सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

६८० शतपथ ब्राह्मण
वाचो॒ वद॑ति ॥ १९॥ अथ॑ वाकोवाक्यं॑ ब्रह्म॒ोद्यं॑ वदन्ति । स॒र्वं वै ते॑षामा॒प्तं भव॑-
ति॒ सर्वं॑ जि॒तं ये स॒त्त्रमास॑ते॒ऽचारि॒षुर्यजु॑र्भि॒स्तत्ता॒न्याप॑स्त॒द्वावृ॑त्सता॒शꣳ॑सिषु॒र्ऋच॑स्त-
त्ता आ॑प॑स्त॒द्वावृ॑त्सता॒स्तोष्य॒न् साम॑भि॒स्तत्ता॒न्याप॑स्त॒द्वावृ॑त्सद्यदि॒ षमित्ते॒देवा॒नाप्त॑-
म॒नवरु॑द्धं भवति॒ यद्वाकोवाक्यं॑ ब्राह्म॒णं तद्द्वैवे॑तेना॒प्नुव॑न्ति॒ तद्व॑रुन्धते ॥ २० ॥
औदुम्ब॑रीमुप॒संमृ॑ज्य॒ वाचं॑ यच्छन्ति । वि॒दुह्य॑न्ति वा॒ऽए॒ते य॒ज्ञं निर्द्धय॑न्ति ये वा॒चा
य॒ज्ञं त॑न्वते॒ वाग्वि य॒ज्ञस्तामे॑षां पुरैके॑क ए॒व वा॑चंय॒म आस्ते॒ वाच॑मा॒प्याय॑यंस्त-
यापीनयायातया॒म्न्योत्त॑रमह॒स्तन्व॑ते॒ऽथात्र सर्वै॑व वागा॒प्ता भव॑त्यपवृ॒क्ता ताꣳ सर्व॑
ऽए॒व वा॑चंयमा वा॒चमा॒प्याय॑यन्ति तयापीनयायातया॒म्न्याति॑रा॒त्रं त॑न्वते ॥ २१ ॥
औदुम्ब॑रीमन्वा॒रभ्या॑सते । अन्नं॒ वाऽऊर्गौदु॑म्बर ऊ॒र्जेवैतद्वाच॑मा॒प्याय॑यन्ति ॥ २२॥
ते॒ऽस्त॑मिते प्राञ्च उ॒न्निष्क्रा॑मन्ति । ते ज॒घने॑नाहव॒नीय॒मास॑ते॒ऽग्रेण ह॒विर्द्धाने ता-
न्वाचं॑यमा॒नेव॒ वाचं॑यमः प्रतिप्रस्थाता वसतीवरीभिरभि॒परि॒हर॑ति ते॒ यत्का॑मा
आ॒सीरं॒स्तेन॒ वाचं॑ वि॒सृजे॑र॒न्कमि॒र्ह स्म॒ वै पु॒रुर्षयः स॒त्त्रमास॑ते॒ऽसौ नः काम॒:
स न॒: समृ॑द्ध्यता॒मिति॒ यद्यु॒ऽअ॑नेककामाः स्युर्लोककामा वा प्रजाकामा वा पशुका-
मा वा ॥ २३॥ अ॒नेनै॑व वाचं॑ वि॒सृजे॑रन् । भूर्भुव॒: स्व॒रिति॒ तत्स॒त्येनै॒वैतद्वाचं॑
समर्द्धय॑न्ति तया॒ समृ॑द्ध्या॒शिष॒ आशा॑सते सुप्र॒जाः प्र॒जाभि॑ः स्यामेति तत्प्र॒जामाशा॑-
सते सुवी॒रा वी॒रैरिति॒ तद्वी॒रानाशा॑सते सुपोष॒: पोषै॒रिति॒ तत्पुष्टि॒माशा॑सते
॥ २४॥ अथ गृह॒पति॑: सुब्रह्म॒ण्यामाह्व॑यति । यं वा गृह॒पति॑र्ब्रूयात्पृथगु हैवैके
सुब्रह्म॒ण्यामाह्व॑यीत गृह॒पति॑स्त्वेव सुब्रह्म॒ण्यामाह्व॑येद्यं वा गृह॒पति॑र्ब्रूयात्तस्मिन्स-
मुप॒ह्वन॑मिष्ट्वा समिधो॒ऽभ्याद॑धाति ॥ २५॥ ब्राह्म॒णम् ॥ ११ [६. १.] ॥ पञ्चमः प्रपाठ-
कः ॥ कण्डिकासंख्या १२६ ॥ ॥ षष्ठोऽध्यायः [३०.] ॥ ॥ अस्मिन्काण्डे कण्डिकासं-
ख्या ६४८ ॥ ॥
इति माध्यन्दिनीये शतपथब्राह्मणे ग्रहनाम चतुर्थं काण्डं समाप्तम् ॥४॥

·कां० ४, अ० ६, ब्रा० ६, कं० १६-२५. शतपथब्राह्मण / ६८१
प्रकार वह मानुषी वाणी के लिए कल्याण चाहता है ॥१६॥
अब वाकोवाक्य के रूप में ब्रह्मोद्य पड़ते हैं। उनको सभी कुछ प्राप्त हो जाता है, सब जीत
लिया जाता है जो सत्र में बैठते हैं। इन्होंने यजुओं से यज्ञ किया, इतना उनको मिल गया, इतना
प्राप्त हो गया। उन्होंने ऋचाएँ पढ़ीं, उनको इतना मिल गया, इतना प्राप्त हो गया। उन्होंने
साम से स्तुति की, उनको इतना मिल गया, इतना प्राप्त हो गया। परन्तु इतना नहीं मिला,
इतना नहीं प्राप्त हुआ अर्थात् वाकोवाक्य या ब्राह्मण, इसको वे इसके द्वारा प्राप्त करते हैं ॥२०॥
औदुम्बरी के पास पहुँचकर वे वाणी को रोक लेते हैं। जो वाणी से यज्ञ करते हैं वे यज्ञ
को दुह लेते या चूस लेते हैं, क्योंकि वाणी यज्ञ है। इससे पहले हर एक वाणी को रोककर बैठता
है अर्थात् उसको प्रबल बनाता है। इस रुकी हुई और प्रबल हुई वाणी के द्वारा वे अन्त के दिन यज्ञ
करते हैं। परन्तु इस वाकोवाक्य में समस्त वाणी थक जाती है। वे सब इस वाणी को चुप होकर
शक्तिशाली करते हैं। इस प्रकार प्रबल और शक्ति-सम्पन्ना वाणी से वे अतिरात्र करते हैं ॥२१॥
औदुम्बरी को छूकर बैठते हैं। अन्न शक्ति है। उदुम्बर शक्ति है। उदुम्बर से ही वे
वाणी को शक्ति देते हैं ॥२२॥
सूर्यास्त पर वे सदस् से पूर्व की ओर बाहर आते हैं, और हविर्धान के सामने आहवनीय
के पीछे बैठते हैं। जब वे चुपचाप बैठे होते हैं तो प्रतिप्रस्थाता उनके चारों ओर वस्तीवरी जलों
को फिराता है। जिस कामना के लिए उन्होंने यह सत्र रचा उसी कामना से उनको इस वाणी को
छोड़ना चाहिए (अर्थात् मौन तोड़ते समय उसी समय बात को कहना चाहिए)। क्योंकि पहले
समय में ऋषियों ने भिन्न-भिन्न कामनाओं से सत्र किये थे अर्थात् यह हमारी इच्छा है, हमको
यह मिले इत्यादि। और यदि उनकी कामनाएँ अनेक हों अर्थात् लोक की कामना, सन्तान की
कामना या पशुओं की कामना, तो—॥२३॥
'भूः भुवः स्वः' कहकर मौन तोड़ना चाहिए। इस प्रकार सत्य के द्वारा वाणी को शक्ति-
शाली बनाते हैं, और इसी शक्तिशाली वाणी से आशीर्वाद देते हैं। "सुप्रजाः प्रजाभिः स्याम"
(यजु० ८।५३)—"हम सन्तानवाले हों।" इससे सन्तान की प्रार्थना करते हैं। "सुवीराः वीरैः"
(यजु० ८।५३)—"वीर पुरुषों से युक्त हों।" इससे वीर पुरुषों के लिए प्रार्थना करते हैं।
"सुपोषाः पोषैः" (यजु० ८।५३)—"सम्पत्तिशाली हों।" इससे सम्पत्ति के लिए प्रार्थना ॥२४॥
अब गृहपति सुब्रह्मण्या को पढ़ता है, या वह पुरुष जिसको गृहपति नियुक्त कर दें। कुछ
लोग सुब्रह्मण्या को पृथक्-पृथक् पढ़ते हैं, परन्तु गृहपति को ही सुब्रह्मण्या पढ़नी चाहिए या उसको
जिसे गृहपति आज्ञा दे। (अतिरात्र भोज में) निमंत्रण की इच्छा करके वे आग पर समिधाएँ
रख देते हैं ॥२५॥
माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका'
भाषा व्याख्या का ग्रहनाम चतुर्थ काण्ड समाप्त हुआ।
चतुर्थ काण्ड
प्रपाठक कण्डिका-संख्या
प्रथम [४. २. १] १३६
द्वितीय [४. ३. ३] १३६
तृतीय [४. ४. ४] १२२
चतुर्थ [४. ५. ८] १२५
पञ्चम [४. ६ ६] १२६
योग ६४८
पूर्व के काण्डों का योग २२४६
पूर्णयोग २८९४