शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-४
ऽइव समि॑द्धतं॒ मन्ये॑त॒ तदाहु॑तीर्जुहुयात्समि॑द्धहोमेनै॒व समृ॑द्धा आहु॑तयः
॥३९॥ स वाऽऋच॑मनू॒च्य जुषा॒णो य॑जति । तस्मा॑दि॒मेऽअ॑स्थ्यत्स्त्यनस्थ्यि॑के॒ चक्षु॑-
षीऽआ॒शिषि॑ष्टे॒ऽअथ॒ यदृच॑मनू॒च्यर्चा यजे॒दस्थि॑ हैव कुर्यान्न चक्षुः॑ ॥४०॥ ते वाऽए॒ते ।
अ॒ग्नीषोम॑योरे॒व रू॒पम॑न्वायत्ते॒ यच्छु॒क्लं तदा॑ग्ने॒यं यत्कृ॑ष्णं॒ तत्सौ॒म्यं॒ यदि॒ वेत॑रथा॒ यदे॑व
कृ॒ष्णं तदा॑ग्ने॒यं यच्छु॒क्लं तत्सौ॒म्यं॒ यदे॑व॒ वीक्ष॑ते॒ तदा॑ग्ने॒यं रू॒पं शुष्के॑ऽइव॒ हि वी॑-
क्षमा॑णास्या॒क्षिणी॑ भवतः॒ शुष्क॑मिव॒ ह्या॑ग्ने॒यं यदे॑व॒ स्वपि॑ति॒ तत्सौ॒म्यं रू॒पमा॒र्द्रे-
ऽइ॑व॒ हि सु॑षुपू॒षोऽक्षि॑णी भवत आ॒र्द्रऽइ॑व॒ हि सो॒म आ॒न्तरं॑ ह॒ वाऽअ॑स्मिं
ल्लो॒के चक्षु॑ष्मान्भवति॒ सच॑क्षुर॒मुष्मिँ॑ल्लो॒के सं॑भवति॒ य ए॒वमे॒तौ चक्षु॑षीऽआ॒ज्यभा॑-
गौ वेद॑ ॥४१॥ ॥ ब्राह्मणम् २ [६. ३.] ॥ ॥
इन्द्रो॑ ह॒ यत्र॑ वृ॒त्राय॒ वज्रं॑ प्रज॒हार॑ । सो॒ऽबली॑यान्म॒न्यमा॑नो॒ नास्तृ॑षीतीव
बिभ्य॒न्निल॑यां चक्रे॒ स पराः॒ परा॑वतो जगाम देवा ह वै वि॒दां च॑क्रुर्ह॒तो वै वृ॒त्रो
ऽथेन्द्रो॒ न्यले॑ष्टेति ॥१॥ तम॒न्वेष्टुं॑ दधिरे । अ॒ग्निर्दे॒वानाꣳ॒ हिर॑ण्यस्तूप॒ ऋषी॑णां
बृ॒ह॒ती छन्द॑सां॒ तम॒ग्निर॑नुवि॒वेद॒ तेनै॒ताꣳ रा॒त्रिꣳ स॒हाऽऽज॑गाम॒ स वै दे॒वानां॒ वसु॑-
र्वी॒रो ह्ये॑षा॒म् ॥२॥ ते दे॒वा अ॑ब्रुवन् । अ॒मा वै नो॒ऽद्य व॑सु॒रव॑सति॒ यो नः॒ प्रा-
वात्सी॒दिति॒ ताभ्या॑मि॒तश्चा॒था ज्ञा॒तिभ्यां॑ वा॒ सखि॑भ्यां वा स॒हाग॑ताभ्याꣳ समा॒नमो॑-
दनं॒ पचे॒दङ्गं॑ वा॒ तदृङ् मानु॑षꣳ ह॒विर्दे॒वाना॑मिवो॒भाभ्या॑मि॒तत्स॑मा॒नꣳ ह॒विर्निर्व॑पन्ने-
न्द्रा॒ग्नं द्वाद॑शकपालं पुरो॒डाशं॒ तस्मा॑दैन्द्रा॒ग्नो द्वाद॑शकपालः पुरो॒डाशो॑ भवति ॥३॥
स इन्द्रो॒ऽब्रवी॑त् । यत्र॒ वै वृ॒त्राय॒ वज्रं॒ प्राह॑रं॒ तद्ध्य॑स्म्ये॒ स कृ॒श-इ॑वास्मि॒ न वै
मे॒दं धि॑नोति॒ यन्मा॒ धिनव॒त्तन्मे॑ कुरु॒तेति॒ तथेति॑ दे॒वा अ॑ब्रुवन् ॥४॥ ते दे॒वा अ॑-
ब्रुवन् । न वा॒ऽइम॑म॒न्यत्सोमा॑द्धिनुया॒त्सोम॑मे॒वास्मै॒ संभ॑रामेति॒ तस्मै॒ सोमꣳ॒ सम॑-
भर॒न्ने॒ष वै सोमो॒ राजा दे॒वाना॒मन्नं॒ यच्च॒न्द्रमाः॒ स यत्रै॑ष ए॒तां रा॒त्रिं न पु॒रस्ता॒न्न
प॒श्चाद्द॑दृ॒शे तदि॒मं लो॒कमा॒गच्छ॑ति॒ स इ॒हैवाप॑श्चौष॒धीश्च॒ प्रवि॑शति॒ स वै दे॒वानां॑
कां० १, अ० ६, ब्रा० ४, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / १२५
क्योंकि सबसे अधिक जलती हुई आग में ही आहुतियां ठीक होती हैं ॥३६॥
ऋचा को कहकर 'जुषाण' को कहता है। इस प्रकार हड्डी-शून्य आँखों को हड्डी-युक्त
स्थान में रखता है। यदि वह ऋचा के पीछे ऋचा पढ़े तो मानो आँख न रखे, हड्डी रखे ॥४०॥
ये दो अग्नि और सोम के रूप हैं—जो शुक्ल है वह अग्नि का, जो कृष्ण है वह सोम
का। यदि इसके विरुद्ध कहा जाय तो जो कृष्ण है वह अग्नि का और जो शुक्ल है वह सोम
का। जो देखता है वह अग्नि का रूप है, क्योंकि देखनेवाले की आँखें सूखी होती हैं और
सूखापन अग्नि का है। जो सोता है वह सोम का रूप है, क्योंकि सोनेवाले की आँखें गीली होती
हैं। गीलापन सोम का गुण है। जो इस प्रकार आज्य भाग आहुतियों को दो आँखें जानता है वह
बुढ़ापे तक इस लोक में आँखोंवाला होता है और परलोक में भी आँखोंवाला होता है ॥४१॥
अध्याय ६—ब्राह्मण ४
जब इन्द्र ने वृत्र के लिए वज्र फेंका तो अपने को निर्बल समझकर और यह समझकर
कि (वृत्र) अभी मरा नहीं, वह छिप गया, और बहुत दूर चला गया। अब देवों ने जान लिया
कि वृत्र मारा गया और इन्द्र छिप गया ॥१॥
देवताओं में अग्नि, ऋषियों में हिरण्यस्तूप और छन्दों में बृहती छन्द उसको खोजने
लगे। अग्नि ने उसे पा लिया, और उसके साथ एक रात रहा। वह देवों में वसु और उनमें वीर
है ॥२॥
देवों ने कहा, 'अमा' अर्थात् 'हमारा' वसु जो हमसे अलग चला गया था आज अग्नि
के साथ रहता है। जैसे दो सम्बन्धियों या मित्रों के लिए या मेहमानों के लिए ओदन (चावल)
या अज (बकरा) पकावें वैसे ही मनुष्यों की हवि है। देवों में इन दो के लिए (इन्द्र और अग्नि
के लिए) यह समान हवि है। इन्द्र और अग्नि के लिए १२ कपालों का पुरोडाश होता है, इसलिए
इन्द्र-अग्नि के लिए १२ कपालोंवाला पुरोडाश होता है ॥३॥
इन्द्र ने कहा, 'जब मैंने वृत्र के वज्र मारा तो मैं डर गया और दुबला हो गया। यह
हवि मुझे काफी नहीं है। ऐसी तैयार करो जो काफी हो जाय।' देवों ने कहा, 'अच्छा' ॥४॥
उन देवों ने कहा, 'इसको सोम के सिवाय और कुछ काफी न होगा। अतः इसके लिए
सोम को ही भरें।' उसके लिए सोम को भरा। यह सोम राजा जो देवों का अन्न है चन्द्रमा ही
है। जब वह इस (अमावस्या की) रात को न पूर्व में, न पश्चिम में दीखता है तो उस समय इस
लोक में आ जाता है और जलों और ओषधियों में प्रविष्ट हो जाता है। वह देवों का वसु या
व॒स्वन्व॑ꣳश्चैषां तथ्द्ये॑ष ए॒ताꣳ रात्रिम॒हामा वस॑ति तस्मादमावा॒स्या नाम॑ ॥ ५ ॥
तं गोभि॑रनुवि॒ष्ठाप्य॒ सम॑भरन् । यदोष॑धीरा॒शꣳस्तदोष॑धिभ्यो॒ यद॒पोऽपि॑बꣳस्तद॒द्द्भ्यस्त-
मेवꣳ संभृ॒त्यात॑प्य ती॒व्रीकृत्य॒ तम॑स्मै प्रायच्छन् ॥ ६ ॥ सोऽब्रवीत् । धिनोत्ये॒व मे॒-
दं नेव तु म॒यि श्रय॑ति॒ यथे॒दं म॒यि श्रय॑ति तथो॒पजानी॒तेति॒ तꣳ शृ॒तेनैवाश्र॑यन्
॥ ७ ॥ तद्धाऽशृतम् । समान॒मिव स॒त्यथ् एव सदिन्द्र॑स्यैव सन्तत्पुनर्नार्नेवाचक्षते
यद॒ब्रवीद्धिनो॑ति मेति॒ तस्माद्दध्यथ॒ यदेनं शृ॒तेनैवाश्र॑यंस्तस्माच्छृतꣳ ॥ ८ ॥ स य-
थाऽश्राव्या॑येत । एवमाप्यायताष पाप्मान॑ꣳ ह॒रिमाण॑मपह॒तेष उ॑ऽअ॒मावा॒स्यस्या
बन्धुः स यो है॒वं वि॒द्वाꣳसंन॑यतयेवꣳ है॒व प्र॒जया प॒शुभि॒राप्या॑यतेऽप पाप्मानं॑
ह॒ते तस्मा॑द्वि संन॑येत् ॥ ९ ॥ तदाहुः । नासो॑मयाजी संन॑येत्सोमाहु॒तिर्वाऽए॒षा मा-
नवरुद्धासो॑मयाजिनस्तस्मान्नासो॑मयाजी स॒नये॒दिति॑ ॥ १० ॥ तदु॒ समे॑व॒ नये॑त् । न-
न्वत्रा॑न्तरेण शुश्रुम सोमे॑न नु मा या॒जयताथ मऽए॒तदाप्याय॑नꣳ संभ॑रिष्यथेत्यब-
वी॒दिति॒ न वै मे॒दं धिनो॑ति यन्मा धि॒न्वन्तन्मे॑ कुरु॒तेति॒ तस्मा॑ऽए॒तदाप्याय॑नꣳ सं-
म॑भरꣳस्तस्माद्यद्यसो॑मयाजी स॒मेव॒ नये॑त् ॥ ११॥ वार्त्र॒घ्नं वै पौर्णमा॒सम् । इन्द्रो॒ ह्ये-
तेन वृ॒त्रमह॑न्नथैतदे॑व वृत्र॒हत्यं यद॑मावा॒स्यं वृ॒त्रꣳ ह्यस्माऽए॒तत्स॒मृष॒ऽआ॒प्याय॑न-
मकु॑र्वन् ॥ १२ ॥ तद्धाऽए॒तदेव वार्त्र॒घ्नम् । यत्पौर्णमासमथैष ए॒व वृ॒त्रो यच्चन्द्रमाः
स य॑त्रैष ए॒ताꣳ रात्रिं न पु॒रस्ता॒न्न प॒श्चाद्ददृशे॒ तदेनमे॒तेन॒ सर्वꣳ॑ ह॒न्ति नास्य॒ किं
चन परि॑शिनष्टि॒ सर्वꣳ॑ ह॒ वै पाप्मानं॑ ह॒न्ति न पाप्मनः॒ किं चन परि॑शिनष्टि
य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ १३ ॥ तद्धैके । दृष्टोप॑वसन्ति श्वो नोदे॒तेत्यदो॒ है॒व दे॒वाना॒मवि-
क्षीणा॒मन्नं भ॑वत्यथैभ्यो वयमि॒त उप॑प्रदास्याम॒ इति॒ तद्धि समृ॑द्धं यद॒क्षीण॑ऽए॒व पूर्व॑-
स्मिन्न॒न्नेऽथाप॑र॒मन्नमागच्छ॑ति॒ स ह ब॒ह्वन्न॑ ए॒व भव॑त्यसोमयाजी तु क्षीर्या॒ड्यदो॒ है॒व
सोमो राजा भव॑ति ॥ १४॥ अथ॒ यथै॑व पु॒रा । केव॑लीरोषधी॒रश्न॑न्ति॒ केव॑लीर॒पः
पिब॑न्ति ताः केवल॑मेव॒ पयो दुह्रऽए॒व तदे॒ष वै सोमो राजा दे॒वाना॒मन्नं यच्चन्द्र-
कां० १, अ० ६, ब्रा० ४, कं० ५-१५ शतपथब्राह्मण / १२७
अन्न है। और चूंकि इस रात को वह यहाँ साथ रहता है (अमा वसति) इसलिए इसका
नाम अमावस्या है ॥५॥
उन्होंने इस (सोम) को गौओं द्वारा इकट्ठा करा-कराके तैयार किया। जो औषध
खाई उस औषध से, और जो जल पिया उस जल से, उसी को बनाकर और तीव्र (तेज) करके
उन्होंने (इन्द्र को) दिया ॥६॥
उस (इन्द्र) ने कहा, 'इससे मेरा पेट तो भर जाता है पर यह मुझे अच्छा नहीं लगता।
ऐसा उपाय करो कि वह मुझे अच्छा लगने लगे। उन्होंने उसे औटे हुए (दूध) के द्वारा रुचिकर
बना दिया ॥७॥
यद्यपि यह एक ही चीज है, दूध ही है और इन्द्र का ही है, फिर भी इसको नाना (अनेक)
कहते हैं। चूंकि इन्द्र ने कहा 'धिनोति मे' (मेरा पेट भर जाता है) इसलिए इसका नाम हुआ 'दधि'
और चूंकि इसमें 'श्रुत' अर्थात् औटा हुआ दूध मिलाया इसलिए उसको 'श्रुत' कहते हैं ॥८॥
जैसे सोम का डण्ठल मजबूत हो जाता है इसी प्रकार (इन्द्र भी) मजबूत हो गया और
उसका रोगी हरापन जाता रहा । अमावस्या यज्ञ का यही महत्त्व है और जो कोई इस रहस्य को
समझकर (अमावस्या के यज्ञ में दूध और दही) मिलाता है वह प्रजा और पशु से पूर्ण होता है।
उसका दोष छूट जाता है। इसलिये उसको दूध और दधि मिलाना चाहिए ॥६॥
इस पर कुछ लोग आक्षेप करते हैं कि जो सोमयाजी न हो उसे सान्नाय्य आहुति न देनी
चाहिए, क्योंकि सान्नाय्य हीसोम आहुति हैं। और जो सोमयाजी न हो उसको सोम आहुति देने का
अधिकार नहीं। इसलिए जो सोमयाजी नहीं उसको सान्नाय्य आहुति नहीं देनी चाहिए ॥१०॥
परन्तु उसे सान्नाध्य आहुति देनी चाहिए। हमने इसी सम्बन्ध में सुना है कि इन्द्र ने कहा
कि, 'इस समय मुझे सोम आहुति दे दो, फिर तुम मेरे लिए उस शक्ति देनेवाली वस्तु (सान्नाय्य
आहुति) को तैयार करना। इससे मेरा पेट नहीं भरता। वह बनाओ जिससे मेरी सन्तुष्टि हो।'
उस शक्ति देनेवाली वस्तु को उन्होंने अवश्य ही तैयार किया और इसलिए जो सोमयाजी नहीं
हैं वे भी सान्नाय्य आहुति दें ॥११॥
पूर्णमास यज्ञ वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है, क्योंकि इसी के द्वारा इन्द्र ने वृत्र को
मारा। और अमावस्या यज्ञ भी वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है, क्योंकि वह शक्ति देनेवाली
चीज भी उन्होंने उसी के लिए तैयार की जिसने वृत्र को मारा ॥१२॥
यज्ञ जो पूर्णमास यज्ञ है वह वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है। यह जो चन्द्रमा है वही वृत्र
है। जब वह उस रात को न पूर्व में दीखता है, न पश्चिम में, तो इस यज्ञ के द्वारा (वह इन्द्र) इस
सब (वृत्र) को मार डालता है, और उसका कुछ भी शेष नहीं रहने देता। जो इस रहस्य को
जानता है वह सब पाप का नाश कर देता है, कुछ भी नहीं छोड़ता ॥१३॥
कुछ लोग (चौदस को) देखकर ही उपवास करते हैं कि कल (अमावस्या को यह चाँद)
उदय न होगा। यह देवों का निश्चय करके दीखता हुआ भोजन है। (कल से) उनके लिए हम
इसमें से देंगे। वह पुरुष वस्तुतः समृद्ध है जिसके पास अभी पुराना अन्न होता है और नया आ
जाता है, क्योंकि उसके पास बहुत अन्न होता है। परन्तु वह इस समय सोमयाजी नहीं है;
क्षीरयाजी है। इसी दूध का सोम राजा होता है ॥१४॥
इसलिए यह (दूध सोम से युक्त नहीं किन्तु) पूर्ववत् ही है क्योंकि (गायें) केवल ओषधि
ही खाती हैं, केवल जल ही पीती हैं। इसलिए यह केवल दूध ही होता है (सोम नहीं); सोम तब
होता जब अमावस्या के दिन चन्द्रमा वनस्पति और जलों में मिल जाता (ऊपर कह चुके हैं कि