शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-८
रश्च॒रणं॒ नाम पु॒र-इव ह वै श्रि॒या यश॑सा भवति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद् ॥ २०॥ तद्वाऽए-
त॒देव पुरश्च॒रणम् । य॑ ए॒ष तप॑ति स ए॒तस्यैवावृता चरेद्ग्रहं गृ॒ह्लीयात्तस्यै॒वावृ॒तम-
न्वाव॑र्तेत॒ प्रति॑गी॒र्येतस्यै॒वावृ॒तमन्वाव॑र्तेत॒ यदृचं ब्रू॒वैतस्यै॒वावृ॒तमन्वाव॑र्तेत॒ स
है॒ष भर्ता स यो है॒वं वि॒द्वानित॒स्यावृ॒ता श॒क्नोति॒ चरि॒तुं श॒क्नोति॒ हैव॒ भार्या-
न्भर्तुम् ॥ २१॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [६. ७.] ॥
या वै दीक्षा सा निष्कत् । तत्सत्त्रं तस्मादेनानासत्सङ्गत्याऽऽहुरथ यत्ततो यज्ञं
तन्वते तद्यन्ति तन्नयति यो नेता भवति स तस्मादेनान्यन्तीत्याहुः ॥ १॥ या ह
दीक्षा सा निष्कत् । तत्सत्त्रं तदयनं तत्सत्त्रायणमथ यत्ततो यज्ञस्योदृचं गच्छन्त्यो-
त्थि तदुत्थानं तस्मादेनानुदस्थुरित्याहुरिति नु पुरस्ताददनम् ॥ २॥ अथ दीक्षि-
ष्यमाणा समवस्यन्ति । ते यद्यग्निं चेष्यमाणा भवन्त्यरण्योर्वाऽग्नीन्समारोप्योपस-
मायन्ति यत्र प्राजापत्येन पशुना यक्ष्यमाणा भवन्ति मथित्वापसमाधायोद्धृत्याहव-
नीयं यजन्तऽएतेन प्राजापत्येन पशुना ॥ ३॥ तस्य शिरो निदधति । तेषां यदि
तदहरेवैतेषां न समेत्यरणिष्वेवाग्नीत्समारोप्य यथायथं विपरेत्य जुह्वति ॥ ४॥ अथ
यदहरेषां दीक्षा समेति । अरणिष्वेवाग्नीत्समारोप्योपसमायन्ति यत्र दीक्षिष्यमाणा
भवन्ति गृहपतिरेव प्रथमो मन्यते मध्यं प्रति शालाया अथेतरेषामर्धा दक्षिणत
उपविशन्त्यर्धा उत्तरतो मथित्वापसमाधायैकैकमेवोल्मुकमादायोपसमायन्ति गृह-
पतेर्गार्हपत्यं गृहपतेरेव गार्हपत्यादुद्धृत्याहवनीयं दीक्षन्ते तेषाꣳ समान् आह-
वनीयो भवति नाना गार्हपत्या दीक्षोपसत्सु ॥ ५॥ अथ यदहरेषां क्रयो भवति
। तदहर्गार्हपत्यां चितिमुपदधात्यथेतरेभ्य उपवसथे धिष्ण्यान्वैसर्जिनीनां काले
प्राच्यः पत्न्य उपसमायन्ति प्रजह्वत्येतानपरानग्नीन्कृतऽएव वैसर्जने ॥ ६॥ राजानं
प्रणयति । उद्यत एवेष आग्नीध्रीयोऽग्निर्भवत्यथैतऽएकैकमेवोल्मुकमादाय यथा-
धिष्ण्यं वि॒परा॑यन्ति॒ तैरेव तेषामुल्मुकैः प्रध्नन्तीति ह स्माह याज्ञवल्क्यो ये तथा
का० ४, अ० ६, ब्रा० ७-८, कं० २०-२१ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६७१
इस रहस्य को समझता है वह श्री और यश में आगे होता है ॥२०॥
यह पुरश्चरण वही है जो तपता है (अर्थात् सूर्य) । उसी की चाल के अनुसार चलना
चाहिए। जब सोम ग्रह को लेवे तो उसी की चाल के अनुसार घुमावे। जब वे होता के गीत का
अनुसरण करें, तो भी सूर्य की चाल का ही अनुसरण करना चाहिए। जब वे ग्रह की आहुति दें
तब भी सूर्य की चाल का ही अनुसरण करना चाहिए। सूर्य ही भर्त्ता है। जो इस रहस्य को
समझकर सूर्य का अनुसरण करता है वह अपने आश्रितों (भार्या) का पालन कर सकता
है ॥२१॥
सत्रायणम्
अध्याय ६-ब्राह्मण ८
यह जो दीक्षा है उसका नाम है निषत् (बैठना)। उसी को सत्र (बैठक, session) कहते
हैं। इसीलिए कहते हैं कि 'आसत्' अर्थात् वे बैठे हैं। और इसके पश्चात् जब यज्ञ करते हैं तब वे
'यन्ति' अर्थात् 'जाते हैं'। इनमें जो 'नयति' अर्थात् अगुआ होता है वह 'नेता' होता है। इसलिए
इनको कहते हैं कि ये जाते हैं। (तात्पर्य यह है कि 'दीक्षा' के लिए 'बैठने' का और यज्ञ करने के
लिए 'जाने' शब्द का प्रयोग होता है) ॥१॥
जो दीक्षा है वह निषत् या बैठना है। वही सत्र (बैठक) है। वह 'अयन' (जाना) भी
है। वह 'सत्रायण' अर्थात् 'बैठने के लिए जाना' है। और जब यज्ञ की समाप्ति पर उठते हैं
उसको 'उत्थान' कहते हैं। इसलिए कहते हैं कि 'वे उठ बैठे।' यह हुआ प्राक्कथन (पुरस्ताद्
वदनम्) ॥२॥
जिनको दीक्षित होना है वे (समय तथा स्थान को) तय कर लेते हैं। जिनको वेदी बनानी
है वे अरणियों में अग्नियों को लेकर वहां चले जाते हैं जहाँ प्रजापति के लिए पशु का आलभन
करना है। आग को मथकर उसमें प्रजापति-सम्बन्धी पशु-यज्ञ करते हैं ॥३॥
उसके सिर को रख लेते हैं। यदि उसी दिन उनकी दीक्षा नहीं होनी है तो अरणियों में
ही फिर आग लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं और दैनिक आहुतियों में ही देते हैं ॥४॥
यदि उनकी दीक्षा उसी दिन होती है तो अरणियों में ही अग्नि को लेकर उस स्थान पर
आ जाते हैं जहाँ दीक्षा होनी है। शाला के बीच में वहीं पर गृहपति पहले (आग को) मथता
है। इनमें से आधे उसकी दक्षिण की ओर बैठते हैं, आधे उत्तर की ओर। जब आग मथ जाती
है और उस पर समिधा रख जाती है तो वे एक-एक लकड़ी को लेकर गृहपति की गार्हपत्य अग्नि
तक आते हैं। गृहपति को ही गार्हपत्य से आहवनीय लेकर दीक्षा लेते हैं। दीक्षा और उपसद् में
आहवनीय एक ही होती है और गार्हपत्य अलग-अलग ॥५॥
जिस दिन इनको (सोम) मोल लेना है, उस दिन गार्हपत्य को चिनते हैं और उपवास
के दिन (सोमयज्ञ से पूर्व दिन को उपवसथ करते हैं) दूसरों के लिए धिष्ण्या चिनते हैं। विसर्जन
के दिन पत्नियां भी साथ आती हैं। और यजमान उन दूसरी अग्नियों को (गार्हपत्यों को) छोड़
जाते हैं। जब वैसर्जन आहुति हो चुकती है तो-॥६॥
सोम राजा को लाते हैं। आग्नीध्रीय अग्नि उसी समय अभी लाई हुई होती है। वे इसमें
से एक-एक लकड़ी लेकर अपनी-अपनी धिष्ण्या में चले जाते हैं। (याज्ञवल्क्य ने) कहा है कि
कुर्व॑न्तीत्येतदेक॒मयनम् ॥ ७॥ अथे॒दं द्वि॒तीय॑म् । अर॒णिष्वे॒वाग्नीत्स॒मारो॒ह्योपस-
माय॑न्ति यत्र॑ प्राजाप॒त्येन॑ पशुना॒ यक्ष्य॑माणा भव॑न्ति मथि॒त्वोप॑समाधा॒योद्धृत्या॑हव-
नीयं॒ यज॑न्तऽए॒तेन॑ प्राजाप॒त्येन॑ पशुना॑ ॥८॥ तस्य॒ शिरो॑ नि॒दध॑ति । तेषां॒ यदि॑
तदह॒र्दीक्षा॒ न समैत्य॑र॒णिष्वे॒वाग्नीत्स॒मारो॒ह्य यथायथं॒ विप॒रेत्य॑ जुह्वति ॥९॥ अथ
यद॒हरे॑षां दीक्षा॒ समै॑ति । अर॒णिष्वे॒वाग्नीत्स॒मारो॒ह्योपसमाय॑न्ति यत्र॑ दीक्षिष्यमा-
णा भव॑न्ति गृ॒हप॑तिरेव॒ प्रथमो॑ मन्थते॒ऽथेत॑रे पर्युप॒विश्य॑ मन्थन्ति॒ ते जातं॑-जातमे-
वानुप्रह्र॑न्ति गृ॒हप॑तेर्गाह॑पत्ये गृ॒हप॑तेरेव गार्हप॒त्यादुद्धृत्या॑हवनीये॒ दीक्ष॑न्ते ते-
षाꣳ समा॒न आह॑वनी॒यो भ॑वति समा॒नो गार्ह॑पत्यो दीक्षोप॒सत्सु॑ ॥ १०॥ अथ
यद॒हरे॑षां क्रयो भव॑ति । तद॒हर्गार्ह॑पत्यां चि॒तिमु॑पदधात्य॒थेत॑रेभ्य उपवस॒थे धि-
ष्ण्यान्वैस॑र्जिनानां काले प्राच्यः॒ पत्न्य॒ उपसमाय॑न्ति प्रजन॒त्येतमप॑रम॒ग्निꣳ स्रुतऽए॒व
वैस॒र्जिने॑ ॥११॥ राजानं॑ प्रणय॑ति । उद्यत ए॒वैष आ॑ग्नीध्रीयोऽग्नि॒र्भव॑त्यथैतऽएकै-
कमे॒वोल्मुकमा॒दाय॑ यथाधि॒ष्ण्यं॒ विपरा॑यन्ति सम॒द्धमु हैव॒ ते कु॑र्वन्ति॒ सम॑द्धेनान्वि-
न्दत्यु॑र्तुका ह भवन्त्यपि ह॒ तमर्थं॑ सम॒द्धिन्द॑न्ति॒ यस्मि॒न्नर्थे॒ यज॑न्ते॒ ये तथा॒ कुर्वन्त्ये-
तद्द्द्विती॒यम॑यनम् ॥ १२॥ अथे॒दं तृती॑यम् । गृ॒हप॑ते॒रेवार॒ण्योः संवद॑न्ते॒ य इ॒तो
ऽग्नि॒र्जनिष्य॑ते॒ स नः॑ सह॒ यद॒नेन॑ य॒ज्ञेन॒ जेष्यामो॒ऽनेन॑ पशुब॒न्धेन॒ तन्नः॑ स॒ह॒ सह॑
नः सा॒धुकृ॑त्या॒ य ए॒व पा॒पं कर॑वत्त॒स्यैव॒ तदि॒त्ये॒वमु॒क्त्वा गृ॒हप॑तिरेव॒ प्रथमः॒ समा-
रो॑हयते॒ऽथेत॑रेभ्यः समा॒रोह॑यति स्व॒यं वैव समा॑रोहयते त॒ऽश्राय॑न्ति॒ यत्र॑ प्राजा-
प॒त्येन॑ पशुना॒ यक्ष्य॑माणा भव॑न्ति मथि॒त्वोप॑समाधा॒योद्धृत्या॑हवनीयं॒ यज॑न्तऽए॒तेन॑
प्राजाप॒त्येन॑ पशुना॑ ॥ १३॥ तस्य॒ शिरो॑ नि॒दध॑ति । तेषां॒ यदि॑ तदह॒र्
कां० ४, अ० ६, ब्रा० ८, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ६७३
ये इन्हीं लकड़ियों से वध करते हैं। यह रीति है ॥७॥
दूसरी यह है—अरणियों पर अग्नियों को लेकर वहाँ जाते हैं जहाँ प्रजापति-सम्बन्धी
पशु-यज्ञ करना है। आग मथकर उस पर समिधा रखके उसमें से आहवनीय को लेकर प्रजापति-
सम्बन्धी पशु-यज्ञ करते हैं ॥८॥
उसके सिर को रख लेते हैं। यदि उस दिन दीक्षा नहीं होनी होती तो अरणियों पर
अग्नियों को लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं और वहाँ (दैनिक) आहुतियाँ देते हैं ॥६॥
यदि दीक्षा उसी दिन लेनी हो तो अरणियों पर अग्नियों को लेकर वहाँ चले आते हैं
जहाँ दीक्षा लेनी है। पहले गृहपति ही मथता है, फिर और उसके पास बैठकर मथते हैं। और
जो-जो अपनी आग मथता है वह उसको गृहपति के ही गार्हपत्य में डाल देता है। गृहपति के ही
गार्हपत्य से आहवनीय लेकर दीक्षा लेते हैं, उनकी आहवनीय एक ही होतो है और एक ही
गार्हपत्य दीक्षा में भी और उपसदों में भी ॥१०॥
जिस दिन उनको सोम का क्रय करना हो (मोल लेना हो) उस दिन गार्हपत्य को चिनते
हैं, और उपवास के दिन दूसरों के लिए धिष्ण्या। विसर्जन के समय पत्नियां आगे आती हैं
और यजमान इस दूसरी अग्नि को छोड़ जाता है। और जब विसर्जन की आहुति दी जाती
है—॥११॥
तभी सोम राजा को लाता है। आग्नीध्र अग्नि उस समय लाई हुई होती है। उसमें से
एक-एक लकड़ी को लेकर अपनी-अपनी धिष्ण्या में लाते हैं। जो इस प्रकार करते हैं वे झगड़ा
करते हैं। झगड़ा उनके बीच में आ जाता है। वे झगड़ा कर बैठते हैं जो इस प्रकार यज्ञ करते हैं।
यह दूसरी रीति है ॥१२॥
यह तीसरी रीति है—गृहपति की ही अरणियों में साझी हो जाते हैं। 'जो अग्नि इनसे
उत्पन्न होगी इसमें हमारा भाग है। इस यज्ञ के करने से जो फल होगा, या पशु-बन्ध से, इसमें
हमारा भाग है। जो पुण्य कर्म है उसमें हम सब शामिल हैं। जो पाप करे वह उसका अपना है।'
ऐसा कहकर गृहपति पहले अपने लिए आग लेता है, फिर दूसरों के लिए, या वे स्वयं अपने
लिए लेते हैं। वे उस स्थान पर आते हैं जहाँ प्रजापति का पशुयाग होना होता है। आग मथकर,
समिधा रखकर आहवनीय को लेते हैं और प्रजापति-सम्बन्धी पशु-यज्ञ करते हैं ॥१३॥
उसके सिर को रख लेते हैं। यदि उस दिन उनकी दीक्षा नहीं होनी होती तो अरणियों
पर अग्नियों को लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं और आहुतियां दे लेते हैं ॥१४॥
यदि इस दिन दीक्षा होनी होती है तो गृहपति की ही अरणियों में साझा कर लेते हैं कि
'जो अग्नि उत्पन्न होगी उसमें हमारा भाग है और जो इस होनेवाले यज्ञ तथा सत्र से फल होना
है उसमें हमारा साझा है। जो-जो पुण्य करना है उसमें हमारा साझा है। जो पाप हो जाय वह