हैं जो सबको अश्नुवातां
या प्राप्त करते हैं । यह पुष्कर स्रज अर्थात् पुष्कर की माला वाले हैं, क्योंकि पृथिवी का पुष्कर
अग्नि है और द्यौ का सूर्य ॥१६॥
वह अश्विन ग्रह को इस मन्त्र से लेता है— “या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनूतावती ।
तया यज्ञं मिमिक्षतम्” (यजु० ७।११, ऋ० १।२२।३) — 'हे अश्विन, यह जो तुम्हारी मीठी
और प्रसन्न करनेवाली कशा या वाणी है उससे यज्ञ को मिलाओ ।' "उपयामगृहीतोऽस्यश्विभ्यां
त्वा” (यजु० ७।११) — 'तुझे आश्रय के लिए ग्रहण किया है। दोनों अश्विनों के लिए तुझको ।'
इस मन्त्रांश से उसको रख देता है— “एष ते योनिर्मध्वीभ्यां त्वा” (यजु० ७।११) — 'यह तेरी
योनि है, मधु-प्रियों के लिए तुझे ।' 'मधु' शब्द वाली ऋचा के साथ क्यों उठाता है और 'मधु-
प्रियों के लिए तुझे' ऐसा कहकर क्यों रख देता है ? ॥१७॥
दध्यङ् अथर्वा ने 'मधु-ब्राह्मण' को अश्विनों को बताया था । यह इनका प्रिय धाम है ।
उनके इसी प्रिय से वह उनके पास जाता है। इसलिए मधु शब्द वाली ऋचा से उठाता है और
'मधुप्रियों के लिए तुझको' यह कहकर रखता है ॥१८॥
ये पात्र चिकने होते हैं । इन्द्र और वायु के पात्र के बीच में मेखला होती है । यह
इसका दूसरा रूप है । इसलिए यह दो देवों का होता है। मित्र-वरुण का पात्र बकरी की आकृति
का होता है। यह इसका दूसरा रूप है। इसलिए यह दो देवताओं का है। आश्विनों का ग्रह होंठ
की आकृति का होता है। यह उसका दूसरा रूप है, इसलिए यह दो देवताओं का है। यह पात्र
अश्विनों का इसलिए होता है कि अश्विन यज्ञ का मुख (मुख्य) हैं और मुख में होंठ होते हैं ।
इसलिए आश्विन-ग्रह होंठ की आकृति का होता है ॥१९॥
शुक्रामन्थि ग्रहौ
अध्याय २–ब्राह्मण १
शुक्र और मन्थिन् ग्रह उसकी आँख हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, वह शुक्र है। चूँकि
तपता है इसलिए इसका नाम सूर्य है । चन्द्रमा मन्थी है ॥१॥
उसमें सत्तू मिलाता है। यह जो मथता है इसलिए इसका नाम मन्थी है। ये दोनों सूर्य
और चाँद इन प्रजाओं की आंख हैं, क्योंकि यदि दोनों उदय न हों तो लोगों को अपने दोनों हाथ
भी न दीखें ॥२॥
इनमें एक खानेवाला है और एक खाद्य । शुक्र खानेवाला है और मन्थी खाद्य ॥३॥
एक इनमें से खानेवाले के अनुकूल है, दूसरा खाद्य के—शुक्र खानेवाले के, मन्थिन् खाद्य
के । ये ग्रह एक के लिए जाते हैं और दूसरे के लिए इनकी आहुति दी जाती है । शण्ड और मर्क
दो असुर राक्षस हैं । इनके लिए ग्रह लिये जाते हैं और देवों के लिए इनकी आहुति दी जाती है ।
यह इस प्रकार से—॥४॥

दे॒वाः । असुर॒रक्ष॒सान्यप॑जघ्निरे तदे॒तावेव न॒ शेकु॒रपह॑न्तुं यद्ध स्म दे॒वाः किं च
कर्म॒ कुर्व॑ते॒ तद्ध॒ स्म मो॒हयि॒त्वा क्षिप्र॒ऽएव पुन॒रप॑द्रवतः ॥५॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः ।
उप॑जानीत यथे॒मावपह॑नामहा॒ऽइति॒ ते होचुर्गृहा॑वे॒वाभ्यां॒ गृहाम॒ ताव॒भ्यवै॑ष्यत-
स्तौ स्वी॒कृत्या॒पह॑निष्यामहा॒ऽइति॒ ताभ्यां॒ ग्रहौ॑ जगृहू॒स्ताव॒भ्यवै॑तां तौ स्वी॒कृत्या॑-
पाघ्नत॒ तस्मा॑च्छण्डा॒मर्का॑भ्या॒मिति॑ गृह्येते दे॒वता॑भ्यो हूयेते ॥६॥ अ॒पि होवाच
याज्ञवल्क्यः । नो स्त्वि॑द्दे॒वता॑भ्य ए॒व गृह्णीयामा३ विजि॑तरूपमिव॒ हीद॒मिति॒ तद्धे
स तन्मीमाꣳसा॑मेव॒ चक्रे नेत्तु चकार ॥७॥ इ॒मामु॒ हैके शुक्रस्य पुरोरुचं कुर्व-
न्ति । अ॒यं वे॒नश्चोद्य॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒मान॒ऽइति॒ तदे॒तस्य रू॒पं
कुर्मो य ए॒ष तप॑तीति॒ यदा॒ह ज्योति॑र्जरा॒युरिति॑ ॥८॥ इमां त्वे॒व शुक्रस्य॑ पुरो॒रुचं
कुर्या॒त् । तं प्र॒त्नथा॒ पूर्व॑था वि॒श्वथे॒मथाᳵ ज्येष्ठता॑तिं बर्हि॒षद॒ꣳ स्व॑र्वि॒दमित्ये॒ता ह्ये॑-
तम॒न्वत्ता हि ज्येष्ठस्तस्मादाह॒ ज्येष्ठता॑तिं बर्हि॒षद॒ꣳ स्व॑र्विदम् प्रती॒चीनं॑ वृज॒नं
दोहसे धुनि॒माशुं जय॑न्त॒मनु॒ यासु॒ वर्ध॑से । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ शण्डा॑य त्वै॒ष ते॒
योनि॑र्वी॒रतां पा॒हीति॑ सादयत्ये॒ता ह्ये॑तम॒न्वत्ता हि वी॒रस्तस्मा॒दाहै॒ष ते॒ योनि॑-
र्वी॒रतां पा॒हीति॒ दक्षि॑णार्धे सादयत्ये॒ताꣳ ह्ये॑ष दि॒शम॑नु॒ संचर॑ति ॥९॥ अथ म-
न्थि॒नं गृह्णा॑ति । अ॒यं वे॒नश्चोद॑य॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒माने॑ । इ॒मम॒-
पाꣳ स॑ङ्ग॒मे सूर्य॑स्य॒ शिशुं न विप्रा॑ म॒तिभी रिहन्ति । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि म॒र्काय॑
त्वेति॑ ॥१०॥ तꣳ स॒क्तुभिः॑ श्रीणाति । तद्यत्स॒क्तुभिः॑ श्रीणा॒ति वरु॑णो ह॒ वै सो-
मस्य॒ राज्ञो॒ऽभीवा॒द्धि प्र॑तिपि॒पेष॒ तद॒श्वय॑त्ततो॒ऽश्वः॒ सम॑भवत्तद्य॒ङ्कूय॒यात्स॒मभ॑वत्त-
स्मादश्वो॒ नाम॒ तस्या॒श्रु प्रास्क॑न्दत्ततो॒ यवः॒ सम॑भवत्तस्मादाहु॒र्वारु॒ण्यो॒ यव॒ इति॑
तद्यद्दे॒वाःस्यात्र॑ चक्षुषो॒ऽमीयत॒ तेनै॒वैनमेतत्सम॑र्धयति कृ॒त्स्नं क॑रोति॒ तस्मात्स॒क्तु-
भिः॑ श्रीणाति ॥११॥ स॒ श्री॑णाति । मनो॒ न येषु॒ हव॑नेषु ति॒ग्मं विपः॒ शच्या॑
वनुथो द्र॒वता॑ । आ यः शर्या॑भिस्तुविनृ॒म्णोऽअ॒स्याश्रीणीता॒दिशं॒ गभ॑स्तावे॒ष ते॒