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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-७, ब्राह्मण-१

शा॒रत्निं॑ परि॒वास॑येत् ॥ २२॥ द्वाद॑शारत्निं परि॒वास॑येत् । द्वाद॑श॒ वै मासा॑ः संवत्स॒-
र॒स्य सं॑वत्स॒रो व॒ज्रो व॒ज्रो यू॒पस्तस्मा॑द्द्वादशारत्निं परि॒वास॑येत् ॥ २३॥ त्रयो॑दशार-
त्निं परि॒वास॑येत् । त्रयो॑दश॒ वै मासा॑ः संवत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रो व॒ज्रो व॒ज्रो यू॒पस्त-
स्मात्त्रयो॑दशारत्निं परि॒वास॑येत् ॥ २४॥ पञ्च॑दशारत्निं परि॒वास॑येत् । पञ्च॑दशो॒ वै
व॒ज्रो व॒ज्रो यू॒पस्तस्मा॑त्पञ्चदशारत्निं परि॒वास॑येत् ॥ २५॥ स॒प्तद॑शारत्निर्वाजपेययू-
पः॑ । अप॑रिमित ए॒व स्या॑दपरिमितिन वाऽए॒तेन॒ वज्रे॑ण दे॒वा अ॑परिमितमज॑यंस्त-
थोऽए॒वैष ए॒तेन॒ वज्रे॑णापरिमितैनैवापरिमितं॒ जय॑ति॒ तस्मा॑दपरिमित ए॒व स्या॒त्
॥ २६॥ स वाऽअ॒ष्टाश्रि॑र्भवति । अ॒ष्टाक्ष॑रा॒ वै गा॑य॒त्री पू॒र्वार्धो॒ वै य॒ज्ञस्य॒ गाय॑त्री
पू॒र्वार्ध॑ ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ तस्मा॑दष्टा॒श्रिर्भवति ॥ २७॥ ब्राह्म॑णम् ॥ ३ [६.४] ॥ षष्ठोऽध्या-
यः [२१.] ॥ ॥
अ॒भिमाद॑त्ते । दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यामाद॒दे
नार्यसीति॑ समा॒न ए॒तस्य॒ यजु॑षो ब॒न्धुर्योषो॒ वाऽए॒षा यद॒ब्रिस्तस्मा॑दाह॒ नार्य॑सी-
ति ॥ १॥ अ॒थाव॑टं परि॒लिख॑ति । इ॒दम॒हꣳ रक्ष॑सां ग्री॒वा अ॑पिकृन्ता॒मीति॒ वज्रो॑
वाऽअ॒भ्रिर्वज्रे॑णैवैतन्नाष्ट्राणाꣳ रक्ष॑सां ग्री॒वा अ॑पिकृन्तति ॥ २॥ अथ॒ खन॑ति । प्रा-
ञ्च॒मुत्क॑रमु॒त्किर॑त्युत्त॒रेण॒ संमा॒याव॑टं खनति॒ तदु॑त्तरेण॒ प्राञ्चं॒ यूपं॒ निद॑धात्येतावन्मा-
त्राणि॑ ब॒र्हिष्यु॑प॒रिष्टा॒दधि॑निदधाति॒ तद्दे॑वो॒परि॑ष्टा॒द्यूप॑शकल॒मधिनि॑दधाति पुर॒स्ता-
त्पार्श्व॒तश्च॒षाल॒मुप॑निदधात्यथ॒ यव॑मत्यः प्रोक्ष॒ण्यो भव॑न्ति सोऽसावे॒व बन्धु॑ः ॥ ३॥
स य॒वाना॑वपति । यवो॑ऽसि यव॒यास्मद्द्वेषो॑ यव॒यारा॑ती॒रिति॒ नात्र॑ तिरो॒हित॑मि-
वास्त्यथ॑ प्रोक्ष॒त्येको॒ वै प्रोक्ष॑णस्य॒ बन्धु॒र्मेध्य॑मे॒वैतत्क॑रोति ॥ ४॥ स प्रोक्ष॑ति ।
दि॒वे त्वा॒न्तरि॑क्षाय त्वा पृथि॒व्यै त्वेति॒ वज्रो॒ वै यूप॑ ए॒षां लो॒काना॑मभि॒गुप्त्या॒ऽएषां॑
वा लो॒काना॑मभि॒गुप्त्यै॒ प्रोक्षा॑मी॒त्येवैतदा॑ह ॥ ५॥ अथ॒ याः प्रोक्ष॑ण्यः परि॒शिष्य॑न्ते ।
ता अव॑टेऽवनयति शुन्ध॒न्तां लो॒काः पि॑तृ॒षद॑ना॒ इति॑ पितृदेव॒त्यो वै कूप॑ः खा-

कां० ३, अ० ६-७, ब्रा० ४-१, कं० २२-२७ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४५६
वज्र है। इसलिए ११ हाथ का काटे ॥२२॥
या बारह हाथ-भर काटे। साल में बारह मास होते हैं। वर्ष वज्र है। यूप भी वज्र है।
इसलिए बारह हाथ का काटे ॥२३॥
या तेरह हाथ का काटे। वर्ष में तेरह मास होते हैं। वर्ष वज्र है। यह यूप वज्र है।
इसलिए तेरह हाथ-भर का काटे ॥२४॥
या पन्द्रह हाथ का काटे। पन्द्रह वज्र है। यूप भी वज्र है। इसलिए पन्द्रह हाथ का
काटे ॥२५॥
वाजपेय यज्ञ का यूप १७ हाथ का होता है। या यह अपरिमित या बे-नपा हो। बे-नपे
वज्र से ही देवों ने बे-नपे (अपरिमित) को जीता। इसी प्रकार अपरिमित वज्र के द्वारा वह
अपरिमित को जीतता है। इसलिए यह अपरिमित भी हो सकता है ॥२६॥
वह आठ कोण का होता है। गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है।
यह यूप यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए इसको आठ कोण का होना चाहिए ॥२७॥
अध्याय ७—ब्राह्मण १
इस मन्त्रांश को पढ़कर खुरपी (अभ्रि) लेता है—‘‘देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्वि-
नोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि’’ (यजु० ६।१)—‘‘देव सविता की प्रेरणा से अश्विनों
को बाहुओं से, पूषा के दोनों हाथों से तुझको लेता हूँ। तू नारी है।’’ इस यजुः का वही तात्पर्य है
जो पहले का। ‘अभ्रि’ स्त्रीलिङ्ग है। इसलिए कहता है कि तू नारी है ॥१॥
इस प्रकार (यूप के गाड़ने के लिए) सूराख खोदता है, इस मन्त्रांश से—‘‘इदमहँ ‿
रक्षसां ग्रीवाऽअपिकृन्तामि’’ (यजु० ६।१)—‘‘इससे मैं राक्षसों की गर्दनें काटता हूँ।’’ अभ्रि या
खुरपी वज्र है। इसी खुरपी रूपी वज्र से राक्षसों की गर्दनें काटता है ॥२॥
अब खोदता है और मिट्टी को पूर्व की ओर फेंक देता है। अब इतना सूराख खोदता है
जिसमें यूप का नीचे का भाग समा सके। आगे की ओर वह यूप को इस प्रकार रखता है कि पूर्व
की ओर सिरा रहे। उतने ही बड़े कुशों को उसके ऊपर रखता है। उसके ऊपर यूप के शकल
को रखता है। आगे बगल को चषाल रखता है (चषाल यूप के ऊपर सिर के समान रक्खा जाता
है)। प्रोक्षणी में जौ होते हैं। इसका भी वही तात्पर्य है ॥३॥
अब वह जौ को बोता है इस मन्त्रांश को पढ़कर—‘‘यवोऽसि यवयास्मद् द्वेषो यवया-
रातीः’’(यजु० ६।१)—‘‘तू यव है। हमसे द्वेष और शत्रुओं को दूर कर(यवय)।’’ यह स्पष्ट है।
अब वह जल छिड़कता है। जल छिड़कने का एक ही तात्पर्य है, अर्थात् वह उसको यज्ञ के लिए
पवित्र करता है ॥४॥
वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है—‘‘दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा’’ (यजु०
६।१)—‘‘द्यौलोक के लिए तुझको, अन्तरिक्ष के लिए तुझको, पृथिवी के लिए तुझको।’’ यूप वज्र
है। इस काम को वह इन लोकों की रक्षा के लिए करता है। इससे इसका तात्पर्य यह है कि मैं
इन लोकों की रक्षा के लिए तुझको जल से सींचता हूँ ॥५॥
प्रोक्षणी पात्र में जो जल बचा रहता है उसको सूराख में डाल देता है, इस मन्त्रांश को
पढ़कर—‘‘शुन्धन्ताँल्लोकाः पितृषदनाः’’ (यजु ६।१)—‘‘पितरों के रहने के लोक शुद्ध हों।’’

तत्स॒मेवैतन्मेध्यं॑ करोति ॥६॥ अथ बर्॒हिंषि। प्राचीनाग्राणि चोदीचीनाग्राणि
चावस्तृ॒णाति पितृष॒दनमसीति पितृदेव॒त्यं वाऽअ॒स्यैतद्भवति यन्नि॒खातं॒ स यथा-
निखात॒ ओष॑धिषु मितः स्यादे॒वमेतास्वोष॑धिषु मि॒तो भ॑वति ॥७॥ अथ यूपश-
कलं॒ प्रास्य॑ति । तेजो ह वाऽए॒तद्वनस्पतीनां यद्वाश्याशक॒लस्तस्माद्यद्वा बाश्या-
शकल॒मपत॒द्वण॒वस्त्यथ॒ शुष्य॑न्ति तेजो ह्येषामितस्तद्यद्यू॑पशकलं॒ प्रास्य॑ति स॒तेजसं
मिनवानीति तद्य॒देष एव भ॑वति॒ नान्य एष हि यज्ञ॒कृतो मेध्य॒स्तस्माद्यू॑पशकलं
प्रास्य॑ति ॥८॥ स प्रास्य॑ति । अग्रे॒णीर॑सि॒ स्वावे॒श उ॑न्ने॒तॄणामिति पुर॒स्ताद्धाऽअ॒-
स्मादिषोऽप॒क्षिय॑ते॒ तस्मादाहाग्रे॒णीर॑सि॒ स्वावे॒श उ॑न्ने॒तॄणामित्येत॒स्य वित्ता॒दधि॑ वा
स्थास्यतीत्यधि ह्ये॑नं तिष्ठ॑ति॒ तस्मादाहैतस्य वित्ता॒दधि॑ वा स्थास्यतीति ॥९॥ अ-
थ स्रुवे॒णोप॑हू॒त्याज्य॑म् । अव॒टम॒भिजु॑होति॒ नेदधस्तान्नाष्ट्रा रक्षांस्युपोत्तिष्ठानिति
वज्रो वाऽआज्यं॑ तद्वज्रेणैवैतन्नाष्ट्रा रक्षांस्यवबाधते तथाधस्तान्नाष्ट्रा रक्षांसि नो-
पोत्तिष्ठन्त्यथ पुर॒स्तात्पर्योत्योदङ्कासीनो यूपमनक्ति॒ स आह यूपायाज्य॑मानायानुब्रू-
हीति ॥१०॥ सोऽनक्ति । देव॒स्त्वा सविता म॒ध्वान॑क्त्विति सविता वै देवानां प्र-
सवि॒ता यज॑मानो वाऽए॒ष निदानेन यद्यूपः सर्वं वाऽइ॒दं मधु॒ यदि॒दं किं च तदे-
नमे॒तेन॒ सर्वे॑ण संस्पर्शयति तदस्मै सविता प्रसवि॒ता प्रसौति तस्मादाह देव॒स्त्वा
सविता म॒ध्वान॑क्त्विति ॥११॥ अथ चषाल॒मुभयतः प्रत्यज्य॒ प्रति॑मुञ्चति । सुपिप्प-
लाभ्यस्त्वौषधीभ्य इति पिप्यलꣳ॒ ह्वे॒वास्त्येतन्मध्ये संगृहीतमिव भवति तिर्यग्वा
ऽइ॒दं वृत्ते पिप्यलमारुहत स यद्दे॒वेदुः॒ संबन्धनं चात्तरोप॑नितंमिव तद्वैतत्करो-
ति तस्मान्मध्ये संगृहीतमिव भवति ॥१२॥ आत्तमग्निष्ठा॑मनक्ति । यज॑मानो वा
ऽअ॒ग्निष्ठा रस॒ आज्य॑ꣳ रसेनैवैतद्यज॑मानमनक्ति तस्मादात्तमग्निष्ठा॑मनक्त्यथ परिव्य-
यणं प्रतिसमन्तं परि॑मृशत्याहो॒क्रीयमाणायानुब्रूहीति ॥१३॥ स उ॑ह्रयति । द्या-
मग्रे॒णास्पृ॑क्ष॒ आन्तरिक्षं म॒ध्वेनाप्राः पृथिवीमुपरे॒णादृꣳही॒रिति॒ वज्रो वै यूप एषां

कां० ३, अ० ७, ब्रा० १, कं० ६-१४ शतपथब्राह्मण / ४६१
यह जो गड्ढा खोदा गया वह पितरों के लिए था। इसलिए वह उसे पवित्र करता है ॥६॥
अब वह पूर्व की ओर, उत्तर की ओर सिरा करके कुश रखता है, इस मन्त्रांश को पढ़-
कर—"पितृषदनमसि" (यजु० ६।१)—"तू पितरों के रहने का स्थान है।" यह जो गड्ढा खोदा
गया वह पितरों का था। मानो वह वृक्षों की भाँति गाड़ दिया गया; खोदा नहीं गया। इस
प्रकार वह वृक्षों के समान स्थापित हो जाता है। (तात्पर्य यह है कि यूप जब गाड़ दिया गया तो
वृक्षों के समान हो गया) ॥७॥
अब वह यूप-शकल को भीतर डालता है। यह जो बाहरी छाल होती है वह वृक्ष का
तेज होता है। इसलिए यह जो बाहर की छाल को छील देते हैं, मानो उसके तेज को सुखा देते
हैं, क्योंकि यह उनका तेज है। यूप-शकल को भीतर डालने का तात्पर्य यह है कि यूप को तेज
के साथ गाड़ सकूँ। इसी को क्यों डालता है, अन्य को क्यों नहीं? इसका कारण यह है कि इसको
यजुः-मन्त्र पढ़कर शुद्ध किया गया है। इसलिए वह यूप-शकल को डालता है ॥८॥
वह इस मन्त्रांश को पढ़कर डालता है—"अग्रेणीरसि स्वावेशऽउन्नेतॄणाम्" (यजु०
६।२)—"तू अगुआ है। उन्नेताओं के लिए सुगमता से मिलने योग्य।" यह यूप-शकल आगे के
भाग से छीला गया है, इसलिए वह कहता है, 'अग्रेणीरसि' इत्यादि। अब कहता है—"एतस्य
वित्तादधि त्वा स्थास्यति" (यजु० ६।२)—"सावधान हो। यह तुझ पर खड़ा होगा।" वस्तुतः
यह उसी पर खड़ा होगा। इसलिए वह कहता है, 'एतस्य' इत्यादि ॥६॥
अब स्रुवा से घी लेकर गड्ढे में आहुति देते हैं कि कहीं दुष्ट राक्षस उसको न सतावें।
घी वज्र होता है। इस प्रकार वह वज्र से दुष्ट राक्षसों को भगाता है। इस प्रकार दुष्ट राक्षस
नीचे से नहीं उठते। अब वह परिक्रमा करके आगे की ओर उत्तराभिमुख बैठता है और यूप पर
घी लगाता है। अब वह होता से कहता है, 'घी-युक्त यूप के लिए मन्त्र पढ़' ॥१०॥
वह इस मन्त्रांश से घी लगाता है—"देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु" (यजु० ६।२)—
"सविता देव तुझको मधु से युक्त करे।" सविता देवों का प्रेरक है, और यह यूप यजमान ही है।
और यहाँ की ये सब चीजें मधु हैं। इस सबके साथ इस प्रकार से इसको सम्बन्धित करता है,
और प्रेरक सविता प्रेरणा करता है। इसलिए कहता है, 'देवस्त्वा सविता' इत्यादि ॥११॥
अब वह चषाल को दोनों ओर से घी लाकर यूप के ऊपर रखता है यह पढ़कर—
“सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः" (यजु० ६।२)- "अच्छे फलों-युक्त ओषधियों के लिए।" क्योंकि यह
(चषाल) उसका फल ही है यह जो बीच में सकुड़ा होता है। इसका कारण यह है कि वृक्ष पर
फल दोनों ओर से जुड़ा होता है और डंठल और फल के बीच का भाग सकुड़ा होता है।
इसलिए बीच में सुकड़ा होता है ॥१२॥
जो आग के सामने का भाग है उसमें ऊपर से नीचे तक घी लगाता है। क्योंकि आग के
सामने का भाग यजमान होता है और घी रस है। रस से वह यजमान को युक्त करता है।
इसलिए वह आग के सामने के भाग पर ऊपर से नीचे तक घी लगाता है। अब वह यूप की पिंडी
को उठाता है, यह कहकर, 'यूप के गाड़ने के लिए मन्त्र पढ़' ॥१३॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर उठाता है—"द्यामग्रेणास्पृक्षोऽन्तरिक्षं मध्येनाप्राः पृथिवी-
मुपरेणादृ ँहीः।" (यजु० ६।२)-"तूने अग्र भाग से द्यौलोक को छुआ, बीच के से अन्तरिक्ष को,
पैरों से तूने पृथिवी को सुदृढ़ कर दिया" ॥१४॥

४६२ शतपथ ब्राह्मण
लोकानामभिजित्यै तेन॒ वज्रे॑णे॒मांल्लो॒काꣳस्तृ॑णुते॒ऽभ्यो लो॒केभ्यः॑ सप॒त्नान्नि॑र्भजति
॥ १४॥ अथ मिनोति । या ते॒ धामा॒न्युश्म॑सि॒ गम॑ध्ये॒ यत्र॒ गावो॒ भूरि॑शृङ्गा अया॑सः ।
अत्रा॒ह तदु॑रुगा॒यस्य॒ विष्णोः॑ पर॒मं प॒दमव॑भारि॒ भूरि॒त्येतया त्रिष्टुभा मिनोति वज्र-
स्त्रिष्टुब्वज्रो यूपस्तस्मात्त्रिष्टुभा मिनोति ॥ १५॥ सम्प्रत्यग्निमग्निष्ठां मिनोति । यज-
मानो वाऽअग्निमग्निष्ठो वै यज्ञः स यदग्रेरग्निष्ठाꣳ ह्लयेदङ्गुलेह यज्ञायजमानस्त-
स्मात्सम्प्रत्यग्निमग्निष्ठां मिनोत्यथ पर्यूकृत्यथ पर्युक्षत्याप उपनिनयति ॥ १६॥ अ-
थैवमभिपद्य वाचयति । विष्णोः॒ कर्मा॑णि पश्यत॒ यतो॑ व्र॒तानि॑ पस्प॒शे । इन्द्र॑स्य
युज्यः॒ सखा॒ति वज्रं वाऽएष प्राहार्षीद्यो यूपमुदशिश्रियद्विष्णोर्विजितिं पश्यतेत्ये-
वैतदाह यदाह विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः
सखेतीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता वैष्णवो यूपस्तꣳ सेन्द्रं करोति तस्मादाहेन्द्रस्य युज्यः
सखेति ॥ १७॥ अथ चषालमुदीक्षते । तद्विष्णोः॑ पर॒मं प॒दꣳ सदा॑ पश्यन्ति सू॒रयः॑ ।
दि॒वीव॒ चक्षु॒रात॑तमिति वज्रं वाऽएष प्राहार्षीद्यो यूपमुदशिश्रियत्तं विष्णोर्विजि-
तिं पश्यतेत्येवैतदाह यदाह तद्विष्णोः परमं पदꣳ सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव
चक्षुराततमिति ॥ १८॥ अथ परिव्ययति । अनग्नतायै न्वेव परिव्ययति तस्मादत्रे-
व परिव्ययत्यत्रेव हीदं वासो भवत्यन्नाद्यमेवास्मिन्नेतद्दधात्यत्रेव हीदमन्नं प्रति-
तिष्ठति तस्मादत्रेव परिव्ययति ॥ १९॥ त्रिवृता परिव्ययति । त्रिवृद्धान्नं पशवो
ह्यन्नं पिता माता यज्जायते तत्तृतीयं तस्मात्त्रिवृता परिव्ययति ॥ २०॥ स परि-
व्ययति । परि॑वी॒रसि॒ परि॑ त्वा॒ दैवी॒र्विशो॑ व्ययन्तां॒ परीमं यज॑मान॒ꣳ रा॒यो म॑नु॒ष्या॑-
णामिति तद्यजमानायाशिषमाशास्ते यदाह परीमं यजमानꣳ रायो मनुष्याणामि-
ति ॥ २१॥ अथ यूपशकलमवगूहति । दिवः सूनुरसीति प्रजा हैवास्यैषा तस्मा-
द्यदि यूपैकादशिनी स्यात्स्वꣳ-स्वमेवावगूहेद्विपर्यासं तस्य हैषामुग्धानुव्रता प्र-
जा जायेतेऽथ यो विपर्यासमनवगूहति न स्वꣳ-स्वं तस्य हैषा मुग्धानुव्रता प्रजा

कां० ३, अ० ७, ब्रा० १, कं० १५-२२ शतपथब्राह्मण / ४६३
अब वह गाड़ता है इस मन्त्रांश को पढ़कर — “या ते धामान्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो
भूरिश्रृङ्गाऽअयासः। अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमवभारि भूरि” (यजु० ६।३) — “हम
तेरे उन धामों में जाना चाहते हैं जिनमें तेज और बहुत-से सींगोंवाली गायें (सूर्य की किरणें)
रहती हैं। वहाँ वस्तुतः विशाल विष्णु के परम पद की ज्योति अनेक प्रकार से चमकती है।”
(यहाँ 'गावो' का अर्थ गाय नहीं किन्तु सूर्य की किरणें और ईश्वर की भक्ति है, अर्थात् एक से
भौतिक प्रकाश और दूसरे से आत्मिक प्रकाश का तात्पर्य है।) इस त्रिष्टुप् छन्द के द्वारा वह
गाड़ता है। त्रिष्टुप् वज्र है और यूप वज्र है, इसलिए त्रिष्टुप् से गाड़ता है ॥१५॥
जो सिरा अग्नि के सामने था उसको अग्नि की ओर कर देता है। क्योंकि यजमान अग्नि
के सम्मुख होता है और यज्ञ अग्नि है। यदि उस सिरे का मुँह फेर दिया जाय तो यजमान का
मुँह यज्ञ से फिर जाय, इसलिए उसका मुँह अग्नि की ओर कर देता है। अब वह उसके चारों
ओर मिट्टी डालता है और चारों ओर दबाकर पानी को उस पर डाल देता है ॥१६॥
अब इसको छूकर यजमान से कहलवाता है — “विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि
पस्पशे। इन्द्रस्य युज्यः सखा” (यजु० ६।४, ऋ० १।२२।१९) — “विष्णु के कर्मों को देखो
जिससे व्रत बँधे हुए हैं। जो इन्द्र का उचित सखा है।” इन्द्र यज्ञ का देवता है। यूप विष्णु का है।
उसको इन्द्र से युक्त करता है, इसलिए कहा ‘इन्द्रस्य’ इत्यादि ॥१७॥
अब इस मन्त्र को पढ़कर चषाल को देखता है — “तद् विष्णोः परमं पद॒ सदा पश्यन्ति
सूरयः दिवीव चक्षुराततम्” (यजु० ६।५, ऋ० १।२२।२०) — “विष्णु के उस परम पद को
बुद्धिमान् लोग सदा देखते हैं जैसे विकसित आँख सूर्य को।” क्योंकि जिसने यूप लगाया उसने
वज्र छोड़ दिया। जब यह कहता है ‘तद् विष्णोः’ इत्यादि, तब मानो वह कहता है कि विष्णु की
विजय की ओर देखो ॥१८॥
अब वह कुश की रस्सी को (यूप के चारों ओर) बाँधता है। नंगापन दबाने के लिए
ऐसा करता है। इसलिए धोती को कमर में बाँधते हैं। इससे वह उसमें अन्न रखता है, क्योंकि
अन्न भी तो वहीं (पेट में) रहता है। इसलिए वह (यूप की कमर में) रस्सी बाँधता है ॥१९॥
वह तीन लपेट लगाता है। अन्न तीन भागोंवाला है। पशु अन्न है। (पहला) माता,
(दूसरा) पिता और (बच्चा) जो पैदा होता है तीसरा है। इसलिए वह तीन लपेट लगाता
है ॥२०॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर तीन लपेट लगाता है — “परिवीरसि परि त्वा दैवीर्विशो
व्ययन्तां परीमं यजमानं॒ रायो मनुष्याणाम्’ (यजु० ६।६) — “तू लिपटा हुआ है। दिव्य लोक
के लोग तुझे लिपटें। मनुष्यों में यजमान धन से लिपटा होवे।” जब वह कहता है, ‘परीमं
यजमानं’ आदि, तो मानो वह यजमान को आशीर्वाद देता है ॥२१॥
अब वह यूप-शकल को प्रवेश कराता है, इस मन्त्र से — “दिवः सूनुरसि” (यजु० ६।६) -
“तू द्युलोक का पुत्र है।” वस्तुतः वह उसीकी सन्तान है। इसलिए यदि ग्यारह यूप हों तो हर
एक में उसी का यूप-शकल (चीपुटी) लगाना चाहिए। ऐसा करने से उसकी सन्तान मूर्ख
(मुग्धा) या अननुव्रता (न व्रत पालनेवाली) न होगी। जो यूपों में यूप-शकल लगाने के समय
उसी-उसी यूप की चीपुटी नहीं लगाता और गड़बड़ कर देता है, उस-उसकी सन्तान मूर्ख और

द्धायते॒ तस्मा॑द्व॒ स्त्र॒ᳪ॒ स्त्रमे॒वाव॑गूह्येद्द्विपर्या॒सं॑ ॥ २२॥ स्वर्ग॑स्यो ह्यै॒ष लो॒कस्य॒ स-
मारो॑हणः क्रियते । यद्यू॑पशकल॒ᳪ॒ स्यु॒ᳪ॒ रश॑ना रश॒नायै॒ यूप॑शकलो यूपशक॒ला-
च्चषा॒लं च॑षा॒लात्स्व॒र्गं लो॒कᳪ॒ सम॑श्नुते ॥ २३॥ अथ॒ यस्मा॑त्स्वरुर्नाम॑ । ए॒तस्मा॒द्वा
ऽए॒षोऽप॑च्छिद्यते॒ तस्यैत॒त्त्वमे॒वारु॑र्भवति॒ तस्मा॑त्स्वरुर्नाम॑ ॥ २४॥ तस्य॒ यन्नि॒खा-
तम् । तेन॑ पितृलो॒कं जय॑त्यथ॒ यदूर्ध्वं नि॒खाता॒दा रश॑नायै॒ तेन॑ मनुष्यलो॒कं जय॑-
त्यथ॒ यदूर्ध्वं॒ रश॑नाया॒ आ च॑षा॒लात्तेन॑ देवलो॒कं जय॑त्यथ॒ यदूर्ध्वं॑ चषा॒लाद्द्व्यङ्गु॒लं
वा॒ त्र्यङ्गु॒लं वा साध्या॒ दूति॑ दे॒वास्तेन॑ तेषां॑ लो॒कं जय॑ति सलो॒को वै साध्यैर्दे॒-
वैर्भवति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ २५॥ तं वै पू॒र्वार्धे॑ मिनोति । व॒ज्रो वै यूपो॑ व॒ज्रो दण्डः॑
पूर्वा॒र्धं वै द॒ण्डस्या॑भि॒प्रय्य॒ प्रह॑रति पूर्वा॒र्ध ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ तस्मा॑त्पूर्वा॒र्धे मि॑नोति ॥ २६॥
य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॒तिं जि॑ग्युर्यैषा॒मियं जि॒तिस्ते हो॑चुः क॒थं न इ॒दं मनु॒ष्यै-
रनभ्यारो॒ह्यᳪ॒ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा य॒था मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्द्ध॑येयु॒र्विङ्क्य॑
य॒ज्ञं यूपेन॑ योपयि॒त्वा तिरो॑ऽभव॒न्नथ॒ यदेने॒नायो॑पयं॒स्तस्मा॑द्यू॒पो नाम॑ पु॒रस्ता॒द्धि प्र-
ज्ञा पु॒रस्ता॒न्मनो॒ऽन्व॑स्त॒स्मात्पूर्वा॒र्धे मि॑नोति ॥ २७॥ स वा॒ऽअ॒ष्टाश्रि॑र्भवति । अ॒ष्टा-
क्षरा॒ वै गा॑य॒त्री पूर्वा॒र्धो वै य॒ज्ञस्य॑ गाय॒त्री पूर्वा॒र्ध ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ तस्मा॑द॒ष्टाश्रि॑र्भव-
ति ॥ २८॥ तᳪ॒ ह स्मै॒तं दे॒वा अ॒नुप्र॒हर॑न्ति । य॒द्येद॒मप्येत॒र्ह्येकै॒ऽनुप्र॒हर॑न्तीति दे॒वा
अ॒कुर्व॒न्निति॒ ततो॒ रक्षा॑ᳪसि य॒ज्ञमन्व॒वापि॑बन् ॥ २९॥ ते दे॒वा अ॑ध्व॒र्युम॑ब्रुवन् । यूप-
शकल॑मे॒व जु॑हुधि॒ तदृहै॒ष स्व॒गाकृ॑तो भवि॒ष्यति॒ तथो॒ रक्षा॑ᳪसि य॒ज्ञं नानू॑त्पा-
स्यन्ते॒ऽयं वै व॒ज्र उद्य॑त॒ दूति॑ ॥ ३०॥ सो॒ऽध्व॒र्युः । यूप॑शकलमे॒वाजु॑होत्तदृहै॒ष स्व-
गाकृ॑त॒ आसी॒त्तथो॒ रक्षा॑ᳪसि य॒ज्ञं नानू॑दपिबता॒यं वै व॒ज्र उद्य॑त॒ दूति॑ ॥ ३१॥ त-
थो॒ऽह्वैवैष ए॒तत् । यूप॑शकल॒मेव जु॑होति॒ तदृहै॒ष स्व॒गाकृ॑तो भवति॒ तथो॒ रक्षा॑ᳪ-
सि य॒ज्ञं नानू॒त्पिब॑न्ते॒ऽयं वै व॒ज्र उद्य॑त॒ दूति॒ स जु॑होति दि॒वं ते धू॒मो ग॑च्छतु
स्व॒र्ज्योतिः॑ पृथि॒वी भस्म॒नापृ॑ण॒ स्वाहेति॑ ॥ ३२॥ ब्राह्मणम् ॥४ [७. १.]॥

कां० ३, अ० ७, ब्रा० १, कं० २२-३२ शतपथब्राह्मण / ४६५
अनुव्रत होती है। इसलिए उस-उस यूप में उसी-उसी की चिपुटी लगानी चाहिए ॥२२॥
जो यूप-शकल है वह स्वर्ग की सीढ़ी है। वह इस प्रकार कि पहले तो रस्सी हुई, फिर
यूप-शकल, फिर चषाल । फिर चषाल से चढ़कर स्वर्गलोक को प्राप्त हो जाता है ॥२३॥
इसका 'स्वरु' नाम इसलिए है कि वह उसी में से काटी जाती है। 'स्व' का अर्थ है
'अपना' और 'अरु' का अर्थ है 'घाव' । इससे मिलकर 'स्वरु' हुआ ॥२४॥
जो नीचे गड़ा हुआ भाग है उससे स्वर्गलोक की प्राप्ति करता है और जो ऊपर का भाग
है उससे रस्सी-सहित मनुष्य-लोक की प्राप्ति करता है। और जो रस्सी से ऊपर चषाल है उससे
देवलोक को प्राप्त करता है। और चषाल से ऊपर जो दो-तीन अँगुल लकड़ी होती है उससे जो
'साध्य देव' हैं उनके लोक को प्राप्त करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह साध्य देवों का
सलोक बन जाता है ॥२५॥
वह यूप को वेदी के पूर्वार्ध में लगाता है। यूप वज्र है। दण्ड वज्र है। जब कोई वज्र को
मारता है तो अग्रभाग को पकड़कर मारता है। यह यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसीलिए पूर्वार्ध में यूप
को लगाता है ॥२६॥
यज्ञ के द्वारा देवों ने विजय प्राप्त की जो इनको प्राप्त है। उन्होंने कहा कि इस अपने
लोक को किस प्रकार ऐसा बनायें कि मनुष्य न आ सकें? उन्होंने यज्ञ का रस चूस लिया जैसे
मधु-मक्खियाँ मधु को चूसती हैं। और यज्ञ को यूप के चारों ओर बिखेरकर (योपयित्वा) छिप
गये । चूंकि उन्होंने इसको यूप द्वारा (उपापयन) बिखेरा, इसलिए इसका नाम यूप पड़ा। बुद्धि
अग्रभाग में होती है। मन का वेग भी अग्रभाग में होता है। इसलिए वह उसको 'अग्रभाग' में
लगाता है ॥२७॥
वह अष्ट कोणवाला होता है। गायत्री छन्द के आठ अक्षर होते हैं और गायत्री यज्ञ का
पूर्वार्ध होती है। यह भी चूंकि यज्ञ का पूर्वार्ध है, इसलिए वह उसको अष्ट कोणवाला बनाता
है ॥२८॥
एक बार देवों ने इसको (प्रस्तर को आग में) पीछे से फेंका था, इसका अनुसरण करके
ये भी पीछे फेंक देते हैं, क्योंकि देवों ने ऐसा किया था। इसलिए राक्षसों ने यज्ञ को देवों के पीछे
पिया ॥२६॥
देवों ने अध्वर्यु से कहा, 'केवल यूप-शकल की आहुति दे।' इससे यज्ञ सफल हो जायगा
और राक्षस उसमें न आवेंगे—यह सोचकर कि यह यूपरूपी वज्र खड़ा हो गया है ॥३०॥
तब अध्वर्यु ने यूप-शकल की आहुति दी, और यजमान सफल हो गया। इसके पीछे
राक्षस यज्ञ को न पी सके। यह सोचकर कि यह एक वज्र खड़ा हो गया है ॥३१॥
इसी प्रकार वह यूप-शकल की आहुति ही देता है। यजमान इससे सफल हो जाता है।
राक्षस यज्ञ को नहीं पीने पाते, यह सोचकर कि यह तो वज्र खड़ा हो गया है। वह इस मन्त्र से
आहुति देता है-“दिवं ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्योतिः पृथिवी भस्मनापृण स्वाहा” (यजु० ६।२१)-
“द्यौलोक तक तेरा धुआँ जाय, स्वर्लोक तक ज्योति और पृथिवी तेरी भस्म से भर जाय” ॥३२॥