सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-८, ब्राह्मण-१

पारयितास्मी॒ति क॒थं ते॑ भृति॒रिति॑ ॥२॥ स॒ होवा॑च । याव॒द्वै क्षुल्ल॑का भ-
वामो ब॒ह्वी वै न॒स्ताव॑न्ना॒ष्ट्रा भव॑त्युत॒ मत्स्य॑ ए॒व मत्स्यं॑ गिलति कु॒म्भ्यां मा॑ग्रे
बिभ॑रासि॒ स य॒दा तामति॒वर्धा॒ऽअथ कर्षू॑ खा॒त्वा तस्यां॑ मा बिभ॑रासि॒ स य॒दा ता-
मति॒वर्धा॒ऽअथ मा समु॒द्रम॒भ्यव॑हरासि॒ तर्हि॒ वा॒ऽअति॑ना॒ष्ट्रो भवि॒तास्मीति॑ ॥३॥
शश्व॑द्ध झ॒ष आस॑ । स हि ज्येष्ठं॑ वर्ध॑ते॒ऽथैतिती ँ समां तदौ॑घ आ॒गन्ता तन्मा ना-
वमुप॑कल्प्यो॒पासा॑सै॒ स औघ॒ऽउत्थि॑ते॒ नाव॒माप॑द्यासै॒ तत॑स्त्वा पारयितास्मीति॑ ॥४॥

Everything matches accurately. Ready to produce the response.

कां० १, अं० ८, ब्रा० १, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / १५१
(ऋत्विज्) यज्ञ के बीच में पाकयज्ञिया इडा करते हैं, वे यज्ञ को नष्ट कर देते हैं। ब्रह्मा ही
ऋत्विजों में इलाज करनेवाला (भिषक्) है। इस प्रकार ब्रह्मा को चंगा कर देता है। परन्तु यदि
वह बात करता हुआ बैठा रहे तो चंगा न कर पायेगा। इसलिए वह चुपचाप रहे ॥१९॥
यदि वह पहले मानुषी भाषा को बोल दे तो उसको विष्णु-सम्बन्धी ऋग्वेद की ऋचा
या यजुः जपना चाहिए। यज्ञ ही विष्णु है। इस प्रकार वह यज्ञ को फिर आरम्भ करता है।
(बात करने का) यह प्रायश्चित्त है ॥२०॥
जब (अध्वर्यु) कहे "ब्रह्मन् प्रस्थास्यामि"—"हे ब्रह्मा, मैं आगे बढ़ूँ।" तब ब्रह्मा कहे,
"एते देव सवितर्यज्ञं प्राहुः" (यजु० २।१२)—"हे देव सविता ! इन्होंने तेरे इस यज्ञ की घोषणा
की।" इस प्रकार वह सविता के पास प्रेरणा के लिए जाता है, क्योंकि वह देवों का प्रेरक है। अब
कहता है—"बृहस्पतये ब्रह्मणे" (यजु० २।१२)—"बृहस्पति ब्रह्मा के लिए।" बृहस्पति ही देवों
का ब्रह्मा है। इसलिए वह इस यज्ञ की उसके लिए घोषणा करता है, जो देवों का ब्रह्मा है।
इसलिए कहा, 'बृहस्पति ब्रह्मा के लिए।' अब कहता है—"तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिन्तेन मामव"
(यजु० २।१२)—"इससे यज्ञ की रक्षा कर। इससे यज्ञपति की, इससे मेरी रक्षा कर।" यह स्पष्ट
है ॥२१॥
अब कहता है—"मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य" (यजु० २।१३)—"मन-घी की धार में प्रसन्न
हो।" मन से ही यह सब व्याप्त है, इसलिए मन से ही इस सबको प्राप्त होता है। अब कहता
है—"बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञँ समिमं दधातु" (यजु० २।१३)—"बृहस्पति इस यज्ञ
को करे। वह इस यज्ञ को पूर्ण विघ्न-रहित करे।" इस प्रकार जो घायल हो गया था उसे चंगा
कर देता है। अब कहता है—"विश्वे देवासऽइह मादयन्ताम्" (यजु० २।१३)—"सब देव यहाँ
प्रसन्न हों।" 'विश्वे देवा' का अर्थ है सब। सबसे ही वह इसे चंगा करता है। यदि वह चाहे तो
कहे 'प्रतिष्ठ (चल)', न चाहे तो न कहे ॥२२॥
अध्याय ८—ब्राह्मण १
मनु के लिए प्रातःकाल धोने के लिए पानी लाये, जैसे हाथ धोने के लिए लाया करते हैं।
जब वह धो रहा था तो उसके हाथ में मछली (मत्स्य) आ गई ॥१॥
वह उससे बोली, 'मुझे पाल ! मैं तेरी रक्षा करुँगी।' उसने पूछा, 'तू मेरी किससे रक्षा
करेगी ?' उसने उत्तर दिया, 'तूफान में यह सब प्रजा बह जायेगी। मैं उससे तेरी रक्षा करुँगी।'
मनु ने पूछा, 'मैं तुझे कैसे पालूँ ?' ॥२॥
यह बोली, 'जब तक हम छोटे हैं हमारी बड़ी आफत है, क्योंकि मछली को मछली खाती
हैं। मुझे पहले घड़े में पाल। जब मैं उससे बढ़ जाऊँ तो गड्ढे को खोदकर मुझे उसमें रखना।
जब मैं उससे भी बढ़ जाऊँ तो मुझे समुद्र में ले जाना। तब मैं बड़ी हो जाऊँगी और कोई आपत्ति
न रहेगी' ॥३॥
वह तुरन्त ही झष मछली हो गई क्योंकि झष (सब मछलियों से अधिक) बढ़ती है।
(अब उसने कहा) 'अमुक वर्ष में तूफान आयेगा, तब तू मेरे कहने के अनुसार नाव बनाना।
और जब तूफान उठे तो तू नाव में बैठ जाना। मैं तुझे उससे बचाऊँगी' ॥४॥

त॒मेवं॑ भृ॒त्वा स॑मुद्र॒मभ्य॒वह॑ञ्चकार । स॒ यति॑थीं तत्समां॑ प॒रिदि॑देश॒ तति॑थीꣳ समां॑
नाव॑मुपकल्प्यो॒पासां॑ चक्रे स॒ औघऽउ॒त्थिते नावं॑मपे॒दे तꣳ स मत्स्य॒ उप॑न्यापुप्लुवे
तस्य॒ शृङ्गे॒ नावः॒ पाशं॑ प्र॒तिमु॑मोच॒ तेनै॑तमुत्त॒रं गि॒रिमति॑दुद्राव ॥५॥ स॒ हो॑वाच ।
अ॒पीप॑रं वै त्वा वृ॒क्षे नावं॒ प्रति॑बध्नीष्व॒ तं तु त्वा॒ मा गि॒रौ सन्त॑मुद॒कमन्तश्छे॒त्सी-
द्य्याव॑दुद॒कꣳ सम॑वायात्ताव॑त्ताव॒दन्व॑वस॒र्पासी॑ति॒ स ह॒ ताव॑त्ताव॒देवान्व॑वससर्प॒ त-
दे॒तदु॑त्त॒रस्य गि॒रेर्मनो॒रव॑सर्प॒णमित्यौ॒घो ह॒ ताः सर्वाः प्र॒जा नि॑र्ज्जा॒हाथे॒ह मनु॑रे-
वैकः॑ परिशिशि॒षे ॥६॥ सोऽर्च॑ञ्च्श्रा॒म्यंश्च॑चार प्र॒जाका॑मः । तत्रा॑पि पाकय॒ज्ञेने॑जे स॒
घृ॒तं दधि॑ म॒स्त्वामि॒क्षामित्य॒प्सु जु॑हुवाञ्चकार॒ ततः॒ संवत्स॒रे योषि॑त्सम्ब॒भूव सा ह॑
पि॒ब्दमा॑नेवो॒देया॑य॒ तस्यै॑ ह॒ स्म घृ॒तं प॒दे संति॑ष्ठते॒ तया॑ मित्रावरु॒णौ संज॑ग्माते
॥७॥ ताꣳ हो॑चतुः॒ कासीति॑ । मनो॑र्द्दुहि॒तेत्याव॑योर्द्दुहि॒ति नेति॒ हो॑वाच॒ य ए॒व
मामजी॑जनत॒ तस्यै॒वाहम॒स्मीति॒ तस्याम॒पित्व॑मीषाते॒ तद्धा ज॒ज्ञौ तद्धा न॑ ज॒ज्ञावति॒
त्वे॒विया॑य॒ सा मनु॒माज॑गाम ॥८॥ ताꣳ ह॒ मनू॑रुवाच॒ कासीति॑ । तव दुहि॒तेति॑
क॒थं भग॑वति॒ मम॑ दुहि॒तेति॒ या अमू॒रप्स्वाहु॑तीरहौ॒षीर्घृतं॒ दधि॑ म॒स्त्वामि॑क्षां॒ ततो॑
मामजी॑जनथाः॒ साशी॒रस्मि॒ तां मा य॒ज्ञेऽव॑कल्पय य॒ज्ञे चेद्वै मावकल्पयिष्य॑सि ब॒हुः
प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भविष्यसि॒ याम॒मुया॒ कां चाशि॑षमाशासि॒ष्यसे॒ सा ते॒ सर्वा॒ समर्धि॑-
ष्यत॒ऽइति॒ तामेतन्मध्ये॑ य॒ज्ञस्यावा॑कल्पयन्मध्ये॒ ह्येतद्य॒ज्ञस्य॒ यद॑न्त॒रा प्र॑याजानुया-
जान् ॥९॥ त॒यार्च॑ञ्च्श्रा॒म्यंश्च॑चार प्र॒जाका॑मः । तये॒मां प्र॒जातिं॑ प्र॒जज्ञे॒ येयं मनोः प्र॒जा-
तिर्याम्वे॑नया॒ कां चाशि॑षमा॒शास्त॒ सास्मै॒ सर्वा॒ समा॑र्ध्यत ॥१०॥ सैषा निदा॒नेन॒
यदि॒डा । स यो॒ हैवं॑ वि॒द्वानिडया॒ चर॑त्येताꣳ हैव प्र॒जातिं॑ प्र॒जायते॒ यां मनुः॒ प्रा-
जायत याम्वे॑नया॒ कां चाशि॑षमा॒शास्ते॒ सास्मै॒ सर्वा॒ समृ॑ध्यते ॥११॥ सा वै प॒ञ्चा-
व॒त्ता भव॑ति । प॒शवो॒ वाऽइ॑डा पा॒ङ्क्ता वै प॒शव॒स्तस्मात्पञ्चाव॒त्ता भव॑ति ॥१२॥
स॒ सम॑वदायेडाम् । पूर्वार्धं पुरोडाशस्य प्रशीर्य्य पुरस्ताद्द्‍ध्रुवाये॒ निद॑धाति॒ ताꣳ होत्रे॒

का० १, अ० ८, ब्रा० १, कं० ५-१३ शतपथब्राह्मण / १५३
जब वह उसको इस प्रकार पाल चुका तो उसे समुद्र में ले गया, और जिस वर्ष के लिए
उसने कहा था उसी वर्ष उसी के कहने के अनुसार नाव बनाई । जब तूफान उठा तो वह नाव में
बैठ गया । तब मछली उस तक तैर आई और उसके सींग से उसने नाव की रस्सी को बाँध दिया ।
इससे वह उत्तरी पहाड़ तक जल्दी से पहुँच गया ॥५॥
उसने कहा, 'मैंने तुझे बचा लिया । वृक्ष में नाव बाँध दे । परन्तु जब तू पहाड़ पर है उस
समय ऐसा न होने दे कि जल तुझे काट दे । जब जल कम हो जाय तो नीचे उतर आना ।' अतः
वह धीरे-धीरे उतरा । इसलिए उत्तरी पहाड़ के उस भाग को 'मनोरवसर्पणम्' अर्थात् 'मनु का
उतार' कहते हैं। तूफान ने उस सब प्रजा को नष्ट कर दिया । केवल मनु बच रहा ॥६॥
उसने सन्तान की इच्छा से पूजा और श्रम किया । उस समय पाकयज्ञ भी किया और
घी, दही, मट्ठा भी जलों में चढ़ाया । तब एक वर्ष में एक स्त्री उत्पन्न हुई । वह मोटी होकर
निकली । उसके पैर में घी था । मित्र और वरुण उसे मिले ॥७॥
उन्होंने उससे पूछा, 'तू कौन है ?' उसने कहा, 'मनु की लड़की ।' उन्होंने कहा, 'कह कि
तू हम दोनों की है ।' उसने कहा, 'नहीं, मैं उसी की हूँ जिसने मुझे जना है ।' उन्होंने उसमें भाग
माँगा । उसने माना या न माना । वह वहाँ से चली आई और मनु के पास आई ॥८॥
मनु ने उससे पूछा, 'तू कौन है ?' 'तेरी लड़की ।' उसने पूछा, 'भगवति ! तू मेरी लड़की
कैसे ?' उसने उत्तर दिया, 'तूने जलों में जो घी-मट्ठा अर्पण किया, उसी से तूने मुझे उत्पन्न
किया । मैं आशी हूँ । तू मेरा प्रयोग कर । यदि तू यज्ञ में मेरा प्रयोग करेगा तो बहुत-से पशुओं
और सन्तानवाला होगा । जो कुछ चीज तू मेरे द्वारा माँगेगा वह सब तुझको मिलेगी ।' अब उसने
उसका यज्ञ के मध्य में प्रयोग किया, क्योंकि प्रयाज और अनुयाज के बीच में जो कुछ है वही
यज्ञ का मध्य है ॥९॥
वह प्रजा की कामना से उसी के द्वारा पूजा और श्रम करता रहा । उसके द्वारा इस प्रजा
को उत्पन्न किया, जो यह मनु की सन्तान है । जो कोई चीज उसके द्वारा माँगी वह सब उसको
मिल गई ॥१०॥
निदान में यही इडा है । जो कोई इस रहस्य को समझकर 'इडा'-यज्ञ करता है वह इस
प्रजा को जिसे मनु ने उत्पन्न किया बढ़ाता है, और जो कुछ चीज उसके द्वारा माँगता है, वही
उसे मिल जाती है ॥११॥
इस (इडा) के पाँच भाग होते हैं । पशु ही इडा है । पशु के भी पाँच भाग होते हैं ।
इसलिए इडा के भी पाँच भाग होते हैं ॥१२॥
इडा के बराबर-बराबर टुकड़े करके और पुरोडाश के पूर्वार्द्ध को काटकर वह ध्रुवा

प्रदा॒य दक्षि॒णात्ये॑ति ॥ १३ ॥ स होतु॒रक्षि॒ निर्लि॑म्पति । तद्धो॒तौष्ठयो॒र्निर्लि॑म्पते
मन॒सस्प॑तिना ते हु॒तस्या॑श्नामी॒षे प्रा॒णायेति॑ ॥ १४ ॥ अथ॒ होतुरक्षि॒ निर्लि॑म्पति ।
तद्धो॒तौष्ठयो॒र्निर्लि॑म्पते वाच॒स्पति॑ना ते हु॒तस्या॑श्नाम्यू॒र्ध्वऽउ॑दाना॒येति॑ ॥ १५ ॥ एत॒द्ध
वै मनु॒र्बिभ॑यां चकार । इदं वै मे॒ तनि॑ष्ठं य॒ज्ञस्य॒ यदिय॒मिडा पा॑कय॒ज्ञिया॒ यदि॑ म
ऽइ॒ह रक्षा॑ꣳसि य॒ज्ञं न हिꣳस्युरिति॒ तम॑तत्पु॒रा रक्षो॑भ्यः पु॒रा रक्षो॑भ्य इ॒त्येव प्रा-
पय॒त् तथो॒ऽए॒वैना॑मे॒ष ए॒तत्पु॒रा रक्षो॑भ्यः पु॒रा रक्षो॑भ्य इ॒त्येव प्राप॑य॒त्येऽथ॒ यत्प्र-
त्यक्षं॒ न प्रा॒श्नाति॒ नेदु॑पहू॒तां प्राश्ना॒मीत्ये॒तद्वैवैनां॑ प्रापयते॒ यद्धो॒ष्ठयो॒र्निर्लि॑म्पते
॥ १६ ॥ अथ॒ होतुः॑ पा॒णौ सम॑वद्यति । समव॑त्तमिव॒ सतीं॒ तदे॑नां॒ प्रत्य॒क्षꣳ होतृ॑-
रि श्रयति॒ तया॑त्मं॒हूत॑या॒ होता॒ यज॑मानाया॒शिष॒माशा॑स्ते॒ तस्मा॒द्धोतुः॑ पा॒णौ सम॑-
वद्यति ॥ १७ ॥ अथोपा॑ꣳशू॒पह्व॑यते । ए॒तद्वै मनु॑र्बिभयां चकारेदं वै मे तनि॑ष्ठं
य॒ज्ञस्य॒ यदिय॒मिडा पा॑कय॒ज्ञिया॒ यदि॑ म॒ऽइ॒ह रक्षा॑ꣳसि य॒ज्ञं न॒ हन्यु॒रिति॒ तामे॑त-
त्पु॒रा रक्षो॑भ्यः पु॒रा रक्षो॑भ्य इ॒त्येवोपा॑ꣳशूपा॒ह्वयत॒ तथो॒ऽए॒वैना॑मे॒ष ए॒तत्पु॒रा र-
क्षो॑भ्यः पु॒रा रक्षो॑भ्य इ॒त्येवोपा॑ꣳशूप॒ह्वय॑ते ॥ १८ ॥ स उप॑ह्वयते । उप॑हू॒तꣳ रथन्त-
र॒ꣳ सह पृ॑थि॒व्योप॒ माꣳ रथन्तर॒ꣳ सह पृ॑थि॒व्या ह्व॑यतामुप॑हूतं वाम॑दे॒व्य॒ꣳ स॒हा॒न्त-
रिक्षे॒णोप॒ मां वा॑मदे॒व्य॒ꣳ सहा॒न्तरि॑क्षेण ह्वयतामुप॑हूतं बृह॒त्स॒ह दि॒वोप॒ मां बृ॒-
ह॒त्स॒ह दि॒वा ह्व॑यता॒मिति॒ तदे॑तानि॒वैतदुप॑ह्वय॒मान इ॒मांश्च लो॒कानुप॑ह्वयतऽए॒ता-
नि च॒ सामा॑नि ॥ १९ ॥ उप॑हूता गावः॒ सह॑ऽर्षभा॒ इति॑ । प॒शवो॒ वाऽइ॒डा तदे॑नां
परो॒ऽक्षमू॒पह्व॑यते॒ सह॑ऽर्षभा॒ इति॑ स॒मिथु॑नामे॒वैना॑मे॒तदुप॑ह्वयते ॥ २० ॥ उप॑हूता
स॒प्तहोत्रेति॑ । तदे॑नाꣳ स॒प्तहोत्रा सौम्ये॒नाध्व॑रेणोप॒ह्वय॑ते ॥ २१ ॥ उप॑हूतेडा ततु॒-
रिरिति॑ । तदे॑नां प्रत्य॒क्षमू॒पह्व॑यते ततु॒रिरिति॒ सर्वꣳ ह्येषा पा॒प्मानं॑ तरति॒ तस्मा॑-
दाह ततु॒रिरिति॑ ॥ २२ ॥ उप॑हूतः सखा भ॒क्ष इति॑ । प्रा॒णो वै सखा॑ भ॒क्षस्त॒त्प्रा-
णमुप॑ह्वयत॒ऽउप॑हूत॒ꣳ हेगिति॑ तच्छरीरमुप॑ह्वयते तत्सर्व॑मुप॒ह्वय॑ते ॥ २३ ॥ अथ प्र-

कां० १, अ० ८, ब्रा० १, कं० १३-२३ शतपथब्राह्मण / १५५
(चमसे) के सामने रखता है, और उसे होता को देकर दक्षिण की ओर आता है ॥१३॥
वह होता के इस जगह (पहली अँगुली के बीच में) घी लगाता है । होता घी अपने होठों
से लगाता है, यह मन्त्र पढ़कर— “मनस्पतिना ते हुतस्याश्नामीषे प्राणाय”—“मन के पति द्वारा
आहुति दिये गये तुझको वह इस (बल) और प्राण के लिए खाता हूँ” ॥१४॥
अब वह होता के इस जगह (अँगुली पर) घी लगाता है। होता घी अपने होठों से लगाता
है, यह मन्त्र पढ़कर “वाचस्पतिना ते हुतस्याऽश्नाम्यूर्जैऽउदानाय”—“वाणी के पति द्वारा आहुति
दिये गये तुझको तेज और उदान के लिए खाता हूँ” ॥१५॥
इस पर मनु डरा कि यह जो पाक-यज्ञिया इडा है, यह मेरे यज्ञ का सबसे कमजोर भाग
है। कहीं ऐसा न हो कि राक्षस लोग मेरे यज्ञ को इस स्थान पर विध्वंस कर दें, इसलिए (उस इडा
को) राक्षसों के आने से पहले ही उसने (होठों से लगाकर) सुरक्षित कर दिया। इसी प्रकार यह
होता भी राक्षसों के आने से पहले ही सुरक्षित कर देता है। यद्यपि वह इसे खाता नहीं कि बिना
आहुति दिये कैसे खा लूँ, परन्तु वह होठों से लगाकर उसे सुरक्षित कर देता है ॥१६॥
अब वह होता के हाथ में इडा के टुकड़े-टुकड़े करता है। इस प्रकार टुकड़े-टुकड़े की गई
इडा को वह प्रत्यक्ष रूप से होता के हवाले कर देता है। जो उसके हवाले हो गई उस इडा से वह
यजमान के लिए आशीर्वाद चाहता है। इसलिए होता के हाथ में रखता है ॥१७॥
अब (इडा को) चुपके-चुपके बुलाता है। उस समय सचमुच मनु यह सोचकर डरा कि
यह पाक-यज्ञिया इडा मेरे यज्ञ का सबसे कमजोर भाग है; कहीं राक्षस इसको हानि न पहुँचावे ।
इसीलिए उसने चुपके-चुपके कहा, 'राक्षस (के आने) से पूर्व, राक्षस (के आने) से पूर्व।' इसी
प्रकार यह होता भी चुपके-चुपके कहता है, 'राक्षस (के आने) से पूर्व' ॥१८॥
वह इस प्रकार (धीरे से) कहता है, 'पृथिवी के साथ रथन्तर बुलाया गया। पृथिवी के
साथ रथन्तर मुझे बुलाये। अन्तरिक्ष के साथ वामदेव्य बुलाया गया । अन्तरिक्ष के साथ वामदेव्य
मुझे बुलावे। द्यौ के साथ बृहत् बुलाया गया। द्यौ के साथ बृहत् मुझे बुलावे।' वह इस प्रकार
बोलकर तीनों लोकों और तीनों सामों को बुलाता है (रथन्तर, वामदेव्य और बृहत् तीन साम
हैं) ॥१९॥
अब कहता है, 'गायें बैलों के साथ बुलाई गईं।' पशु ही इडा है। उन्हीं को परोक्ष रीति
से बुलाता है। 'बैलों के साथ' से तात्पर्य उनके जोड़े से है ॥२०॥
अब कहता है, 'सात होताओं से की गई इडा बुलाई गई।' इस प्रकार वह सात होताओं
द्वारा किये गये सोम यज्ञ के नाम से उसे बुलाता है ॥२१॥
अब कहता है, 'विजय पाने वाली (ततुरि) इडा बुलाई गई।' इस प्रकार उसको प्रत्यक्ष
रूप से बुलाता है। यह सब पापों को पार कर देती है। इसलिए इसको 'ततुरिः' कहा गया ॥२२॥
अब कहता है, 'भक्ष-मित्र बुलाया गया'। प्राण ही सखा भक्ष है। इससे प्राण को बुलाता
है । 'हेक्,' अर्थात् बुलाया गया। इससे वह शरीर को बुलाता है। इस प्रकार वह सबको बुलाता
है ॥२३॥

१५६ शतपथ ब्राह्मण
तिपद्यते । इ॒डोपहू॑तोपहू॑ते॒डोपो॒ऽअ॒स्मांऽइडा॑ ह्वयतामि॒डोपहू॑तेति॒ तदुपहूता-
मे॒वैना॑ने॒तत्सतॊ॑ प्रत्य॒क्षमुपह्व॑यते या वै सासीदौर्वे॑ सासीच्चतु॑ष्पदी वै गौस्तस्मा-
च्चतु॒रुप॑ह्वयते ॥२४॥ स वै चतुरुप॑ह्वयमानः । अथ नानि॑वोप॒ह्वये॒तेऽजामि॑तायै जा-
मि ह कुर्याद्यदि॒डोपहू॑ते॒डोपहू॑ते॒त्येवोप॑ह्वयेतोपहू॑ते॒डेति वे॒डोपहू॑तेति॒ तद॒र्वाची॑-
मुप॑ह्वयत॒ऽउप॑हूते॒डेति तत्पराची॑मुपो॒ऽअ॒स्मांऽइडा॑ ह्वयतामिति॒ तदा॒त्मानं॑ चै-
वै॒तन्नान्तरे॒त्यन्ये॑व च भवती॒डोपहू॑तेति॒ तत्पुनर॒र्वाची॑मुप॑ह्वयते॒ तद॒र्वाचीं॑ चै॒वै-
न॑मेतत्पराचीं॑ चॊप॑ह्वयते ॥२५॥ मानवी घृ॒तप॑दीति । म॒नुर्ह्यै॑तामग्रे॑ऽजनयत॒ त-
स्मादाह मानवी॑ति घृ॒तप॑दीति॒ यदि॒वास्यै घृ॒तं प॒दे सम॑तिष्ठत॒ तस्मा॑दाह घृ॒तप॒दी-
ति ॥२६॥ उ॒त मै॑त्रावरु॒णीति॑ । यदि॒व मित्रावरुणाभ्या॒ꣳ सम॑गच्छत॒ स एव मै॑त्रा-
वरु॒णो न्य॒ङ्गो ब्र॒ह्मा दे॑व॒कृतोप॑हूतेति॒ ब्रह्मा ह्ये॑षां॑ दे॒वकृ॑तोप॒हूतोप॑हूता दैव्या॑
ऋ॒त्विज॒ उप॑हूता मनु॒ष्या॒ इति तद्देवांश्चैवाध्व॑र्यूनू॒प॑ह्वयते॒ ये च मानु॒षा वत्सा वै
दैव्या॑ ऋ॒त्विजॊऽथ य॒ऽइतरे॑ ते मानु॒षाः ॥२७॥ य॒ऽइ॒मं य॒ज्ञमवा॒न्त्ये च॑ य॒ज्ञप॑तिं
व॒र्धानि॑ति । ए॒ते वै य॒ज्ञम॑वन्ति॒ ये ब्राह्म॑णाः शुश्रुवा॒ꣳसो॑ऽनूचा॒ना ए॒ते ह्ये॑नं त-
न्वत॒ऽए॒तं जन॑यन्ति॒ तद् तेभ्यो॒ निह्व॑ते व॒त्सा उ वै य॒ज्ञप॑तिं वर्ध॑न्ति॒ यस्य॑
ह्ये॑ते॒ भूयि॑ष्ठा भव॒न्ति स हि य॒ज्ञप॑तिर्व॒र्धते॒ तस्मा॑दाह॒ ये च॑ य॒ज्ञप॑तिं व॒र्धानि॑ति
॥२८॥ उप॑हूते द्यावापृथिवी पूर्व॒जेऽऋ॒तावरी॑ दे॒वी दे॒वपु॑त्रे॒ऽइति॑ । तदि॒मे द्या-
वापृथि॒वीऽउप॑ह्वयते ययो॒रिद॒ꣳ सर्व॑म॒ध्युप॑हूतो॒ऽयं यज॑मान॒ इति तद्यज॑मानमुप॑-
ह्वयते॒ तद्यदत्र नाम॑ न गृह्णा॑ति परो॒ऽक्षं ह्ये॑त्राशी॒र्दि॒डायां मानु॒षꣳ ह कुर्याद्य-
त्रास्य नाम॑ गृह्णीयाद्य॒द्वै तद्य॒ज्ञस्य यन्मानु॑षं॒ नेद्य॒दं यज्ञं करवा॑णीति॒ तस्मा॒न्न नाम॑
गृह्णा॑ति ॥२९॥ उत्त॒रस्यां॑ दे॒वय॒ज्यायामुपहू॑त॒ इति॑ । तद॒स्माऽए॒तत्सञ्जीवा॑तुमे॒व प॒-
रो॒ऽक्षम॒ाशास्ते जीवन्हि पूर्व॑मि॒ष्ट्वाथाप॑रं यज॑ते ॥३०॥ तद॒स्मा ए॒तत्प्र॒जामि॑व प॒रो-
ऽक्षम॒ाशास्ते । यस्य॒ हि प्र॒जा भव॑त्य॒मुं लो॒कमात्मनैत्यथा॒स्मिँल्लो॒के प्र॒जा यज॑ते

कां० १, अ० ८, ब्रा० १, कं० २४-३१ शतपथब्राह्मण / १५७
अब वह जोर से कहता है, 'इडा बुलाई गई। बुलाई गई इडा हमको अपनी ओर बुलाये।'
'इडा यहाँ बुलाई गई' से तात्पर्य यह है कि जो पहले वास्तविक रूप में बुलाई जा चुकी है उसे
अब प्रत्यक्ष रूप से बुलाता है। इडा गौ चार पैर वाली होती है। इसलिए उसको चार बार
बुलाया ॥२४॥
चार बार बुलाता हुआ कई प्रकार से बुलाता है जिससे दुहराने का दोष न लगे। यदि 'इडा
उपहूता'-'इडा उपहूता' ही कई बार कहे या 'उपहूता इडा'-'उपहूता इडा' ही कई बार कहे तो
दुहराने का दोषी हो। इसलिए 'इडा उपहूता' कहकर वह उसे इधर बुलाता है और 'उपहूता इडा'
कहकर वह उसे उधर बुलाता है। 'इडा हमको बुलाये' यह कहकर वह अपने को अलग नहीं
करता और कहने की शैली भी बदल जाती है। 'इडा उपहूता' कहकर वह उसे फिर इधर बुलाता
है। इस प्रकार वह उसको इधर भी बुलाता है और उधर भी बुलाता है ॥२५॥
अब कहता है, 'मानवी घृतपदी'—'मनु की लड़की घी के पैरों वाली'। मनु ने ही पहले
उसे जना था, इसीलिये कहा 'मानवी' (मनु की लड़की)। 'घृतपदी' इसलिए कहा कि उसके
पदचिह्न में घृत रहता है, इसलिए 'घृतपदी' नाम हुआ ॥२६॥
अब कहता है, 'मैत्रा-वरुणी'—'मित्र और वरुणी वाली'। चूंकि उसका मित्र और वरुण
से समागम हुआ, इसलिए उसकी मैत्रा-वरुण प्रकृति हुई। वह देवकृत ब्रह्मा हुई, क्योंकि वह
देवकृत ब्रह्मा कहकर बुलाई गई। 'देव अध्वर्यु और मनुष्य बुलाये गये' ऐसा कहकर वह दैव्य
अध्वर्यु और मनुष्य अध्वर्यु दोनों को बुलाता है। दैव्य अध्वर्यु वत्स या बछड़े हैं, और जो दूसरे
हैं वे मनुष्य अध्वर्यु ॥२७॥
अब कहता है, 'जो इस यज्ञ को बढ़ावें, जो इस यज्ञपति को बढ़ावें।' जिन ब्राह्मणों ने
वेदों को पढ़ा और पढ़ाया है वे इस यज्ञ की रक्षा करते हैं, चूंकि वे इसको फैलाते और करते हैं।
उनको इस प्रकार सन्तुष्ट करता है, और बछड़े यज्ञपति को बढ़ाते हैं क्योंकि जिस यज्ञपति के
बछड़े बहुत होंगे वह बढ़ेगा। इसीलिये कहा 'वे जो इस यज्ञपति को बढ़ावें' ॥२८॥
अब कहता है, "उपहूते द्यावापृथिवी पूर्वजेऽऋतावरी देवी देवपुत्रे"—'बुलाई गई द्यावा-
पृथिवी जो दोनों पूर्वज (पहले जन्मी हुई हैं), ऋतावरी (ऋत को पालने वाली), देवी (दिव्य
गुण वाली), देवपुत्र (देवता हैं पुत्र जिनके ऐसी) हैं।" इस प्रकार वह द्यावापृथिवी को बुलाता है,
जिसमें सब संसार आ जाता है। अब कहता है, 'यजमान बुलाया गया' इससे यजमान को बुलाता
है। यहाँ नाम नहीं लेता। इससे परोक्ष रूप में इडा के लिए आशीर्वाद है। यदि नाम ले तो
मानुषी भाषा हो जाय। जो मानुषी भाषा है वह यज्ञ में अशुभ है। यज्ञ में अशुभ नहीं करना
चाहिये, इसलिए नाम नहीं लेना चाहिए ॥२९॥
अब कहता है, "उत्तरस्यां देव यज्यायामुपहूतः"—अर्थात् "आगे होनेवाली देवपूजा के लिए
(यजमान) बुलाया गया।" इस प्रकार उस (यजमान) के लिए परोक्ष रीति से जीविका के लिए
आशीर्वाद देता है। जैसे उसने जीवन-भर यज्ञ किया है, आगे भी करेगा ॥३०॥
वह उसके लिए परोक्ष-रीति से सन्तान के लिए भी आशीर्वाद देता है, क्योंकि जिसके
सन्तान होती है जब वह मर जाता है तो उसकी सन्तान इस लोक में यज्ञ करती है। इसलिए

१५८ शतपथ ब्राह्मण
तस्मात्प्रजोत्तरा देव॒यज्या॑ ॥ ३१॥ त॒दस्मा॒ऽएतत्प॒शूने॒व प॒रोऽक्ष॒माशा॑स्ते । यस्य॑
हि॒ पश॑वो भव॑न्ति स पू॒र्वमिष्ट्वा॒याप॑रं यजते ॥ ३२॥ भूय॑सि ह॒विष्करण॒ऽउप॑हूत
इति॑ । त॒दस्मा ए॒तज्जीवातु॑मेव॒ परो॒ऽक्षमाशा॑स्ते जी॒वन्हि पू॒र्वमिष्ट्वा॑य॒ भूयो॑-भूय
ए॒व ह॒विष्करोति॑ ॥ ३३॥ त॒दस्मा॒ऽएतत्प्र॒जामि॑व प॒रोऽक्ष॒माशा॑स्ते । यस्य॒ हि प्र॒जा
भव॒त्येक॑ आ॒त्मना॒ भव॑त्यथो॒त द॑श॒धा प्र॒जया ह॒विर्निष्क्रि॑यते॒ तस्मा॑त्प्र॒जा भूयो॑ ह॒वि-
ष्करणम् ॥ ३४॥ त॒दस्मा ए॒तत्पशूने॒व प॒रोऽक्ष॒माशा॑स्ते । यस्य॒ हि पश॑वो भव॑न्ति
स पू॒र्वमिष्ट्वा॑य॒ भूयो॑-भूय ए॒व ह॒विष्करो॑ति ॥ ३५॥ ए॒षा वा आ॒शीः । जी॒वेयं॑ प्र॒जा
मे स्या॒च्छ्रियं॑ गच्छेय॒मिति॒ तद्यत्पशूनाशा॑स्ते तच्छ्रिय॒माशा॑स्ते श्रीर्हि प॒शव॑स्तदे॒ताभ्या॑-
मे॒वैतदाशी॒र्भ्या॑ सर्व॒माप्तं तस्मा॑द्वाऽए॒तेऽअत्र॒ द्वेऽआशिषौ॑ क्रियेते ॥ ३६॥ दे॒वा
म॒ऽइदꣳ॑ ह॒विर्जु॑षन्ता॒मिति॑ । त॒स्मिन्नुप॑हूत॒ इति॑ तद्य॒द्ध्यस्यै॒वैतत्समृ॑द्धि॒माशा॑स्ते॒ यदि॑
दे॒वा ह॒विर्जुष॑न्ते॒ तेन॒ हि म॒हद्गम॑यति॒ तस्मा॑दाह जु॒षन्ता॒मिति॑ ॥३७॥ ॥ शतम्
७०० ॥ ॥ तां वै प्राश्नन्त्येव । नाग्नौ जुह्वति पशवो वाऽइडा नेत्पशूनग्नौ प्रव्-
राजानिमिति तस्मान्नाग्नौ जुह्वति ॥ ३८॥ प्रा॒णेष्वेव हूयते । होत॑रि॒ यज॑माने॒ सद-
र्ध्यौ॑ व॒द्य यत्पूर्वार्धं पुरोडाशस्य प्रशीर्य पुरस्ताद्दध्रुवाये निदधाति यजमानो वै
ध्रुवा तद्यजमानस्य प्राशितं भवत्यथ यत्प्रत्यक्षं न प्राश्नाति नेदसꣳस्थिते यज्ञे प्रा-
श्नानीत्येतद्वैवास्य प्राशितं भवति सर्वे प्राश्नन्ति सर्वेषु मे हुतासदिति पञ्च प्राश्न-
न्ति पशवो वाऽइडा पाङ्क्ता वै पशवस्तस्मात्पञ्च प्राश्नन्ति ॥ ३९॥ अथ यत्र प्रति-
पद्यते । तच्चतुर्धा पुरोडाशं कृत्वा बर्हिषदं करोति तदत्र पितॄणां भाजनिन चतस्रो
वाऽअवान्तरदिशोऽवान्तरदिशो वै पितरस्तस्माच्चतुर्धा पुरोडाशं कृत्वा बर्हिषदं
करोति ॥ ४०॥ अथ यत्राहोपहूते द्यावापृथिवीऽइति । तदग्नीध्रऽआदधाति तद्-
ग्रीत्प्राश्नात्युपहूता पृथिवी मातोप मां पृथिवी माता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहो-
पहूतो द्यौष्पितोप मां द्यौष्पिता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहेति द्यावापृथिव्यो वा

कां० १, अ० ८, ब्रा० १, क० ३१-४१ शतपथब्राह्मण / १५६
'उत्तरा देवयज्या' का अर्थ है 'सन्तान' ॥३१॥
इस प्रकार वह परोक्ष-रीति से पशुओं के लिए भी आशीर्वाद देता है, क्योंकि जिसके पशु
हैं वह जैसे उसने पहले यज्ञ किया उसी प्रकार फिर भी यज्ञ करेगा ॥३२॥
अब कहा, "भूयसि हविष्करणऽउपहूतः"--"वह बहुत ज्यादा हवि देने के लिए बुलाया
गया।" इस प्रकार वह उसकी जीविका के लिए परोक्ष-रीति से आशीर्वाद देता है, क्योंकि जैसे
उसने पहले यज्ञ किया इस प्रकार जीता रहेगा तो आगे भी यज्ञ करेगा ॥३३॥
इससे वह परोक्ष रूप से सन्तान के लिए भी आशीर्वाद देता है, क्योंकि जिसके सन्तान
होती है वह चाहे अकेला ही हो सन्तान द्वारा दश गुनी हवि देता है। इसीलिये कहा कि 'सन्तान
का अर्थ है बहुत-सी हवि देना' ॥३४॥
इस प्रकार वह परोक्ष रूप से पशुओं के लिए भी आशीर्वाद देता है। जिसके पशु होते हैं
वह पहले जैसे यज्ञ करता था फिर भी अधिक यज्ञ करता है ॥३५॥
अब आशीर्वाद यह है, "जीवेयं प्रजा मे स्याच्छ्रियं गच्छेयम्"--"मैं जियूं। मेरी प्रजा हो,
मेरी सम्पत्ति हो।" 'पशुओं के लिए आशीर्वाद' से तात्पर्य है 'सम्पत्ति से', क्योंकि पशु ही सम्पत्ति
हैं। इन दो आशीर्वादों में सब आ गया, इसलिए यहाँ दो आशीर्वाद किये जाते हैं ॥३६॥
अब कहता है, "देवा म इदं हविर्जुषन्ताम्"--"देव मेरी इस हवि को स्वीकार करें।"
'इसी यज्ञ में बुलाया गया' - यह जो देव हवि को स्वीकार करते हैं मानो यज्ञ की समृद्धि के लिए
ही आशीर्वाद देते हैं। इससे बड़ी जय होती है। इसलिए कहा, 'स्वीकार करें' ॥३७॥
(यजमान और पुरोहित) उस (इडा) को खाते हैं। अग्नि में नहीं छोड़ते। इडा का
अर्थ है पशु। इसलिए अग्नि में नहीं छोड़ते कि कहीं पशुओं को अग्नि में न छोड़ दें ॥३८॥
प्राणों में ही आहुति दी जाती है, कुछ होता में, कुछ यजमान में, कुछ अध्वर्यु में। अब
पुरोडाश का पूर्वार्द्ध काटकर ध्रुवा में रखता है। ध्रुवा यजमान है, इसलिए यजमान इसको
खाता है। यदि वह प्रत्यक्ष में उसे नहीं भी खाता है कि कहीं यज्ञ की समाप्ति के पहले खा लूं, तो
भी वह खाई हुई समझ ली जाती है। सब खाते हैं। तात्पर्य है कि 'सब में ये मेरे लिए हुत होवें'।
पांच इसमें से खाते हैं। इडा का अर्थ है पशु। पशु पांच प्रकार के होते हैं। इसलिए पांच इसमें से
खाते हैं ॥३९॥
जब (होता) जोर से बोलता है तो वह (अध्वर्यु) पुरोडाश के चार भाग करके कुशों पर
रखता है। वह यहाँ पितरों के स्थान पर होता है। अवान्तर दिशायें चार होती हैं। अवान्तर
दिशा ही पितर हैं। इसलिए पुरोडाश के चार भाग करके उनको कुशों पर रखता है ॥४०॥
और जब वह कहता है, 'उपहूते द्यावापृथिवी'--'द्यावा-पृथिवी बुलाये गये', तो उसको
अग्नीध्र को दे देता है। अग्नीध्र (उनमें से दो टुकड़ों को) यह मन्त्र पढ़कर खाता है, "उपहूता
पृथिवी मातोप मां पृथिवी माता ह्वयतामग्निरानीध्रात् स्वाहा" (यजु० २।१०)--"उपहूतो
द्यौष्पितोप मां द्यौष्पिता ह्वयतामग्निरानीध्रात् स्वाहा" (यजु० २।११)-"बुलाई गई पृथिवी
माता। पृथिवी माता मुझे बुलावे। अग्नीध्र होने के कारण मैं अग्नि हूँ", "बुलाया गया द्यौ पिता।
द्यौ पिता मुझे बुलावे। अग्नीध्र होने के कारण मैं अग्नि हूँ।" यह जो अग्नीध्र है वह मानो द्यावा-