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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-९, ब्राह्मण-१

४६८ शतपथ ब्राह्मण
प्र॒जाय॑न्त॒ऽउप॑रिष्टाद॒ग्नये॑ गृ॒हपत॑य॒ऽउप॑रिष्टाद्वृ॒षा योषा॑मधि॒द्रव॑ति ॥७॥ अथ हृ-
दय॒शूले॒नाव॒भृथं॑ यन्ति । प॒शोर्ह॒ वाऽआ॒लभ्य॑मानस्य॒ हृदयँ॑ शुक्सम॒भ्ये॑ति हृ-
दयाद्धृदयशू॒लमथ॒ यद्धृतस्य॑ परि॒तृन्द॑न्ति॒ तदल॑ङ्गुषं॒ तस्मा॒त्परितृ॒द्यैव शू॒लात्कुर्यात्त-
न्निःप्रच्यु॑ते प॒शौ हृद॑यं प्र॒वृक्योत्त॑मं॒ प्रत्यव॑दधाति ॥८॥ अथ॑ हृदयशू॒लं प्रय॑ह्व-
ति । तन्न पृ॑थि॒व्यां परा॒स्ये॒न्नाप्सु॒ स यत्पृ॑थि॒व्यां परा॒स्येदोष॑धीश्च वन॒स्पतीँ॑श्चैषा
शुक्प्र॑विशेद्यद॒प्सु परा॒स्येद॒प ए॒षा शुक्प्र॑विशेत्त॒स्मान्न पृ॑थि॒व्यां नाप्सु ॥९॥ अ॒प
ए॒वाभ्य॑वेत्य । यत्र॒ शुष्क॑स्य चा॒र्द्रस्य॑ च सं॒धिः स्यात्तद॑पगू॒हेद्यद्यु॒ऽअभ्य॒वाय॑नाय
ग्लायेद्ये॒तेन॒ यूप॑मु॒दपात्रं॑ निनी॒य यत्र॒ शुष्क॑स्य चा॒र्द्रस्य॑ च सं॒धिर्भव॑ति तद॑पगू॒हति॒
मापॊ॒ मौषधी॑र्हिंसी॒रिति॒ तथा॒ नापो नौषधी॑र्हिनस्ति॒ धाम्नो॑-धाम्नो राजँस्ततो व-
रु॒ण नो मुञ्च । यदाहु॒रघ्या॒ इति॒ वरु॑णेति शपामहे॒ ततो॑ वरुण नो मुञ्चेति॒ तदे॒-
नँ सर्व॑स्माद्वरुणपा॒शात्स॒र्व॑स्माद्वरुण्या॒त्प्रमु॑ञ्चति ॥१०॥ अ॒थाभि॒मन्त्र॑यते । सुमि॒त्रि-
या न॒ आप॒ ओष॑धयः सन्तु दुर्मि॒त्रिया॑स्तस्मै॑ सन्तु॒ योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म
इति॒ यत्र॒ वाऽए॒तेन॒ प्रच॑रन्त्याप॒श्च ह॒ वाऽअ॒स्मात्ताव॒दोष॑धयश्चाप॒क्रम्ये॑व तिष्ठन्ति
तद् ताभि॑र्मि॒त्रधेयँ॑ कुरुते॒ तथो॒ हैन॑ ताः पुन॑ः प्र॒विश॑न्त्येषो तत्र॒ प्राय॑श्चित्तिः क्रि-
यते॒ स वै नाग्नीषोमीय॑स्य प॒शोः क॑रो॒ति॒ नाग्नेय॑स्य व॒शाया॑ऽए॒वानू॒बन्ध्या॑यै ताँ
हि सर्वो॒ऽनु य॒ज्ञः संति॑ष्ठत॒ऽएत॒द्ध ह्या॑ग्नीषोमी॒यस्य॑ च प॒शो राग्नेय॑स्य च हृद॒य-
शू॒लेन॒ चरितं॑ भवति॒ यद्वशायाश्चर॑न्ति ॥११॥ ब्राह्म॒णम् ॥ १ [८. ५.] ॥ अष्टमोऽध्या-
यः [२३.] ॥ ॥
प्र॒जाप॑ति॒र्वै प्र॒जाः स॑सृजा॒नो रि॑रिचा॒न-इ॒वाम॑न्यत । तस्मा॒त्पराच्यः॑ प्र॒जा आ-
सुर्न्नास्य॑ प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॑य तस्थिरे ॥१॥ स ऐक्ष॒ता॒रिच्य् अहम् । अ॒स्माऽउ॒ कामा॒-
यासृ॒क्षि न मे॒ स काम॑ः समार्धि॒ परा॑च्यो मत्प्र॒जा अ॑भूव॒न् न म॑ प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॑-
यास्थिषतेति ॥२॥ स ऐक्षत प्रजापतिः । कथं नु पुनरात्मानमाप्याययेयोप मा

कां० ३, अ० ८-६, ब्रा० ५-१, कं० ७-११ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४६६
उत्पन्न होती है। ऊपर से गृहपति अग्नि के लिए, क्योंकि ऊपर से ही नर स्त्री में वीर्य धारण
कराता है ॥७॥
इस पर वे हृदय-शूल के साथ 'अवभृथ' स्नान को जाते हैं। जब पशु को मारते हैं तो
उसका शोक हृदय में ही इकट्ठा होता है, हृदय से हृदयशूल में। पकाये हुए मांस का जो भाग
छिदा होता है वह स्वादिष्ट होता है।१ इसलिए उसे छेदकर काँटे पर पकाना चाहिए। पशु के
तीन बार हिलाये हुए भाग पर काँटे से निकालकर हृदय को रखता है ॥८॥
अब (शमिता अध्वर्यु को) हृदय-शूल देता है। उसे पृथिवी पर न फेंके, न जल में ।
यदि पृथिवी पर फेंकेगा तो शोक ओषधि और वनस्पतियों में घुस जायगा। यदि जल में फेंकेगा
तो शोक जल में घुस जायगा। इसलिए न पृथिवी पर फेंके, न जल में ॥६॥
किन्तु जल में जाकर ऐसे स्थान पर गाड़ दे जहाँ नमी और खुश्की का मेल हो। परन्तु
जल में जाने की इच्छा न हो तो यूप के सामने जल का पात्र लाकर जहाँ नमी और खुश्की का
मेल हो वहाँ गाड़ दे, इस मन्त्र से— "मापो॒ मौषधीर्हिँ॒सीः" (यजु० ६।२२)—"जल और
ओषधि न सतावें।" इस पर जल और ओषधि हानि नहीं पहुँचाते। "धाम्नो॑ धाम्नो॒ राज॑स्ततो
वरु॑ण नो मुञ्च। यदा॒हुरघ्न्या॒ इति॒ वरु॒णेति॒ शपामहे॒ ततो॑ वरुण नो मुञ्च" (यजु० ६।२२)—
"हे राजा वरुण, हर (थान) जल से हमको छुड़ा। हे वरुण, हमको छुड़ा जिससे वे कहें कि न
हने जानेवाली और वरुण की हम शपथ खाते हैं।" इस प्रकार वह वरुण के सब जालों से या
सम्बन्धी पापों से उसको छुड़ा देता हैं ॥१०॥
अब वह जलों को कहता है—"सुमित्रिया॑ न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु दुर्मित्रिया॑स्तस्मै॑ सन्तु
यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः" (यजु० ६।२२)—"जल और ओषधियाँ हमको लाभ पहुंचावें
और हानि उनको जो हमको द्वेष करते हैं या जिनसे हम द्वेष करते हैं।" क्योंकि जब वे शूल के
साथ जाते हैं तो जल और ओषधियाँ मानो उनसे पीछे हटते हैं। परन्तु इस प्रकार वह उनसे
मित्रता करता है। इस प्रकार वे फिर उसके पास आते हैं। अब वह वहां प्रायश्चित्त करता है।
वह यह (अवभृथ) अग्नि-सोम के पशु-याग में नहीं करता, न अग्नि के; किन्तु अनुबन्ध्या-गौ
के सम्बन्ध में करता है। इस प्रकार सब यज्ञ पूर्ण हो जाता है। यह जो वशा-गौ के साथ अवभृथ
किया जाता है उससे अग्नि-सोम या अग्नि के भी पशु-याग की पूर्ति हो जाती है ॥११॥
अध्याय ६—ब्राह्मण १
प्रजापति प्रजा को उत्पन्न करके थक-सा गया। प्रजा उसके पास से हट गई। उसकी
श्री और भोजन के लिए वह उसके पास न ठहरी ॥१॥
उसने सोचा—'मैं थक गया और जिस कामना के लिए मैंने सृष्टि की रचना की वह
भी पूरी न हुई। मेरी प्रजा मेरे पास से चली गई। मेरी श्री और भोजन के लिए मेरे पास ठहरी
नहीं' ॥२॥
प्रजापति ने सोचा कि—'मैं फिर अपने को कैसे पुष्ट करूँ ? कैसे मेरी प्रजा लौटे और
१. पशु-हिंसा सर्वथा अवैदिक है और ऐसे स्थल पूर्णतः प्रक्षिप्त हैं।
—स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

५०० शतपथ ब्राह्मण

प्र॒जाः स॒मावर्त्तेरँस्तिष्ठे॑रन्मे प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॒येति॑ ॥ ३॥ सोऽर्चञ्छ्राम्यंश्चचार प्र-
जाकामः॑ । स ए॒तामे॑काद॒शिनी॑मपश्यत्स एकादशि॒न्येष्टा॑ प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नम॒-
प्यायय॒तोपै॑नं प्र॒जाः स॒माव॑र्त्तन्तात्तिष्ठन्तास्य प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॑य स वसी॑याने॒वेष्टा-
ऽभवत् ॥ ४॥ तस्मै॑ कमेकाद॒शिन्या॒ यजे॑त । ए॒व꣫ हैव॑ प्र॒जया॑ प॒शुभि॒राप्या॑यत॒ऽ-
पैनं॑ प्र॒जाः स॒माव॑र्त्तन्ते॒ तिष्ठ॑न्तेऽस्य प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॑य स वसी॑याने॒वेष्टा भव॑त्ये-
तस्मै॑ कमेकाद॒शिन्या॒ यज॑ते ॥ ५॥ स आ॑ग्ने॒यं प्र॑थ॒मं प॒शुमा॒लभ॑ते । अ॒ग्निर्वै दे॒वता॑-
नां मुखं॑ प्र॒जनयि॒ता स प्र॒जाप॑तिः स उ॒ऽए॒व यज॑मानस्तस्मादाग्ने॒यो भव॑ति ॥ ६॥
अथ सार॑स्व॒तम् । वाग्वै सर॑स्वती वा॒चैव तत्प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नमा॒प्याय॑यत
वा॒गेन॒मुप॑स॒माव॑र्त्तत वा॒चम॑नुका॒मात्म॒नो॑ऽकुरुत वा॒चोऽᳵवै॒ष ए॒तदाप्या॑यते वा॒गे-
न॒मुप॑स॒माव॑र्त्तते वा॒चम॑नुका॒मात्म॑नः कुरुते ॥ ७॥ अथ सौ॒म्यम् । अन्नं॒ वै सोमो॒
ऽन्ने॑नै॒व तत्प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नम॒प्याय॑यतान्न॒मेन॒मुप॑स॒माव॑र्त्ततान्न॒मनु॑क॒मात्म॑नो
ऽकुरुतान्नोऽᳵए॒वैष ए॒तदाप्या॑य॒त्यन्न॑मेन॒मुप॑स॒माव॑र्त्त॒तेऽन्न॒मनु॑क॒मात्म॑नः कुरुते ॥ ८॥
तद्य॒त्सार॑स्व॒तम॑नु भव॑ति । वाग्वै सर॑स्व॒त्यन्नं॑ सो॒मस्तस्मा॒द्यो वा॒चा प्र॒साम्यन्ना-
दो हैव भव॑ति ॥ ९॥ अथ पौष्णम् । प॒शवो॒ वै पू॒षा प॒शुभि॑रेव॒ तत्प्र॒जाप॑तिः पु-
न॒रात्मा॑नम॒प्याय॑यत पश॑व एन॒मुप॑स॒माव॑र्त्तन्त प॒शून॑नुका॒मात्म॒नो॑ऽकुरुत प॒शुभि॑-
र्वेᳵष ए॒तदाप्या॑यते पश॑व एन॒मुप॑स॒माव॑र्त्तन्ते प॒शून॑नुका॒मात्म॑नः कुरुते ॥ १०॥
अथ बार्हस्प॒त्यम् । ब्रह्म॒ वै बृ॒हस्पति॒र्ब्रह्म॑णैवैतत्प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नमा॒प्याय॑यत
ब्रह्मैन॒मुप॑स॒माव॑र्त्तत ब्रह्म॑नुका॒मात्म॒नो॑ऽकुरुत ब्र॒ह्मणो॑ऽᳵवै॒ष ए॒तदाप्या॑यते ब्र॒ह्मै-
न॒मुप॑स॒माव॑र्त्तते ब्रह्म॑नुका॒मात्म॑नः कुरुते ॥ ११॥ तद्य॒त्पौष्ण॒मनु॑ भव॑ति । प॒शवो॒
वै पू॒षा ब्रह्म॒ बृह॒स्पति॒स्तस्मा॒द्ब्राह्म॑णः प॒शून॒भिधृ॑ष्णुतमः पुराहि॒ता ह्य॑स्य भव॑न्ति
मु॒खऽआ॒हिता॒स्तस्मा॒द् तत्सर्वं॑ दृ॒त्वाजि॑नवासी॒ चर॑ति ॥ १२॥ अथ वैश्वदे॒व꣫ । सर्वं॒
वै विश्वे॑ दे॒वाः सर्वै॑णेव॒ तत्प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नम॒प्याय॑यत॒ सर्व॑मेन॒मुप॑स॒मावर्त्त-

कां० ३, अ० ६, ब्रा० १, कं० ३-१३ शतपथब्राह्मण / ५०१
मेरी श्री और भोजन के लिए ठहरे' ॥३॥
वह सन्तान की इच्छा से पूजा और श्रम करता रहा। उसने तब इस एकादशिनी (ग्यारह
का समूह) को देखा। उस एकादशिनी की इष्टि करके उसने अपने को पुष्ट किया। प्रजा उसके
पास लौट आई और उसकी श्री और भोजन के लिए उसके पास ठहरी। इस इष्टि से वह वस्तुतः
अच्छा हो गया ॥४॥
इसलिए ग्यारह इष्टि करनी चाहिएँ। इस प्रकार प्रजा और पशुओं के द्वारा पुष्टि हो
जाती है। प्रजा उसके पास लौट आती है। उसकी प्रजा श्री और भोजन के लिए ठहरती है। वह
इष्टि करके अच्छा हो जाता है। इसलिए ग्यारह की इष्टि करनी चाहिए ॥५॥
पहले वह अग्नि देवता सम्बन्धी पशु का आलभन करता है। अग्नि देवताओं का मुख
और उत्पन्न करनेवाला है। वह प्रजापति है। इस प्रकार यजमान अग्नि का हो जाता है ॥६॥
फिर सरस्वती के लिए। वाणी सरस्वती है। वाणी से ही प्रजापति ने फिर अपने को
पुष्ट किया। वाणी फिर उसके पास वापस आई। वाणी को उसने अपने अनुकूल किया। वाणी
से यह भी अपने को पुष्ट करता है। वाणी उसके पास लौट आती है और वह वाणी को अपने
अनुकूल बनाता है ॥७॥
फिर सोम के लिए। सोम अन्न है। अन्न से ही तब प्रजापति ने अपने को पुष्ट किया।
अन्न उसके पास लौटकर आया। अन्न को ही उसने अपने अनुकूल बनाया। अन्न से यह भी अपने
को पुष्ट करता है। अन्न उसके पास लौटकर आता है और अन्न को वह अपने अनुकूल बनाता
है ॥८॥
सरस्वती के पीछे सोम क्यों आता है ? सरस्वती वाणी है, सोम अन्न है, इसलिए जो
वाणी के द्वारा अधूरा रहता है अन्न का खानेवाला होता है ॥६॥
अब पूषा के लिए। पशु पूषा हैं। पशुओं से ही तब प्रजापति ने अपने को पुष्ट किया।
पशु उसके पास लौट आये। पशुओं को उसने अपने अनुकूल बनाया। इसी प्रकार यह भी पशुओं
के द्वारा अपने को पुष्ट करता है। पशु उसके पास लौट आते हैं,और वह पशुओं को अपने अनुकूल
बनाता है ॥१०॥
अब बृहस्पति के लिए। ब्रह्म बृहस्पति है। ब्रह्म के द्वारा ही प्रजापति ने अपने को पूर्ण
किया। ब्रह्म उसके पास लौट आया। ब्रह्म को वह अपने अनुकूल करता है। यह भी ब्रह्म के
द्वारा अपने को पुष्ट करता है। ब्रह्म उसके पास लौट आता है। ब्रह्म को वह अपने अनुकूल करता
है ॥११॥
बृहस्पति पूषा के पीछे क्यों होता है ? पशु ही पूषा हैं। ब्रह्म बृहस्पति है। इसलिए पशु
ब्रह्म के हैं। उसी ने उनको आगे रक्खा है, मुख के स्थान में रक्खा है। इसलिए इन सबको देकर
वह भेड़ के चमड़े को पहनकर चलता है ॥१२॥
अब विश्वेदेवों के लिए। विश्वेदेव 'सर्व या सब' हैं। सबके द्वारा ही प्रजापति ने अपने
को पूर्ण किया। 'सब' उसके पास लौट आये। 'सबको' उसने अपने अनुकूल बनाया। यह भी

५०२ शतपथ ब्राह्मण
त॒ सर्व॑मनुकमा॒त्मनो॑ऽकुरुत सर्वैरे॒वैष ए॒तदाप्या॑यते॒ सर्व॑मेनमुपसमा॒वर्त॑ते
सर्व॑मनुकमा॒त्मनः॑ कुरुते ॥ १३॥ तद्यद्बार्हस्प॒त्यम॑नु भ॒वति॑ । ब्रह्म॒ वै बृह॒स्पति॑ः
सर्व॒मिदं विश्वे॑ दे॒वा अ॒स्यैवैतत्स॑र्वस्य॒ ब्रह्म॑ मु॒खं क॑रोति॒ तस्मा॑दस्य॒ सर्व॑स्य ब्रा-
ह्म॒णो मु॒खम् ॥ १४॥ अथैन्द्रम् । इ॒न्द्रियं॒ वै वी॒र्य॒मिन्द्र॑ इन्द्रि॒येणै॒व तद्वी॒र्येण प्र॒-
जाप॑तिः पुनरा॒त्मान॒माप्या॑यत॒तेन्द्रि॒येणै॒व वी॒र्य॒मुप॑समा॒वर्त॑तेन्द्रि॒यं वी॒र्य॑मनुकमा॒त्म-
नो॑ऽकुरुतेन्द्रि॒येणै॒वैष ए॒तद्वी॒र्येणाप्या॑यत॒ऽइन्द्रि॒यमे॑नं वी॒र्य॒मुप॑समा॒वर्त॑त॒ऽइन्द्रि॒-
यं वी॒र्य॑मनुकमा॒त्मनः॑ कुरुते ॥ १५॥ तद्यद्वैश्वदे॒वम॑नु भ॒वति॑ । क्ष॒त्रं वाऽइ॒न्द्रो वि॒-
शो विश्वे॑ दे॒वा अ॒न्नाद्य॑मे॒वास्मा॒ऽएतत्पुर॒स्तात्क॑रोति ॥ १६॥ अथ मारु॒तम् । वि॒-
शो वै म॒रुतो॒ भूमो॒ वै विड्भूत्वैव तत्प्र॒जाप॑तिः पुनरा॒त्मान॒माप्या॑यत॒ भूमि॑नमु॒-
पस॑मा॒वर्त॑त॒ भूमा॑नमनुकमा॒त्मनो॑ऽकुरुत॒ भूम्नो॒ऽवैष ए॒तदाप्या॑यते॒ भूमि॑नमुपसमा॒-
वर्त॑ते॒ भूमा॑नमनुकमा॒त्मनः॑ कुरुते ॥ १७॥ तद्यदैन्द्र॒मनु॑ भवति । क्ष॒त्रं वाऽइ॒न्द्रो
विशो विश्वे॑ दे॒वा विशो वै म॒रुतो॒ विशै॒वैतत्क्ष॒त्रं परि॑बृ॒ह्यति॒ तदि॒दं क्ष॒त्रमु॑भय॒तो
वि॒शा परि॑बृढम् ॥ १८॥ अथैन्द्रा॒ग्नम् । तेजो वाऽअ॒ग्निरि॑न्द्रि॒यं वी॒र्य॑मिन्द्र॒ उभाभ्या॑-
मे॒व तद्वी॒र्या॑भ्यां प्र॒जाप॑तिः पुनरा॒त्मान॒माप्या॑यत॒तोभे॒ऽएनं॑ वी॒र्ये॒ऽउप॑समा॒वर्त॑ता-
मुभे वी॒र्ये॒ऽअनु॑के॒ऽआ॒त्मनो॑ऽकुरुतो॒भाभ्या॑मे॒वैष ए॒तद्वी॒र्या॑भ्यामाप्या॑यत॒ऽउभे॒ऽएनं॑
वी॒र्ये॒ऽउप॑समा॒वर्त॑ते॒ऽउभे वी॒र्ये॒ऽअनु॑के॒ऽआ॒त्मनः॑ कुरुते ॥ १९॥ अथ सावित्र॒म् ।
सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता त॒थो हास्मा॒ऽएते॑ सवितृप्रसूता ए॒व सर्वे॒ कामाः॑
समृ॑ध्यन्ते ॥ २०॥ अथ वारु॒णम॒न्तत॒ आलभ॑ते । तदे॒न॑ सर्व॑स्माद्वरु॒णपाशा॑त्स॒र्व-
स्माद्वरु॒ण्यात्प्रमु॑ञ्चति ॥ २१॥ तस्माद्यदि॒ यूपै॑कादशिनी स्यात् । आग्ने॒यमे॒वाग्निष्ठे॒
नियु॒ञ्ज्यादथे॑तरा॒न्व्युप॑नयेयुर्यथापूर्वम् ॥ २२॥ यद्यु प॒श्वे॑कादशिनी स्यात् । आग्ने॒यमेव॑
यूप॒ऽआल॑भेर॒न्नथे॑त॒रान्यथापूर्वम् ॥ २३॥ तान्यत्रोदीचो नय॑न्ति । आग्ने॒यमेव॑ प्रथ॒मं
नय॑न्त्यथे॑त॒रान्यथापूर्वम् ॥ २४॥ तान्य॒त्र निवि॑ध्यन्ति । आग्ने॒यमेव॑ प्रथ॒मं दक्षि॑णा॒र्धं

कां० ३, अ० ६, ब्रा० १, कं० १३-२५ शतपथब्राह्मण / ५०३
'सब' के द्वारा अपने को पूर्ण करता है। सब उसके पास लौट आते हैं और सबको वह अपने
अनुकूल कर लेता है ॥१३॥
यह बृहस्पति के पीछे क्यों होता है ? बृहस्पति ब्रह्म है। यह सब विश्वेदेव हैं। वह ब्रह्म
को इन सबका मुख बनाता है। इसी से ब्राह्मण सबका मुख है ॥१४॥
अब इन्द्र के लिए। इन्द्र का अर्थ है शक्ति, वीर्य। इसी शक्ति तथा वीर्य के द्वारा
प्रजापति ने अपने को पूर्ण किया। यही शक्ति या वीर्य उसके पास लौट आया। इसी शक्ति या
वीर्य को उसने अपने अनुकूल बनाया। यह भी शक्ति या वीर्य के द्वारा अपने को पूर्ण करता है।
यह शक्ति या वीर्य उसके पास लौट आता है और वह उसको अपने अनुकूल बना लेता है ॥१५॥
यह विश्वेदेवों के पीछे क्यों होता है ? इन्द्र क्षत्रिय है। विश्वेदेव वैश्य हैं। इस प्रकार वह
अन्न को सामने रखता है ॥१६॥
अब मरुत् के लिए। मरुत् वैश्य है। वैश्य का अर्थ है भूमः या बहुतायत। बहुतायत
(भूमः) से ही प्रजापति ने तब अपने-आपको पूर्ण किया। बहुतायत उसके पास लौट आई।
बहुतायत को उसने अपने अनुकूल बना लिया। इसी प्रकार वह भी बहुतायत से अपने को पूर्ण
करता है। बहुतायत उसके पास लौट आती है। बहुतायत को अपने अनुकूल बना लेता है ॥१७॥
वह इन्द्र के पीछे क्यों होता है ? इन्द्र क्षत्रिय है, विश्वेदेव वैश्य हैं, मरुत् वैश्य हैं।
इस प्रकार वैश्यों से क्षत्रिय की रक्षा होती है। यह क्षत्रिय दोनों ओर से वैश्यों के द्वारा सुरक्षित
है ॥१८॥
अब इन्द्राग्नी के लिए। अग्नि तेज है। इन्द्र वीर्य है। इन दोनों शक्तियों के द्वारा
प्रजापति ने अपने को पूर्ण किया। दोनों शक्तियाँ उसके पास आईं। उन दोनों शक्तियों को
उसने अपने अनुकूल बनाया। यह भी इन दोनों शक्तियों द्वारा अपने को पूर्ण करता है। ये दोनों
शक्तियाँ उसके पास लौट आती हैं और वह दोनों को अपने अनुकूल कर लेता है ॥१९॥
अब सविता के लिए। सविता देवों का प्रेरक है। इस प्रकार सविता से प्रसवित होकर
उसकी सब कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥२०॥
अन्त में वह वरुण के लिए (पशु का) आलभन करता है। वह इसको वरुण के सब
पाशों से और सब पापों से मुक्त कर देता है ॥२१॥
इसलिए यदि ग्यारह यूप हों तो अग्निवाले पशु को अग्नि के सामनेवाले यूप से बाँधे।
अन्य सब को इसी प्रकार क्रमशः ॥२२॥
यदि ग्यारह पशु हों तो अग्निवाले पशु को यूप में आलभन करे। अन्यों को इसी प्रकार
क्रमशः ॥२३॥
जब उनको उत्तर की ओर ले जाते हैं तो अग्निवाले को पहले ले जाते हैं, फिर औरों
को इसी क्रम से ॥२४॥
जब उनको पहले गिराते हैं, तो अग्निवाले को पहले दक्षिण की ओर गिराते हैं। औरों