शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-८, ब्राह्मण-३
४८४ शतपथ ब्राह्मण
वा॒ऽग्रे॒ऽभि॒घा॒रय॑न्ति प्रा॒णाः पृषदाज्य॒मिति॑ वद॒न्तस्त॒दु ह॒ याज्ञ॑वल्क्यं चर॒काध्व॒र्यु॒रनु॑-
व्या॒जहा॑रे॒वं कुर्व्वन्तं॑ प्रा॒णं वा॒ऽअय॒मन्त॑रगादध्व॒र्युः प्रा॒ण ए॒नं॑ हास्यतीति॑ ॥ २४ ॥
स॒ ह॒ स्म बा॒हूऽअ॒न्ववे॑क्ष्याह॑ । इमौ॑ पलि॒तौ बा॒हू क्व॑ स्विद्ब्राह्म॒णस्य॒ वचो॑ ब-
भूवेति॑ न तदा॑द्रियेतोत्त॒मो वा॒ऽए॒ष प्र॑या॒जो भ॑वती॒दं वै ह॒विर्य्य॒ज्ञ उत्त॑मे प्रया॒जे
ध्रु॒वामै॑वा॒ग्रे॒ऽभिघा॑रयति तस्यै॒ हि प्रथ॑मावाज्यभा॒गौ क्षोष्य॑न्भवति व॒पां वा॒ऽअत्र॑
प्रथ॒माग्॑ क्षोष्य॑न्भवति॒ तस्मा॑द्वपा॒मेवा॒ग्रे॒ऽभिघा॑रये॒द्य पृ॑षदा॒ज्यमथ॒ यत्प॒शुं नाभि॑-
घा॒रय॑ति नेद॒मृत॑मभिघा॒रया॒णीत्ये॒तद्वैवा॒स्य॒ सर्व्वः॑ प॒शुर॑भिघा॒रितो॑ भवति॒ यद्वपा॑म-
भिघा॒रय॑ति॒ तस्मा॑द्वपा॒मेवा॒ग्रे॒ऽभिघा॑रये॒द्य पृ॑षदा॒ज्यम् ॥ २५ ॥ अथाज्य॑मुपस्तृ॒णीते॑ ।
अथ॒ हिर॑ण्यशकल॒मव॑दधा॒त्यथ व॒पाम॑वद्य॒न्नाहा॒ग्नीषोमा॑भ्यां॒ छाग॑स्य व॒पायै॒ मेद॑सो
ऽनु॑ब्रूही॒त्यथ॒ हिर॑ण्यशकल॒मव॑दधा॒त्यथो॑प॒रिष्टा॑द्द्विर॒ाज्यस्या॑भि॒घारय॑ति ॥ २६ ॥ तद्य॒-
द्धिर॑ण्यशकला॒वभि॒तो भ॑वतः । प्र॒त्ति वा॒ऽए॒तत्प॒शुं यद॒ग्नौ जु॒होत्य॒मृत॒मायु॒र्हिर॑ण्यं
तद॒मृत॑ऽआयु॒षि प्र॑तिति॒ष्ठति॒ तथोत॒ उदे॑ति॒ तथा॒ संजी॑वति॒ तस्मा॒द्धिर॑ण्यशकला॒व-
भि॒तो भ॑वत॒ आ श्रा॑व्या॒हा॒ग्नीषोमा॑भ्यां॒ छाग॑स्य व॒पां मेदः॒ प्रेष्येति॑ न प्रस्थित॒मि-
त्या॒ह प्रस्तु॑ते प्रस्थित॒मिति॑ वषट्कृ॒ते जु॑होति ॥ २७ ॥ जु॒ह्वां व॒पाग्॑ समीच्यौ॑ । व॒-
पाश्रप॒ण्यौ कृ॒त्वानु॑प्रा॒स्यति॒ स्वाहा॑कृ॒तेऽऊ॒र्ध्वन॑भसं मारु॒तं ग॑च्छत॒मिति॒ नेदि॒मेऽअ॒मु-
ष्या॒ सतो॒ याभ्यां॑ व॒पामशि॑श्रप॒मिति॑ ॥ २८ ॥ तद्य॒द्वपया॒ चर॑न्ति । यस्यै॒ वै दे॒वता॑यै
प॒शुमाल॑भन्ते ता॒मेवै॒तद्दे॒वता॒मेते॑न मे॒धेन॑ प्रीणाति॒ सैषा दे॒वतेते॑न मे॒धेन॑ प्री॒ता
शान्तोत्त॑राणि ह॒वीग्ं॑षि श्र॒प्यमा॑णान्यु॒पर॑मति॒ तस्मा॒द्वपया॒ चर॑न्ति ॥ २९ ॥ अथ चा-
त्वा॒ले मा॑र्जयन्ते । क्रू॒री वा॒ऽए॒तत्कु॑र्व्वन्ति॒ यत्सं॒ज्ञपय॑न्ति॒ यदि॑शा॒सति॒ शान्ति॒राप॒स्त-
द॒द्भिः शा॒न्त्या श॑मयन्ते॒ तद॒द्भिः संद॑धते॒ तस्मा॑च्चात्वा॒ले मा॑र्जयन्ते ॥ ३० ॥ ब्राह्मणम्
॥ ३ [८. २.] ॥ ॥
यद्वे॒वत्यः॑ प॒शुर्भव॑ति । तद्दे॒वत्यं॑ पुरो॒डाश॒मनु॑निर्व्वपति॒ तद्यत्पु॑रो॒डाश॒मनु॑निर्व्व॑-
कां० ३, अ० ८, ब्रा० २-३, कं० २४-३० व १ शतपथब्राह्मण / ४८५
पृषदाज्य को पहले अभिघार करते हैं, क्योंकि प्राण पृषदाज्य है। एक चरकाध्वर्यु ने याज्ञवल्क्य
को ऐसा करने के लिए धिक्कारा कि इस अध्वर्यु ने प्राण को निकाल दिया। प्राण इसको छोड़
देगा ॥२४॥
परन्तु उसने अपने बाहुओं की ओर देखकर कहा, 'ये भुजाएँ पल गईं (मैं बुड्ढा हो
गया)। इस ब्राह्मण की दाणी को क्या हुआ ?' परन्तु इसकी परवाह न करे। यह उत्तम प्रयाज
है। यह हविर्यज्ञ है। अन्तिम प्रयाज में पहले ध्रुवा में घी डालता है, दो आज्य-भागों की आहुति
के लिए। इस समय पहले वह वपा की आहुति देगा। इसलिए पहले वपा का अभिघार करेगा,
फिर पृषदाज्य का। यदि वह सम्पूर्ण पशु का अभिघार नहीं करता किकहीं बिन-पके का अभिघार
न हो जाय, तो भी वपा का अभिघार करने से सम्पूर्ण पशु का अभिघार हो ही जाता है। इसलिए
पहले वपा का अभिघार करना चाहिए, फिर पृषदाज्य का ॥२५॥
अब (जुहू में) पहले आज्य की एक तह लगाता है। फिर उसमें सोने का एक टुकड़ा
डालता है। फिर वपा को काटकर होता से कहता है, 'अग्नि और सोम के अनुवाक कहो। बकरे
के वपा और मेद के लिए।' अब वह सोने के टुकड़े को वपा पर रखता है और घी से दो बार
अभिघार करता है ॥२६॥
दोनों ओर सोने के टुकड़े इसलिए रखे जाते हैं कि जब अग्नि में पशु की आहुति देते हैं
तो उसको मारते हैं। यह जो सोना है वह अमर जीवन है। इस प्रकार उसको अमर जीवन में
स्थापित करता है। इस प्रकार वह वहाँ से उठता है। इस प्रकार जीवित होता है। इसलिए सोने
के टुकड़ों को दोनों ओर रखते हैं। अब वह श्रौषट् कहकर (मैत्रावरुण से) कहता है, 'अग्नि और
सोम के लिए बकरे के वपा और मेद को दे।' इस स्थान पर वह 'प्रस्थितन्' (उपस्थित है) नहीं
कहता। ऐसा तो सोम के निचोड़ने पर कहा जाता है। वषट्कार करके आहुति देता है ॥२७॥
वपा की आहुति देकर दोनों वपाश्रपणियों को फेंक देता है इस मन्त्र से—"स्वाहा-
कृतेऽऊर्ध्वनभसं मारुतं गच्छतम्" (यजु० ६।१६)—"स्वाहा से युक्त होकर मरुत्-सम्बन्धी
ऊर्ध्वनभस् को जाओ।" वह ऐसा इसलिए करता है कि दोनों जिन पर वपा पकाई गई हैं व्यर्थ न
जायें ॥२८॥
वपा से क्यों काम लेते हैं.? इसलिए कि जिस देवता के लिए पशु का आलभन किया जाता
है उसी देवता को उसी पशु के मेध से प्रसन्न करता है। वही देवता उस पशु के मेध से प्रसन्न
होकर अन्य हवियों के पकने की प्रतीक्षा करता है। इसलिए वपा से काम लिया जाता है ॥२६॥
अब चात्वाल पर मार्जन करते हैं। जब उसे काटते हैं तो वह घायल हो जाता है। जल
शान्ति है। इसलिए जल से शान्त करते हैं या जल से चंगा करते हैं। इसलिए वह चात्वाल पर
मार्जन करते हैं ॥३०॥
अध्याय ८—ब्राह्मण ३
जिस देवता के लिए पशु होता है उसी देवता के लिए पीछे से पुरोडाश बनाया जाता है।
४८६ शतपथ ब्राह्मण
पति॒ सर्वेषां वा॒ऽएष पशूनां॑ मेधो यद्ब्री॒हियवौ तेनै॑वैनमेतन्मेधे॑न समर्धयति कृ-
त्स्नं करोति तस्मात्पुरोडाशमनुनिर्व॑पति ॥ १॥ अथ यद्वपया प्रचर्य॑ । एतेन पुरो-
डाशेन प्रचर॑ति मध्यतो वा॒ऽइमां वपामुत्खि॑दन्ति मध्यत एवैनमेतेन मेधे॑न स-
म॒र्धयति कृत्स्नं करोति तस्माद्वपया प्रचर्ये॒तेन पुरोडाशेन प्रचर॒त्येष॒ त्वे॑वैतस्य॑
बन्धुर्य॒त्र क्वा चैष पशुं॒ पुरोडाशोऽनु॑निरुप्यते ॥ २॥ अथ पशुं विशास्ति । त्रिः प्र-
च्यावयतान्निःप्रच्युतस्य हृद॑यमुत्त॒मं कुरुतादिति त्रिवृद्धि यज्ञः ॥ ३॥ अथ शमिता-
रꣳ सꣳशास्ति । यत्त्वा॒ पृच्छा॒त्तꣳ ह॒विः शमिता३रिति शृतमित्येव ब्रूतान्न शृतं
भगवो॒ न शृत॒३ ᳲती ॥ ४॥ अथ जुह्वां पृषदाज्यस्योपस्तीर्य॑ । अध्वर्यु॒रुपनिष्क्रम्य॑
पृच्छति शृतꣳ ह॒विः शमिता३रिति शृतमित्याह तद्दे॒वानामित्युपाꣳश्वध्वर्युः ॥ ५॥
तद्यत्पृच्छ॑ति । शृतं वै दे॒वानाꣳ ह॒विर्ना॑शृतꣳ शमिता वै तद्वेद यदि शृतं वा भ-
वत्यशृतं वा ॥ ६॥ तद्यत्पृच्छ॑ति । शृतेन प्रचरा॒णीति तद्यद्यशृतं भव॑ति शृतमेव
दे॒वानाꣳ ह॒विर्भवति शृतं यजमानस्यानेना॑ अध्वर्युर्भवति शमितरि॒ तदेनो भवति
त्रिष्कृत्वः पृच्छति त्रिवृद्धि यज्ञोऽथ यदाह तद्दे॒वानामिति तद्धि दे॒वानां यच्छृतं त-
स्मादाह तद्दे॒वानामिति ॥ ७॥ स हृद॑यमेवाग्रे॒ऽभिघा॑रयति । आ॒त्मा वै मनो हृ-
दयं प्राणाः पृषदाज्यमात्मन्ये॒वैतन्मनसि प्राणं दधाति तद्यत्तत्स्रीवमेव दे॒वानाꣳ ह॒-
विर्भवत्यमृतममृतानाꣳ ॥ ८॥ सोऽभि॒घारय॑ति । सं ते मनो॒ मन॑सा सं प्राणाः प्रा-
णै॒न गच्छतामिति न स्वाहाकरोति न ह्येषाहुतिरुद्वासय॑न्ति पशूम् ॥ ९॥ तं जघ-
नेन चावालमन्तरेण यूपं चाग्निं च हरन्ति । तय्यत्समया न हर॑न्ति येनान्यान्यवेत्येव
हवीꣳषि हर॑न्ति शृतꣳ सन्तं नेदङ्गशो विकृत्येनं क्रू॒रीकृ॒तेन समया यज्ञं प्रसजा॒मे-
ति यदु बाह्येन न हरन्त्यग्रेण यूपं बर्हिषो ह यज्ञात्कुर्युस्तस्मादन्तरेण यूपं चा-
ग्रिं च हरन्ति दक्षिणतो॒ निधाय प्रतिप्रस्थातावद्यति प्लक्षशाखा उत्तरबर्हिर्भवति
ताꣳ श्रपययति तद्यत्प्लक्षशाखा उत्तरबर्हिर्भवति ॥ १०॥ यत्र वै देवाः । अग्रे॒ प-
कां० ३, अ० ८. ब्रा० ३, क० १-१० शतपथब्राह्मण / ४८७
पीछे से पुरोडाश इसलिए बनाते हैं, कि जो धान और जौ हैं वे वस्तुतः सब पशुओं का मेध है।
इसी मेध से वह इस पशु को चंगा करता है या पूरा करता है। इसीलिए वह पीछे से पुरोडाश
बनाता है ॥१॥
वपा को काम में लाकर पुरोडाश क्यों बनाते हैं ? इसलिए कि पशु के बीच से ही तो वपा
को निकालते हैं। मध्य में ही इसको मेध द्वारा चंगा करते हैं या पूरा करते हैं। इसीलिए वपा को
काम में लाकर तब पुरोडाश को काम में लाते हैं। इनका सम्बन्ध हर जगह एक-सा ही है। जहाँ
कहीं पशु होता है वहीं पुरोडाश भी होता है ॥२॥
अब पशु (पशुता) को काटता है। और कहता है, 'तीन बार घूमो और तीन बार घूमे
हुए के हृदय को ऊपर उठाओ।' क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् (तीन वाला) होता है ॥३॥
अब शमिता (काटनेवाला—कसाई) को आदेश देता है 'यदि कोई पूछे कि हे शमिता,
हवि पक गया ?' तो कहना 'पक गया'; यह न कहना कि 'श्रीमान् जी पक गया' या 'पक तो
गया' ॥४॥
अब जुहू से पृषदाज्य को लेकर अध्वर्यु आगे बढ़कर पूछता है, 'हे शमिता, हवि पका ?'
वह कहता है 'पका।' अध्वर्यु चुपके से कहता है, 'यह देवताओं का है' ॥५॥
यह इसलिए पूछता है कि देवताओं का हवि पका हुआ होता है, बे-पका नहीं। शमिता
इसको जानता है कि पका है या नहीं पका है ॥६॥
वह पूछता इसलिए है कि वह समझता है कि मैं पके हुए को काम में लाऊँ। और यदि बे-
पका हो तो देवों का हवि पका होता है और यजमान की अपेक्षा से पका ही होता है। अध्वर्यु
निर्दोष हो जाता है। दोष शमिता का रहता है। वह तीन बार पूछता है क्योंकि यज्ञ तिहरा होता
है। 'यह देवों का है' ऐसा इसलिए कहता है कि जो पका है वह देवों का है। इसलिए वह कहता
है कि यह देवों का है ॥७॥
पहले वह हृदय का अभिघार करता है, क्योंकि 'हृदय' मन और आत्मा है, पृषदाज्य
प्राण है। इस प्रकार वह आत्मा और मन में प्राण धारण कराता है। इस प्रकार देवों का हवि जीव
होता है, अमृतों का अमृत ॥८॥
वह इस मन्त्र से अभिघार करता है— “सं ते मनो मनसा सं प्राणः प्राणेन गच्छताम्”
(यजु०६।१८)— “तेरा मन मन से मिले, प्राण प्राण से।” वह 'स्वाहा' नहीं कहता क्योंकि हवि
तो है नहीं। वह पशु को हटा देता है ॥६॥
वे इसको चात्वाल के पीछे से यूप और अग्नि के बीच से ले जाते हैं। जब यह पका हुआ
है तो फिर उसे मध्य से क्यों नहीं ले जाते जैसा कि अन्य हवियों को ले जाते हैं ? इसका कारण
यह है कि कहीं मध्य में इसका संसर्ग अङ्गों से विकृत (कटा-कटाया) और घायल से न होजाय।
बाहर से इसलिए नहीं ले जाते कि कहीं यज्ञ से बहिष्कृत न हो जाय। इसलिए वे यूप और अग्नि
के बीच से ले जाते हैं। दक्षिण की ओर रखकर प्रतिप्रस्थाता टुकड़े-टुकड़े करता है। पलाश की
शाखाएँ ऊपरी बर्हि का काम देती हैं। उन्हीं पर काटता है। पलाश शाखा में ऊपरी बर्हि का काम
क्यों देती हैं ? (इसका उत्तर आगे पढ़िये) ॥१०॥
शुमालेभिरे॒ तं त्वष्टा॑ शीर्ष॒तोऽग्रे॒ऽभ्य॑वामोते॒वं चि॒न्नाल॑भेर॒न्निति॒ त्वष्टु॒र्हि प॒शवः॑
स ए॒ष शीर्ष॒न्मस्ति॑ष्कोऽनू॒क्य॑श्च म॒ज्जा तस्मा॒त्स वात॑-इव॒ त्वष्टा॑ ष्ये॒तम॒भ्यव॑मत्-
स्मात्तं नाश्री॑यात्त्वष्टुर्ह्येतद॒भिवा॒न्तम् ॥ ११॥ तस्या॒वाङ् मेधः॑ पपात । स ए॒ष वन॑-
स्पति॒रजायत॒ तं दे॒वाः प्राप॑श्यंस्तस्मात्प्रा॒क्ष्यः॑ प्र॒क्ष्यो ह॒ वै नामैतद्यत्प्ल॒क्ष॒ इति॒ ते-
नैवे॒नमेतन्मेधे॑न सम॒र्धय॑ति कृ॒त्स्नं क॑रोति तस्मा॒त्प्लक्ष॑शा॒खा उ॑त्तरब॒र्हिर्भव॑ति ॥१२॥
अथा॑ज्यमुपस्तृणी॒ते । जु॒ह्वां चो॑प॒भृति॑ च वसाहोम॒हव॒न्याँ सम॑वत्तधा॒न्यामथ हिर-
ण्यशकला॒वव॑दधाति जु॒ह्वां चोप॒भृति॑ च ॥१३॥ अथ मनो॒तायै॑ ह॒विषो॒ऽनुवा॑च
ग्राह॑ । तद्यन्म॑नो॒तायै॑ ह॒विषो॒ऽनुवा॑च॒ ग्राह॒ सर्वा॑ ह॒ वै दे॒वताः॑ प॒शुमाल॑भ्यमा-
नमुप॒संग॑च्छन्ते॒ मम॒ नाम॑ ग्रहीष्यति॒ मम॒ नाम॑ ग्रहीष्यती॒ति सर्वा॑साꣳ हि दे॒वता-
नाँ ह॒विः प॒शुस्तासां॒ सर्वा॑सां दे॒वतानां॒ मनाँ॑स्युप॒संग॑तानि भवन्ति ता॒न्येवै-
त॒त्प्रीणा॑ति तथो हा॒मोघा॑य दे॒वतानां॒ मनाँ॑स्युप॒संग॑तानि भवन्ति॒ तस्मान्मनो॒-
तायै॑ ह॒विषो॒ऽनुवा॑च ग्राह ॥ १४॥ स हृद॑यस्यै॒वाग्रे॒ऽवद्य॑ति । तद्यन्मध्य॑तः स॒तो
हृद॑यस्या॒ग्रेऽव॒द्यति॑ प्रा॒णो वै हृद॑यम॒तो ह्य॑य॒मूर्ध्वः॑ प्रा॒णः संच॑रति प्रा॒णो वै प॒शु-
र्याव॒द्ध्येव प्रा॒णेन॒ प्राणिति॒ ताव॑त्प॒शुरथ॒ यदा॑स्मात्प्रा॒णोऽप॑क्रामति दार्वि॑व॒ तर्हि॑
भू॒तोऽन॑र्थः शेते ॥ १५॥ हृद॑यमु वै प॒शुः । तद॑स्या॒त्मन॑ ए॒वाग्रे॒ऽवद्य॑ति॒ तस्मा॒-
द्यदि॒ किंचि॑दवदा॒नँ हीये॑त न तदा॒द्रिये॑त॒ सर्व॑स्य ह्येवास्य॒ तत्प॒शोरव॑त्तं भवति
यद्धृद॑यस्या॒ग्रेऽव॒द्यति॒ तस्मान्मध्य॑तः स॒तो हृद॑यस्यैवा॒ग्रेऽव॒द्यत्यथ॒ यथापूर्वंम् ॥ १६॥
अथ जि॒ह्वायाः॑ । सा ह्ये॒यं पूर्वा॒र्धात्प्रति॑ष्ठित्यथ॒ वक्ष॑सस्तद्धि ततो॑ऽथै॒कच॑रस्य दो॒षो-
ऽथ पा॒र्श्वयो॒रथ तनि॒म्नोऽथ वृक्योः ॥ १७॥ गुदं त्रेधा क॑रोति । स्थवि॑ष्ठमपगु॒ङ्गो
मध्यं॑ जुह्वां द्वेधा कृ॒त्वाव॑द्यत्यणि॒ष्ठम॑ङ्गेभ्य॒श्चै॒कच॑रायै श्रोणे॑रितावन्नु जु॒ह्वामव॑द्यति
॥ १८॥ अथोप॒भृति॑ । अ॒न्य॑स्य दो॒षो गुदं॑ द्वेधा कृ॒त्वाव॑द्यत्य॒न्य॑स्यै श्रोणे॒रथ
हिर॑ण्यशकलावव॒दधा॒त्यथो॒परि॑ष्टादाज्यस्याभिघा॒रय॑ति ॥ १९॥ अथ वसाहो॒मं गृ-
कां० ३, अ० ८, ब्रा० ३,० क ११-१६ शतपथब्राह्मण / ४८६
जब देवों ने पहले पशु का आलभन किया तो त्वष्टा ने उसके सिर पर थूक दिया यह
सोचकर कि 'वे उसको छुएँगे नहीं।' क्योंकि पशु तो त्वष्टा के ही हैं। यह सिर में मस्तिष्क और
गर्दन में मज्जा बन गया। इसलिए वह थूक है, क्योंकि त्वष्टा ने उस पर वमन कर दिया।
इसलिए उसको न खाना चाहिए क्योंकि यह त्वष्टा का वमन किया हुआ है ॥११॥
इसका मेध नीचे गिर पड़ा; उससे एक वृक्ष उगा। उसको देवों ने देखा। इसलिए प्रख्य
हुआ। प्रख्य ही प्लक्ष है। उसी मेध से वह उसको चंगा करता है और पूर्ण करता है। इसलिए
प्लक्ष शाखाएँ ऊपर के बर्हि का काम देती हैं ॥१२॥
अब जुहू और उपभृति दोनों में घी एक तह लगाता है, वसा-होम-हवनी और समवत्त-
धानी में भी। जुहू और उपभृति दोनों में सोने के टुकड़े भी रखता है ॥१३॥
अब वह (होता से) कहता है कि मनोता के लिए हवि पर अनुवाक कह। हवि पर
मनोता के लिए अनुवाक कहलवाने का तात्पर्य यह है—जब पशु का आलभन करते हैं तो सब
देवता घिर आते हैं कि मेरा नाम लेगा, मेरा नाम लेगा। क्योंकि पशु तो सभी देवताओं की हवि
हैं।१ सभी देवताओं के मन उस पशु में लगे रहते हैं। उनके उन मनों को वह प्रसन्न करता है
जिसमें से देवों के मन वहाँ व्यर्थ न आवें। इसलिए वह मनोता के लिए हवि पर अनुवाक
कहलवाता है ॥१४॥
पहले वह हृदय के टुकड़े करता है। हृदय तो बीच में है। फिर वह पहले इसके टुकड़े
क्यों करता है ? इसलिए कि हृदय प्राण है, यहीं से प्राण ऊपर को जाता है। पशु भी प्राण है
क्योंकि जब तक सांस लेता है तभी तक पशु है, और जब प्राण निकल जाता है तो लकड़ी के
समान निरर्थक पड़ा रहता है ॥१५॥
हृदय ही पशु है। इसलिए वह पहले इसके आत्मा (धड़) को ही काटता है। इसलिए
यदि कोई टुकड़ा रह भी जाय तो परवाह न करनी चाहिए। क्योंकि पहले हृदय को काटने से पशु
का सम्पूर्ण ही कट जाता है। इसलिए हृदय के बीच में रहते हुए भी पहले उसी को काटते हैं,
फिर यथापूर्व ॥१६॥
फिर जिह्वा को, क्योंकि वह अगले भाग में सबसे आगे है। फिर छाती क्योंकि वह भी
वैसी ही है। फिर साथ चलनेवाला अर्थात् बायाँ अगला पैर। फिर बगल, फिर यकृत, फिर
वृक्क ॥१७॥
गुदा के तीन टुकड़े करता है। स्थूल भाग पिछली आहुतियों के लिए (रख छोड़ता है)।
बीच के भाग को जुहू में काटकर दो भाग करता है। और सबसे सूक्ष्म भाग को त्र्यंग्य के लिए।
फिर एक घर श्रोणि को। इतने को जुहू में काटकर रखता है ॥१८॥
अब त्र्यंग्य के अगले भाग को उपभृति में रखता है, गुदा के दो टुकड़े काटकर, और
त्र्यंग्य की श्रोणि के। उन पर दो सोने के टुकड़े रखता है। उन पर घी छोड़ता है ॥१९॥
१. देवत्व और पशुत्व का मेल असम्भव है। वस्तुतः हृदय की दुर्भावना, जिह्वा की कटुता एवं
अंग-प्रत्यंग की अपवित्रता को भस्म करना ही देवत्व है। प्रस्तुत बीभत्स व्याख्या सर्वथा
प्रक्षिप्त है। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती
ह्लाति । रेडसीति लेल्य्येव हि यू॒स्तस्मादाह रेडसीत्य्य॒ग्निष्ट्ठा श्रीणात्वित्य्य॒ग्निश्चैत्-
दूपयति तस्मादाहाग्निष्ट्ठा श्रीणात्वित्य्यापस्त्या समरिणन्नित्यापो॒ ह्येतमङ्गेभ्यो॒ रस॑
सम्भरन्ति तस्मादाहापस्त्वा समरिणन्निति ॥२०॥ वातस्य त्वा ध्राज्याऽइति । अत्-
रिद्धं वाऽअयमन्वपवते॒ योऽयं पवते॒ऽन्तरिक्षाय॒ वै गृह्णाति तस्मादाह वातस्य वा
ध्राज्याऽइति ॥२१॥ पूष्णा रंह्याऽइति । एष वै पूष्णो॒ रंहिरेतस्म्माऽइ हि गृ-
ह्लाति तस्म्मादाह पूष्णो रंह्याऽइति ॥२२॥ ऊष्मणो व्यथिषदिति । एष वाऽऊ-
ष्मैतस्म्माऽइ॒ हि गृह्णाति तस्म्मादाहोष्मणो व्यथिषदित्यथोपरिष्टाद्धिरण्यस्याभिघा-
रयति ॥२३॥ ॥ शतम् २१०० ॥ ॥ अथ पार्श्वेन वासिना वा प्रयौति । प्रयुतं द्वे-
ष इति तन्नाष्ट्रा ऽएवैतद्रक्षांस्यतोऽपहन्ति ॥२४॥ अथ यद्यूपपरिशिष्यते । तत्स-
मवत्तधान्यामानयति तद्धृदयं प्रास्यति जिह्वां वक्षस्तनिम मतस्ने वनिष्ठुमथोपरि-
ष्टाद्धिरण्यस्याभिघारयति ॥२५॥ तद्यद्धिरण्यशकलाविभतो भवतः । प्रति वाऽए-
तत्पशुं यदग्नौ जुह्वत्यमृतमायुर्हिरण्यं तदमृतऽआयुषि प्रतितिष्ठति तथात उदेति
तथा संञ्जीवति तस्म्माद्धिरण्यशकलाविभतो भवतः ॥२६॥ अथ यद्दक्ष्णायावद्यति ।
सव्यस्य च दोष्णो दक्षिणायाश्च श्रोणेर्दक्षिणस्य च दोष्णः सव्यायाश्च श्रोणेस्तस्मा-
दयं पशुर्दक्ष्णाया पदो हरत्यथ यत्सम्प्पद्येखावच्छेत्समीचो हैवायं पशुः पदो हरेत्तस्मा-
द्दक्ष्णायावद्यत्यथ यन्न शीर्ष्णोऽवद्यति नाऽक्षयोर्न्नानूकस्य नापरसक्थयोः ॥२७॥
असुरा ह वाऽअग्रे पशुमालेभिरे । तद्देवा भीषा नोपावेयुस्तानह्येयं पृथिव्युवाच
नैतदादद्र्ढूमहं व एतस्याध्यक्ष्या भविष्यामि यथा-यथैतऽएतेन चरिष्यन्तीति ॥२८॥
सा होवाच । अन्यतरामेवाहुतिमहौषुरन्यतरां पर्य्यशिषन्निति सा यां पर्य्यशिषं-
स्तानीमान्यवदानानि ततो देवाः स्विष्टकृते ऽयङ्गाण्यपामार्ंस्तस्मात्त्य्यङ्गाण्यथासुरा
अवाञ्च्ऽकीर्ण्णाऽक्षयोरनूकस्यापरसक्थयोस्तस्मात्तेषां नावद्येयुन्नैव त्वष्टानूकमभ्य-
वमत्तस्मादनूकस्य नावद्येदथाहामीषामाभ्यां छागस्य हविषोऽनुब्रूहीत्याश्राव्या-
कां ३, अ० ८, ब्रा० ३, कं० २०-२६ शतपथब्राह्मण / ४६१
अब वसाहोम को लेता है, इस मन्त्र से- "रेडसि" (यजु० ६।१८)-"तू काँपता है।" वह
वसा काँपती-सी है इसलिए कहा 'रेडसि'। "अग्निष्ट्वा श्रीणातु" (यजु० ६।१८) - "अग्नि
तुझको पकावे।" अग्नि ही उसको पकाता है इसलिए कहा कि 'अग्नि तुझे पकावे।' "आपस्त्वा
समरिणन्" (यजु० ६।१८) - "जल तुझको मिलावे।" जल ही इन अंगों से रस को इकट्ठा करके
मिलाते हैं। इसलिए कहा कि 'जल तुझे मिलावे' ॥२०॥
“वातस्य त्वा ध्राज्यै" (यजु० ६।१८) - "हवा तुझे हिलावे।" यह जो वायु है वह
अन्तरिक्ष में बहता है। वायु के लिए ही इसको लेता है, इसलिए कहता है 'तू हवा के लिए
है" ॥२१॥
"पूष्णो रँ॒ह्या" (यजु० ६।१८) - "पूषा के वेग के लिए।" वह वायु पूषा का वेग है।
उसी के लिए यह ग्रहण करता है; इसलिए कहता है कि 'पूषा के वेग के लिए' ॥२२॥
“ऊष्मणो व्यथिषत्” (यजु० ६।१८)-"ऊष्ण से तपाया जाता है।" यह वायु उष्ण है।
उसी के लिए ग्रहण करता है। इसलिए कहता है कि 'उष्ण से तपाया गया।' इस पर दो बार घी
लगाता है ॥२३॥ [शतम् २१००]
पार्श्व या वासि (छुरियों के नाम हैं) से मिलाता है, इस मन्त्र से- "प्रयुतं द्वेषः" (यजु०
६।१८)-"द्वेष हट गया।" इससे वह यहाँ दुष्ट राक्षसों को हटाता है ॥२४॥
अब जो हवि (यूप) बचता है उसे समवत्तधानी में लाता है। उसमें हृदय, जीभ, छाती,
तनिम, मतस्न (गुर्दे), वनिष्ठ को डाल देता है। फिर उस पर दो बार घी लगाता है ॥२५॥
दोनों ओर सोने के टुकड़ों को इसलिए रखता है कि जब पशु की आग में आहुति देते हैं
तो उसको मारते हैं। सोना अमृत-जीवन है। इस प्रकार उसको अमृत-जीवन में स्थापित करता
है। इसी से वह उत्पन्न होता है, इसी से जीता है। इसलिए दोनों ओर सोने का टुकड़ा होता
है ॥२६॥
और चूंकि तिरछा काटता है। दाहिनी टांग और बायां चूतड़, तथा बायीं टांग और
दाहिना चूतड़, इसलिए यह पशु तिरछे पैर बढ़ता है। यदि सीधा काटता तो दोनों पैर साथ-साथ
उठते हैं, इसलिए तिरछा काटता है। अब प्रश्न है कि सिर को क्यों नहीं काटता, न कन्धों को,
न गर्दन को, न पिछली जांघों को ? ॥२७॥
असुरों ने पहले पशु का आलभन किया था। देव डर के मारे उसके पास नहीं गये।
पृथिवी ने उनसे कहा- 'इसकी परवाह न करो। मैं जिस-जिस प्रकार ये इसको करेंगे, मैं इसकी
साथी होऊँगी' ॥२८॥
उसने कहा- 'एक आहुति इन्होंने दी। एक छोड़ दी। जिसको उन्होंने छोड़ दिया यह
यही भाग हैं।' इस पर देवों ने तीन अंगों के अग्निस्विष्टकृत् के लिए अर्पण किया, इसलिए त्र्यङ्ग-
आहुति हुई। तब असुरों ने सिर, कन्धों, गर्दन और पिछली जांघों के टुकड़े किये। इसलिए इनको
नहीं काटना चाहिए। चूंकि त्वष्टा ने गर्दन पर थूका था, इसलिए गर्दन के टुकड़े न करे। अब
वह होता कहता है कि बकरे के हवि पर अग्नि-सोम के लिए अनुवाक कह। और श्रौषट् कहकर
४६२ शतपथ ब्राह्मण
ह्नाग्नीषोमाभ्यां छागस्य ह॒विः प्रेष्येति न प्रस्थितमित्याह प्रसुते प्र॑स्थितमिति
॥ २९॥ उत्तर॒र्द्धार्च्चै यज्या॒यै वसाहोमं जुहोति । इतो वाऽअ॒यमूर्द्ध्वो मेध॒ उ-
त्थितो यमस्या इ॒मꣳ र॒सं प्र॒ज्ञा उप॒जीवन्त्य॒र्वाचीनं दिवो र॒सो वै वसाहोमो र॒-
सो मेधो र॒सेने॒वैतद्र॒सं ती॒व्रीक॑रोति॒ तस्माद॒यꣳ र॒सोऽद्य॑मानो॒ न क्षीयते ॥ ३०॥
तद्य॒दुत्तरेण । अर्द्धर्चे॑ य॒ज्या॒यै वसाहोमं जु॒होती॒यं वाऽअर्द्धर्च्चो॒ऽसौ द्यौर॒र्द्धर्चे॑
ऽन्तर्रा वै द्यावापृथिवीऽअ॒न्तरि॑क्षम॒न्तरि॑क्षाय॒ वै जु॑होति॒ तस्मा॒दुत्तरेणार्द्धर्चे॑ य॒ा-
ज्यायै वसाहोमं जुहोति ॥ ३१॥ स॒ जुहोति । घृ॒तं घृ॑तपावानः पिबत॒ वसां॑ व-
सापावानः पिब॒तान्तरि॑क्षस्य ह॒विर॑सि॒ स्वाहेत्येतेन वैश्वदे॒वेन यजु॑षा जुहोति वै-
श्वदेवं वाऽअ॒न्तरि॑क्षं॒ तद्य॒देनेनेमाः प्र॒जाः प्राणन्त्यथो॑दान॒न्त्य॒न्तरि॑क्षम॒नुचर॑न्ति॒ ते-
न वैश्वदे॒वं वषट्कृते॑ जुहोति॒ यानि जुह्वामव॒दाना॑नि भव॑न्ति ॥ ३२॥ अथ जुह्वा॒
पृषदाज्यस्योपघ्नन्राह । व॒नस्पत॑ये॒ऽनुब्रू॒हीत्या॒श्राव्या॑ह॒ वन॒स्पत॑ये प्रेष्ये॑ति॒ वषट्-
कृते जु॑होति॒ तद्यद्वन॒स्पत॑ये जु॒होत्येत॒मेवैतद॒ग्नं यूपं॑ भागिनं करोति॒ सोमो॒ वै व॒-
नस्प॑तिः प॒शुमे॒वैतत्सोमं करोति॒ तद्यदुत्तरेणोभेऽआहुती जुहो॑ति तयो॒रु॑भयं॒ व्या-
प्नोति॒ तस्मादुत्तरेणोभेऽआहुती जुहोति ॥ ३३॥ अथ यान्युप॒भृत्यव॒दाना॑नि भव॑-
न्ति । तानि समानयमान आहाग्नये स्विष्टकृते॒ऽनुब्रू॒हीत्या॒श्राव्या॑हा॒ग्नये स्विष्टकृते
प्रेष्ये॑ति॒ वषट्कृ॑ते जुहोति ॥ ३४॥ अथ॒ यद्वसाहोमस्य परिशिष्य॑ते । तेन॒ दिशो
व्याघा॑रयति दिशः प्रदिश॒ आदिशो॑ विदिश॒ उद्दिशो॑ दिग्भ्यः स्वाहेति र॒सो वै
वसाहोमः सर्वास्वेवैतद्दि॒क्षु र॒सं दधाति॒ तस्माद॒यं दि॒शि दि॒शि र॒सोऽभिग॑म्यते
॥ ३५॥ अथ प॒शुं संमृ॑शति । एत॒र्हि संम॑र्शनस्य कालो॒ऽथ यत्पुरा समृ॑शति षड्-
म॒ऽउप॑तिष्ठन्ते ते विमथिष्यन्तऽइति शङ्कमानो यद्यु विमाथ्यान्न शङ्केतात्रैव संमृ-
शेत् ॥ ३६॥ इन्द्वः प्रा॒णः । अ॒ङ्गेऽअङ्गे निदी॑ध्यदिन्द्र उदा॒नोऽअ॒ङ्गेऽअङ्गे निधीत इ-
ति॒ यद॒ङ्गशो वि॒कृत्तो भव॑ति॒ तत्प्राणोदानाभ्याꣳ संद॑धाति दे॒व त्वष्ट्रर्भूरि॑ ते॒ सꣳ-
कां० ३, अ० ८, ब्रा० ३, कं० २६-३७ शतपथब्राह्मण / ४६३
वह (मैत्रावरुण से) कहता है कि 'अग्नि-सोम के लिए बकरे के हवि की प्रेरणा कर।' 'प्रस्थित'
है ऐसा नहीं कहता। ऐसा तो सोम निचोड़ने पर कहा जाता है ॥२६॥
याज्य की दो आधी ऋचाओं के बीच में वसाहोम देता है। यहीं से मेध ऊपर को उठा
था,—पृथिवी का वह रस जिससे प्रजाएँ द्यौलोक के इस ओर जीती हैं। वसाहोम रस है, मेध
रस है। रस से रस को तीव्र करता है। इससे रस खाया जाकर क्षीण नहीं होता ॥३०॥
याज्य की दो अर्द्ध ऋचाओं के बीच में वसाहोम की आहुति क्यों दी जाती है ? आधी
ऋचा यह पृथिवी है। आधी ऋचा वह द्यौलोक है। द्यौ और पृथिवी के बीच में अन्तरिक्ष है।
अन्तरिक्ष के लिए यह आहुति है। इसलिए याज्य की दो अर्द्ध ऋचाओं के बीच में वसाहोम की
आहुति देता है ॥३१॥
इस मन्त्र से आहुति देता है —‘‘घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरि-
क्षस्य हविरसि स्वाहा’’ (यजु० ६।१६)—‘‘घी के पीनेवालो, घी पियो। वसा के पीनेवालो, वसा
पियो। तू अन्तरिक्ष की हवि है, स्वाहा।’’ इस यजुः से विश्वेदेवों को आहुति देता है। अन्तरिक्ष
विश्वेदेवों का है। इस अन्तरिक्ष में प्रजा प्राण और उदान लेती हैं। इसलिए यह अन्तरिक्ष विश्वे-
देवों का है। जुहू में जो कुछ टुकड़े रहते हैं उनसे वषट्कृत आहुति दी जाती है ॥३२॥
अब जुहू में पृषदाज्य लेकर (होता से) कहता है कि 'वनस्पति के लिए अनुवाक कह।'
श्रौषट् कहकर वह (मैत्रावरुण से) कहता है कि 'वनस्पति के लिए प्रेरणा कर।' वषट्कार करने
पर वह आहुति दे देता है। वह वनस्पति के लिए इसलिए आहुति देता है कि इस यूप वज्र को
वह भागी बनाता है। सोम वनस्पति है। इस प्रकार वह पशु को सोम कर लेता है। दो आहुतियों
के बीच में आहुति क्यों देता है ? इस प्रकार वह दोनों को व्याप्त कर लेता है। इसलिए वह दो
आहुतियों के बीच में आहुति देता है ॥३३॥
अब जो उपभृत् के लिए टुकड़े होते हैं उनको साथ-साथ डालकर कहता है 'अग्नि-
स्विष्टकृत् के लिए अनुवाक कह।' श्रौषट् कहकर 'अग्नि स्विष्टकृत् के लिए प्रेरणा कर' ऐसा
कहता है और वषट्कार के बाद आहुति दे देता है ॥३४॥
वसाहोम से जो बचता है उसे दिशाओं में फेंकता है, इस मन्त्र से—‘‘दिशः प्रदिशऽ
आदिशो विदिशऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा’’ (यजु ६।१६)—‘‘वसाहोम रस है। सब दिशाओं में
रस को पहुँचाता है। इसलिए पृथिवी पर सब दिशाओं में रस मिलता है’’ ॥३५॥
अब पशु का स्पर्श करता है। यही स्पर्श का समय है। चाहे पहले इस डर से ही छुआ हो
कि राक्षस उपस्थित हैं, वे इसने नष्ट कर डाले, या इस प्रकार शंका न भी की हो तो भी इस
समय छूना अवश्य चाहिए ॥३६॥
‘‘ऐन्द्रः प्राणोऽअङ्गेऽअङ्गे निधीद्यदैन्द्रऽउदानोऽअङ्गेऽअङ्गे निधीतः’’ (यजु० ६।२०)—
‘‘प्राण इन्द्र-सम्बन्धी है। यह अंग-अंग में स्थापित है। उदान इन्द्र-सम्बन्धी है। यह अंग-अंग में
स्थापित है।’’ जहाँ-जहाँ अङ्ग से काटा गया है वहाँ-वहाँ प्राण और उदान से संयुक्त करता है।